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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ
८९६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंश

ततस्त्रिशीर्षैर्भुजगैर्बृहद्भि-
  र्युक्तं रथं हेमचितं महात्मा।
आस्थाय कुन्देन्दुनिभं जलेशो
  ययौ रणायासुरदर्पहन्ता॥ ३५॥
तदनन्तर असुरोंके दर्पका दमन करनेवाले जलके स्वामी महात्मा वरुण कुन्द और चन्द्रमाके समान उज्ज्वल तथा सुवर्णजटित रथपर, जिसमें तीन सिरवाले विशालकाय सर्प जुते हुए थे, आरूढ हो युद्धके लिये चले॥ ३५॥

वैदूर्यमुक्तामणिभूषिताङ्ग-
  स्तेजोमयः पाशगृहीतहस्तः।
महासुराणां निधनाय देवः
  प्रयाति रूप्याङ्गदबद्धबाहुः॥ ३६॥
उनके अङ्ग वैदूर्य, मुक्ता एवं मणियोंसे विभूषित थे, उनकी भुजाओंमें चाँदीके बाजूबंद बँधे हुए थे और उन्होंने अपने हाथमें पाश ले रखा था, इस प्रकार वे तेजस्वी देवता वरुण उन महान् असुरोंके विनाशके लिये समराङ्गणकी ओर प्रस्थित हुए॥ ३६॥

अन्वीयमानो जलदेवताभि-
  र्निषेच्यमाणो जलजैश्च सर्वैः।
संस्तूयमानश्च महर्षिवृन्दैः
  सम्पूज्यमानश्च महाभुजङ्गैः॥ ३७॥
उस समय जलके अधिष्ठाता देवता उनका अनुसरण करते थे। जलमें उत्पन्न होनेवाले उनका अभिषेक कर रहे थे। महर्षियोंके समुदाय उनके गुण गा रहे थे और बड़े-बड़े भुजंग उनकी पूजामें लगे थे॥ ३७॥

कैलासशृङ्गप्रतिमोऽप्रमेयः
  समुद्रनाथोऽमृतपो महात्मा।
महोरगैः स्वैस्तनयैः सुगुप्तो
  ययौ रथेनार्कसमप्रभेन॥ ३८॥
समुद्रके स्वामी तथा अमृतपान करनेवाले महात्मा वरुण कैलास-शिखरके समान गौर-वर्णके थे। उनकी शक्ति अप्रमेय थी। उनके पुत्र और बड़े-बड़े नाग उनकी भलीभाँति रक्षा करते थे। वे सूर्यके समान तेजस्वी रथसे चले॥ ३८॥

युद्धाय तं यान्तमदीनसत्त्वं
  नभस्तले चन्द्रमिवातिकान्तम्।
पश्यन्ति भूतानि महानुभावं
  संहृष्टरोमाणि कृताञ्जलिनि॥ ३९॥
चन्द्रमाके समान अत्यन्त कान्तिमान् और उदार हृदय-वाले महानुभाव वरुण जब युद्धके लिये जा रहे थे, उस समय आकाशमें समस्त प्राणी पुलकित-शरीरसे हाथ जोड़कर उनकी ओर देख रहे थे॥ ३९॥

धातार्यमांशोऽथ भगो विवस्वान्
  पर्जन्यमित्रौ च शशी च देवः।
त्वष्टा तथैवोर्जितविश्वकर्मा
  पूषा च साक्षाद् दिवि देवराजः॥ ४०॥
सोरश्छदैः सध्वजकिङ्किणीकै-
  र्वैदूर्यनिष्कैश्चितहेमकण्ठैः।
हयैर्वरैः शाकरथप्रकाशै-
  र्युक्तान् रथानारुरुहुः सुरास्ते॥ ४१॥
धाता, अर्यमा, अंश, भग, विवस्वान्, पर्जन्य, मित्र, चन्द्रदेव, त्वष्टा, तेजस्वी विश्वकर्मा, पूषा तथा साक्षात् देवराज इन्द्र—ये सभी देवता आकाशमें अच्छे घोड़ोंसे जुते हुए रथों-पर आरूढ़ थे। ये सभी घोड़े हृदयको आच्छादित करनेवाले कवचोंसे युक्त थे। उनके गलेमें वैदूर्यमणिके पदक और सोनेके हार शोभा पाते थे। वे अश्व ध्वज और छोटी-छोटी घंटिकाओंसे युक्त थे। उन सबका रंग वही था, जो इन्द्रके रथमें जुते हुए घोड़ोंका था (इन्द्रके रथमें हरे रंगके घोड़े जुते हुए थे)॥ ४०-४१॥

दिवाकराकारनिभानि केचि-
  द्धुताशनाचीःप्रतिमानि केचित्।
निशाकरांशुप्रतिमानि केचित्
  तडिद्गणोद्द्योतनिभानि केचित्॥ ४२॥
नीलांशुमेघप्रतिमानि केचित्
  कार्ष्णायसाकारनिभानि केचित्।
चर्माणि दिव्यानि महाप्रभाणि
  त्वष्ट्रा कृतान्युत्तमभानुमन्ति॥ ४३॥
आमुच्य मालाश्च सुवर्णपुष्पाः
  प्रयान्ति तोयानिलतुल्यवेगाः।
कुछ देवता सूर्यमण्डलके समान, कोई अग्निकी ज्वालाके समान, कोई चन्द्रमाकी किरणोंके सदृश, कुछ देवता विद्युत्-की प्रभाके समान, कुछ नील वर्णवाले मेघोंके सदृश और कोई काले लोहेके समान महान् प्रभापुञ्जसे युक्त तथा उत्तम किरणोंसे उद्भासित दिव्य कवच धारण किये हुए थे, जिन्हें साक्षात् विश्वकर्माने बनाया था। जिनमें सुवर्णमय पुष्प गूँथे गये थे, ऐसी मालाएँ पहनकर जल और वायुके समान तीव्र वेगवाले वे देवता रणभूमिकी ओर बढ़े जा रहे थे॥ ४२-४४ १/२॥

द्वावश्विनौ चैव महानुभावौ
  रूपोत्तमौ धर्मभृतां वरिष्ठौ॥ ४४॥
रथं समारुह्य सुवर्णचित्रं
  रणं गतौ काञ्चनतुल्यवर्णौ।
रूपमें सबसे उत्तम तथा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ दोनों अश्विनीकुमार महानुभाव भी सुवर्णजटिल रथपर आरूढ़ हो रणभूमिमें गये। उन दोनोंके शरीरकी कान्ति सुवर्णके तुल्य थी॥ ४४ १/२॥

मनोः सुता वै वसवश्च सर्वे
  बलोत्कटा दैत्यवधाय देवाः॥ ४५॥

भविष्यपर्व ] द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ ८९७


रथैश्च नागांश्च महाप्रमाणा-
नास्थाय जग्मुः सुशुभास्त्रहस्ताः ।
मनुके पुत्र तथा समस्त वसु देवता जो उत्कट बलशाली और हाथोंमें उत्तम अस्त्र धारण करनेवाले थे, बड़े-बड़े रथों और हाथियोंपर आरूढ़ हो दैत्योंका वध करनेके लिये चले ॥

रुद्राश्च सर्वेऽरुणधूम्रवर्णाः
श्वेतैर्ययुर्गोपतिभिर्बृहद्भिः ॥ ४६ ॥
महौजसः सर्वगुणोपपन्ना
दीप्तात्मनो भाभिरिव ज्वलन्तः ।
नानायुधव्यग्रकरैर्भुजैस्तै-
र्लोकान् समस्तानिव निर्दहन्तः॥ ४७ ॥
अरुण और धूमके समान वर्णवाले समस्त रुद्रगण, जो महाबली, सर्वगुणसम्पन्न और दीप्तिमान् शरीरवाले थे तथा अपनी प्रभाओंसे प्रज्वलित-से हो रहे थे; श्वेत वर्णवाले विशाल वृषभोंद्वारा युद्धभूमिमें गये । नाना प्रकारके आयुधोंसे युक्त हाथवाली भुजाओंसे वे समस्त लोकोंको दग्ध करते हुए-से जान पड़ते थे ॥ ४६-४७ ॥

ययुः ससैन्यास्तपनीयनद्धाः
सविद्युतस्तोयधरा यथैव ।
विश्वे च देवास्तपसा ज्वलन्तो
वीर्योत्तमाः सूर्यमरीचिवर्णाः ॥ ४८ ॥
ययुः ससैन्या युधि दुर्निवार्या
बलोत्कटाः पद्मसहस्रमालाः ।
सुवर्णमय कवच बाँधकर सेनाको साथ लिये जब वे आगे बढ़े, उस समय बिजलियोंसे युक्त मेघोंके समान शोभा पाने लगे। सूर्यकी किरणोंके समान कान्तिमान्, उत्तम बलशाली तथा तपस्याके तेजसे प्रकाशित होनेवाले विश्वेदेवगण भी सेना साथ लेकर युद्धके लिये चले । शत्रुओंके लिये उनके वेग-को रोकना कठिन था । वे उत्कट बलशाली तथा सहस्र कमलोंकी मालाओंसे अलंकृत थे ॥ ४८ १/२ ॥

रथैः सुयुक्तैस्तपनीयवर्णै-
र्वैदूर्यमुक्तामणिदामचित्रैः ॥ ४९ ॥
नानाविधाकारसमाकुलास्ते
पारिप्लवैश्चैव सितातपत्रैः ।
तेजोमयैः काञ्चनचारुचित्रैः
सुनिर्मलैः पावकसंनिभास्ते ॥ ५० ॥
सोनेके समान कान्तिवाले तथा वैदूर्य, मुक्ता और मणियोंकी लड़ियोंसे विचित्र शोभा पानेवाले, भलीभाँति जुते हुए रथोंद्वारा वे सब लोग समरभूमिमें गये । वे नाना प्रकार-की आकृतियोंसे युक्त थे । उनके ऊपर सुवर्णनिर्मित, मनोहर, विचित्र, अत्यन्त निर्मल, तेजस्वी और सब ओर घूमनेवाले श्वेत छत्र तने हुए थे । जिनके कारण वे सब लोग प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ४९-५० ॥

सोरश्छदैः सध्वजकिङ्किणीकै-
र्हयैश्च वायोः समवेगवद्भिः ।
दिशां गजैश्चैव महाचलैस्तैः
कैलासशृङ्गप्रतिमैर्महद्भिः ॥ ५१ ॥
प्रजग्मुरुग्रायुधचापहस्ता-
श्चर्तुयुगान्ते ज्वलिता इवोल्काः ।
कवच, ध्वज और घुँघुरुओंसे युक्त वायुके समान वेग-शाली घोड़ों तथा कैलासशिखरके समान उज्ज्वल, विशाल-काय एवं महाबली दिग्गजोंद्वारा वे यात्रा कर रहे थे । उनके हाथोंमें भयंकर धनुष थे, जिनसे वे युगान्तकालमें प्रज्वलित होनेवाली उल्काओंके समान प्रतीत होते थे ॥ ५१ १/२ ॥

साध्याश्च देवाः सुमहाप्रभावाः
स्वाधीनचक्राः प्रतिदीप्तवक्त्राः ॥ ५२ ॥
प्रयान्ति जाम्बूनदभूषिताङ्गा
गाङ्घौघमात्रैर्गगनैर्बलौघैः ।
विद्योतयन्तो विदिशो दिशश्च
महाबलास्ते जयतां वरिष्ठाः ॥ ५३ ॥
महान् प्रभावशाली साध्यदेवता सारी सेनाको अपने अधीन करके युद्धके लिये जा रहे थे । उनके मुख दिव्य दीप्ति-से उद्दीप्त हो रहे थे । उन्होंने अपने अङ्गोंको जाम्बूनदके आभूषणोंसे विभूषित कर रखा था । उनके साथ गङ्गाके जल-प्रवाह और आकाशके समान अनन्त एवं असंख्य सैनिक थे । विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ वे महाबली साध्यगण अपने तेजसे समस्त दिशाओं और विदिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे ॥

वरिष्ठपुष्टाष्टभुजाः सुदृप्ता
वैश्वानरार्कप्रतिमप्रभावाः ।
ते ब्रह्मविद्भिश्च नमस्यमानाः
सम्पूज्यमानाश्च सुरैः सशक्रैः ॥ ५४ ॥
गन्धर्वसङ्घैरनुगम्यमाना
वधाय तेषामसुराधिपानाम् ।
उनके आठ भुजाएँ थीं, जो श्रेष्ठ एवं पुष्ट थीं । उन्हें अपने बलपर गर्व था । वे अग्नि एवं सूर्यके समान प्रभावशाली थे । ब्रह्मवेत्ता पुरुष उन्हें नमस्कार करते थे । इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता उनकी पूजा करते थे तथा दैत्येश्वरोंका वध करनेके लिये जाते हुए उन साध्यगणोंके पीछे गन्धर्वोंके समुदाय चलते थे ॥ ५४ १/२ ॥

वैदूर्यवज्रस्फटिकाग्रचित्रै-
र्ध्वजैः सुवर्णैश्च परिष्कृतानाम् ॥ ५५ ॥
रूपं वभौ चोत्कटभूषणानां
दैत्येन्द्रनाशाय विभूषितानाम् ।
वैदूर्य, हीरे और स्फटिकमणिसे जटिल होनेके कारण विचित्र शोभा पानेवाले ध्वजों और सुवर्णमय आभूषणोंसे जिनकी सुन्दर शोभा होती थी, जो उत्कट आभूषण पहने


म० पृ० २९

८९८श्रीमद्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

हुए ये तथा दैत्येन्द्रोंके विनाशके लिये ही जिन्होंने अपनेको विभूषित किया था, उन साध्य देवताओंका रूप वहाँ अद्भुत शोभा पा रहा था ॥ ५५१/२ ॥

आत्मप्रभाभिश्च रणोत्कटाभि-
वर्मप्रभाभिश्च तमोन्नुदाभिः ॥ ५६ ॥
ध्वजोत्थभाभिः खशरोरुभाभि-
र्महाप्रभाभिश्च महोज्ज्वलाभिः ।
विभान्ति ते देववराः ससाध्याः
प्रध्मातशङ्खस्तनसिंहनादाः ॥ ५७ ॥
महारथस्थास्त्रिदिवौकसस्ते
महाबलाः शत्रुबलं प्रयान्ति ।
महास्त्रहस्ता ययुरुग्रकाया
महासुराणां निधनाय देवाः ॥ ५८ ॥

युद्धके लिये उत्कट प्रतीत होनेवाली अपने शरीरकी प्रभा, अन्धकारको दूर करनेवाली कवचोंकी प्रभा, ध्वजसे उत्पन्न होनेवाली आभा तथा अपने बाणसमूहोंसे उद्गत हुई प्रचुर प्रभा—इन सबके योगसे प्रकाशित होनेवाली परम उज्ज्वल महाप्रभाओंसे वे साध्यगणोंसहित श्रेष्ठ देवता बड़ी शोभा पा रहे थे। वे महाबली देवता अपने विशाल रथोंपर बैठकर शङ्खध्वनि और सिंहनाद करते हुए शत्रु-सेनाकी ओर बढ़ने लगे। उनके हाथोंमें बड़े-बड़े अस्त्र थे। उनकी काया भयंकर थी; वे देवता उन महादैत्योंका संहार करनेके लिये चल दिये ॥ ५६–५८ ॥

तथैव सर्वे मरुतोऽतिवीर्या
बलोत्कटास्ते समरं प्रतीताः ।
ययुर्महामेघसमानवर्णा-
श्चक्रायुधास्तोयदनादनादाः ॥ ५९ ॥

इसी प्रकार अत्यन्त पराक्रमी और उत्कट बलशाली समस्त मरुद्गण, जो महान् मेघके समान श्याम वर्णवाले तथा चक्रधारी थे, मेघकी भाँति गर्जना करते हुए विजयका दृढ़ विश्वास लिये समरभूमिकी ओर चले ॥ ५९ ॥

महेन्द्रकेतुप्रतिमा महाबलाः
प्रगृह्य सर्वासुरसूदनां गदाम् ।
रणोत्कटा लोहितचन्दनाक्ताः
सहेममाल्याम्बरभूषिताङ्गाः ॥ ६० ॥

वे इन्द्रके ध्वजस्वरूप ऐरावतके समान महान् बलवान् थे। युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले थे। उनके सारे अङ्ग लाल चन्दनसे चर्चित तथा सोनेके हार और दिव्य वस्त्रोंसे विभूषित थे। उन्होंने समस्त असुरोंका संहार करनेवाली गदा लेकर युद्धके लिये यात्रा की थी ॥ ६० ॥

ते युद्धशौण्डाः समुजास्त्रवीर्या
बलोत्कटाः क्रोधविलोहिताक्षाः ।
ययुः सजाग्बूनदपद्ममाला
यथेष्टनानाविधकामरूपाः ॥ ६१ ॥
खड्गप्रभाश्यामलित्रांसपीठाः
पुरंदरं वै परिवार्य देवाः ।

वे सब-के-सब युद्धमें कुशल थे। उनमें बाहुबल और अस्त्रबलकी पूर्णता थी। वे उत्कट बलशाली थे। उनकी आँखें क्रोधसे लाल हो रही थीं। वे देवता सुवर्ण तथा कमलोंकी माला धारण करके इच्छानुसार नाना प्रकारके रूप धारण किये देवराज इन्द्रको चारों ओरसे घेरकर रणभूमिकी ओर जा रहे थे। उनके कंधे और पीठ खड्गोंकी प्रभासे साँवले दिखायी देते थे ॥ ६११/२ ॥

वैदूर्यचामीकरचारुरूपा-
ण्याबध्य गात्रेषु महाप्रभाणि ॥ ६२ ॥
वर्माणि दैत्यस्त्रनिवारणानि
प्रयान्ति युद्धाय सपत्नसाहाः ।

शत्रुओंका वेग सहन करनेमें समर्थ वे देवता अपने अङ्गोंमें वैदूर्य और सुवर्णसे जटित होनेके कारण मनोहर रूपवाले परम कान्तिमान् कवचोंको, जो दैत्योंके अस्त्रोंका निवारण करनेवाले थे, बाँधकर युद्धके लिये जा रहे थे ॥

