विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 937, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ९१३
प्रादुरासीन्महाघोरा बृहती पूषकार्मुकात् । तत्पश्चात् पूषाके धनुषसे सोनेके पर लगे हुए बाण आकाशको भरते हुए-से प्रकट होने लगे । उस समय पूषाके शरासनसे आकाशमें सुनहरे पंखवाले बाणोंकी महाघोर, विस्तृत एवं विशाल माला-सी प्रकट हो गयी ॥१०३-१०४ १/२॥
ततो व्योम्नि विभक्तानि शरजालानि सर्वशः ॥१०५॥ आहतानि व्यशीर्यन्त शरैः संनतपर्वभिः । फिर तो झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे आहत हो वे दैत्यके बाणजाल आकाशमें छिन्न-भिन्न हो सब ओर बिखरकर गिरने लगे ॥ १०५ १/२ ॥
ततः कनकपुङ्खानां छिन्नानां कङ्कवाससाम् ॥१०६॥ पततां पात्यमानानां खमासीद्यावृतं रणे। तदनन्तर सोनेके पंख और कङ्क पक्षीके परवाले बाण कटकर गिरने और गिराये जाने लगे, जिससे रणभूमिका सारा आकाश आच्छादित हो गया ॥ १०६ १/२ ॥
पूषा प्रापूरयद् बाणैर्हयग्रीवं शिलाशितैः ॥१०७॥ नामाङ्कैरर्कसदृशैर्दिव्यहेमपरिष्कृतैः । पूषाने अपने नामसे चिह्नित, सूर्यतुल्य तेजस्वी तथा दिव्य सुवर्णसे भूषित हुए, शिलापर तेज किये गये बाणोंसे हयग्रीवको ढक दिया ॥ १०७ १/२ ॥
ततो व्यसृजदुग्राणि शरजालानि दानवः ॥१०८॥ अमर्षी बलवान् क्रुद्धो दिधक्षन्निव पावकः । तब वह अमर्षशील बलवान् कुपित तथा जलानेकी इच्छावाले अग्निदेवके समान तेजस्वी दानव वहाँ भयङ्कर बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगा ॥ १०८ १/२ ॥
पूष्णस्त्वश्वौ ध्वजं चैव पताकां धनुरेव च ॥१०९॥ रश्मीन् योक्त्राणि चाश्वानां हयग्रीवो रणेऽच्छिनत्। हयग्रीवने रणभूमिमें पूषाके ध्वज, पताका, धनुष, वागडोल और घोड़ोंके जोते काट डाले ॥ १०९ १/२ ॥
अथाप्यश्वान् पुनर्हत्वा चतुर्भिः सायकोत्तमैः ॥११०॥ सारथिं सुमहातेजा रथो पस्थदपातयत् । तत्पश्चात् फिर चार उत्तम सायकोंसे उनके घोड़ोंको मारकर उस महातेजस्वी दैत्यने पूषाके सारथिको भी रथकी बैठकसे नीचे गिरा दिया ॥ ११० १/२ ॥
कृतस्तु विरथः पूषा हयग्रीवेण संयुगे ॥१११॥ पूषा तस्य रथाभ्याशात् स ययौ तेन वै जितः। गतः शक्ररथाभ्याशं मुक्तो मृत्युमुखादिव ॥११२॥ उस युद्धस्थलमें हयग्रीवके द्वारा रथहीन किये गये पषा उससे पराजित हो उसके रथके पाससे दूर चले गये । वे मृत्युके मुखसे मुक्त हुएके समान उस दानवसे बचकर इन्द्रके रथके समीप चले गये ॥ १११-११२ ॥
तत्राद्भुतमिदं भूयो युद्धं वर्तत दारुणम् । कृतप्रतिकृतं घोरं शम्बरस्य भगस्य च ॥११३॥ तदनन्तर वहाँ पुनः शम्बरासुर और भग देवताका यह अद्भुत, घोर और दारुण युद्ध आरम्भ हुआ, जिसमें दोनों ओरसे प्रहार और उसका प्रतिकार किया जा रहा था ॥११३॥
सप्तकिष्कुपरीणाहं द्वादशारत्न कार्मुकम् । चापं चाशनिनिर्घोषं दृढज्यं भारसाधनम् ॥११४॥ विक्षिपन्नक्षसदृशान् व्यसृजत् सायकान् बहून्। क्रोधसंरक्तनयनः शम्बरः सर्वयोगवित् ॥११५॥ सब प्रकारके योग ( या प्रयोग ) का ज्ञान रखनेवाले शम्बरासुरके नेत्र क्रोधसे लाल हो रहे थे । उसके धनुषकी लंबाई बारह अरत्नि थी और उसकी चौड़ाई सात किष्कु (साढ़े तीन हाथ) की थी । उससे वज्रकी गड़गड़ाहटके समान टंकारध्वनि प्रकट होती थी। उसकी प्रत्यञ्चा सुदृढ़ थी और वह धनुष भारी-से-भारी कार्यको सिद्ध कर सकता था। शम्बरासुर उस धनुषको खींचकर धुरेके समान मोटे-मोटे बहुसंख्यक सायकोंकी वृष्टि करने लगा ॥ ११४-११५ ॥
तेन वित्रास्यमानानि देवसैन्यानि सर्वशः । समकम्पन्त भीतानि सिन्धोरिव महोर्मयः ॥११६॥ शम्बरासुरके द्वारा आतंकित की गयी सम्पूर्ण देवसेनाएँ भयभीत हो महासागरकी बड़ी-बड़ी तरङ्गोंके समान काँपने लगीं ॥ ११६ ॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य विरूपाक्षं विभीषणम् । भगः प्रस्फुरमाणौष्ठस्त्वरमाणो व्यदारयत् ॥११७॥ विरूप नेत्रवाले उस भयंकर दैत्यको आते देख भग देवताके ओष्ठ फड़क उठे । उन्होंने बड़ी उतावलीके साथ उसे अपने अस्त्रोंद्वारा घायल कर दिया ॥ ११७ ॥
ततो भगो महेष्वासो दिव्यं विस्फारयन् धनुः। अवाकिरद् दैत्यगणाञ्छरजालैन छादयन् ॥११८॥ तदनन्तर महाधनुर्धर भगने अपने दिव्य धनुषको तान-कर दैत्यगणोंको अपने बाणोंके जालसे आच्छादित करते हुए उनपर बाणोंकी बौछार आरम्भ कर दी ॥ ११८ ॥
तमभ्यगाद् भगो दैत्यं तूर्णमस्यन्तमन्तिकात् । मातङ्गमिव मातङ्गो वृषं प्रति वृषो यथा ॥ ११९ ॥ लगातार बाण फेंकते हुए उस दैत्यके समीप भग देवता तुरंत जा पहुँचे । मानो एक हाथी दूसरे हाथीके और साँड़ दूसरे साँड़से भिड़नेके लिये उसके पास जा पहुँचा हो ॥११९॥
तौ प्रगृह्य महावेगौ धनुषी भारसाधने । प्राच्छादयेतामन्योन्यं तक्षमाणौ रणे शरैः ॥१२०॥ वे दोनों महान् वेगशाली वीर भारसाधनमें समर्थ धनुष हाथमे लेकर रणभूमिमे बाणोंद्वारा एक दूसरेको क्षत-विक्षत करते हुए आच्छादित करने लगे ॥ १२० ॥
तयोः सुतुमुलं युद्धमासीद् घोरं महारणं । भगशम्बरयोर्भीममप्रमेयं महात्मनोः ॥ १२१ ॥ उस महासमरमे महामनस्वी भग और शम्बरासुरमें