भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 916, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 916
८९२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

शताक्ष, अयस्, निकुम्भ और कथन—ये दस दानव दानवराज बलिकी रक्षामें तत्पर रहते थे ॥ ८२ १/२ ॥

पुरश्चराश्चैव सहस्रशोऽसुराः पदातयो दानवराजरक्षिणः ॥ ८३ ॥ शतघ्निचक्राशनिशक्तिपाणयः प्रजग्मुरग्रेऽनिलतुल्यवेगिनः ।

दानवराज बलिकी रक्षाके लिये हजारों पैदल असुर उनके आगे-आगे भी चलते थे । वे सब शतघ्नी, चक्र, अशनि और शक्ति हाथमें लेकर वायुके समान वेगसे आगे-आगे चल रहे थे ॥ ८३ १/२ ॥

घण्टाः सुशब्दास्तपनीयबद्धा आडम्बरा गर्गरडिण्डिमाश्च ॥ ८४ ॥ महारवा दुन्दुभयश्च नेदू रथप्रयाणे दितिजेश्वरस्य ।

दैत्यराज बलिको रथ जब प्रस्थित हुआ, उस समय सुवर्णजटित घण्टे सुन्दर शब्द करते हुए बजने लगे । तुरही वा बिगुल, गर्गर (प्राचीन वाद्यविशेष), नगाड़े तथा महान् शब्द करनेवाली दुन्दुभियाँ—इन सबकी तुमुल ध्वनि होने लगी ॥ ८४ १/२ ॥

तस्योत्थितः काञ्चनवेदिकाढ्यो हिरण्मयो दिव्यमहापताकः ॥ ८५ ॥ महाध्वजो वै तपनीयनद्धो रराज वीरस्य यथा विवस्वान् ।

वीर राजा बलिको सुवर्णजटित और विशेषतः सोनेका ही बना हुआ विशाल ध्वज ऊपरको उठा हुआ था, उसकी दिव्य पताका बहुत बड़ी थी तथा वह सुवर्णमयी वेदीसे संयुक्त था । वह विशाल ध्वज भगवान् सूर्यके समान प्रकाशित होता था ॥ ८५ १/२ ॥

समुच्छ्रितं काञ्चनमातपत्रं स्रक्काञ्चनी वक्षसि चास्य भाति ॥ ८६ ॥ समन्ततश्चाप्यसुराश्चरन्ति दैत्यर्षयः प्राञ्जलयो जयन्ति ।

राजा बलिके ऊपर सोनेका ऊँचा छत्र तना हुआ था और उनके वक्षःस्थलपर सुवर्णमयी माला शोभा पा रही थी । उनके चारों ओर बहुत-से असुर विचरते थे और दैत्य, ऋषि हाथ जोड़कर जय-जयकार करते थे ॥ ८६ १/२ ॥

पुरोहिताः शत्रुवधे समाहिता- स्तथैव चान्ये श्रुतशीलवृद्धाः ॥ ८७ ॥ जपैश्च मन्त्रैश्च तथौषधीभि- र्महात्मनः स्वस्त्ययनं प्रचक्रुः ।

राजा बलिके पुरोहित तथा वेद और शीलमें बढ़े-चढ़े दूसरे ब्राह्मण राजाके शत्रुओंके वधके उद्देश्यसे एकाग्रचित्त हो मन्त्रजप, वेदपाठ तथा ओषधियोंके प्रयोगद्वारा उन महात्मा नरेशके लिये स्वस्तिवाचन करते थे ॥ ८७ १/२ ॥

स तत्र वस्त्राणि शुभांश्च गावः फलानि पुष्पाणि तथैव निष्कान् ॥ ८८ ॥ वलिर्द्विजेभ्यः प्रयतः प्रयच्छन् विराजतेऽतीव यथा धनेशः ।

राजा बलि अपने मनको संयममें रखकर वहाँ उन ब्राह्मणोंको वस्त्र, सुन्दर गौएँ, फल-फूल और पदक अधिक मात्रामें देते हुए धनाध्यक्ष कुबेरके समान अतिशय शोभा पा रहे थे ॥ ८८ १/२ ॥

सहस्रसूर्यो बहुकिङ्किणीकः परार्ध्यजाम्बूनदहेमचित्रः ॥ ८९ ॥ सहस्रचन्द्रायुततारकश्च रथो वलेरग्निरिवावभाति ।

बलिको रथ सहस्र सूर्योंके चित्रसे शोभित था, उसमें बहुत-सी छोटी-छोटी घंटियाँ लटकायी गयी थीं । उसमें बहुमूल्य जाम्बूनद और सुवर्ण जड़े गये थे, जिनसे उसकी विचित्र शोभा हो रही थी । सहस्रों चन्द्रमाओं तथा दस हजार तारिकाओंसे युक्त बलिको वह रथ अग्निके समान उद्भासित हो रहा था ॥ ८९ १/२ ॥

तमास्थितो दानवसंगृहीतं महाबलः कार्मुकधृक् सवाणः ॥ ९० ॥ उद्धर्तिष्यंस्त्रिदशेन्द्रसेना- मतीव रौद्रं स विभर्ति रूपम् ।

उस रथकी वागडोर एक दानवने ले रखी थी। महाबली बलि उसपर आरूढ़ हो धनुष और बाण लेकर अत्यन्त भयंकर रूप धारण किये हुए थे । उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो वे देवेन्द्रकी सेनाका संहार कर डालेंगे ॥

स वेगवान् वीररथौघसंकुलः प्रयाति देवान् प्रति दैत्यसागरः ॥ ९१ ॥ महार्णवो वीचितरङ्गसंकुलो यथा जलौघैर्युगसंक्षये तथा ।

वीर रथियोंके प्रवाहसे व्याप्त हुआ वह वेगशाली दैत्य-सागर देवताओंकी ओर बढ़ा जा रहा था । ठीक उसी तरह जैसे प्रलयकालमें जलके प्रवाह और उत्ताल तरङ्गोंसे व्याप्त महासागर समस्त त्रिलोकीको डुबो देनेके लिये बढ़ने लगता है ॥

त्रैलोक्यवित्रासकरैर्वपुर्भि- स्तान्यग्रतो यान्ति वले रथस्य ॥ ९२ ॥ महाबलान्युच्छ्रितकार्मुकाणि सपर्वतानीव वनानि राजन् ॥ ९३ ॥