तैरत्थितैः काञ्चनवेदिकाद्यै-
र्वरध्वजैर्भास्कररश्मिवर्णैः ॥ ६३ ॥
ययौ सुराणां पृतनोग्रभासा
समुन्नदन्ती युधि सिंहनादान् ।

सोनेकी वेदिकाओंसे युक्त और सूर्यकी किरणोंके समान कान्तिमान् ऊँचे उठे हुए श्रेष्ठ ध्वजोंसे उपलक्षित होनेवाली देवताओंकी वह भयंकर सेना युद्धके लिये जोर-जोरसे सिंहनाद करती हुई जा रही थी ॥ ६३१/२ ॥

इत्येवमुक्तं त्रिदिवेश्वरस्य
सैन्यं तदासीत् सुमहत्प्रभावम् ॥ ६४ ॥
युद्धं प्रयातस्य जयावहस्य
वधाय तेषामसुराधिपानाम् ॥ ६५ ॥

इस प्रकार उन असुरेश्वरोंके वधके लिये युद्धस्थलकी ओर प्रस्थित हुए विजयशाली देवेश्वर इन्द्रकी वह सेना बड़ी प्रभावशालिनी थी। जिसका इस रूपमें वर्णन किया गया है ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५२ ॥

भविष्यपर्व ] त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ ८९९


त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

देवताओं और असुरोंका द्वन्द्वयुद्ध, भीषण उत्पात, ब्रह्माजी तथा सनकादि योगेश्वरोंका युद्ध देखनेके लिये आगमन

वैशम्पायन उवाच
ततः प्रवृत्तोऽसुरदेवविग्रह-
स्तदद्भुतो भाति सुरासुराकुलः ।
वेलामतिक्रम्य युगान्तकाले
महार्णवान्योन्यमिवाश्रयन्तः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! तदनन्तर देवताओं और असुरोंका युद्ध आरम्भ हुआ । देवताओं और दैत्योंसे व्याप्त होनेके कारण उसकी अद्भुत शोभा हो रही थी । जैसे प्रलयकालमें चारों दिशाओंके महासागर अपनी सीमाको लाँघकर एक दूसरेसे मिल जाते हैं (उसी प्रकार देवता और दैत्य उस युद्धमें एक दूसरेसे मिश्रित हो गये) ॥ १ ॥

नानायुधोद्द्योतविदीपिताङ्गा
महाबला व्यायतकार्मुकास्ते ।
रणोत्सुका वारणहस्तहस्ताः
सुदुर्जयस्तोयदनादनादाः ॥ २ ॥

वे महाबली योद्धा बड़े-बड़े धनुष ताने हुए युद्धके लिये उत्सुक हो रहे थे । उनके अङ्ग नाना प्रकारके आयुधोंकी प्रभासे प्रकाशित होते थे । उनकी भुजाएँ हाथियोंकी सूँड़के समान मोटी थीं । उनपर विजय पाना बहुत ही कठिन था और उनका सिंहनाद मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके समान जान पड़ता था ॥ २ ॥

विस्फारयन्तः सहसा धनूंषि
चक्राणि चादित्यसमप्रभाणि ।
समुत्क्षिपन्तो ह्यशनींश्च घोरान्
खड्गांश्च ते वज्रमुखांश्च शक्तीः ॥ ३ ॥

वे सहसा धनुषकी टंकार करने लगते थे तथा सूर्यके समान तेजस्वी चक्र, भयंकर अशनि, खड्ग तथा वज्रमुखी शक्तियोंका लगातार प्रहार करते थे ॥ ३ ॥

महागदाः काञ्चनपट्टनद्धा-
स्तथायसान् कार्मुकमुद्गरांश्च ।
शूलांश्च वृक्षांश्च विगृह्य दीप्तान्
नदन्ति शूराः शतशो रणस्थाः ॥ ४ ॥

रणभूमिमें खड़े हुए सैकड़ों शूरवीर सुवर्णपत्रसे मढ़ी हुई विशाल गदाओं, लोहेके बने हुए धनुषों, मुद्गरों, चमकीले त्रिशूलों और वृक्षोंको हाथमें लेकर वहाँ गर्जना करते थे ॥ ४ ॥

एतस्मिन्नन्तरे तेषामन्योन्यमभिनिघ्नताम् ।
द्वन्द्वयुद्धान्यवर्तन्त देवानां दानवैः सह ॥ ५ ॥

इसी बीचमें एक दूसरेपर चोट करते हुए उन सैनिकोंमेंसे देवताओंका दानवोंके साथ द्वन्द्वयुद्ध होने लगा ॥ ५ ॥

मरुतां पञ्चमो यस्तु स बाणेनाभ्ययुध्यत ।
महाबलः सुरवरः सावित्र इति यं विदुः ॥ ६ ॥

मरुद्गणोंमें जो पाँचवें थे और जिनको लोग महाबली सुरश्रेष्ठ सावित्रके नामसे जानते हैं, वे बाणासुरके साथ युद्ध करने लगे ॥ ६ ॥

दनायुषायाः पुत्रस्तु बलो नाम महासुरः ।
सोऽयुध्यत रणेऽत्युग्रो ध्रुवेण वसुना सह ॥ ७ ॥

दनायुषाका पुत्र अत्यन्त भयंकर महान् असुर बल उस रणभूमिमें ध्रुव नामक वसुके साथ युद्ध करने लगा ॥ ७ ॥

नमुचिश्वासुरश्रेष्ठो धरेण सह युध्यत ।
प्रवरौ विश्वकर्माणौ ख्यातौ देवासुरेश्वरौ ॥ ८ ॥

असुरोंमें श्रेष्ठ नमुचि धर नामक वसुके साथ जूझने लगा । जो दोनों श्रेष्ठ विश्वकर्माके रूपमें विख्यात हैं, वे देवेश्वर त्वष्टा और असुरेश्वर मय परस्पर युद्ध करने लगे ॥ ८ ॥

पुलोमा तु महादैत्यो वायुना सह युध्यत ।
ससैन्यः पर्वताकारो रणेऽयुध्यत दंशितः ॥ ९ ॥

महादैत्य पुलोमाने वायु देवताके साथ युद्ध छेड़ दिया । वह पर्वताकार दैत्य कवच धारण करके अपनी सेनाको साथ लिये रणभूमिमें जूझ रहा था ॥ ९ ॥

हयग्रीवस्तु दितिजः सह पूष्णा त्वयुध्यत ।
शूरेणामितवीर्येण भास्कराकारवर्चसा ॥ १० ॥

हयग्रीव नामक दैत्य सूर्यतुल्य तेजस्वी अमित पराक्रमी शूरवीर पूषाके साथ लड़ने लगा ॥ १० ॥

शम्बरस्तु महादैत्यो महामायो महासुरः ।
भगेनायुध्यत तदा सहितो युद्धदुर्मदः ॥ ११ ॥

महामायावी महान् असुर रणदुर्मद महादैत्य शम्बर भग देवताके साथ युद्ध करने लगा ॥ ११ ॥

शरभः शलभश्चैव दैत्यानां चन्द्रभास्करौ ।
प्रयुद्धौ सह सोमेन शैशिरास्त्रेण धीमता ॥ १२ ॥

शरभ और शलभ ये दोनों वीर दैत्योंमें सूर्य और चन्द्रमाके समान तेजस्वी थे । वे शैशिरास्त्रधारी बुद्धिमान् सोमके साथ जूझने लगे ॥ १२ ॥

विरोचनस्तु बलवान् बलेर्बलवतः पिता ।
विष्वक्सेनेन साध्येन देवेन च स युध्यत ॥ १३ ॥

बलवान् बलिके पिता महाबली विरोचन विष्वक्सेन नामक साध्य देवताके साथ भिड़ गया ॥ १३ ॥

९००श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

कुजम्भस्तु महातेजा हिरण्यकशिपोः सुतः।
अंशेनायुध्यत तदा प्रासप्रहरणेन वै ॥ १४ ॥
महातेजस्वी कुजम्भ, जो हिरण्यकशिपुके पुत्रका पुत्र था, उस समय प्रासधारी अंशके साथ युद्ध करने लगा ॥ १४ ॥

असिलोमा तु बलिना मारुतेन समं विभो।
तदायुध्यत दीप्तास्यो विकृतः पर्वतायुधः ॥ १५ ॥
प्रभो ! तेजस्वी मुखवाला विकृताङ्ग दैत्य असिलोमा पर्वतखण्डरूपी आयुध लेकर उस समय बलवान् मारुतके साथ संग्राम करने लगा ॥ १५ ॥

दनायुषायाः पुत्रस्तु वृत्रो नाम महासुरः।
अश्विभ्यां देववैद्याभ्यां सह युध्यत संयुगे ॥ १६ ॥
दनायुषाका पुत्र महान् असुर वृत्र युद्धस्थलमें देववैद्य अश्विनीकुमारोंके साथ जूझने लगा ॥ १६ ॥

एकचक्रस्तु दितिजश्चक्रहस्तो दुरासदः।
सहायुध्यत देवेन साध्येन दितिजारिणा ॥ १७ ॥
हाथमें चक्र लिये हुए एकचक्र नामक दुर्जय दैत्यने दैत्योंके शत्रु साध्यदेवके साथ युद्ध किया ॥ १७ ॥

बलस्तु मधुपिङ्गाक्षो वृत्रभ्राता महासुरः।
मृगव्याधेन रुद्रेण सहायुध्यत वीर्यवान् ॥ १८ ॥
वृत्रासुरके भाई, मधुके समान पिङ्गल नेत्रवाले, पराक्रमी महान् असुर बलने मृगव्याध नामक रुद्रके साथ युद्ध किया ॥ १८ ॥

राहुस्तु विकृताकारः शतशीर्षो महोदरः।
अजैकपादेन रणे सहायुध्यत दंशितः ॥ १९ ॥
सैकड़ों सिर और बड़े पेटवाले विकृताकार दैत्य राहुने कवच धारण करके रणभूमिमें अजैकपाद नामक रुद्रके साथ संग्राम छेड़ दिया ॥ १९ ॥

केशी तु दानवश्रेष्ठः प्रावृट्कालाम्बुदप्रभः।
धनेश्वरेण भीमेन सहायुध्यत संयुगे ॥ २० ॥
वर्षाकालके मेघकी भाँति काले रंगवाले दानवशिरोमणि केशीने युद्धस्थलमें धनेश्वर भीमके साथ युद्ध ठाना ॥ २० ॥

वृषपर्वा तु बलिना पावनेन महारणे।
विश्वेदेवेन विश्वेशः सहायुध्यत वीर्यवान् ॥ २१ ॥
पराक्रमी और जगत्के शासक वृषपर्वाने उस महासमरमें पावन नामक बलवान् विश्वेदेवके साथ युद्ध किया ॥ २१ ॥

प्रह्लादस्तु महावीर्यो वीरैः स्वैस्तनयैर्वृतः।
युयुधे सह कालेन रणे काल इवापरः ॥ २२ ॥
अपने वीर पुत्रोंसे घिरे हुए महापराक्रमी प्रह्लाद रणभूमिमें दूसरे कालके समान होकर कालके ही साथ युद्ध करने लगे ॥ २२ ॥

अनुह्लादः कुबेरेण धनदेन महारणे।
गदाहस्तेन युयुधे क्षोभयन् रिपुवाहिनीम् ॥ २३ ॥
अनुह्लाद शत्रुसेनाको क्षोभमें डालता हुआ उस महासमरमें गदाधारी धनदाता कुबेरके साथ जूझने लगा ॥ २३ ॥


विप्रचित्तिस्तु दैतेयो वरुणेन महात्मना।
प्रवृत्तो वै रणं कर्तुं दैत्यानां नन्दिवर्धनः ॥ २४ ॥
दैत्योंका आनन्द बढ़ानेवाले विप्रचित्ति नामक दैत्यने महात्मा वरुणके साथ युद्ध करना आरम्भ किया ॥ २४ ॥

बलिस्तु सह शक्रेण सुरेशन महात्मना।
युयुधे देवराजेन बलिना बलवान् रणे ॥ २५ ॥
उस रणभूमिमें बलवान् दैत्यराज बलिने महाबली देवराज सुरेश्वर महात्मा इन्द्रके साथ संग्राम आरम्भ किया ॥ २५ ॥

शेषा देवाश्च दैत्याश्च जघ्नुरन्योन्यमाहवे।
विनर्दन्तो महानादान् प्रासासिशरशक्तिभिः ॥ २६ ॥
शेष देवता और दैत्य युद्धस्थलमें जोर-जोरसे सिंहनाद करते हुए प्रास, खड्ग, बाण और शक्तियोंद्वारा एक दूसरेको चोट पहुँचाने लगे ॥ २६ ॥

अदृश्यन्त महोत्पाता ये प्रोक्ता जगतः क्षये।
मारुताः सप्त ते क्षुब्धा व्यशीर्यन्त महीधराः ॥ २७ ॥
उस समय ऐसे बड़े-बड़े उत्पात दिखायी देने लगे, जिन्हें प्रलयकालमें प्रकट होने योग्य बताया गया है। प्रवह आदि जो सात प्रकारके वायु हैं, वे क्षुब्ध हो उठे। पर्वत स्वयं ही बिखर-बिखरकर गिरने लगे ॥ २७ ॥

सप्त चैवोत्थिताः सूर्याः शोषयन्तो महार्णवान्।
बहुनाभिद्यत धरा वायुना मथिता यथा ॥ २८ ॥
महासागरोंको सोखते हुए सात सूर्य उदित हो गये। प्रचण्ड वायुने इस पृथिवीको इस प्रकार विदीर्ण कर दिया, जैसे इसे मथ डाला हो ॥ २८ ॥

व्युत्थिताश्च महामेघाः शक्रचापाङ्कितोदराः।
प्रणेदुः सर्वभूतानि सर्वाः सतिमिरा दिशः ॥ २९ ॥
आकाशमें बड़े-बड़े मेघोंकी घटा घिर आयी। उसका मध्यभाग इन्द्रधनुषसे अङ्कित हो गया। समस्त प्राणी आर्तनाद करने लगे और सम्पूर्ण दिशाओंमें अन्धकार छा गया ॥ २९ ॥

देवानाम्जयो घोरो दृश्यते कालनिर्मितः।
घोरोत्पातः समुद्भूतो युगान्तसमये यथा ॥ ३० ॥
कालकी प्रेरणासे देवताओंकी घोर पराजय दिखायी देने लगी। जैसा प्रलयकालमें होता है, वैसा ही भयंकर उत्पात प्रकट होने लगा ॥ ३० ॥

न चान्तरिक्षं न दिशो न भूमि-
र्न भास्कराऽदृश्यत रेणुजालैः।
ववुश्च वातास्तुमुलाः सधूमा
दिशश्च सर्वास्तिमिरोपगूढाः ॥ ३१ ॥
न तो अन्तरिक्ष, न दिशाएँ, न भूमि और न सूर्य ही दिखायी देते थे। सबपर धूलका जाल-सा बिछ गया था।

भविष्यपर्व ] त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ९०१

धूमयुक्त भयंकर वायु चलने लगी और सारी दिशाएँ अन्धकारसे आच्छन्न हो गयीं ॥ ३१ ॥

एते चान्ये च बहवो दृश्यन्ते देवनिर्मिताः ।
भूमौ तथान्तरिक्षे च महोत्पाताः समन्ततः ॥ ३२ ॥
ये तथा और भी बहुत-से देवनिर्मित बड़े-बड़े उत्पात पृथ्वी और आकाशमें सब ओर दिखायी देने लगे ॥ ३२ ॥

तद् युद्धं देवदैत्यानां भीमानां भीमदर्शनम् ।
अपश्यत गुरुर्ब्रह्मा सर्वैरेव सुरैः सह ॥ ३३ ॥
भीषण देवताओं और दैत्योंका वह युद्ध देखनेमें बड़ा भयंकर था। लोकगुरु ब्रह्माजीने समस्त देवताओंके साथ उस युद्धको देखा ॥ ३३ ॥

वेदैश्चतुर्भिः साङ्गैश्च विद्याभिश्च सनातनः ।
पद्मयोनिर्वृतः श्रीमान् सिद्धैश्च परमर्षिभिः ॥ ३४ ॥
छहों अङ्गोंसहित चारों वेदों तथा चारों विद्याओंसे घिरे हुए सनातन पद्मयोनि ब्रह्माजीको सिद्ध और महर्षिगण सब ओरसे घेरकर खड़े थे ॥ ३४ ॥

नानामणिस्तम्भसहस्रचित्र-
मारुह्य यानं ददृशे स्वयम्भूः ।
सुभास्वरं भूतसहस्रयुक्तं
प्रदीप्यमानो वपुषा वरेण ॥ ३५ ॥
नाना प्रकारके सहस्रों मणिमय खम्भोंसे विचित्र शोभा पानेवाले तथा सहस्रों भूतगणोंसे जुते हुए तेजस्वी विमानपर आरूढ़ हो स्वयंभू ब्रह्माजी अपने श्रेष्ठ शरीरसे देदीप्यमान दिखायी दे रहे थे ॥ ३५ ॥

सुतप्तजाम्बूनदभक्तिचित्र-
मानन्दभेरीशतसम्प्रणादम् ।
नक्षत्रचण्डांशुभिरंशुमन्तं
वैदूर्यसोमार्कविभूषिताङ्गम् ॥ ३६ ॥
उनका विमान तपाये हुए सुवर्णद्वारा निर्मित विभिन्न चित्र-मूर्तियोंसे सुशोभित था। उसमें सहस्रों भेरियोंका आनन्दमय शब्द गूँजता रहता था। नक्षत्रों तथा सूर्यकी तेजोमयी मूर्तियोंके कारण वह किरणोंकी प्रभासे परिपूर्ण था और वैदूर्यमणि तथा चन्द्रकान्त एवं सूर्यकान्त मणियोंसे (अथवा सूर्य एवं चन्द्रमाकी मूर्तियोंसे) उस विमानका प्रत्येक अङ्ग विभूषित था ॥ ३६ ॥

