भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 919

भविष्यपर्व ] द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ ८९५


ते देवराजस्य पुरंदरस्य
हयाश्च ये मातुलिसंगृहीताः ।
प्रयान्ति देवेश्वरसमुद्वहन्तो
नभस्तलं पद्भिरिवाक्षिपन्तः ॥ २४ ॥

जिनकी रास मातलिने पकड़ रखी थी, वे देवराज इन्द्रके घोड़े देवेश्वरकी सवारी ढोते हुए आकाशको अपने पैरोंसे तिरस्कृत करते हुए-से तीव्र गतिसे आगे बढ़ने लगे ॥ २४ ॥

ब्रह्मर्षयश्चैव महर्षयश्च
राजर्षयश्चाक्षयपुण्यलोकाः ।
सर्वेऽनुजग्मुः सहसा ज्वलन्तं
तेजोऽन्वितं शक्रममित्रसाहम् ॥ २५ ॥

अक्षय पुण्य-लोकोंमें निवास करनेवाले ब्रह्मर्षि, महर्षि तथा राजर्षि—ये सब लोग सहसा तेजसे प्रज्वलित होने और शत्रु का सामना करनेवाले इन्द्रके पीछे-पीछे चल दिये ॥२५॥

प्रगृह्य शूलांश्च परश्वधांश्च
दीप्तानि चापान्यशनीर्विचित्राः ।
वर्माणि चामुच्य हिरण्मयानि
प्रयान्ति सूर्याशुसमप्रभाणि ॥ २६ ॥

वे हाथोंमें शूल, फरसे, चमकते हुए धनुष और विचित्र अशनि लेकर सूर्यके समान तेजस्वी सुवर्णमय कवच धारण करके युद्धके लिये आगे बढ़ने लगे ॥ २६ ॥

तथा कुवेरोऽश्वसहस्रयुक्तं
श्रेष्ठं रथं सर्वसहं महार्हम् ।
दिव्यं समारुह्य रणाय यातो
धनेश्वरो दीप्तगदाग्रहस्तः ॥ २७ ॥

इसी प्रकार धनेश्वर कुवेर सहस्र अश्वोंसे जुते हुए सब कुछ सहनेमें समर्थ बहुमूल्य एवं दिव्य उत्तम रथपर आरूढ़ हो युद्धके लिये चले, उनके हाथके अग्रभागमें चमकती हुई गदा शोभा पा रही थी ॥ २७ ॥

निशाचराः पावकधूमकाया
रक्षोवृषा रुद्रसखस्य तस्य ।
विशालनानायुधदीप्तहस्ता
यान्त्यग्रतो वैश्रवणस्य राज्ञः ॥ २८ ॥

विश्रवाके पुत्र तथा रुद्रके सखा राजा कुबेरके आगे नाना प्रकारके विशाल आयुधोंसे चमकीले हाथवाले बहुत-से निशाचारी राक्षसप्रवर जा रहे थे । उनके शरीर अग्नि और धूमके समान वर्णवाले थे ॥ २८ ॥

ते लोहिताक्षाः परिवार्य देवं
व्रजन्ति भिन्नाञ्जनचूर्णवर्णाः ।
यक्षोत्तमा यक्षपतिं धनेशं
रक्षन्ति वै पाशगदासिखड्गाः ॥ २९ ॥

जिनके शरीरकी कान्ति फूटे हुए कोयलोंके चूर्णकी भाँति काली है, वे लाल नेत्रोंवाले यक्षशिरोमणि वीर हाथोंमें पाश, गदा और तलवार लिये यक्षराज धनेश्वर देवको चारों ओरसे घेरकर उनकी रक्षा करते हैं ॥ २९ ॥

पुण्यः प्रभुः प्राणपतिर्जितात्मा
वैवस्वतो धर्मभृतां वरिष्ठः ।
तडिद्गणाभं शतवाजियुक्तं
रथं समारोहत सूर्यकल्पम् ॥ ३० ॥

अपने मनको वशमें रखनेवाले, प्राणीमात्रके प्राणोंके अधिपति तथा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ पुण्यात्मा प्रभु सूर्यपुत्र यम सौ घोड़ोंसे जुते हुए, विद्युत्-गणोंसे प्रकाशित तथा सूर्यके समान तेजस्वी रथपर आरूढ़ हुए ॥ ३० ॥

तं लोकपालं पितरोऽनुजग्मु-
र्विंविक्तपापा ज्वलितास्तपोभिः ।
सर्वे च भूता भुवनप्रधाना
नानायुधव्यग्रकराः सुभीमाः ॥ ३१ ॥

तपस्यासे प्रकाशित होनेवाले पापरहित पितृगणोंने उन लोकपाल यमका अनुसरण किया । तीनों लोकोंमें जो प्रधान-प्रधान भयंकर भूत थे, वे सब हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लेकर उनके पीछे-पीछे चले ॥ ३१ ॥

दण्डं महास्त्रं परिगृह्य देवो
लोकाङ्कुशं निग्रहनिश्ञ्चितार्थम् ।
हिरण्मयानां कमलोत्पलानां
मालां मनोज्ञामवसज्य कण्ठे ॥ ३२ ॥

समस्त जगत्पर अङ्कुश (नियन्त्रण) रखनेवाले दण्ड नामक महान् अस्त्रको, जो शत्रुओंका निश्चितरूपसे निग्रह करनेवाला था, हाथमें लेकर यमराजने अपने कण्ठमें सुवर्णमय कमलों और उत्पलोंकी मनोहर माला पहन ली थी ॥ ३२ ॥

स्थितोऽस्थिमेदामिषलोहिताद्रं
सर्वासुराणां निधनं विरूपम् ।
तेजोमयं मुद्गरमुग्ररूपं
विकर्षमाणोऽरुणधूम्रनेत्रः ॥ ३३ ॥

उनके नेत्र अरुण और धूम्रवर्णके थे । वे रथपर बैठकर अपने उस तेजोमय, भयंकर एवं विरूप मुद्गरको साथ लिये जा रहे थे, जो समस्त असुरोंके लिये कालरूप था और उनके मेद, मांस, अस्थि तथा रक्तसे भीगा हुआ था ॥ ३३ ॥

समन्वितो व्याधिशतैरनेकै-
र्ययौ हरिश्मश्रुरुदारसत्त्वः ।
महासुराणां निधनाय बुद्धिं
चक्रे तदा व्याधिपतिः कृतान्तः ॥ ३४ ॥

उनकी मूँछ काली या नीली थी । उनका अन्तःकरण उदार था । रोग-व्याधियोंके स्वामी उन यमराजने नाना प्रकारकी सैकड़ों व्याधियोंको साथ लेकर बड़े-बड़े असुरोंके विनाशका निश्चय कर लिया था ॥ ३४ ॥