विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 918, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें८९४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
समुच्छ्रितश्रीध्वजमक्षयाक्षं प्रज्वाल्यमानं पुरुषोत्तमेन ॥ १३ ॥ उसमें सहस्रों प्रकाशमान तारे जड़े हुए थे। उस रथका सम्पूर्ण अङ्ग देवोचित मालाओंसे पूजित था। उसमें शोभा-शाली ऊँचा ध्वज फहरा रहा था तथा उसका धुरा कभी क्षीण होनेवाला नहीं था। पुरुषोत्तम इन्द्रकी कान्तिसे वह रथ और भी उद्भासित हो रहा था ॥ १३ ॥
आस्थाय तं भास्करमाशुवेगं शचीपतिर्लोकपतिः सुरेशः । वज्रस्य भर्ता भुवनस्य गोप्ता ययौ महात्मा भगवान् महेन्द्रः ॥ १४ ॥ तीव्र वेगसे चलनेवाले उस तेजस्वी रथपर आरूढ़ हो तीनों लोकोंके स्वामी देवताओंके ईश्वर वज्रधारी भुवनरक्षक शचीपति महात्मा भगवान् महेन्द्र युद्धके लिये चले ॥ १४ ॥
आमुच्य वर्मीथ सहस्रतारं हुताशनादित्यसमप्रभावम् । सूर्यप्रभं चामुमुचे किरीटं मालां च जाम्बूनदवैजयन्तीम् ॥ १५ ॥ उन्होंने अग्नि और सूर्यके समान प्रभापुञ्जसे परिपूर्ण सहस्र तारिकावाले कवचको धारण करके मस्तकपर सूर्यके समान तेजस्वी मुकुटको रखा और गलेमें पैरोंतक लटकने-वाली जाम्बूनदमयी वैजयन्तीमाला धारण की ॥ १५ ॥
त्वष्ट्रा कृतं भास्कररश्मिदीप्तं सुतीक्ष्णघोरामलतीव्रधारम् । महासुराणां रुधिराईमुग्रं प्रगृह्य वज्रं शतपर्व भीमम् ॥ १६ ॥ इसके बाद सौ पर्वोंसे युक्त भयंकर वज्र हाथमें लिया, जो बड़े-बड़े असुरोंके रक्तसे भीगा हुआ था। सूर्यकी किरणोंके समान उदीप्त होनेवाले उस उग्र वज्रका निर्माण साक्षात् विश्वकर्माने किया था। उसकी धार अत्यन्त तीक्ष्ण, घोर, निर्मल और तीव्र थी ॥ १६ ॥
महाशनी द्वे च महाग्रहाभे दीप्ताममोघां च सशक्तिमुग्राम् । चक्रं तथैन्द्रं सुमहत्प्रतापं प्रगृह्य शक्रः प्रययौ रणाय ॥ १७ ॥ महान् ग्रहोंके समान प्रकाशित होनेवाली दो अशनियाँ, प्रज्वलित एवं अमोघ उग्र शक्ति तथा महाप्रतापी ऐन्द्र-चक्र हाथमें लेकर देवराज इन्द्र युद्धके लिये प्रस्थित हुए ॥१७॥
सहस्रदृग् भूतपतिः सनातनः सनातनानामपि यः सनातनः । खङ्गं च देवाधिपतिर्महात्मा वैयाघ्रमादाय च चर्म चित्रम् ॥ १८ ॥ उनके सहस्र नेत्र हैं। वे सम्पूर्ण भूतोंके सनातन पति हैं। सनातनोंके भी सनातन हैं। देवताओंके भी अधिपति और महामनस्वी हैं। वे उस समय व्याघ्रचर्मकी बनी हुई विचित्र ढाल और एक तलवार लेकर संग्रामभूमिकी ओर चले ॥१८॥
क्षीरोदविक्षोभसमुच्छ्रितानि पुरामृतादुत्तमभूषणानि । देवासुराणां श्रमनिर्जितानि सोमार्कनक्षत्रतडित्प्रभाणि ॥ १९ ॥ दत्तान्यदित्या मणिकुण्डलानि युद्धे प्रयातस्य सुरेश्वरस्य । तैरूपितो भाति सहस्रचक्षु- रुद्द्योतयन् वै विदिशो दिशश्च ॥ २० ॥ पूर्वकालमें क्षीरसागरके मन्थनसे जिनका प्राकट्य हुआ था, जो अमृतसे निकले थे तथा देवता और असुर दोनोंके परिश्रमसे उपलब्ध हुए थे, जिनकी प्रभा चन्द्रमा, सूर्य, नक्षत्र और विद्युत्के समान थी तथा जो सर्वोत्तम भूषण माने गये थे, उन मणिमय कुण्डलोंको अदितिने युद्धके लिये प्रस्थित हुए देवराज इन्द्रको दिया। उनसे भूषित होकर सहस्रलोचन इन्द्र दिशाओं और विदिशाओंको प्रकाशित करते हुए बड़ी शोभा पाने लगे ॥ १९-२० !
हरिः प्रभुर्नेत्रसहस्रचित्रो विभाति युद्धाभिमुखः सुरेन्द्रः । यथा सितं शारदमभ्रकल्पं नभस्तलं ऋक्षसहस्रचित्रम् ॥ २१ ॥ सर्वसमर्थ देवराज इन्द्र युद्धके लिये उत्सुक हो सहस्र नेत्रोंकी विचित्र शोभा धारण किये ऐसे जान पड़ते थे मानो शरद् ऋतुका मेघहीन स्वच्छ आकाश सहस्रों नक्षत्रोंसे चितकबरा दिखायी देता हो ॥ २१ ॥
स्तुवन्ति यान्तं विपुलैर्वचोभि- र्जयाशिषा चोर्जितसत्त्ववीर्यम् । अत्रिर्वसिष्ठो जमदग्निरुर्वो बृहस्पतिर्नारदपर्वतौ च ॥ २२ ॥ बढ़े हुए धर्म तथा बल पराक्रमसे सम्पन्न इन्द्र जब युद्धके लिये चले, तब अत्रि, वशिष्ठ, जमदग्नि, उर्व, बृहस्पति, नारद तथा पर्वत—ये ऋषि अपने विपुल वचनों-द्वारा उन्हें विजयके लिये आशीर्वाद देते हुए उनकी स्तुति करने लगे ॥ २२ ॥
तमन्वयुर्देवगणा महेन्द्रं प्रयान्तमादित्यसमानवर्चसम् । विश्वे च देवा मरुतस्तथैव साध्यास्तथाऽऽदित्यगणाश्च सर्वे ॥ २३॥ सूर्यके समान तेजस्वी महेन्द्रको जाते देख उनके पीछे विश्वेदेव, मरुद्गण, साध्य, आदित्यगण तथा अन्य सब देवता भी चले ॥ २३ ॥