तमात्मजा वै पुलहः पुलस्त्य-
स्तथा मरीचिर्भृगुरङ्गिराश्च ।
ऋक्सामभिः सम्यगभिष्टुवन्तः
सेवन्ति देवं वरदं विमाने ॥ ३७ ॥
उस समय विमानपर बैठे हुए वरदायक देवता ब्रह्माजीकी, उन्हींके पुत्र पुलह, पुलस्त्य, मरीचि, भृगु तथा अङ्गिरा ऋषि ऋग्वेद एवं सामवेदके मन्त्रोंद्वारा सम्यक् रूपसे स्तुति करते हुए उनकी सेवामें तत्पर थे ॥ ३७ ॥

तं पावका लोकगुरुं स्वयंभुवं
साङ्गाश्च वेदा मखदेवताश्च ।
सेवन्ति देवं भुवनेश्वराणां
भूतानि चान्यानि महानुभावम् ॥ ३८ ॥
उन लोकगुरु, महानुभाव, भुवनेश्वरोश्वर देवता स्वयम्भू ब्रह्माजीकी सेवामें अग्नि, साङ्ग वेद, यज्ञदेवता तथा अन्यान्य भूत (प्राणी) भी संलग्न थे ॥ ३८ ॥

एते बभूवुश्च महर्षिसंघा
वैश्वानराः पावकयोनयश्च ।
सर्वे ययुर्देवपुरोहिताश्च
युद्धोत्सुकाः सर्वसुरासुराणाम् ॥ ३९ ॥
महर्षियोंके समुदाय, वैश्वानरगण, अग्निसे जिनकी उत्पत्ति हुई है, वे ऋषि तथा देवताओंके समस्त पुरोहित—ये सम्पूर्ण देवताओं और असुरोंके उस युद्धको देखनेके लिये उत्सुक हो वहाँ उपस्थित हुए थे ॥ ३९ ॥

योगेश्वराः षट् च दिवाकराभा
विभूषणैर्भूषितसर्वदेहाः ।
अन्तर्हिता वै ददृशुर्नभःस्था
नारायणश्चैव नरश्च देवाः ॥ ४० ॥
छः योगेश्वर (सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार, कपिल और जैगीषव्य), जो सूर्यके समान तेजस्वी थे और सारे अङ्गोंमें उत्तमोत्तम आभूषणोंसे विभूषित भी थे, अदृश्य भावसे आकाशमें खड़े हो उस युद्धका दृश्य देख रहे थे। भगवान् नारायण, नर तथा कतिपय देवता भी अदृश्य भावसे उस युद्धका अवलोकन करते थे ॥ ४० ॥

वक्त्रैश्चतुर्वेदधरैश्चतुर्भिः
सम्पूर्णचन्द्रप्रतिमैः सुकान्तैः ।
सर्वा दिशो निस्तिमिरान्धकार
नवोदितोऽसौ शरदीव चन्द्रः ॥ ४१ ॥
शरत्कालके नवोदित चन्द्रमाके समान ब्रह्माजी चार वेदोंको धारण करनेवाले अपने चारों मुखोंसे, जो पूर्ण चन्द्रमण्डलके समान परम मनोहर कान्तिसे युक्त थे, सम्पूर्ण दिशाओंको अन्धकाररहित कर रहे थे ॥ ४१ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि देवासुरयुद्धे सनकादिकागमनं नाम त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें देवताओं और असुरोंके युद्धमें सनकादिका आगमन नामक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५३ ॥

९०२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे

चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

देवताओं और असुरोंके युद्धका यज्ञके रूपमें वर्णन, दोनों सेनाओंका तुमुल युद्ध तथा सावित्र और ध्रुवकी पराजय

वैशम्पायन उवाच

उभयोः सेनयो राजन् भूयो युद्धमवर्तत।
नादेन संचालयतां त्रैलोक्यमिदमव्ययम् ॥ १ ॥
गोमुखाडम्बराणां च भेरीणां मुरजैः सह।
झल्लरीडिण्डिमानां च व्यथ्यन्त महास्वनाः ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन् ! पुनः दोनों सेनाओंमें घोर युद्ध होने लगा। गोमुख, बिगुल, भेरी, ढोल, झाँझ और नगाड़ोंके बड़े भारी शब्द सुनायी देने लगे। वे बाजे अपनी तुमुल ध्वनिसे तीनों लोकोंको विचलित कर रहे थे ॥ १-२ ॥

प्रवृत्तो युद्धयज्ञस्तु तुमलो लोमहर्षणः।
रणमध्ये महानादः स्वर्गीयः शूरसम्मतः ॥ ३ ॥

वहाँ रोंगटे खड़े कर देनेवाला भयंकर युद्धयज्ञ होने लगा, जो स्वर्गरूपी फलकी प्राप्ति करानेवाला था। उस संग्राममें महान् सिंहनाद एवं आर्तनाद होता था, जो शूर-वीरोंके लिये अभिमत है ॥ ३ ॥

युद्धयज्ञस्य नेताभूत् प्रह्लादो दैत्यसत्तमः।
विरोचनस्तथाध्वर्युर्युद्धयज्ञप्रवर्तकः ॥ ४ ॥

उस युद्धयज्ञके नेता हुए दैत्यप्रवर प्रह्लाद। उनका पुत्र विरोचन उस युद्धयज्ञका प्रवर्तक अध्वर्यु हुआ ॥ ४ ॥

होता चैवात्र नमुचिर्वृत्रः स्तोत्रोपकल्पकः।
मन्त्रा दैत्याः समाख्याता यज्ञकर्मणि तत्र वै ॥ ५ ॥

इसमें नमुचि होता और वृत्रासुर प्रस्तोता हुआ। उस यज्ञकर्ममें दैत्योंको ही मन्त्र कहा गया है ॥ ५ ॥

अनुयातश्च पितरमधिको वा पराक्रमैः।
यष्टा तत्राभवद् बाणः संयुगे चोपतिष्ठते ॥ ६ ॥

जो पराक्रमद्वारा अपने पिता बलिक अनुसरण करता था अथवा पितासे बढ़कर पराक्रमी था, वह बाणासुर उस युद्धयज्ञका यजमान बना और युद्धस्थलमें बराबर उप-स्थित रहा ॥ ६ ॥

ऐन्द्रं पाशुपतं ब्राह्मं स्थूणाकर्णं सुदुर्जयम्।
मन्त्रास्तत्राभ्यवर्तन्त साध्वनुह्लादयोजिताः ॥ ७ ॥

अनुह्लादके द्वारा भलीभाँति प्रयुक्त हुए ऐन्द्र, पाशुपत, ब्राह्म और अत्यन्त दुर्जय स्थूणाकर्ण नामक अस्त्र वहाँ मन्त्र थे ॥ ७ ॥

उद्गाता च मयः श्रीमान् स्थितः शत्रुभयंकरः।
विनदन् दितिजश्रेष्ठो देवानीकं व्यदारयत् ॥ ८ ॥

शत्रुओंके लिये भयंकर श्रीमान् मयासुर वहाँ उद्गाता बनकर खड़ा था। वह दैत्यशिरोमणि वीर सिंहनाद करके देवताओंकी सेनाको विदीर्ण करने लगा ॥ ८ ॥

बलिस्तु राजा द्युतिमान् स्वयं तत्र महासुरः।
जाप्यैर्होमैश्च संयुक्तो ब्रह्मत्वमकरोत् प्रभुः ॥ ९ ॥

सामर्थ्यशाली, तेजस्वी, महान् असुर राजा बलि स्वयं ही वहाँ जप-होम आदिसे युक्त हो ब्रह्माका कार्य करने लगे ॥

रणाग्निर्ज्वलितो घोरो वैरेन्धनसमीरितः।
हूयते त्वसुरैस्तत्र देवो विष्णुः सुरैः सह ॥ १० ॥

वैरके ईन्धनसे उद्दीप्त हो वहाँ युद्धकी घोर अग्नि प्रज्व-लित हुई। असुरगण देवताओंके साथ आकर उस आगमें आहुति डालने लगे। वह आहुति भगवान् विष्णुकी तृप्तिके लिये की जा रही थी ॥ १० ॥

शङ्खशब्दैः सुतुमुलैर्भेरीणां च महास्वनैः।
उद्घृष्टं विमलं चैव सुब्रह्मण्यं प्रयुज्यते ॥ ११ ॥

शङ्खोंकी तुमुल ध्वनि और भेरियोंके गम्भीर नादसे मानो वहाँ 'सुब्रह्मण्यम्' का विमल उद्घोष होता रहता था ॥ ११ ॥

वलश्च वलकश्चैव पुलोमा च महासुरः।
प्रशस्तं च समं कृत्वा सत्रं सम्यक् प्रचक्रिरे ॥ १२ ॥

वल, वलक और पुलोमा नामक महासुर इन तीनोंने वहाँ प्रशस्त एवं सम कर्म करके सम्यक्रूपसे सत्रका अनु-ष्ठान किया ॥ १२ ॥

कल्माषदण्डा विमला विपुला रथपङ्क्तयः।
यूपाश्च समकल्पन्त युद्धयज्ञे महाफले ॥ १३ ॥

उस महान् फलदायक युद्धयज्ञमें चितकबरे ईषादण्ड-वाली निर्मल एवं विशाल रथपंक्तियाँ यूपोंके रूपोंमें कल्पित हुईं ॥ १३ ॥

कर्णिनालीकनाराचा वत्सदन्तोपबृंहिकाः।
तोमराः सोमकलशा विचित्राणि धनूंषि च ॥ १४ ॥

कर्णि, नालीक, नाराच, वत्सदन्त, उपबृंहिका, तोमर और विचित्र धनुष—ये ही उस यज्ञमें सोमकलश थे ॥ १४ ॥

अस्थीन्यत्र कपालानि पुरोडाशाः शिरांसि च।
आज्यं च रौद्रं रुधिरं तस्मिन् यज्ञेऽभिहूयते ॥ १५ ॥

हड्डियाँ इसमें कपाल थीं, सिर पुरोडाश थे तथा भयंकर रुधिर ही घी था, जिसकी उस यज्ञमें आहुति दी जाती थी॥

इध्मः परिघयस्तत्र प्रस्तारा विपुला गदाः।
हयग्रीवोऽसिलोमा च राहुः केशी च दानवः ॥ १६ ॥

भविष्यपर्व ] चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ९०३


विरोचनश्च जम्भश्च कुजम्भश्च महाबलः।
सदस्यास्तत्र तु मखे विप्रचित्तिस्तु वीर्यवान् ॥ १७ ॥
द्वारपंक्तियाँ, इध्म और विशाल गदाएँ परिधि थीं। हयग्रीव, असिलोमा, राहु, दानव केशी, विरोचन, जम्भ, महाबली कुजम्भ और पराक्रमी विप्रचित्ति—ये उस यज्ञमें सदस्य थे ॥ १६-१७ ॥

इषवस्तु स्रुवास्तत्र रथाक्षसदृशाः शुभाः।
धनुष्कोट्या धनुर्ज्याश्च स्रुवस्तत्र महामखे ॥ १८ ॥
रथके धुरेके समान मोटे और सुन्दर बाण उस यज्ञमें स्रुवा थे। धनुषकी कोटियाँ और प्रत्यञ्चाएँ उस महायज्ञमें स्रुवका काम देती थीं ॥ १८ ॥

प्रतिप्रस्थानिकं कर्म वृषपर्वाकरोदिह ।
दीक्षितस्तत्र तु बलिस्तस्य पत्नी महाचमूः ॥ १९ ॥
वृषपर्वाने उस यज्ञमें प्रतिप्रस्थाताका कार्य किया, राजा बलि उसमें दीक्षा ग्रहण करनेवाले यजमान थे और उनकी विशाल सेना ही उनकी पत्नी थी ॥ १९ ॥

शम्बरस्तत्र शामित्रमकरोद् दितिनन्दनः।
अतिरात्रे महाबाहुर्वितते यज्ञकर्मणि ॥ २० ॥
महाबाहु दितिनन्दन शम्बरने वहाँ चालू हुए उस अतिरात्र नामक यज्ञकर्ममें शामित्र-कर्म किया ॥ २० ॥

दक्षिणास्तस्य यज्ञस्य कालनेमिर्महासुरः।
वैताने कर्मणि विभोर्यः ख्यातो हव्यवाड़िव ॥ २१ ॥
उस यज्ञकी दक्षिणाओंके रूपमें महान् असुर कालनेमि उपस्थित था, जो अपने स्वामी बलिके यज्ञकर्ममें अग्निके समान विख्यात था ॥ २१ ॥

त्रिदशानां तु सैन्यस्य शरीरैर्गतजीवितैः।
तस्मिन् यज्ञे तु सवनं वर्धते दैत्यनिर्मितम् ॥ २२ ॥
देवताओंकी सेनाके निष्प्राण शरीरोंद्वारा उस यज्ञमें दैत्योंका किया हुआ सवनकर्म उत्तरोत्तर बढ़ रहा था ॥ २२ ॥

देवानां रुधिरं संख्ये पपुस्तेऽथ दितेः सुताः।
नर्दमानाः प्रमुदिताः सोमपानं रणाध्वरे ॥ २३ ॥
उस रणयज्ञमें भयंकर दैत्य जो देवताओंका रुधिर पान करते थे, वही मानो प्रसन्नतापूर्वक उनके द्वारा किया गया सोमपान था, वे कोलाहल करते हुए वहाँ वह सोमपान करते थे ॥ २३ ॥

यदा बलिर्महादैत्यो विजेता समरे सुरान् ।
तदा ह्यवभृथो यज्ञे भविष्यति न संशयः ॥ २४ ॥
जब महादैत्य बलि समरमें देवताओंपर विजय पा लेंगे, तब उस यज्ञकी समाप्तिपर अवभृथस्नान होगा, इसमें संशय नहीं है ॥ २४ ॥

महासुरेन्द्रपतयो यज्वानो भूरिदक्षिणाः।
वेदवन्तो वृत्तवन्तः शूराः सर्वे तनुत्यजः ॥ २५ ॥
बड़े-बड़े असुरेश्वर जो प्रचुर दक्षिणा देनेवाले, यज्ञकर्ता, वेदज्ञ, सदाचारी और शूरवीर थे, सब-के-सब उस युद्धमें शरीरका मोह छोड़कर लगे थे ॥ २५ ॥

त्रैलोक्यहरणे सृष्टा युद्धयज्ञाय दीक्षिताः।
बद्धकृष्णाजिनाः सर्वे व्रतिनो मुञ्जधारिणः ॥ २६ ॥
वे सब त्रिलोकीका राज्य हर लेनेके लिये उद्यत हो उस युद्धरूपी यज्ञके लिये दीक्षा ले चुके थे। उन सबने अपने शरीरमें काले मृगचर्म बाँध रखे थे। वे सभी मुञ्जकी मेखला धारण करके व्रतके पालनमें तत्पर थे ॥ २६ ॥

एकनिश्चयकार्याश्च त्रैलोक्यजयकाङ्क्षिणः।
सुरदानवदैत्यानां शब्दः समभवन्महान् ॥ २७ ॥
नानायुधविहस्तानां त्वरितानां प्रधावताम्।
एक ही निश्चित उद्देश्यको लेकर वे सभी युद्धरूपी कार्यमें संलग्न थे। सबके मनमें यही इच्छा थी कि त्रिलोकीके राज्यपर विजय प्राप्त हो जाय। नाना प्रकारके आयुध हाथमें लेकर बड़ी उतावलीके साथ रणभूमिमें तीव्रगतिसे दौड़ते हुए देवताओं, दानवों और दैत्योंका महान् कोलाहल वहाँ होने लगा ॥ २७३ ॥

क्ष्वेडितोत्क्रुष्टनिनदैर्गजवृंहितनिःस्वनैः ॥ २८ ॥
रथनेमिस्वनैर्घोरैस्तुमुलः सर्वतोऽभवत् ।
योद्धाओंके सिंहनाद, उच्चस्वरसे पुकार, गर्जना, हाथियोंके चिंघाड़ने तथा रथके पहियोंकी घरघराहट आदिके घोर कोलाहलसे वहाँ सब ओर तुमुलनाद छा गया ॥ २८३ ॥

शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैर्हयहेषितनिःस्वनैः ॥ २९ ॥
हयानां हेषमाणानां दानवानां च गर्जताम् ।
क्ष्वेडितोत्क्रुष्टनिनदैः पाणिपादखैस्तथा ॥ ३० ॥
शङ्ख और दुन्दुभियोंके गम्भीर घोषसे, घोड़ोंके हिनहिनानेकी आवाजसे, हँसते हुए अश्वों और गरजते हुए दानवोंके सिंहनादसे, उनके चीखने और चिल्लानेसे तथा उनके हाथ-पैर पटकनेसे भी वहाँ महान् कोलाहल छा रहा था ॥ २९-३० ॥

दानवानां परेषां च शस्त्रवन्ति महान्ति च ।
समरे भीमकर्माणि सैन्यानि प्रचकाशिरे ॥ ३१ ॥
दानवों और देवताओंकी विशाल सेनाएँ अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित हो समराङ्गणमे भयंकर कर्म करती हुई प्रकाशित हो रही थीं ॥ ३१ ॥

ततो नागा रथैश्चैव जाम्बूनदविभूषिताः ।
भ्राजमाना व्यराजन्त मेघा इव सविद्युतः ॥ ३२ ॥
उस समय वहाँ सुवर्णसे विभूषित हाथी और रथ, विद्युत्सहित मेघोंके समान उद्भासित होते हुए बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ ३२ ॥

ऋष्टिखड्गदास्तीक्ष्णाः शूलशक्तिपरश्वधाः ।

९०४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

चारु विभ्राजिरे तत्र तेष्वनीकेषु भागशः ॥ ३३ ॥
उन सेनाओंमें पृथक्-पृथक् ऋष्टि, खड्ग, गदा, तीखे शूल, शक्ति और फरसे चमक रहे थे, जो अत्यन्त मनोहर जान पड़ते थे ॥ ३३ ॥

