भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 917
भविष्यपर्व ]द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः८९३

राजन् ! बलिके रथके आगे उनके बड़े-बड़े सैनिक धनुष उठाये तीनों लोकोंको भयभीत कर देनेवाले शरीरोंसे बढ़े जा रहे थे, उस समय वे पर्वतोंसहित वनोंके समान जान पड़ते थे ॥ ९२-९३ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामने बलेरुद्योगे एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें बलिके उद्योगविषयक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५१ ॥


द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

इन्द्र आदि देवताओं और लोकपालोंका युद्धके लिये उद्योग और प्रस्थान

वैशम्पायन उवाच
श्रुतस्ते दैत्यसैन्यस्य विस्तरो जनमेजय ।
भूयस्त्रिदशसैन्यस्य शृणु विस्तरमादितः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! तुमने दैत्योंकी सेनाका विस्तारपूर्वक वर्णन सुन लिया; अब पुनः देवताओंकी सेनाका विस्तार आरम्भसे ही बता रहा हूँ, सुनो ॥ १ ॥

सुराधिपस्तु भगवानाज्ञापयत वै सुरान् ।
मरुद्गणांस्तथादित्यान् विश्वान् देवांश्च वासवः ॥ २ ॥
वस्तूनथौ भृशं सर्वान् यक्षरक्षोमहोरगान् ।
विद्याधरगणान् सर्वान् गन्धर्वांश्च महाबलान् ॥ ३ ॥
महार्णवांश्च शैलांश्च तथा रुद्रान् महौजसः ।
यमवैश्रवणौ चोभौ वरुणं च जनाधिपम् ॥ ४ ॥

देवताओंके अधिपति भगवान् इन्द्रने देवता, मरुद्गण, आदित्य, विश्वेदेव, आठ वसु, यक्ष, राक्षस, बड़े-बड़े नाग, समस्त विद्याधर-गण, महाबली गन्धर्व, महासागर, पर्वत, महातेजस्वी रुद्र, यम, कुबेर तथा राजा वरुणको युद्धके लिये तैयार होनेकी आज्ञा दी ॥ २-४ ॥

ये तु सिद्धा महात्मानः पितरश्च मनस्विनः ।
राजर्षयश्च शतशो योगसिद्धास्तथैव च ॥ ५ ॥
त्रिदशाज्ञापकः शक्र आज्ञापयति वीर्यवान् ।
भवन्तो दैत्यनाशाय संनह्यन्तामिति प्रभुः ॥ ६ ॥

उनके आदेशकी घोषणा इस प्रकार हुई—'जो सिद्ध महात्मा हैं, जो मनस्वी पितर हैं तथा जो राजर्षि और सैकड़ों योग-सिद्ध पुरुष हैं, उन सबको सर्वसमर्थ, देवशासक, पराक्रमी इन्द्र आज्ञा देते हैं कि आपलोग दैत्योंका विनाश करनेके लिये कमर कसकर तैयार हो जायें' ॥ ५-६ ॥

शक्रस्य वचनं श्रुत्वा ततः सर्वे दिवौकसः ।
संनह्यन्त महात्मानः शक्रस्य समविक्रमाः ॥ ७ ॥

देवेन्द्रका यह वचन सुनकर उनके समान ही पराक्रम प्रकट करनेवाले समस्त महामनस्वी देवता युद्धके लिये तैयार होने लगे ॥ ७ ॥

नानाकवचिनः सर्वे विचित्रकवचध्वजाः ।
नानायुधोद्यतकरा मत्ता इव महागजाः ॥ ८ ॥

उन सबने नाना प्रकारके कवच धारण किये। उनके कवच और ध्वज विचित्र थे । वे हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये हुए थे और मतवाले गजराजोंके समान युद्धके लिये उद्यत थे ॥ ८ ॥

केचिदारुरुहुर्व्याघ्रान् केचिदारुरुहुर्गजान् ।
केचिदारुरुहुर्नागान् केचिदारुरुहुर्वृषान् ॥ ९ ॥

उनमेंसे कुछ लोग व्याघ्रोंपर सवार थे और कुछ लोग हाथियोंपर । कोई नागोंपर चढ़े थे और कोई बैलोंपर ॥ ९ ॥

हरिनेत्रो हरिशमश्रुर्द्विरदैरावतध्वजम् ।
रथं हरिहयैर्युक्तं स प्रायात् समरं प्रति ॥ १० ॥

इन्द्रके नेत्र सिंहके समान चमकीले हैं, उनकी मूँछ नीले रंगकी है, उनका ध्वज ऐरावत हाथीसे चिह्नित है, उनके रथमे हरे रंगके घोड़े जुते हुए हैं । वे उसी रथपर आरूढ़ हो समरकी ओर चले ॥ १० ॥

आदित्यवर्णं विरजं सुधौतं
त्वष्ट्रा स्वयं निर्मितमीश्वरार्थम् ।
जालैश्च जाम्बूनद्भक्तिचित्रै-
रलंकृतं काञ्चनदामभिश्च ॥ ११ ॥

उस रथकी कान्ति सूर्यके समान थी । वह निर्मल तथा स्वच्छ धुला हुआ था । साक्षात् विश्वकर्माने इन्द्रके लिये उसका निर्माण किया था। वह सोनेकी जालियों, जाम्बूनदकी चित्रभङ्गी तथा सुवर्णकी लड़ियोंसे अलंकृत था ॥ ११ ॥

सकूबरोपस्करवन्धुरेषं
विद्युत्प्रभाभिः कृतमाभिताम्रम् ।
कैलासशृङ्गोपममिन्द्रयानं
सुचारुचारुं प्रतिचक्रचक्रम् ॥ १२ ॥

कूबर, अन्य उपकरण तथा मनोहर ईषादण्डसहित वह रथ विद्युत्‌की प्रभासे ताम्रवर्णका हो गया था । वह इन्द्र-यान कैलास-शिखरके समान दिखायी देता था और मनोहरसे भी मनोहर तथा शत्रुमण्डलीपर शासन करनेवाला था ॥ १२ ॥

तारासहस्रैः खचितं ज्वलद्भि-
र्देवार्हमाल्यार्चितसर्वदेहम् ।

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