भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 920
८९६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंश

ततस्त्रिशीर्षैर्भुजगैर्बृहद्भि-
  र्युक्तं रथं हेमचितं महात्मा।
आस्थाय कुन्देन्दुनिभं जलेशो
  ययौ रणायासुरदर्पहन्ता॥ ३५॥
तदनन्तर असुरोंके दर्पका दमन करनेवाले जलके स्वामी महात्मा वरुण कुन्द और चन्द्रमाके समान उज्ज्वल तथा सुवर्णजटित रथपर, जिसमें तीन सिरवाले विशालकाय सर्प जुते हुए थे, आरूढ हो युद्धके लिये चले॥ ३५॥

वैदूर्यमुक्तामणिभूषिताङ्ग-
  स्तेजोमयः पाशगृहीतहस्तः।
महासुराणां निधनाय देवः
  प्रयाति रूप्याङ्गदबद्धबाहुः॥ ३६॥
उनके अङ्ग वैदूर्य, मुक्ता एवं मणियोंसे विभूषित थे, उनकी भुजाओंमें चाँदीके बाजूबंद बँधे हुए थे और उन्होंने अपने हाथमें पाश ले रखा था, इस प्रकार वे तेजस्वी देवता वरुण उन महान् असुरोंके विनाशके लिये समराङ्गणकी ओर प्रस्थित हुए॥ ३६॥

अन्वीयमानो जलदेवताभि-
  र्निषेच्यमाणो जलजैश्च सर्वैः।
संस्तूयमानश्च महर्षिवृन्दैः
  सम्पूज्यमानश्च महाभुजङ्गैः॥ ३७॥
उस समय जलके अधिष्ठाता देवता उनका अनुसरण करते थे। जलमें उत्पन्न होनेवाले उनका अभिषेक कर रहे थे। महर्षियोंके समुदाय उनके गुण गा रहे थे और बड़े-बड़े भुजंग उनकी पूजामें लगे थे॥ ३७॥

कैलासशृङ्गप्रतिमोऽप्रमेयः
  समुद्रनाथोऽमृतपो महात्मा।
महोरगैः स्वैस्तनयैः सुगुप्तो
  ययौ रथेनार्कसमप्रभेन॥ ३८॥
समुद्रके स्वामी तथा अमृतपान करनेवाले महात्मा वरुण कैलास-शिखरके समान गौर-वर्णके थे। उनकी शक्ति अप्रमेय थी। उनके पुत्र और बड़े-बड़े नाग उनकी भलीभाँति रक्षा करते थे। वे सूर्यके समान तेजस्वी रथसे चले॥ ३८॥

युद्धाय तं यान्तमदीनसत्त्वं
  नभस्तले चन्द्रमिवातिकान्तम्।
पश्यन्ति भूतानि महानुभावं
  संहृष्टरोमाणि कृताञ्जलिनि॥ ३९॥
चन्द्रमाके समान अत्यन्त कान्तिमान् और उदार हृदय-वाले महानुभाव वरुण जब युद्धके लिये जा रहे थे, उस समय आकाशमें समस्त प्राणी पुलकित-शरीरसे हाथ जोड़कर उनकी ओर देख रहे थे॥ ३९॥

धातार्यमांशोऽथ भगो विवस्वान्
  पर्जन्यमित्रौ च शशी च देवः।
त्वष्टा तथैवोर्जितविश्वकर्मा
  पूषा च साक्षाद् दिवि देवराजः॥ ४०॥
सोरश्छदैः सध्वजकिङ्किणीकै-
  र्वैदूर्यनिष्कैश्चितहेमकण्ठैः।
हयैर्वरैः शाकरथप्रकाशै-
  र्युक्तान् रथानारुरुहुः सुरास्ते॥ ४१॥
धाता, अर्यमा, अंश, भग, विवस्वान्, पर्जन्य, मित्र, चन्द्रदेव, त्वष्टा, तेजस्वी विश्वकर्मा, पूषा तथा साक्षात् देवराज इन्द्र—ये सभी देवता आकाशमें अच्छे घोड़ोंसे जुते हुए रथों-पर आरूढ़ थे। ये सभी घोड़े हृदयको आच्छादित करनेवाले कवचोंसे युक्त थे। उनके गलेमें वैदूर्यमणिके पदक और सोनेके हार शोभा पाते थे। वे अश्व ध्वज और छोटी-छोटी घंटिकाओंसे युक्त थे। उन सबका रंग वही था, जो इन्द्रके रथमें जुते हुए घोड़ोंका था (इन्द्रके रथमें हरे रंगके घोड़े जुते हुए थे)॥ ४०-४१॥

दिवाकराकारनिभानि केचि-
  द्धुताशनाचीःप्रतिमानि केचित्।
निशाकरांशुप्रतिमानि केचित्
  तडिद्गणोद्द्योतनिभानि केचित्॥ ४२॥
नीलांशुमेघप्रतिमानि केचित्
  कार्ष्णायसाकारनिभानि केचित्।
चर्माणि दिव्यानि महाप्रभाणि
  त्वष्ट्रा कृतान्युत्तमभानुमन्ति॥ ४३॥
आमुच्य मालाश्च सुवर्णपुष्पाः
  प्रयान्ति तोयानिलतुल्यवेगाः।
कुछ देवता सूर्यमण्डलके समान, कोई अग्निकी ज्वालाके समान, कोई चन्द्रमाकी किरणोंके सदृश, कुछ देवता विद्युत्-की प्रभाके समान, कुछ नील वर्णवाले मेघोंके सदृश और कोई काले लोहेके समान महान् प्रभापुञ्जसे युक्त तथा उत्तम किरणोंसे उद्भासित दिव्य कवच धारण किये हुए थे, जिन्हें साक्षात् विश्वकर्माने बनाया था। जिनमें सुवर्णमय पुष्प गूँथे गये थे, ऐसी मालाएँ पहनकर जल और वायुके समान तीव्र वेगवाले वे देवता रणभूमिकी ओर बढ़े जा रहे थे॥ ४२-४४ १/२॥

द्वावश्विनौ चैव महानुभावौ
  रूपोत्तमौ धर्मभृतां वरिष्ठौ॥ ४४॥
रथं समारुह्य सुवर्णचित्रं
  रणं गतौ काञ्चनतुल्यवर्णौ।
रूपमें सबसे उत्तम तथा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ दोनों अश्विनीकुमार महानुभाव भी सुवर्णजटिल रथपर आरूढ़ हो रणभूमिमें गये। उन दोनोंके शरीरकी कान्ति सुवर्णके तुल्य थी॥ ४४ १/२॥

मनोः सुता वै वसवश्च सर्वे
  बलोत्कटा दैत्यवधाय देवाः॥ ४५॥