रथा बहुविधाकाराः शतशोऽथ सहस्रशः ।
हेमप्रच्छन्नशिखरा ज्वलन्त इव पावकाः ॥ ३४ ॥
नाना प्रकारकी आकृतिवाले सैकड़ों और हजारों रथ जिनके ऊपरी भाग सोनेके पत्रसे ढके हुए थे, प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ३४ ॥

दानवानां सुराणां च समालोक्यन्त सैनिकाः ।
काञ्चनैः कवचैः सर्वे ज्वलितार्कसमप्रभैः ॥ ३५ ॥
संनद्धाः समदृश्यन्त ज्योतिंषीव गगने यथा ।
दीप्तिमान् सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले सुवर्णमय कवचोंसे सुसज्जित हुए दानवों और देवताओंके समस्त सैनिक आकाशमें तारोंके समान दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ ३५ १/२ ॥

उद्यतैरायुधैश्चित्रैस्तलवद्धाः कलापिनः ॥ ३६ ॥
ऋषभाक्षाः सुरगणाश्चमूमुखगता बभुः ।
हाथोंमें दस्ताने बाँधे और पीठपर तरकस लिये बैलोंके समान बड़े-बड़े नेत्रोंवाले देवता सेनाके मुहानेपर ओर ऊपर उठाये हुए विचित्र आयुधोंके द्वारा बड़ी शोभा पा रहे थे ॥

नानावर्णाः पताकाश्च ध्वजमालाश्च संयुगे ॥ ३७ ॥
युध्यतां रणशौण्डानामीरयामास मारुतः ।
समरभूमिमें जूझते हुए रणकुशल योद्धाओंकी बहुरंगी पताकाओं और ध्वजपंक्तियोंको वायु कम्पित कर रही थी ॥

ध्वजालंकारवस्त्राणि कवचानि च रश्मिभिः ॥ ३८ ॥
भासयामास सर्वाणि रश्मिवर्णानि रश्मिवान् ।
सैनिकोंके ध्वज, आभूषण, वस्त्र और कवच—इन सभी वस्तुओंको सूर्यदेव अपनी किरणोंसे उन्हींके समान कान्तिमान् बनाकर प्रकाशित कर रहे थे ॥ ३८ १/२ ॥

सर्वेषामप्रमेयाणां वलानां पादचारिणाम् ॥ ३९ ॥
रजः प्रच्छादयामास पत्रोर्णं पाण्डुरं दिशः ।
दोनों दलोंके समस्त पैदल सैनिकोंके, जो असंख्य थे, पैरोंसे उठी हुई धुले हुए रेशमी वस्त्रके समान श्वेत धूलने समस्त दिशाओंको आच्छादित कर दिया ॥ ३९ १/२ ॥

दिव्यायुधधराः सर्वे दीप्तायुधपरिच्छदाः ॥ ४० ॥
प्रतितस्तम्भिरेऽन्योन्यमनीकं प्रत्यनीकतः ।
सबने दिव्य आयुध धारण कर रखे थे; सभीके अस्त्र-शस्त्र तथा वस्त्र-आभूषण आदि चमकीले थे। वे आपसमें एक सेनाके लोग दूसरी सेनाके लोगोंको स्तम्भित कर देते थे (आगे नहीं बढ़ने देते थे) ॥ ४० १/२ ॥

गिरिकूटोच्छ्रयाः सर्वे तदा ते देवदानवाः ॥ ४१ ॥
अन्योन्यमभिनिघ्नन्तो रणस्थाश्चित्रयोधिनः ।
पर्वत-शिखरोंके समान ऊँचे शरीरवाले वे समस्त देवता और दानव उस समय रणभूमिमें खड़े हो एक दूसरेपर चोट करते हुए विचित्र रीतिसे युद्ध करने लगे ॥ ४१ १/२ ॥

बाणैः सुरुचिरैस्तीक्ष्णैः पत्रवाजैर्दुरासदैः ॥ ४२ ॥
मुद्गरैर्मुसलैः शूलैरयस्तुण्डैहलूखलैः ।
वज्रैरशनिकल्पैश्च खड्गवृक्षादिभिस्तथा ॥ ४३ ॥
तथा प्रवर्तिते तेषां विमर्देऽद्भुतविक्रमे ।
सावित्रस्य वधं प्रेप्सुर्वाणो जग्राह कार्मुकम् ॥ ४४ ॥
पंखोंसे वेगयुक्त हुए दुर्जय, तीक्ष्ण और परम सुन्दर बाण, मुद्गर, मूसल, शूल, अयस्तुण्ड, उलूखल, अशनितुल्य वज्र, खड्ग और वृक्ष आदिके द्वारा अद्भुत पराक्रम प्रकट करते हुए उन योद्धाओंमें जब इस प्रकार भीषण मारकाट हो रही थी, उसी समय सावित्रका वध करनेके लिये बाणासुरने धनुष उठाया ॥ ४२-४४ ॥

शरजालेन दिव्येन च्छादयानः सुरोत्तमम् ।
मन्त्रैर्हुत इवार्चिष्मान् सम्प्रजज्वाल तेजसा ॥ ४५ ॥
अपने दिव्य बाणोंके जालसे सुरश्रेष्ठ सावित्रको आच्छादित करता हुआ बाणासुर मन्त्रोंद्वारा घीकी आहुति पाये हुए अग्निदेवके समान तेजसे प्रज्वलित हो उठा ॥ ४५ ॥

सागराभां महासेनां देवानां दैत्यपुंगवः ।
संशोषयति बाणौघैरर्कैऽशुभिरिवार्णवम् ॥ ४६ ॥
देवताओंकी विशाल सेना समुद्रके समान थी। उसे दैत्यशिरोमणि बाणासुर अपने बाणसमूहोंद्वारा उसी प्रकार सुखाने लगा, जैसे सूर्य अपनी किरणोंद्वारा समुद्रको सुखाते रहते हैं ॥ ४६ ॥

मारुतः सुमहावेगः सावित्रः शक्तिमुत्तमाम् ।
चिक्षेप बलिपुत्राय शक्रोऽशनिमिवाद्रये ॥ ४७ ॥
तब महान् वेगशाली सावित्र नामक मारुतने बलिपुत्र बाणासुरपर उत्तम शक्ति चलायी, मानो इन्द्रने किसी पर्वत-पर वज्र फेंका हो ॥ ४७ ॥

आपतन्ती च सा शक्तिर्महोल्का ज्वलिता इव ।
द्विधा छिन्ना क्षुरप्रेण वाणेनाद्भुतकर्मणा ॥ ४८ ॥
परंतु अद्भुत कर्म करनेवाले बाणासुरने प्रज्वलित हुई विशाल उल्काके समान अपनी ओर आती हुई उस शक्तिके एक क्षुरप्रद्वारा दो टुकड़े कर डाले ॥ ४८ ॥

हतायामथ शक्त्यां तु सावित्रो देवसत्तमः ।
विश्वकर्मकृतं दिव्यं सुतीक्ष्णं दानवार्दनम् ॥ ४९ ॥
सुपीनधारं विमलं विपुलं चन्द्रवर्चसम् ।
अङ्ग्लहान्निशितं खड्गमाशीविषमिवोरगम् ॥ ५० ॥
उस शक्तिके खण्डित हो जानेपर देवशिरोमणि सावित्रने विश्वकर्माके बनाये हुए एक दिव्य दानवदलन खड्गको हाथमें लिया, जो विषधर सर्पके समान भयंकर था। उसकी

भविष्यपर्व ] चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ ९०५

धार बहुत ही तीखी और पुष्ट थी। वह निर्मल एवं विशाल खङ्ग तेज होनेके साथ ही चन्द्रमाके समान उज्ज्वल कान्तिसे प्रकाशित हो रहा था ॥ ४९-५० ॥ तं गृहीत्वा रणमुखे प्रज्वलन्तं महाप्रभम् । वाणाभ्याशे महातेजाः खङ्गपाणिरवस्थितः ॥ ५१ ॥ युद्धके मुहानेपर उस प्रज्वलित होनेवाले महान् कान्तिमान् खङ्गको हाथमें लेकर महातेजस्वी सावित्र वाणासुरके निकट खड़े हो गये ॥ ५१ ॥ स तं स्थितमथालक्ष्य सावित्रं बलिनन्दनः । लोहिताक्षं महाकायं चिक्षेप च ननाद च ॥ ५२ ॥ सावित्रकी आँखें लाल और काया विशाल थी। उन्हें इस प्रकार खड़ा हुआ देख बलिनन्दन बाणासुरने उनके प्रति आक्षेप और सिंहनाद किया ॥ ५२ ॥ ततोऽर्ककिरणाकारानशनिप्रतिमाञ्छितान् । संदधे चाशु बाणौघानाशीविषशिलीमुखान् ॥ ५३ ॥ तदनन्तर उसने सूर्यकी किरणोंके समान तेजस्वी, अशनिके सदृश तीखे और विषधर सर्पोंकी भाँति विषैले बाणसमूहोंका शीघ्र ही संधान किया ॥ ५३ ॥ रुक्मपुङ्खान प्रदीप्ताग्रानुग्रवेगानलंकृतान् । आकर्णपूरान्प्रिक्षेप शरानुग्रान् समन्ततः ॥ ५४ ॥ उनमें सोनेके पर लगे थे। उनका अग्रभाग उद्दीप्त हो रहा था। वे भयंकर वेगशाली तथा अलंकृत थे। बाणासुरने उन उग्र बाणोंको धनुषपर रखकर उन्हें कानतक खींचकर चारों ओर बरसाना आरम्भ किया ॥ ५४ ॥ दृढचापप्रयुक्तास्ते शरा वैश्वानरप्रभाः । सावित्रं छादयामासुः कैलासमिव तोयदाः ॥ ५५ ॥ वे अग्निके समान तेजस्वी बाण सुदृढ़ धनुषद्वारा छोड़े गये थे। उन्होंने सावित्रको उसी तरह ढक लिया, जैसे बादल कैलास पर्वतको आच्छादित कर देते हैं ॥ ५५ ॥ संछाद्यमानः शस्त्रौघैर्वाणेन बलिसूनुना । पराङ्मुखः सुरवरः प्रयाततः सरथध्वजः ॥ ५६ ॥ बलिकुमार बाणासुरके शस्त्रसमूहोद्वारा इस प्रकार आच्छादित होते हुए सुरश्रेष्ठ सावित्र युद्धसे विमुख हो रथ और ध्वजसहित वहाँसे चल दिये ॥ ५६ ॥ पराजित्य स सावित्रं वाणः परमहर्षितः । प्रगृह्य कार्मुकं घोरं गतः शक्ररथं प्रति ॥ ५७ ॥ सावित्रको पराजित करके वाणासुर बहुत प्रसन्न हुआ। तत्पश्चात् वह भयंकर धनुष लेकर इन्द्रके रथकी ओर चला गया ॥ ५७ ॥ बलश्चाप्यसुरश्रेष्ठः प्रगृह्य महतीं गदाम् । ध्रुवाय वसवे मूर्ध्नि रौद्रां चिक्षेप दानवः ॥ ५८ ॥ इधर असुरशिरोमणि बल नामक दानवने विशाल एवं भयंकर गदा हाथमें लेकर उसे ध्रुव नामक वसुके मस्तकपर दे मारा ॥ ५८ ॥ तस्य निर्मथितं त्वंसे हेमचित्रं च वर्म वै । गदावेगेन भीमेन ध्रुवस्य समरे तदा ॥ ५९ ॥ उस समय समराङ्गणमें उस गदाके भयंकर वेगसे ध्रुवके कंधेपर स्थित सुवर्णजटित विचित्र कवच छिन्न भिन्न हो गया ॥ शेषाश्च वसवः सर्वे दिव्यास्त्रैर्घोरदर्शनैः । प्राच्छादयन् रणे दैत्यमादित्यमिव तोयदाः ॥ ६० ॥ तब शेष सभी वसुओंने घोर दिव्यास्त्रोंद्वारा रणभूमिमें उस दैत्यको उसी प्रकार ढक दिया, जैसे बादल सूर्यदेवको आच्छादित कर देते हैं ॥ ६० ॥ ततः सम्मर्दितो बाणैर्बलो दानवसत्तमः । अवातरद् रथात् तस्माद् गदामुद्यम्य वेगवान् ॥ ६१ ॥ फिर तो उनके बाणोंसे रौंदा गया दानवशिरोमणि बल गदा उठाकर अपने उस रथसे वेगपूर्वक उतर पड़ा ॥ ६१ ॥ पातयामास शत्रूणां समाविध्य महासुरः । दिशः प्राद्रावयत् सर्वांस्त्रिदशान् सा महांगदा ॥ ६२ ॥ उस महान् असुरने गदाको घुमाकर उसे अपने शत्रुओंपर चला दिया। उस विशाल गदाने सम्पूर्ण देवताओंको उस समय विभिन्न दिशाओंमे भागनेको विवश कर दिया ॥ इन्द्राशनिरिवेन्द्रेण प्रवृद्धा सुमहास्वना । तस्याः सविद्युद्घोषायास्तेन शब्देन वेपिताः ॥ ६३ ॥ व्यद्रवन्त परित्रस्ता रथेभ्यो रथिनस्तदा । जैसे इन्द्रके द्वारा फेंकी गयी उनकी अशनि बड़े वेगसे आगे बढ़कर बड़ी भारी गड़गड़ाहट पैदा करती है, उसी तरह उस गदाने भी किया। बिजलीकी-सी कड़क पैदा करनेवाली उस गदाके शब्दसे कम्पित होकर उस समय देवसेनाके रथी अपने रथोंसे कूदकर भाग गये ॥ ६३॥ तदुदीर्णं रथानीकं सूर्याभं मेघनिःस्वनम् ॥ ६४ ॥ देवानां शरधाराभिः समन्तादभ्यवर्षत । तब सूर्यके समान तेजस्विनी और मेघोंके समान गर्जना करनेवाली देवताओंकी उस प्रचण्ड रथ-सेनापर बलने चारों ओरसे बाणधाराकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ६४॥ क्षुरप्रैर्विशिखैर्भल्लैर्वत्सदन्र्तैः शिलीमुखैः ॥ ६५ ॥ मुहुर्मुहुर्महातेजाः प्रत्यविध्यन्महासुरः । वह महातेजस्वी महान् असुर देवताओंको क्षुरप्र, विशिख, भल्ल, वत्सइन्त तथा शिलीमुख नामक बाणोंद्वारा बारंबार घायल करने लगा ॥ ६५॥ बलकस्तु गदापाणिर्व्यादितास्य इवान्तकः ॥ ६६ ॥ तडिद्रङ्गार्कसदृशो वैश्वानर इवापरः । बलकके नामक दैत्य हाथमें गदा लेकर मुँह बाये हुए कालके समान जान पड़ता था। वह विद्युत् और सूर्यके

