भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 915

भविष्यपर्व ] एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ ८९१


दस्ताने बाँध रखे थे। वह बलसे उन्मत्त हो रहा था। उसकी आँखें पलाशके फूलकी भाँति लाल थीं। वह सुवर्णसे जटिल होनेके कारण मनोहर एवं विचित्र धनुष लेकर खड़ा था। उसके नेत्र गोल गोल और बड़े-बड़े थे॥ ७२ ॥

महासुरेन्द्रश्च महासुरैर्वृतो बलिस्तदा स्यन्दनमारुरोह । वैदूर्यहैमोपचितं विशालं विद्युतप्रभं षोडशनलवमात्रम् ॥ ७३ ॥

तदनन्तर उस समय बड़े-बड़े असुरोंसे घिरे हुए महान् असुरराज बलि रथपर आरूढ़ हुए। उनका वह विशाल रथ वैदूर्यमणि और सुवर्णसे जटिल था, विद्युत्के समान प्रकाशित होता था और उसकी लंबाई चौसठ हाथकी थी ॥ ७३ ॥

युक्तं सहस्रेण दितेः सुतानां गजाननानां विकृताकृतीनाम् । चामीकरोरःस्थलभूषितानां प्रनर्दतां प्रावृषि चाम्बुदानाम् ॥ ७४ ॥

उसमें हाथीके-से मुख और विकट आकारवाले एक सहस्र दैत्य जुते हुए थे। उन सबके वक्षःस्थल सुवर्णसे विभूषित थे तथा वे वर्षाकालके मेघोंके समान जोर-जोरसे गर्जना करते थे ॥ ७४ ॥

महारथं देवरथप्रकाशं सहस्रमायेन मयेन सृष्टम् । ईहामृगाक्रीडितभक्तिचित्रं दिव्यं रथं दिव्यरथानुयातम् ॥ ७५ ॥

वह महान् रथ देवताओंके रथ (विमान) की भाँति प्रकाशित होता था। सहस्रों मायाओंके ज्ञाता मयासुरने उसका निर्माण किया था। उसके भीतर क्रीडा-मृग और उनके क्रीडास्थलके विभिन्न चित्र बने हुए थे, जो उस दिव्य रथकी शोभा बढ़ाते थे। उस रथके पीछे और भी बहुत-से दिव्य रथ चलते थे ॥ ७५ ॥

सकिङ्किणीकं विमलं सुविस्तृतं हिरण्मयैः पद्मशतैरलंकृतम् । अभ्याददे वैजयिकीं जयाय स्रजं बलिर्हैमविचित्रपुष्पाम् ॥ ७६ ॥

उसमें छोटी-छोटी घण्टियाँ लगी थीं। वह निर्मल एवं सुविस्तृत रथ सैकड़ों सुवर्णमय कमलोंसे अलंकृत था। उसपर आरूढ़ होकर बलिने विजयके लिये वैजयन्तीकी माला ग्रहण की, जिसमें विचित्र सुवर्णमय पुष्प गुँथे हुए थे ॥ ७६ ॥

आबध्य मालां प्रभया विचित्रां बलिस्तदा भाति भुजैर्विशालैः । रराज तैः सर्वसमृद्धियुक्तै- र्महार्चिषा सूर्य इवाम्बरस्थः ॥ ७७ ॥

उस समय राजा बलि वह दिव्य प्रभासे युक्त विचित्र माला धारण करके सम्पूर्ण समृद्धियोंसे युक्त अपनी विशाल भुजाओंके द्वारा उसी तरह शोभा पा रहे थे, जैसे आकाशमें स्थित हुए सूर्य अपनी महाप्रभासे अत्यन्त उद्भासित होते रहते हैं ॥

स्रजं तदा बध्नति चास्य दुर्गा सर्वासुराणामिव हारभूताम् । वैरोचनिः सर्वश्रियाभिजुष्टो विभ्राजतेऽसौ शरदीव चन्द्रः ॥ ७८ ॥

उस समय साक्षात् दुर्गादेवीने समस्त असुरोंके लिये हारस्वरूप उस पुष्पमालाको बलिके गलेमें पहनाया था। उसे पहनकर सब प्रकारकी शोभा-सम्पत्तिसे सेवित विरोचन-कुमार बलि शरद्-ऋतुके चन्द्रमाकी भाँति सुशोभित होने लगे ॥ ७८ ॥

मेरोस्तटे वा ज्वलनप्रकाशे ह्यादित्यसंयुक्तमिवाभ्रजालम् । प्रासांश्च पाशांश्च हिरण्यबद्धा वर्माणि खड्गांश्च परश्वधांश्च ॥ ७९ ॥ धनूंषि वज्रायुधसप्रभाणि दिव्या गदा वज्रमुखाश्च शक्त्यः । दिव्याश्च खङ्गा विशिखाश्च दीप्ता नाराचपूर्णा विविधाश्च तूणाः ॥ ८० ॥ धृता रथे दैत्यवृषस्य तस्य चकाशिरे प्रज्वलिता यथोल्काः ।

अथवा अग्निके समान प्रकाशित होनेवाले मेरु पर्वतके तट-प्रान्तमें सूर्यसे संयुक्त हुए मेघसमूहकी जैसी शोभा होती है, वैसी ही शोभा उस समय राजा बलिकी हो रही थी। उन दैत्यप्रवर बलिके रथमें प्रास, सुवर्णजटिल पाश, कवच, खड्ग, फरसे, वज्रके समान प्रकाशित होनेवाले धनुष, दिव्य गदा, वज्रमुखी शक्तियाँ, दिव्य खड्ग, प्रज्वलित बाण तथा उन बाणोंसे भरे हुए नाना प्रकारके तरकस रखे गये थे, जो प्रज्वलित उल्काओंके समान प्रकाशित होते थे ॥७९-८०½॥

तं चामरापीडधराः सुदंष्ट्राः सुवर्णमुक्तामणिहेमचित्राः ॥ ८१ ॥ वीजन्ति वालव्यजनैर्विनीता महासुराः स्यन्दनवेदिकास्थाः ।

हाथमें चँवर और सिरपर पगड़ी धारण किये, सोना, मोती, मणि और हेमके विचित्र आभूषणोंसे अलंकृत, सुन्दर दाढ़ोंवाले और विनयशील महान् असुर उस रथकी वेदिका-पर खड़े हो बालव्यंजनों (चँवरों) से राजा बलिको हवा करते थे ॥ ८१½ ॥

अयःशिरा अश्वशिरा दुरापः शिविर्मतङ्गो विशिराः शताक्षः ॥ ८२ ॥ अयो निकुम्भः क्रथनश्च दानवो ररक्षिरे ते दश दानवाधिपम् ।

अयःशिरा, अश्वशिरा, दुराप, शिवि, मतङ्ग, विशिरा