९०६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंश

समान तेजस्वी था। दूसरे वैश्वानर (अग्नि) के समान प्रकाशित हो रहा था ॥ ६६ ½ ॥
पिबन्निव शरौघांस्तान् देवचापसमुच्छ्रितान् ॥ ६७ ॥
अभ्यद्रवत दैत्येन्द्रो महार्णव इवापरः।
वह दैत्यराज देवताओंके धनुषसे छूटे हुए बाणसमूहोंको पीता हुआ-सा उनकी ओर दौड़ा। वह दूसरे महासागरके समान वेगशाली प्रतीत होता था ॥ ६७ ½ ॥
अवसृर्जन् दिशः सर्वाः स्वेन वीर्येण दानवः॥ ६८ ॥
अरुणत् त्रिदशान् दैत्यः सिन्धुवेगान् नगा इव।
जैसे पर्वत समुद्रके वेगको भग्न कर देते हैं, उसी प्रकार उस दानव अथवा दैत्य वलाकने अपनी गर्जनासे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए अपने बल-पराक्रमसे समस्त देवताओंकी प्रगति भग्न कर दी ॥ ६८ ½ ॥
समुद्रस्तरसाम् देवान् वायुर्वृक्षानिवौजसा ॥ ६९ ॥
दमयंश्च महेष्वासान् वसुभ्यां समसज्जत ।
समुद्र नामक दैत्य जैसे वायु अपने बलसे वृक्षोंको उखाड़ फेंकता है, उसी प्रकार अपने वेगसे महाधनुर्धर देवताओंका दमन करता हुआ आप और अनिल नामक दो वसुओंके साथ युद्ध करने लगा ॥ ६९ ½ ॥
आपश्चैवानिलश्चैव ववर्षतुररिंदमौ ॥ ७० ॥
शरवर्षाणि दीप्तानि मेघाविव परंतपौ ।
क्षिपंस्तान् विशिखान् दीप्तानन्तरिक्षे स चिच्छिदे॥७१॥
शत्रुओंका दमन करनेवाले परंतप आप और अनिल दोनों वसुओंने दो मेघोंके समान तेजस्वी बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी; परंतु उस दैत्यने उनके चलाये हुए उन तेजस्वी बाणोंको आकाशमें ही काट गिराया ॥ ७०-७१ ॥
अमृष्यमाणस्तत्कर्म ध्रुवस्तमभिदुद्रुवे ।
तौ पृथक्शरवर्षाभ्यामन्योन्यमभिजघ्नतुः ॥ ७२ ॥
उसके उस कर्मको ध्रुव सहन न कर सके; अतः उन्होंने उसपर धावा कर दिया। फिर वे दोनों वीर पृथक् पृथक् बाण-वर्षा करके एक-दूसरेको घायल करने लगे ॥७२॥
उत्तमाभिज नौ शूरौ देवदैत्यौ यशस्करौ ।
तौ नखैरिव शार्दूलौ दन्तैरिव महाद्विपौ ॥ ७३ ॥
रथशक्तिभिरन्योन्यं विशिखैश्चाप्यकृन्तताम् ।
निर्भिन्दन्तौ च गात्राणि विलिखन्तौ च सायकैः ॥ ७४ ॥
वे देवता और दैत्य दोनों शूरवीर, उत्तम कुलमें उत्पन्न तथा यशस्वी थे। जैसे दो बाघ नखोंसे और दो महान् गज राज दाँतोंसे एक दूसरेपर चोट करते हैं, उसी प्रकार वे दोनों वीर रथ-शक्तियों और बाणोंद्वारा एक दूसरेको क्षत विक्षत करने लगे। वे अपने अपने सायकोंद्वारा प्रतिपक्षीके अंगोंको विदीर्ण एवं घायल करने लगे ॥ ७३-७४ ॥
स्तम्भयन्तौ च बलिनौ प्रतुदन्तौ स्थितौ रणे ।
चरन्तौ विविधान् मार्गान् मण्डलानि च भागशः ॥७५॥
दोनों बलवान् थे; अतः दोनों ही रणभूमिमें स्थित होकर एक दूसरेको आगे बढ़नेसे रोकते और पीड़ित करते हुए युद्धके विविध मागोंमे विचरते और पृथक् पृथक् पैंतरे दिखाते थे ॥ ७५ ॥
मुद्गरैर्जघ्नतुः क्रुद्धावन्योन्यमभिमानिनौ ।
असिभ्यां चर्मणी दिव्ये विपुले च शरासने ॥ ७६ ॥
निकृत्याचलसंकाशौ बाहुयुद्धं प्रचक्रतुः ।
इसके बाद वे दोनों अभिमानी वीर कुपित होकर परस्पर मुद्गरोंकी मार करने लगे। दोनों ही तलवारोंसे दोनोंके दिव्य ढाल और विशाल धनुष काटकर पर्वतके समान खड़े हो परस्पर बाहुयुद्ध करने लगे ॥ ७६ ½ ॥
व्यूढोरस्कौ दीर्घभुजौ नियुद्धकुशलावुभौ ॥ ७७ ॥
बाहुभिः समसज्जेतामायसैः परिवैरिव ।
दोनोंकी ही छाती चौड़ी और भुजाएँ बड़ी बड़ी थीं। दोनों ही मल्लयुद्धमें कुशल थे; अतः लोहेके बने हुए परिघों-के समान अपनी मोटी एवं बलिष्ठ भुजाओं द्वारा वे एक दूसरेसे गुथ गये ॥ ७७ ½ ॥
तयोरासीद् भुजाघातैर्निग्रहः प्रग्रहस्तथा ॥ ७८ ॥
अतीव भीमः संह्रादो वज्रपर्वतयोरिव ।
उन दोनों में भुजाओंके आघातसे निग्रह और प्रग्रहके दाँव-पेंच चलने लगे। उस समय वज्र और पर्वतके टकरानेके समान अत्यन्त भयंकर शब्द होता था ॥ ७८ ½ ॥
द्विपाविव विषाणाग्रैः शृङ्गैरिव महावृषौ ॥ ७९ ॥
अन्योन्यमभिसंरब्धौ मुहूर्तं पर्यकर्षताम् ॥ ८० ॥
जैसे दो हाथी अपने दाँतोंके अग्रभागसे तथा दो बड़े-बड़े साँड़ अपने सींगोंसे प्रहार करते हुए लड़ते हैं, उसी प्रकार वे दोनों वीर अत्यन्त क्रोधपूर्वक दो घड़ीतक एक दूसरेको खींचते और धक्के देते रहे ॥ ७९-८० ॥
ततः पराजितो देवो वलाकेन तथा ध्रुवः।
रथं त्यक्त्वा भयात् तस्य प्रणष्टः प्राङ्मुखो द्रुतः॥ ८१ ॥
तदनन्तर वसुदेवता ध्रुव वलाक नामक दैत्यसे पराजित हो रथ छोड़कर भयके मारे पूर्व दिशाकी ओर भाग गये ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे देवासुरयुद्धे चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥

इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें देवताओं और असुरोंका युद्धविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५४ ॥

भविष्यपर्व ] | पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः | ९०७

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

नमुचिद्वारा धर नामक वसुकी, मयासुरद्वारा त्वष्टाकी, वायुदेवद्वारा पुलोमाकी, हयग्रीवद्वारा पूषा देवताकी, शम्बरासुरद्वारा भगकी तथा चन्द्रदेवद्वारा समूची दैत्यसेनाकी पराजय

वैशम्पायन उवाच

पुनरेव तु तत्रासीन्महायुद्धं सुदारुणम्।
क्रुद्धस्य नमुचेश्चैव धरस्य च महात्मनः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! वहाँ पुनः क्रोधमें भरे हुए नमुचि और महात्मा धरका अत्यन्त भयंकर महान् युद्ध आरम्भ हुआ ॥ १ ॥

संरब्धौ च महाबाहू महेष्वासावरिंदमौ ।
परस्परमुदैक्षेतां दहन्ताविव लोचनैः ॥ २ ॥
दोनों ही महाबाहु, महाधनुर्धर और शत्रुदमन वीर थे । वे दोनों क्रोधसे भरकर एक दूसरेको इस तरह देखने लगे, मानो नेत्रोंद्वारा दग्ध कर देंगे ॥ २ ॥

विस्फार्य च महाचापं हेमपृष्ठं दुरासदम् ।
संरम्भात् स वसुश्रेष्ठस्त्यक्त्वा प्राणानयुध्यत ॥ ३ ॥
वसुश्रेष्ठ धर जिसके पृष्ठभागमें सोना जड़ा हुआ था, उस दुर्जय एवं विशाल धनुषको फैलाकर और प्राणोंका मोह छोड़कर क्रोधपूर्वक युद्ध करने लगे ॥ ३ ॥

स सायकमयैर्जालैर्धरो दैत्यरथं प्रति ।
भानुमद्भिः शिलाधौतैर्भानोः प्राच्छादयत् प्रभाम् ॥ ४॥
धरने शिलापर तेज किये हुए तेजस्वी बाणोंका जाल-सा बिछाकर दैत्य नमुचिके रथको तथा सूर्यके प्रकाशको भी ढक दिया ॥ ४ ॥

ततः प्रहस्य नमुचिर्धरस्य च शिलाशितान् ।
असृजत् सायकान् दीप्तान् भीमवेगान् दुरासदान् ॥५॥
तब नमुचिने हँसकर धरके ऊपर भी भयंकर वेगशाली दुर्जय बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी । वे सभी बाण सानपर चढ़ाकर तेज किये गये और तेजस्वी थे ॥ ५ ॥

महातेजा महाबाहुर्महावेगो महारथः ।
विव्याधातिबलो दैत्यो नवभिर्निशितैः शरैः ॥ ६ ॥
महातेजस्वी, महान् वेगशाली, महारथी और अत्यन्त बलशाली महाबाहु दैत्य नमुचिने नौ पैने बाणोंसे धरको घायल कर दिया ॥ ६ ॥

स तोत्रैरिव मातङ्गो वार्यमाणः पतत्त्रिभिः ।
अभ्यधावच्च संक्रुद्धो नमुचिं वसुसत्तमः ॥ ७ ॥
जैसे अंकुशोंसे हाथीको रोका जाय, उसी प्रकार बाणोंद्वारा रोके जाते हुए वसुशिरोमणि धरने अत्यन्त कुपित होकर नमुचिपर धावा किया ॥ ७ ॥

तमापतन्तं वेगेन संरम्भान्नमुची रणे ।
दैत्यः प्रत्यसरद् देवं मत्तो मत्तमिव द्विपम् ॥ ८ ॥
उन्हें क्रोधपूर्वक वेगसे आते देख रणभूमिमें नमुचि नामक दैत्य उन वसु देवताका सामना करनेके लिये आगे बढ़ा, ठीक उसी तरह जैसे एक मतवाला हाथी दूसरे मतवाले हाथीके साथ भिड़नेके लिये आगे बढ़ता है ॥ ८ ॥

ततः प्राध्मापयच्छङ्खं भेरीशतनिनादिनम् ।
विक्षोभ्य तद्बलं हर्षादुद्भूतार्णवसप्रभम् ॥ ९ ॥
अश्वानृक्षसवर्णामान् हंसवर्णैः सुवाजिभिः ।
मिश्रयन् समरे दैत्यो वसुं प्राच्छादयच्छरैः ॥ १० ॥
तदनन्तर दैत्यने शङ्ख बजाया, जो सौ भेरियोंके समान गम्भीर घोष करनेवाला था । उसने हर्षसे उमड़ते हुए समुद्रके समान देवताओंकी सेनाको क्षोभमें डालकर अपने रीछके समान रंगवाले घोड़ोंको धरके हंसकी-सी कान्तिवाले उत्तम घोड़ोंके साथ मिलाते हुए समराङ्गणमें बाणोंद्वारा वसुको आच्छादित कर दिया ॥ ९-१० ॥

समाश्रिष्टावथान्योन्यं वसुदानवयो रथौ ।
दृष्ट्वा प्राकम्पत मुहुस्त्रिदशानां महद्बलम् ॥ ११ ॥
वसु और दानवके रथोंको एक दूसरेसे सटा हुआ देख देवताओंकी विशाल सेना बारंबार काँपने लगी ॥ ११ ॥

क्रोधसंरम्भताम्राक्षौ प्रेक्षमाणौ मुहुर्मुहुः ।
गर्जन्ताविव शार्दूलौ प्रभिन्नाविव वारणौ ॥ १२ ॥
उन दोनोंके नेत्र रोषावेशसे लाल हो रहे थे । वे दोनों दो बाघों और मदकी धारा बहानेवाले दो हाथियोंके समान एक दूसरेकी ओर देख-देखकर बारंबार गर्जना करते थे ॥

यमराष्ट्रोपमं रौद्रमासीदायोधनं तयोः।
रथाश्वनरसम्बाधं मत्तवारणसंकुलम् ॥ १३ ॥
उन दोनोंका भयंकर युद्ध यमराजके राज्यके समान प्रतीत होता था । वह युद्धस्थल रथ, घोड़े और मनुष्योंसे भरा हुआ तथा मतवाले हाथियोंसे व्याप्त था ॥ १३ ॥

समाजमित्र तं दृष्ट्वा प्रेक्षमाणा महारथाः ।
आशंसन्तो जयं ताभ्यां योधा नैकशतसंख्याः ॥ १४ ॥
उन दोनोंका युद्ध समाज (रंगशालामें होनेवाली क्रीडा) के समान दर्शनीय हो गया था । उसे देखते हुए उभयपक्षीय महारथी योद्धा उन दोनोंमेंसे एककी जय मनाते थे (देवता देवताकी और दैत्य दैत्यकी विजय चाहते थे ) ॥

तयोः प्रैक्षन्त संरम्भं संनिकृष्टं महारथयोः ।
सिद्धगन्धर्वमुनयो देवदानवयोस्र्तदा ॥ १५ ॥
उन महान् अस्त्रधारी देवता और दानव दोनों वीरोंके निकटसे होनेवाले रोषपूर्ण संग्रामको सिद्ध, गन्धर्व और मुनि देख रहे थे ॥ १५ ॥

९०८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

तौच्छादयन्तावन्योन्यं समरे निशितैः शरैः।
शरजालावृतं व्योम चक्रतुश्च महाबलौ ॥ १६ ॥
उन दोनों महाबली योद्धाओंने समराङ्गणमें पैने बाणोंसे एक दूसरेको आच्छादित करते हुए आकाशको बाणोंके जालसे ढक दिया ॥ १६ ॥

तावन्योन्यं जिघांसन्तौ शरैस्तीक्ष्णैर्महारथौ।
प्रेक्षणीयतमावास्तां वृष्टिमन्ताविवाम्बुदौ ॥ १७ ॥
तीखे बाणोंसे एक दूसरेको मार डालनेकी इच्छावाले वे दोनों महारथी वीर वर्षा करनेवाले मेघोंके समान परम दर्शनीय हो रहे थे ॥ १७ ॥

सुवर्णविकृतान् बाणान् प्रमुञ्चन्तावरिन्दमौ ।
भास्कराभं तदाकाशमुल्काभिरिव चक्रतुः ॥ १८ ॥
सुवर्णनिर्मित बाणोंकी वर्षा करते हुए उन दोनों शत्रु-दमन वीरोंने उस समय आकाशको सूर्यके समान प्रकाशमान तथा उल्काओंसे व्याप्त-सा कर दिया ॥ १८ ॥

तयोः शराः प्रकाशन्ते देवदानवयोरतदा।
पङ्क्तयः शरदि मत्तानां सारसानामिवाम्बरे ॥ १९॥
देवता धर और दानव नमुचि दोनोंके बाण उस समय आकाशमें ऐसे प्रकाशित हो रहे थे, मानो शरद्-ऋतुमें मतवाले सारसोंकी पंक्तियाँ उड़ी जा रही हों ॥ १९ ॥

त्रिदशाश्वगजानां हि शरीरैर्गतजीवितैः।
क्षणेन संवृता भूमिर्मेघैरिव नभस्तलम् ॥ २० ॥
जैसे बादल आकाशको ढक लेते हैं, उसी प्रकार देवताओंके घोड़े और हाथियोंके निर्जीव शरीरोंसे वहाँकी भूमि क्षणभरमें पट गयी ॥ २० ॥

ततः सुधारं ज्वलितं सूर्यमण्डलसन्निभम् ।
धराय वसवे मुक्तं चक्रं नमुचिना रणे ॥ २१ ॥
तदनन्तर रणभूमिमें नमुचिने सूर्यमण्डलके समान प्रज्वलित और तीखी धारवाला चक्र धर नामक वसुको लक्ष्य करके छोड़ दिया ॥ २१ ॥

पतता तेन चक्रेण धरस्य स्यन्दनोत्तमः ।
सध्वजः सायुधः साश्वो दग्धोऽर्ककिरणप्रभः॥ २२ ॥
गिरते हुए उस चक्रने धरके सूर्यकी किरणोंके समान प्रकाशमान उत्तम रथको ध्वज, आयुध और घोड़ोंसहित जलाकर भस्म कर दिया ॥ २२ ॥

स त्यक्त्वा स्यन्दनं देवः प्रदीप्तं चक्रतेजसा ।
भयात् तस्यासुरेन्द्रस्य गतः स्वगृहमुत्तमम् ॥ २३ ॥
चक्रके तेजसे जलते हुए उस रथको त्यागकर धर देवता असुरेश्वर नमुचिके भयसे अपने उत्तम घरको भाग गये ॥२३॥

पराजित्य सुरं दैत्यो नमुचिर्बलगर्वितः ।
प्रयातः स्वेन सैन्येन भूयः सुरचमू प्रति ॥ २४ ॥
इस प्रकार वसु देवताको पराजित करके बलके घमंडसे भरा हुआ दैत्य नमुचि पुनः अपनी सेनाके साथ देवसेनाकी ओर बढ़ा ॥ २४ ॥

यौ तौ मयश्च त्वष्टा च देवदैत्येषु विश्रुतौ ।
प्रवरौ विश्वकर्माणौ मायाशतविशारदौ ॥ २५ ॥
घोरस्तयोः सम्प्रहारः प्रावर्तत सुदारुणः ।
अन्योन्यस्पर्द्धिनोस्तत्र चिरात्प्रभृति संयुगे ॥ २६ ॥
देवताओं और दैत्योंमें जो विख्यात मय और त्वष्टा हैं, वे दोनों श्रेष्ठ विश्वकर्मा कहे गये हैं। दोनों ही सैकड़ों मायाओंके विशेषज्ञ हैं। उन दोनोंमें वहाँ अत्यन्त दारुण और घोर युद्ध आरम्भ हो गया। वे चिरकालसे युद्धके लिये एक दूसरेके प्रति स्पर्धा रखते चले आ रहे थे ॥ २५-२६॥

त्वष्टा तु निशितैर्बाणैर्दैत्यं तु बलदर्पितम् ।
पराक्रान्तं पराक्रम्य विव्याध त्रिशतैः शरैः ॥ २७ ॥
त्वष्टाने बलके घमंडमें भरे हुए पराक्रमी दैत्य मयको पराक्रमपूर्वक तीन सौ तीखे बाणोंसे घायल कर दिया ॥२७॥

मयस्तु प्रतिविव्याध त्वष्टारं निशितैः शरैः ।
सुघातैः सुप्रसन्नाग्रैः शातकुम्भविभूषितैः ।
ननाद दितिजश्रेष्ठो हतस्त्वष्टुः शरैर्मयः ॥ २८ ॥
तब मयने भी त्वष्टाको अपने पैने बाणोंका निशाना बनाया। मयासुरके वे बाण अच्छी तरह चोट करनेवाले तथा सुवर्णसे विभूषित थे। उनके अग्रभाग स्वच्छ एवं चमकीले थे। फिर त्वष्टाके बाणोंसे घायल हुए दैत्यप्रवर मयासुरने बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ २८ ॥

संक्रुद्धो दैत्यसैन्यस्य विचिन्वन्निव जीवितम् ।
शक्तिं कनकवैडूर्य्यचित्रदण्डां महाप्रभाम् ॥ २९ ॥
देवो गृहीत्वा समरे दैत्येन्द्रं समपातयत् ।
यह देख त्वष्टा अत्यन्त कुपित हो उठे और दैत्यसेनाके प्राणोंका चयन-सा करने लगे। उन्होंने सुवर्ण और वैदूर्य-मणिसे जटिल विचित्र दण्डवाली, अत्यन्त प्रभासे परिपूर्ण शक्ति हाथमें लेकर उसे समराङ्गणमें उस दैत्यराजपर दे मारा ॥

भीमां सर्वायसीं दृष्ट्वा पुरंदर इवाशनिम् ॥ ३० ॥
तां त्वष्टुर्भुजनिर्मुक्तामर्कवैश्वानरप्रभाम् ।
मयश्चिच्छेद तीक्ष्णाग्रैस्तूर्णं सप्तभिराशुगैः ॥ ३१ ॥
वह भयंकर शक्ति सम्पूर्णतः लोहेकी बनी हुई थी। जैसे देवराज इन्द्रने वज्र चलाया हो, उसी प्रकार त्वष्टाके हाथोंसे छूटी हुई सूर्य और अग्निके समान प्रभावली उस शक्तिको आती देख मयासुरने तीखे अग्रभागवाले सात शीघ्र-गामी बाणोंद्वारा तुरंत ही उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥

ततः क्षुण्वन्निव प्राणांस्त्वष्टुः कोपान्महासुरः ।
प्रेषयामास संरब्धः शरान् बर्हिणवाससः ॥ ३२ ॥
तब उस महान् असुरने कुपित हो मानो त्वष्टाके प्राण लेनेको उद्यत होकर उनके ऊपर रोषपूर्वक मोरपंख लगे बाणोंका प्रहार आरम्भ किया ॥ ३२ ॥

भविष्यपर्व ] पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ९०९

चिच्छेद बाणांस्त्वष्टा ताञ्ज्वलितैर्नतपर्वभिः ।
दैत्यस्य सुमहावेगैः सुवर्णविकृतैः शरैः ॥ ३३ ॥
परंतु त्वष्टाने सुवर्णनिर्मित, झुकी हुई गाँठवाले, प्रज्वलित तथा महान् वेगशाली सायकोंद्वारा दैत्यके उन बाणोंको काट डाला ॥ ३३ ॥

तौ वृषाविव नर्दन्तौ बलिनौ वासितान्तरे ।
शार्दूलाविव चान्योन्यं प्रसक्तावभिजघ्नतुः ॥ ३४ ॥
वे दोनों बलवान् वीर मैथुनकी इच्छावाली गौके लिये आपसमें लड़ने और गर्जनेवाले दो साँड़ों तथा, परस्पर उलझे हुए दो बाघोंके समान एक-दूसरेपर आघात करने लगे ॥ ३४ ॥

अन्योन्यं प्रतियुध्यन्तावन्योन्यवधकाङ्क्षिणौ ।
अन्योन्यमभिवीक्षन्तौ क्रुद्धावाशीविषाविव ॥ ३५ ॥
वे एक दूसरेके वधकी इच्छासे परस्पर लड़ते थे और क्रोधमें भरे हुए दो विषधर सर्पोंके समान एक-दूसरेकी ओर देखते थे ॥ ३५ ॥

महागजाविवासाद्य विषाणाग्रैः परस्परम् ।
शरैः पूर्णायतोत्सृष्टैरन्योन्यमभिजघ्नतुः ॥ ३६ ॥
जैसे दो बड़े-बड़े हाथी परस्पर भिड़कर दाँतोंके अग्र-भागोंसे एक-दूसरेपर चोट करते हैं, उसी प्रकार वे दोनों धनुषको पूरा-पूरा तानकर छोड़े गये बाणोंद्वारा परस्पर आघात कर रहे थे ॥ ३६ ॥

ततः सुविपुलां दीप्तां मयो रुक्माङ्गदो गदाम् ।
त्वष्ट्रि प्राहिणोद् क्रुद्धः सर्वप्राणहरां रणे ॥ ३७ ॥
तब सोनेके बाजूबंद धारण करनेवाले मयासुरने कुपित हो रणभूमिमें सबके प्राण हर लेनेवाली एक विशाल एवं दीप्तिमती गदा त्वष्टापर चलायी ॥ ३७ ॥

तया जघानातिरथस्त्वष्टुरुत्तमवाजिनः ।
गदया दानवः क्रुद्धो वज्रेणेन्द्र इवाचलान् ॥ ३८ ॥
क्रोधमें भरे हुए उस अतिरथी दानवने उस गदाके द्वारा त्वष्टाके उत्तम घोड़ोंको मार डाला; ठीक उसी तरह, जैसे इन्द्र वज्रसे पर्वतोंको धराशायी कर देते हैं ॥ ३८ ॥

ततः क्रुद्धो महादैत्यः क्षुराभ्यामथ संयुगे ।
पुनर्द्वाभ्यां शराभ्यां तु निशिताभ्यां महारणे ॥ ३९ ॥
ध्वजं त्वष्टूरथं छित्त्वा सूतं निन्ये यमक्षयम् ।
महाबलान् महावेगान् सदश्वान् गदया हनत् ॥ ४० ॥
इसके बाद कुपित हुए उस महादैत्यने महासमरमें पुनः दो पैने 'क्षुर' नामक बाणोंद्वारा त्वष्टाके ध्वजको काटकर उनके सारथीको यमलोक पहुँचा दिया। उनके महाबली और महावेगशाली उत्तम घोड़ोंको तो उसने पहले ही गदासे मार डाला था ॥ ३९-४० ॥

दृष्ट्वा त्वष्टा हतं सूतमश्वांश्च विनिपातितान् ।
हताश्वं रथमुत्सृज्य सूतं च पतितं भुवि ॥ ४१ ॥
विस्फारयन् महाचापं स्थितो भूमाविवाचलः ।
त्वष्टाने जब देखा कि मेरा सारथि मारा गया और घोड़े भी धराशायी कर दिये गये, तब वे अश्वहीन रथ और धरतीपर पड़े हुए सारथिको वहीं छोड़कर अपने महान् धनुषको टंकारते हुए पृथिवीपर अविचल भावसे खड़े हो गये ॥ ४१ १/२ ॥

हताश्वसूतं विरथं दृष्ट्वा रिपुमवस्थितम् ॥ ४२ ॥
जयश्रिया सेव्यमानो दीप्यमान इवानलः ।
मयः कालान्तकप्रख्यश्चापपाणिरदृश्यत ॥ ४३ ॥
घोड़े और सारथिके मारे जानेपर रथहीन हुए शत्रुको रणभूमिमें खड़ा देख विजय-लक्ष्मीसे सेवित और अग्निके समान दीप्तिमान् मयासुर हाथमें धनुष लेकर सामने आ गया। उस समय वह काल और अन्तकके समान दिखायी दे रहा था ॥ ४२-४३ ॥

प्रादहद् देवसैन्यानि दावाग्निरिव काननम् ।
त्वष्टुः सोऽक्षिपतात्युग्रान् नाराचांस्तिग्मतेजसः ॥ ४४ ॥
चतुर्दश शिलाधौतान् सायकान् विविधाकृतीन् ।
जैसे दावानल वनको जला देता है, उसी प्रकार वह देवताओंकी सेनाओंको दग्ध करने लगा। उसने त्वष्टापर प्रचण्ड तेजवाले अत्यन्त उग्र नाराच चलाये। साथ ही सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए विभिन्न रूप-रंगवाले चौदह सायकोंका प्रहार किया ॥ ४४ १/२ ॥

ते पपुस्तस्य सैन्यस्य शोणितं रुक्मभूषणाः ॥ ४५ ॥
आशीविषा इव क्रुद्धा भुजङ्गाः कालचोदिताः ।
जैसे कालसे प्रेरित हुए विषधर सर्प कुपित हो किसीका रक्त पीते हों, उसी प्रकार वे सुवर्णभूषित बाण उनकी सेनाका रक्त पान करने लगे ॥ ४५ १/२ ॥

ते क्षितिं समवर्तन्त शोभन्ते रुधिरोक्षिताः ॥ ४६ ॥
अर्द्धप्रविष्टाः संरब्धा बिलानीव महोरगाः ।
वे खूनसे भीगे हुए बाण पृथ्वीपर गिरकर उसमें धँस गये और बिलमें आधे घुसे हुए रोषभरे महान् सर्पोंके समान शोभा पाने लगे ॥ ४६ १/२ ॥

तं प्रत्यविध्यत् त्वष्टा तु जाम्बूनदविभूषितैः ॥ ४७ ॥
चतुर्दशभिरत्युग्रैर्नाराचैरभिदारयन् ।
तब त्वष्टाने सुवर्णभूषित अत्यन्त उग्र चौदह नाराचों-द्वारा मयासुरको विदीर्ण करते हुए घायल कर दिया ॥ ४७ १/२ ॥

ते तस्य दैत्यस्य भुजं सव्यं निर्भिद्य पत्रिणः ॥ ४८ ॥
विशर्य विविशुर्भूमिं पन्नगा इव वेगतः ।
वे पक्षधारी बाण उस दैत्यकी बायीं भुजाको विदीर्ण करके सर्पोंके समान वेगपूर्वक पृथ्वीमें घुस गये ॥ ४८ १/२ ॥

ते प्रकाशन्त नाराचाः प्रविशन्तो वसुन्धराम् ॥ ४९ ॥
अस्तं गच्छन्तमदित्यं प्रविशन्त इवांशवः ।
पृथ्वीमें प्रवेश करते हुए वे नाराच अस्ताचलको जाते

९१०श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

हुए सूर्यमें प्रविष्ट होनेवाली किरणोंके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ४९½ ॥

मयस्त्रिभिरथानर्च्छत् त्वष्टारं तु पतत्रिभिः ॥ ५० ॥
सुपर्णवेगैर्विकृतैर्ज्वलद्भिः प्राणनाशनैः ।
तदनन्तर मयने पङ्खवाले तीन बाणोंद्वारा, जो गरुड़के समान वेगशाली, विकराल, प्रकाशमान और प्राणनाशक थे, त्वष्टाको घायल कर दिया ॥ ५०½ ॥

त्वष्टाथ मयनिर्मुक्तैः सायकैरर्दितः प्रभुः ॥ ५१ ॥
अपयातो रणं हित्वा व्रीड्याभिसमन्वितः ।
मयके छोड़े हुए सायकोंसे पीड़ित हो प्रभावशाली त्वष्टा लज्जित होकर युद्ध छोड़कर भाग गये ॥ ५१½ ॥

तं तत्र हतसूतं च भुजङ्गमिव निर्विषम् ॥ ५२ ॥
त्वष्टारं विरथं कृत्वा मुदितः स तु दानवः ।
त्वष्टाको सारथि और रथसे हीन तथा विषरहित सर्पके समान शक्तिशून्य करके वह दानव बहुत प्रसन्न हुआ ॥५२½॥

विस्फार्यमाणो रुचिरं चापं रुक्माङ्गदं दृढम् ॥ ५३ ॥
रणे व्यतिष्ठद् दैत्येन्द्रो ज्वलन्निव हुताशनः ।
सोनेके कड़ेसे विभूषित सुदृढ़ एवं सुन्दर धनुषकी टङ्कार करता हुआ वह दैत्यराज रणभूमिमें प्रज्वलित अग्निके समान खड़ा था ॥ ५३½ ॥

पुलोमा तु बलश्लाघी दृप्तो दानवसत्तमः ॥ ५४ ॥
रथे श्वेतहयेनेह सार्धं युद्ध्यति वायुना ।
अपने बलकी प्रशंसा करनेवाला अभिमानी दानव-शिरोमणि पुलोमा रथपर बैठकर श्वेत अश्ववाले वायुदेवके साथ युद्ध करने लगा ॥ ५४½ ॥

सर्वेषामेव भूतानां यः प्राणः कथ्यते द्विजैः ॥ ५५ ॥
बलिना कालकल्पेन वायुना सह संगतः ।
द्विजगण जिन्हें सभी प्राणियोंके प्राण कहते हैं, उन्हीं महाबली कालसदृश वायुदेवताके साथ वह जा भिड़ा ॥५५½॥

पुलोम्नस्तत्र पवनः श्रुत्वा ज्यातलनिःस्वनम् ॥ ५६ ॥
नामृष्यत यथा मत्तो गजः प्रतिगजस्वनम् ।
वायुदेव वहाँ पुलोमाके धनुषकी प्रत्यञ्चाकी टङ्कार सुनकर सहन न कर सके, जैसे मतवाला हाथी अपने विरोधी हाथीकी गर्जनाको नहीं सहन कर पाता है ॥ ५६½ ॥

दैत्यचापच्युतैर्बाणैः प्राच्छाद्यन्त दिशो दश ॥ ५७ ॥
रश्मिजालैरिवार्कस्य विततं साम्बरं जगत् ।
जैसे सूर्यके किरण-जालसे आकाशसहित विस्तृत जगत् आवृत हो जाता है, उसी प्रकार पुलोमा दैत्यके धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा दसों दिशाएँ आच्छादित हो गयीं ॥ ५७½ ॥

स ताम्रनयनः क्रुद्धः श्वसन्निव महोरगः ॥ ५८ ॥
वृतो दैत्यशतैर्वायु रश्मिवानिव भास्करः ।
फुफकारते हुए महान् सर्पकी भाँति कुपित हुए वायुदेवके नेत्र ताँबेके समान लाल हो रहे थे । वे सैकड़ों दैत्योंसे घिरकर अंशुमाली सूर्यके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ५८½ ॥

दैत्यचापभुजोत्सृष्टाः शरा बर्हिणवाससः ॥ ५९ ॥
रुक्मपुङ्खाः प्रकाशन्ते हंसाः श्रेणीकृता इव ।
दैत्यके धनुष और बाहुबलसे छोड़े गये मोरपङ्खवाले बाण, जिनमें सोनेके पर लगे हुए थे, श्रेणीबद्ध हंसोंके समान प्रकाशित होते थे ॥ ५९½ ॥

चापध्वजपताकाभ्यः शस्त्रा दीप्तमुखाश्च्युताः॥ ६० ॥
प्रपतन्तः स्म दृश्यन्ते दैत्यस्यापततः शराः ।
उस आक्रमणकारी दैत्यके धनुष, ध्वज और पताकाओंसे छूटे हुए प्रदीप्त मुखवाले शस्त्र एवं बाण सब ओर गिरते दिखायी देते थे ॥ ६०½ ॥

एवं सुतीक्ष्णान् खचरान्शलभानिव पावके ॥ ६१ ॥
सुवर्णविकृतांश्चित्रान् मुमोच दितिजः शरान् ।
इस प्रकार दैत्यने आगमें गिरनेवाले शलभोके समान बहुत-से तीखे, सुवर्णनिर्मित, विचित्र एवं आकाशमें विचरनेवाले बाण छोड़े ॥ ६१½ ॥

तमन्तकमिब क्रुद्धमापतन्तं च मारुतः ॥ ६२ ॥
त्यक्त्वा प्राणानतिक्रम्य विव्याध नवभिः शरैः ।
क्रोधमें भरे हुए यमराजके समान उस दैत्यको अपनी ओर आते देख वायुने प्राणोंका मोह छोड़कर उसे नौ बाणोंसे बींध डाला ॥ ६२½ ॥

तस्य वेगमसंहार्यं दृष्ट्वा वायुः सनातनः ॥ ६३ ॥
उत्तमं जबमास्थाय व्यधमत् सायकव्रजान् ।
पुलोमाका वेग अनिवार्य देख सनातन वायुदेवने उत्तम वेगका आश्रय ले उसके समस्त सायकसमूहोंका विध्वंस कर डाला ॥ ६३½ ॥

तेजो विधम्य बलवाञ्छरजालानि मारुतः ॥ ६४ ॥
विव्याध दैत्यं विंशत्या विशिखैर्नतपर्वभिः ।
उसके तेज और बाणसमूहोंका नाश करके बलवान् वायुदेवने उस दैत्यको झुकी हुई गाँठवाले बीस बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ६४½ ॥

मरुद्गणानां प्रवरा दश दिव्या महौजसः ॥ ६५ ॥
साधु साध्विति वेगेन सिंहनादं प्रचक्रिरे ।
यह देखकर मरुद्गणोंमें श्रेष्ठ जो दस दिव्य महातेजस्वी पुरुष थे, उन्होंने 'साधु ! साधु ! ( वाह ! वाह ! )' कहकर बड़े वेगसे सिंहनाद किया ॥ ६५½ ॥

तस्मिन् समुत्थिते शब्दे तुमुले लोमहर्षणे ॥ ६६ ॥
अभ्यधावन्त दितिजाः पौलोमाः क्रोधमूर्च्छिताः।
उस रोमाञ्चकारी भयंकर सिंहनादके प्रकट होनेपर पौलोम नामवाले दैत्य क्रोधसे मूर्च्छित होकर दौड़े ॥ ६६½॥

ते समासाद्य पवनं समावृण्वञ्छरोत्तमैः ॥ ६७ ॥
पर्वतं वारिधाराभिः प्रावृषीव बलाहकाः ।
उन्होंने वायुके पास पहुँचकर उन्हें अपने उत्तम बाणोंसे

भविष्यपर्व ] पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ९१२


ढक दिया, ठीक वैसे ही, जैसे वर्षा-ऋतुमें बादल अपनी जलधाराओंसे पर्वतको आच्छादित कर देते हैं ॥ ६७ १/२ ॥
ते पीडयन्तः पवनं क्रुद्धाः सप्त महारथाः ॥ ६८ ॥
प्रजासंहरणे घोराः सोमं सप्त ग्रहा इव ।
क्रोधमें भरे हुए वे सात पौलोम महारथी वायुदेवको उसी तरह पीड़ा देने लगे, जैसे प्रजाके संहार-कालमें सात घोर ग्रह सोमको पीड़ित करने लगते हैं ॥ ६८ १/२ ॥
ततो दक्षिणमक्षोभ्यं नानारत्नविभूषितम् ॥ ६९ ॥
करं गजकराकारमुद्यम्य युधि मारुतः ।
तेषां मूर्धसु दैत्यानां पातयामास वीर्यवान् ॥ ७० ॥
निहता वायुवेगेन तेन सप्त महारथाः ।
तब बल-पराक्रमसे सम्पन्न वायु देवताने किसीसे भी क्षुब्ध न किये जाने योग्य, नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित तथा हाथीकी सूँड़के समान आकारवाले दाहिने हाथको ऊपर उठाकर उसीसे युद्धस्थलमे उन सातों पौलोमोंके मस्तकपर प्रहार किया । उस वायुतुल्य वेगशाली कर-प्रहारसे वे सातों महारथी मारे गये ॥ ६९–७० १/२ ॥
त्यक्त्वा प्राणान् पुलोमा तु विव्याध नवभिः शरैः ॥ ७१ ॥
प्रदर्पितमसंहायं दृष्ट्वा वायुं सनातनम् ।
तब पुलोमाने सनातन वायु देवताको दर्पयुक्त और अजेय देख प्राणोंका मोह छोड़कर नौ बाणोंसे उन्हे बींध डाला ॥ ७१ १/२ ॥
असंचिन्त्य शरौघांस्ताञ्ज्वलितांश्च पुलोमतः ॥ ७२ ॥
तेषां विदार्य तेजांसि दानवानां महात्मनाम् ।
शोणितक्लिन्नमुकुटा गैरिकाका इवाद्वयः ॥ ७३ ॥
पुलोमाकी ओरसे आये हुए उन प्रज्वलित बाणसमूहोंकी चिन्ता न करते हुए उन महाकाय दानवोंके तेज (मस्तक) को विदीर्ण करके वायु देवताने उनके मुकुटोंको रक्तसे भिगो दिया । उस समय वे दैत्य गेरुसे भीगे हुए पर्वतोंके समान प्रतीत होते थे ॥ ७२-७३ ॥
ते भिन्नवर्मास्थिभुजाः पतन्तो भान्ति दानवाः ।
मातङ्गयूथसम्भग्नाः पुष्पिता इव पादपाः ॥ ७४ ॥
कवच, हड्डी और भुजाओंके छिन्न-भिन्न हो जानेसे पृथ्वीपर गिरते हुए वे दानव हाथियोंके झुंडद्वारा तोड़े गये पुष्पयुक्त वृक्षोंके समान प्रतीत होते थे ॥ ७४ ॥
तेषां विदारितैर्देह्रैर्दानवानां महात्मनाम् ।
ततः प्रावर्तत नदी रौद्ररूपा भयावहा ॥ ७५ ॥
उन महाकाय दानवोंके विदीर्ण किये हुए शरीरोंसे खूनकी एक भयंकर नदी बह चली, जिसका स्वरूप बड़ा ही रौद्र था ॥ ७५ ॥
प्रस्रवन्ती रणे रक्तं भीरूणां भयवर्धिनी ।
देवदैत्यगजाश्वानां रुधिरौघपरिप्लुता ।
रणभूमिरभूद्रौद्रा तत्र तत्र सहस्रशः ॥ ७६ ॥
वह रणभूमिमें रक्तका स्रोत बहाती हुई भीरु पुरुषोंके मनमें भयकी वृद्धि कर रही थी। देवताओं और दैत्योंके हाथी-घोड़ोंके रक्तके प्रवाहमें जहाँ-तहाँ सहस्रों स्थानोंमें डूबी हुई वह रणभूमि बड़ी भयंकर प्रतीत हो रही थी ॥ ७६ ॥
सम्भृता गतसत्त्वैश्च यक्षराक्षसखेचरैः ।
सानुगैः सपत्ताकैश्च सोपासङ्गरथध्वजैः ॥ ७७ ॥
निर्जीव यक्ष, राक्षस तथा खेचरोंसे वह भूमि भरी हुई थी। उनके सेवक, ध्वजा, पताका, उपासङ्ग और रथ सभी वहाँ बिखरे पड़े थे ॥ ७७ ॥
शीर्णकुम्भैस्तथा नागैर्घण्टाभिस्तु विभूषितैः ।
सुवर्णपुङ्खैर्ज्वलितैर्नाराचैस्तिग्मतेजसैः ॥ ७८ ॥
देवदानवनिर्मुक्तैः सविषैरुरगैरिव ।
घण्टोंसे विभूषित गजराज धराशायी हो गये थे, उनके कुम्भस्थल फट गये थे। सोनेके पर लगे हुए प्रचण्ड तेजवाले प्रज्वलित बाण, जिन्हे देवताओं और दानवोंने छोड़ा था, विषैले सर्पोंके समान वहाँ पड़े हुए थे ॥ ७८ १/२ ॥
प्रासतोमरनाराचैः शक्तिखङ्गपरश्वधैः ॥ ७९ ॥
सुवर्णविकृतैश्चापि गदामुसलपट्टिशैः ।
कनकाङ्गदकेयूरैर्मणिभिश्च सकुण्डलैः ॥ ८० ॥
तनुत्रैः सतलत्रैश्च हारैर्निष्कैश्च शोभनैः ।
हृतैश्च दितिजैस्तत्र शस्त्रस्यन्दनवर्जितैः ॥ ८१ ॥
पतितैरपि विद्धैश्च शतशोऽथ सहस्रशः ।
प्रास, तोमर, नाराच, शक्ति, खड्ग, फरसे, सुवर्णनिर्मित गदा, मुसल, पट्टिश, सोनेके बाजूबन्द, केयूर, मणि, कुण्डल, कवच, दस्ताने, हार, सुन्दर पदक, शस्त्र तथा रथसे रहित मरे हुए दैत्य तथा घायल होकर पड़े हुए सैकड़ों और हजारों सैनिकोंसे वह रणभूमि भर गयी थी ॥ ७९–८१ १/२ ॥
निपातितध्वजरथो हतवाजिसुरद्विपः ॥ ८२ ॥
विमर्दो देवदैत्यानां सदृशः कर्मणा वभौ ।
जहाँ बहुत-से ध्वज और रथ गिराये गये थे, घोड़े, हाथी और रथी मार डाले गये थे, वह देवताओं तथा दैत्योंका विमर्द (संग्राम) उनके कर्मके अनुरूप ही प्रतीत होता था ॥
अथ दैत्यसहस्रेण पौलोमेन महारथः ॥ ८३ ॥
संवृतः पवनः श्रीमान् गदामुसलपाणिना ॥ ८४ ॥
तदनन्तर हाथोंमें गदा और मुसल लिये हुए पौलोम नामवाले एक सहस्र दैत्योंने श्रीमान् महारथी पवनदेवको घेर लिया ॥ ८३-८४ ॥
ते जघ्नुः शतसाहस्राः पवनं दानवोत्त्माः ।
तैर्वध्यमानः स वभौ समन्तादर्पितैः शरैः ॥ ८५ ॥
फिर तो लाखों श्रेष्ठ दानवोंने पवनदेवको मारना आरम्भ किया। वे चारों ओरसे बाण मारकर उन्हें चोट पहुँचाने लगे। शरीरमें धँसे हुए उन बाणोंसे उनकी अद्भुत शोभा हो रही थी ॥ ८५ ॥

९१२ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंश

हत्वाष्टौ तत्र योधानां शतानि पवनः प्रभुः। कृत्वा मार्गं सुरश्रेष्ठो ननाद सुमहास्थः॥ ८६॥ प्रभावशाली, महारथी, सुरश्रेष्ठ पवनदेवने वहाँ आठ सौ पौलोम योद्धाओंका वध करके अपने लिये मार्ग बना लिया और बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ ८६॥

अद्यापि च सुविस्तीर्णः पन्थाः संदृश्यते दिवि। नाम्ना वायुरथो नाम सिद्धाः पश्यन्ति तं दिवि ॥ ८७॥ आज भी आकाशमें वह सुविस्तृत मार्ग दिखायी देता है, जो वायुरथके नामसे प्रसिद्ध है। सिद्ध पुरुष द्युलोकमें उसका दर्शन करते हैं ॥ ८७ ॥

वैशम्पायन उवाच हयग्रीवस्तु दितिजः पूषणं प्रति वीर्यवान्। ननाद सुमहानादं सिंहनादं महारथः॥ ८८॥ वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! हयग्रीव नामक पराक्रमी एवं महारथी दैत्यने पूषापर आक्रमण करके बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ ८८॥

विस्फार्य सुमहच्चापं हेमजालविभूषितम्। पूषणं दितिजोऽपश्यत् क्रुद्धो घोरेण चक्षुषा ॥ ८९॥ क्रोधमें भरे हुए उस दैत्यने सोनेकी जालीसे विभूषित विशाल धनुषको तानकर पूषाकी ओर घोर दृष्टिसे देखा ॥

भुजाभ्यामाददानस्य संदधानस्य चै शरान्। मुञ्चतः कर्षतो चापि ददृशुस्तन्न नान्तरम् ॥ ९० ॥ उस दैत्यके दोनों हाथोंसे बाणोंके लेने, धनुषपर रखने, प्रत्यञ्चाको खींचने और उन बाणोंको छोड़नेमें कितने क्षणका अन्तर होता है, यह कोई भी वहाँ देख नहीं पाते थे ॥ ९० ॥

अग्निकचक्रोपमं दीप्तं मण्डलीकृतकार्मुकम्। तदासीद् दानवेन्द्रस्य सव्यदक्षिणमस्यतः ॥ ९१ ॥ दायें-बायें दोनों ओर बाण छोड़ते हुए उस दानवराजका दीप्तिमान् धनुष मण्डलाकार होकर अलातचक्रके समान प्रतीत होता था ॥ ९१ ॥

रुक्मपुङ्खैस्ततस्तस्य चापमुक्तैः शितैः शरैः। प्राच्छाद्यन्त शिलाधौतैर्दिशः सूर्यस्य च प्रभाः॥ ९२॥ उसके धनुषसे छूटे हुए तीखे बाणोंसे, जिनमें सोनेके पर लगे थे और जिन्हें सानपर चढ़ाकर तेज किया गया था, सम्पूर्ण दिशाएँ और सूर्यकी प्रभाएँ भी आच्छादित हो गयीं ॥

ततः कनकपुङ्खानां शराणां नतपर्वणाम्। नभश्चराणां नभसि दृश्यन्ते बहवो व्रजाः ॥ ९३॥ तदनन्तर झुकी हुई गाँठ और सुवर्णमय पंखवाले आकाशचारी बाणोंके बहुतसे समूह अन्तरिक्षमें दिखायी देने लगे ॥ ९३ ॥

गिरिकूटनिभाच्चापात् प्रभवन्तः शरोत्तमाः। श्रेणीभूताः प्रकाशन्ते यान्तः श्येना इवाम्बरे ॥ ९४॥ पर्वतशिखरके समान उसके विशाल धनुषसे प्रकट होने- वाले उत्तम बाण आकाशमें श्रेणीबद्ध होकर उड़ते हुए बाजोंके समान सुशोभित होते थे ॥ ९४ ॥

गृध्रपत्रांश्शिलाधौतान् कार्तस्वरविभूषितान्। महावेगान् प्रशस्ताग्रान् मुमोच दितिजः शरान् ॥९५॥ वह दैत्य गीधके पंख लगे हुए, शिलापर तेज किये गये, सुवर्णसे विभूषित, महान् वेगशाली तथा अच्छी नोकवाले बाणोंका प्रहार कर रहा था ॥ ९५ ॥

ततश्चापबलोद्भूताः शातकुम्भविभूषिताः। देहे समयकीर्यन्त पूष्णः संनिहिताः शराः ॥ ९६॥ तदनन्तर धनुषसे बलपूर्वक उठे हुए सुवर्णभूषित बाण पूषाके शरीरमें गिरने और धँसने लगे ॥ ९६ ॥

ते व्योम्नि रुक्मविकृताः सम्प्रकाशन्त सर्वशः। खद्योता इव घर्मान्ते खे चरन्तः समन्ततः ॥ ९७ ॥ जैसे वर्षा-ऋतुमें जुगनुओंके समुदाय आकाशमें सब ओर विचरते हैं, उसी प्रकार वे सुवर्णनिर्मित बाण व्योममण्डलमें सब ओर प्रकाशित हो रहे थे ॥ ९७ ॥

शिलाधौताः प्रसन्नाग्राः पूषणं सिषिचुः शराः। पर्वतं वारिधाराभिर्यथा प्रावृषि तोयदाः ॥ ९८ ॥ जैसे वर्षाकालमें बादल अपनी जलधाराओंसे पर्वतको नहलाते हैं, उसी प्रकार शिलापर चढ़ाकर तेज किये गये स्वच्छ अग्रभागवाले वे बाण मानो पूषाको सींच रहे थे ॥९८॥

ततः प्रच्छादयामास पूषणं शरवृष्टिभिः। पर्वतं वारिधाराभिश्छादयन्निव तोयदः ॥ ९९ ॥ तत्पश्चात् अपनी जलधाराओंसे पर्वतको आच्छादित करनेवाले मेघकी भाँति हयग्रीवने अपने बाणोंकी वर्षासे पूषाको ढक दिया ॥ ९९ ॥

ततः सम्पूर्णोऽदेवस्य बलं वीर्यं पराक्रमम्। व्यवसायं च सत्त्वं च पश्यन्ति त्रिदशाद्भुतम् ॥१००॥ उस समय सब देवता पूषासहित उस दैत्यके बल, वीर्य, पराक्रम, व्यवसाय और धैर्यको अद्भुतरूपसे देख रहे थे ॥

तां समुद्रादियोद्गतां शरवृष्टिं समुत्थिताम्। नाचिन्तयत् तदा पूषा दैत्यं चाभ्यद्रवद् रणे ॥१०१॥ तदनन्तर समुद्रसे उठी हुई जलवर्षाके समान उस बाणवर्षाकी पूषाने कोई परवा नहीं की। उन्होंने तत्काल ही रणभूमिमें उस दैत्यपर धावा किया ॥ १०१ ॥

हेमपृष्ठं महानर्घं पूष्ण आसीन्महाधनुः। विकृतं मण्डलीभूतं शक्राशनिरिवापरा ॥१०२॥ पूषाका विशाल धनुष बड़े जोरसे टङ्कार करनेवाला था। उसके पृष्ठभागमें सोना जड़ा हुआ था। वह खींचा जानेपर मण्डलाकार हो दूसरे इन्द्र-वज्रके समान जान पड़ता था ॥

ततः शराः प्रादुरासन् पूरयन्त इवाम्बरम् ॥१०३॥ सुवर्णपुङ्खाः पूष्णस्ते प्रभवन्तः शरासनात्। मालेव रुक्मपुङ्खानां वितता व्योम्नि पत्रिणाम् ॥१०४॥

भविष्यपर्व ] पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ९१३

प्रादुरासीन्महाघोरा बृहती पूषकार्मुकात् । तत्पश्चात् पूषाके धनुषसे सोनेके पर लगे हुए बाण आकाशको भरते हुए-से प्रकट होने लगे । उस समय पूषाके शरासनसे आकाशमें सुनहरे पंखवाले बाणोंकी महाघोर, विस्तृत एवं विशाल माला-सी प्रकट हो गयी ॥१०३-१०४ १/२॥

ततो व्योम्नि विभक्तानि शरजालानि सर्वशः ॥१०५॥ आहतानि व्यशीर्यन्त शरैः संनतपर्वभिः । फिर तो झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे आहत हो वे दैत्यके बाणजाल आकाशमें छिन्न-भिन्न हो सब ओर बिखरकर गिरने लगे ॥ १०५ १/२ ॥

ततः कनकपुङ्खानां छिन्नानां कङ्कवाससाम् ॥१०६॥ पततां पात्यमानानां खमासीद्यावृतं रणे। तदनन्तर सोनेके पंख और कङ्क पक्षीके परवाले बाण कटकर गिरने और गिराये जाने लगे, जिससे रणभूमिका सारा आकाश आच्छादित हो गया ॥ १०६ १/२ ॥

पूषा प्रापूरयद् बाणैर्हयग्रीवं शिलाशितैः ॥१०७॥ नामाङ्कैरर्कसदृशैर्दिव्यहेमपरिष्कृतैः । पूषाने अपने नामसे चिह्नित, सूर्यतुल्य तेजस्वी तथा दिव्य सुवर्णसे भूषित हुए, शिलापर तेज किये गये बाणोंसे हयग्रीवको ढक दिया ॥ १०७ १/२ ॥

ततो व्यसृजदुग्राणि शरजालानि दानवः ॥१०८॥ अमर्षी बलवान् क्रुद्धो दिधक्षन्निव पावकः । तब वह अमर्षशील बलवान् कुपित तथा जलानेकी इच्छावाले अग्निदेवके समान तेजस्वी दानव वहाँ भयङ्कर बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगा ॥ १०८ १/२ ॥

पूष्णस्त्वश्वौ ध्वजं चैव पताकां धनुरेव च ॥१०९॥ रश्मीन् योक्त्राणि चाश्वानां हयग्रीवो रणेऽच्छिनत्। हयग्रीवने रणभूमिमें पूषाके ध्वज, पताका, धनुष, वागडोल और घोड़ोंके जोते काट डाले ॥ १०९ १/२ ॥

अथाप्यश्वान् पुनर्हत्वा चतुर्भिः सायकोत्तमैः ॥११०॥ सारथिं सुमहातेजा रथो पस्थदपातयत् । तत्पश्चात् फिर चार उत्तम सायकोंसे उनके घोड़ोंको मारकर उस महातेजस्वी दैत्यने पूषाके सारथिको भी रथकी बैठकसे नीचे गिरा दिया ॥ ११० १/२ ॥

कृतस्तु विरथः पूषा हयग्रीवेण संयुगे ॥१११॥ पूषा तस्य रथाभ्याशात् स ययौ तेन वै जितः। गतः शक्ररथाभ्याशं मुक्तो मृत्युमुखादिव ॥११२॥ उस युद्धस्थलमें हयग्रीवके द्वारा रथहीन किये गये पषा उससे पराजित हो उसके रथके पाससे दूर चले गये । वे मृत्युके मुखसे मुक्त हुएके समान उस दानवसे बचकर इन्द्रके रथके समीप चले गये ॥ १११-११२ ॥

तत्राद्भुतमिदं भूयो युद्धं वर्तत दारुणम् । कृतप्रतिकृतं घोरं शम्बरस्य भगस्य च ॥११३॥ तदनन्तर वहाँ पुनः शम्बरासुर और भग देवताका यह अद्भुत, घोर और दारुण युद्ध आरम्भ हुआ, जिसमें दोनों ओरसे प्रहार और उसका प्रतिकार किया जा रहा था ॥११३॥

सप्तकिष्कुपरीणाहं द्वादशारत्न कार्मुकम् । चापं चाशनिनिर्घोषं दृढज्यं भारसाधनम् ॥११४॥ विक्षिपन्नक्षसदृशान् व्यसृजत् सायकान् बहून्। क्रोधसंरक्तनयनः शम्बरः सर्वयोगवित् ॥११५॥ सब प्रकारके योग ( या प्रयोग ) का ज्ञान रखनेवाले शम्बरासुरके नेत्र क्रोधसे लाल हो रहे थे । उसके धनुषकी लंबाई बारह अरत्नि थी और उसकी चौड़ाई सात किष्कु (साढ़े तीन हाथ) की थी । उससे वज्रकी गड़गड़ाहटके समान टंकारध्वनि प्रकट होती थी। उसकी प्रत्यञ्चा सुदृढ़ थी और वह धनुष भारी-से-भारी कार्यको सिद्ध कर सकता था। शम्बरासुर उस धनुषको खींचकर धुरेके समान मोटे-मोटे बहुसंख्यक सायकोंकी वृष्टि करने लगा ॥ ११४-११५ ॥

तेन वित्रास्यमानानि देवसैन्यानि सर्वशः । समकम्पन्त भीतानि सिन्धोरिव महोर्मयः ॥११६॥ शम्बरासुरके द्वारा आतंकित की गयी सम्पूर्ण देवसेनाएँ भयभीत हो महासागरकी बड़ी-बड़ी तरङ्गोंके समान काँपने लगीं ॥ ११६ ॥

तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य विरूपाक्षं विभीषणम् । भगः प्रस्फुरमाणौष्ठस्त्वरमाणो व्यदारयत् ॥११७॥ विरूप नेत्रवाले उस भयंकर दैत्यको आते देख भग देवताके ओष्ठ फड़क उठे । उन्होंने बड़ी उतावलीके साथ उसे अपने अस्त्रोंद्वारा घायल कर दिया ॥ ११७ ॥

ततो भगो महेष्वासो दिव्यं विस्फारयन् धनुः। अवाकिरद् दैत्यगणाञ्छरजालैन छादयन् ॥११८॥ तदनन्तर महाधनुर्धर भगने अपने दिव्य धनुषको तान-कर दैत्यगणोंको अपने बाणोंके जालसे आच्छादित करते हुए उनपर बाणोंकी बौछार आरम्भ कर दी ॥ ११८ ॥

तमभ्यगाद् भगो दैत्यं तूर्णमस्यन्तमन्तिकात् । मातङ्गमिव मातङ्गो वृषं प्रति वृषो यथा ॥ ११९ ॥ लगातार बाण फेंकते हुए उस दैत्यके समीप भग देवता तुरंत जा पहुँचे । मानो एक हाथी दूसरे हाथीके और साँड़ दूसरे साँड़से भिड़नेके लिये उसके पास जा पहुँचा हो ॥११९॥

तौ प्रगृह्य महावेगौ धनुषी भारसाधने । प्राच्छादयेतामन्योन्यं तक्षमाणौ रणे शरैः ॥१२०॥ वे दोनों महान् वेगशाली वीर भारसाधनमें समर्थ धनुष हाथमे लेकर रणभूमिमे बाणोंद्वारा एक दूसरेको क्षत-विक्षत करते हुए आच्छादित करने लगे ॥ १२० ॥

तयोः सुतुमुलं युद्धमासीद् घोरं महारणं । भगशम्बरयोर्भीममप्रमेयं महात्मनोः ॥ १२१ ॥ उस महासमरमे महामनस्वी भग और शम्बरासुरमें

९१४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

अनुपम, भीषण, तुमुल और घोर युद्ध होने लगा ॥ १२१ ॥
अथ पूर्णायतोत्सृष्टैः शरैः संनतपर्वभिः ।
व्यदारयेतामन्योन्यं कार्ष्णे निर्भिद्य वर्मणी ॥ १२२॥
उन्होंने पूर्णतः कानोंतक खींचकर छोड़े गये झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा लोहेकी ढालोंको भी छिन्न-भिन्न करके एक दूसरेको विदीर्ण कर दिया ॥ १२२ ॥
तौ तु विक्षतसर्वाङ्गौ रुधिरेण समुक्षितौ ।
सम्प्रेक्ष्यमाणौ रथिनावुभौ परमदुर्मदौ ।
तक्षमाणौ शितैर्बाणैर्न वीक्षितुमशक्नुताम् ॥ १२३॥
उनके सारे अङ्ग विक्षत तथा रक्तसे लथपथ हो गये थे तो भी वे दोनों रथी परमदुर्मद (युद्धके लिये उन्मत्त) दिखायी देते थे । वे तीखे बाणोंसे परस्पर गहरी चोट कर रहे थे और दूसरेकी ओर देख नहीं पाते थे ॥ १२३ ॥
अथ विव्याध समरे त्वरमाणोऽसुरो भगम् ।
नाराचैः क्रोधताम्राक्षः कालान्तकयमोपमः ॥ १२४॥
तदनन्तर शम्बरासुरकी आँखें क्रोधसे लाल हो उठीं । वह काल, अन्तक और यमके समान विकराल हो गया । उसने तुरंत ही समरभूमिमें भगदेवताको घायल कर दिया ॥
गरुत्मानिव चाकाशे पोथयानो महोरगम् ।
नाराचा न्यपतन् देहे तूर्णं शम्बरचोदिताः ॥ १२५॥
तानन्तरिक्षे नाराचान् भगश्चिच्छेद पत्रिभिः ।
जैसे गरुड़ आकाशमें बड़े भारी सर्पको दबोच लेता है, उसी प्रकार शम्बरासुरने भगको पीड़ित कर दिया । शम्बरासुरके चलाये हुए नाराच भगके शरीरपर तीव्र वेगसे गिरने लगे, किंतु भगने अन्तरिक्षमें ही अपने बाणोंद्वारा उन सभी नाराचोंको काट दिया ॥ १२५३ ॥
ज्वलन्तमचलप्रख्यं वैश्वानरसमप्रभम् ॥ १२६॥
ततो भगं चतुःषष्ट्या विव्याधासुरसत्तमः ।
शिलीमुखैर्महावेगैर्जाम्बूनदविभूषितैः ॥ १२७॥
तब असुरशिरोमणि शम्बरने अग्निके समान तेजस्वी और पर्वतके समान स्थिरभावसे खड़े हुए प्रकाशमान भगदेवताको महान् वेगशाली सुवर्णभूषित चौंसठ बाणोंसे बींध डाला ॥ १२६-१२७ ॥
तदा तत् सुचिरं कालं युद्धं सममिवाभवत् ।
शम्बरस्य च मायाभिर्नादृश्यत ततोऽम्बरम् ॥ १२८॥
उस समय उन दोनोंमें बहुत देरतक एक-सा युद्ध चलता रहा । शम्बरासुरकी मायाओंसे आकाशका दिखायी देना बंद हो गया ॥ १२८ ॥
दोर्भ्यां विक्षिप्तशस्त्रापं रणे विष्टभ्य तिष्ठतः ।
श्रूयते धनुषः शब्दो विस्फूर्जितमिवाशनेः ॥ १२९॥
रणभूमिमें धनुषको तान करके खड़े हुए और दोनों हाथोंसे बाण चलाते हुए शम्बरासुरके धनुषका शब्द वज्रकी गड़गड़ाहटके समान सुनायी देता था ॥ १२९ ॥

स भगस्य हयान् हत्वा सारथिं च महाहवे ।
अभ्यवर्षच्छरैरेनं पर्जन्य इव वृष्टिमान् ॥ १३० ॥
शम्बरासुर उस महासमरमें भगके घोड़ों और सारथिको मारकर भगके ऊपर वर्षा करनेवाले मेघकी भाँति बाणोंकी वृष्टि करने लगा ॥ १३० ॥
न तस्यासीदनिर्भिन्नं गात्रे द्वयंगुलमन्तरम् ।
भगदेवस्य दैत्येन शम्बरेणास्त्रघातिना ॥ १३१॥
भग देवताके शरीरमें दो अङ्गुल भी ऐसा स्थान नहीं रह गया, जिसे अस्त्रघाती दैत्य शम्बरने बाणोंद्वारा विदीर्ण न किया हो ॥ १३१ ॥
देवस्य चाद्भुतं दिव्यमस्त्रमस्त्रेण वारयन् ।
मायायुद्धेन मायावी शम्बरस्तमयोधयत् ॥ १३२॥
मायावी शम्बरासुर भग देवताके अद्भुत दिव्यास्त्रका अपने अस्त्रद्वारा वारण करता हुआ मायामय युद्धके द्वारा उनके साथ जूझता रहा ॥ १३२ ॥
अवञ्चयद् भगं दैत्यो मायाभिर्लाघवेन च ।
भगस्तस्य रथं साश्वं शरवर्षैरवाकिरत् ॥ १३३॥
वह दैत्य अपनी मायाओं तथा फुर्तीसे भग देवताको चकमा देने लगा और भग देवता उसके घोड़ोंसहित रथपर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ १३३ ॥
सहस्रमायो द्युतिमान् देवसेनां निपीडयन् ।
अदृश्यत शरैश्छन्नः शम्बरः शतशो रणे ॥ १३४॥
सहस्रों मायाओंका ज्ञाता तेजस्वी शम्बरासुर देवसेनाका संहार करता हुआ बाणोंसे आच्छन्न हो समरभूमिमें सैकड़ोंकी संख्यामें दिखायी देने लगा ॥ १३४ ॥
अदृश्यत् पतितो भूमौ गतचेता इवासुरः ।
अथ स्म युध्यते भूयः शतधा शैलसंनिभः ॥ १३५॥
वह असुर कभी भूमिपर अचेत-सा होकर गिरा हुआ दिखायी देता था और पुनः सैकड़ों पर्वताकार शरीर धारण करके युद्ध करने लगता था ॥ १३५ ॥
दिशां गजेन्द्रमारूढो दृश्यते स पुनर्वली ।
प्रादेशमात्रश्च पुनः पुनर्भवति शैलवत् ॥ १३६॥
पुनः वह बलवान् दैत्य दिग्गजकी पीठपर बैठा हुआ दृष्टिगोचर होता था । फिर कुछ ही देरमे वह प्रादेशमात्रका हो जाता और दूसरे ही क्षणमें पुनः पर्वत-जैसा रूप धारण कर लेता था ॥ १३६ ॥
महामेघ इव श्रीमांस्तिर्यगूर्ध्वं च सोऽभवत् ।
पुनः कृत्वा विरूपाणि विकृतानि च सर्वशः ॥ १३७॥
सर्वो भीषयते सेनां देवानां भीमदर्शनः ।
ते भीताः प्रपलायन्ते सिंहं दृष्ट्वा मृगा यथा ॥ १३८॥
वह तेजस्वी दैत्य महान् मेघोंकी घटाके समान ऊपर और अगल-बगलकी दिशाओंमें छा जाता था । फिर विकृत एवं विकराल रूप धारण करके भयानक दिखायी देनेवाला

भविष्यपर्व ] पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ९१५


वह असुर सब ओरसे सारी देवसेनाको भयभीत करने लगता था। जैसे सिंहको देखकर मृग भाग जाते हैं, उसी प्रकार उसे देखकर देवताओंके सैनिक भयभीत होकर भागने लगे ॥

ततः सोऽन्यं वरं देहं कृत्वा प्रांशुतरं पुनः ।
गच्छत्यूर्ध्वंगतिं घोरो दिशः शब्देन पूरयन् ॥ १३९ ॥

तत्पश्चात् वह घोर दैत्य पुनः दूसरा श्रेष्ठ एवं बहुत ही ऊँचा शरीर धारण करके ऊपरकी ओर चला गया और वहींसे भयंकर सिंहनाद करके सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करने लगा ॥ १३९ ॥

नभस्तलगतश्चापि वर्षते वासवो यथा ।
संवर्तकाम्बुदप्रख्यः पूरयन् पृथिवीतलम् ॥ १४० ॥

आकाशमें पहुँचकर संवर्तक नामक मेघके समान रूप धारण करके पृथ्वीतलको पूर्ण करता हुआ इन्द्रकी भाँति वर्षा करने लगा ॥ १४० ॥

संवर्तकोऽनलश्चैव भूत्वा भीमपराक्रमः ।
शतवर्त्मा शतशिखो ददाह च पुनः सुरान् ॥ १४१ ॥

फिर वह भयंकर पराक्रमी दैत्य संवर्तक अग्नि बनकर सैकड़ों ज्वालाओंसे युक्त हो, सैकड़ों मार्गोंसे चलकर देवताओंको बारंबार दग्ध करने लगा ॥ १४१ ॥

मुहूर्ताच्च महाशैलः शतशीर्षा शतोदरः ।
अदृश्यत दिवः स्तम्भः शतशृङ्ग इवाचलः ॥ १४२ ॥

फिर दो ही घड़ीमें महान् पर्वतके समान रूप धारण करके वह सौ मस्तकों और सौ पेटोंसे युक्त हो गया (अथवा महान् पूर्वरूप होकर सैकड़ों शिखरों एवं कन्दराओंसे सम्पन्न हो गया)। उस समय वह शतशृङ्ग पर्वतकी भाँति स्वर्गलोक-का स्तम्भ-सा दिखायी देता था ॥ १४२ ॥

येऽन्ये देवाश्च साध्याश्च ये च विश्वे च देवताः ।
क्षिपन्त्यस्त्राणि दिव्यानि तानि सोऽग्रसतासुरः ॥ १४३ ॥

जो दूसरे देवता, साध्यगण और विश्वेदेव उसके ऊपर दिव्यास्त्र चलाते थे । उनके उन सभी अस्त्रोंको वह असुर अपना ग्रास बना लेता था ॥ १४३ ॥

युद्धयमानश्च समरे सरथः सोऽसुरोत्तमः ।
गन्धर्वनगराकारस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ १४४ ॥

समराङ्गणमें युद्ध करता हुआ वह असुरशिरोमणि शम्बर अपने रथके साथ गन्धर्व-नगरकी भाँति वहीं अन्तर्धान हो गया ॥ १४४ ॥

ते भीताः समुदीक्षन्त त्रिदशा भीमविक्रमाः ।
सहस्रमायं समरे शम्बरं चित्रयोधिनम् ॥ १४५ ॥

भयानक पराक्रम दिखानेवाले वे प्रसिद्ध देवता समरभूमिमें विचित्र युद्ध करनेवाले सहस्र मायाधारी शम्बरासुरको भयभीत होकर देखने लगे ॥ १४५ ॥

स भगो भयसंत्रस्तो दानवेन्द्रस्य संयुगे ।
रथं त्यक्त्वा महाभागो महेन्द्रं शरणं गतः ॥ १४६ ॥

उस युद्धस्थलमें दानवराज शम्बरासुरके भयसे त्रस्त हो महाभाग भग देवता अपना रथ छोड़कर देवराज इन्द्रकी शरणमें चले गये ॥ १४६ ॥

पराजित्य तु तं देवं दानवेन्द्रः प्रतापवान् ।
गतो यत्र महातेजा जातवेदा महाप्रभः ॥ १४७ ॥

भग देवताको पराजित करके प्रतापी दानवराज शम्बर उस स्थानपर गया, जहाँ महातेजस्वी तथा महान् प्रभावपुञ्जसे परिपूर्ण जातवेदा (सर्वज्ञ) अग्निदेव विराजमान थे ॥ १४७ ॥

स वह्निं वाग्भिरुग्राभिः क्रुद्धस्तर्जयते बली ।
भवाम्येष हि ते मृत्युरित्युक्त्वान्तरधीयत ॥ १४८ ॥

वह बलवान् दैत्य कुपित हो अपनी कठोर वाणीसे अग्निदेवको डाँट बताता हुआ बोला—'मैं अभी तुम्हारे लिये मृत्युरूप होता हूँ।' ऐसा कहकर वह अन्तर्धान हो गया ॥ १४८ ॥

वैशम्पायन उवाच

एतस्मिन्नन्तरे चैव ब्राह्मणेन्द्रो महाबलः ।
जघान सोमः शीतास्त्रो दानवानां चमूं रणे ॥ १४९ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इसी बीचमें ब्राह्मणोंके राजा महाबली सोम रणभूमिमें शीतास्त्र लेकर दानवोंकी सेनाका संहार करने लगे ॥ १४९ ॥

कैलासशिखराकारो द्युतिमद्भिर्गणैर्वृतः ।
अवधीद् दानवान् दृष्ट्वा दण्डपाणिरिवान्तकः ॥ १५० ॥

उनकी आकृति कैलास-शिखरके समान गौर थी; वे तेजस्वी नक्षत्रगणोंसे घिरे हुए थे, उन्होंने दण्डधारी यमराजके समान दानवोंको देख-देखकर मारना आरम्भ किया ॥ १५० ॥

पोथयद् रथवृन्दानि वाजिवृन्दानि वै प्रभुः ।
दैत्येषु विचरञ्छ्रीमान् युगान्ते कालवद् बली ॥ १५१ ॥

सामर्थ्यशाली एवं कान्तिमान् चन्द्रदेव प्रलयकालमें प्रकट हुए कालके समान दैत्योंकी सेनामें विचरते हुए उनके रथसमूहों और अश्वसमुदायोंका संहार करने लगे ॥ १५१ ॥

सोऽमर्षाद् रथजातानि उरुवेगेन चन्द्रमाः ।
ददाह दानवान् सर्वान् दावाग्निरिव चोदितः ॥ १५२ ॥

चन्द्रमाने अमर्षवश बड़े वेगसे समस्त दानवों और उनके रथसमूहोंको उसी तरह दग्ध करना आरम्भ किया, जैसे वनमें प्रकट हुआ दावानल सारे वृक्षोंको जलाकर भस्म कर देता है ॥ १५२ ॥

मृद्नन् रथेभ्यो रथिनो गजेभ्यो गजयोधिनः ।
सादिनश्चाश्वपृष्ठेभ्यो भूमौ चापि पदातिनः ॥ १५३ ॥

वे रथोंसे रथियों, हाथियोंसे हाथी-सवार योद्धाओं और घोड़ोंकी पीठोंसे घुड़सवारों तथा पैदल सैनिकोंको भी पृथ्वीपर गिराकर रौंद डालते थे ॥ १५३ ॥

शीतेन व्यधमत् सर्वान् वायुर्वृक्षानिवौजसा ।
चन्द्रमाः सुमहातेजा दानवानां महाचमूर् ॥ १५४ ॥