भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 938, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 938
९१४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

अनुपम, भीषण, तुमुल और घोर युद्ध होने लगा ॥ १२१ ॥
अथ पूर्णायतोत्सृष्टैः शरैः संनतपर्वभिः ।
व्यदारयेतामन्योन्यं कार्ष्णे निर्भिद्य वर्मणी ॥ १२२॥
उन्होंने पूर्णतः कानोंतक खींचकर छोड़े गये झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा लोहेकी ढालोंको भी छिन्न-भिन्न करके एक दूसरेको विदीर्ण कर दिया ॥ १२२ ॥
तौ तु विक्षतसर्वाङ्गौ रुधिरेण समुक्षितौ ।
सम्प्रेक्ष्यमाणौ रथिनावुभौ परमदुर्मदौ ।
तक्षमाणौ शितैर्बाणैर्न वीक्षितुमशक्नुताम् ॥ १२३॥
उनके सारे अङ्ग विक्षत तथा रक्तसे लथपथ हो गये थे तो भी वे दोनों रथी परमदुर्मद (युद्धके लिये उन्मत्त) दिखायी देते थे । वे तीखे बाणोंसे परस्पर गहरी चोट कर रहे थे और दूसरेकी ओर देख नहीं पाते थे ॥ १२३ ॥
अथ विव्याध समरे त्वरमाणोऽसुरो भगम् ।
नाराचैः क्रोधताम्राक्षः कालान्तकयमोपमः ॥ १२४॥
तदनन्तर शम्बरासुरकी आँखें क्रोधसे लाल हो उठीं । वह काल, अन्तक और यमके समान विकराल हो गया । उसने तुरंत ही समरभूमिमें भगदेवताको घायल कर दिया ॥
गरुत्मानिव चाकाशे पोथयानो महोरगम् ।
नाराचा न्यपतन् देहे तूर्णं शम्बरचोदिताः ॥ १२५॥
तानन्तरिक्षे नाराचान् भगश्चिच्छेद पत्रिभिः ।
जैसे गरुड़ आकाशमें बड़े भारी सर्पको दबोच लेता है, उसी प्रकार शम्बरासुरने भगको पीड़ित कर दिया । शम्बरासुरके चलाये हुए नाराच भगके शरीरपर तीव्र वेगसे गिरने लगे, किंतु भगने अन्तरिक्षमें ही अपने बाणोंद्वारा उन सभी नाराचोंको काट दिया ॥ १२५३ ॥
ज्वलन्तमचलप्रख्यं वैश्वानरसमप्रभम् ॥ १२६॥
ततो भगं चतुःषष्ट्या विव्याधासुरसत्तमः ।
शिलीमुखैर्महावेगैर्जाम्बूनदविभूषितैः ॥ १२७॥
तब असुरशिरोमणि शम्बरने अग्निके समान तेजस्वी और पर्वतके समान स्थिरभावसे खड़े हुए प्रकाशमान भगदेवताको महान् वेगशाली सुवर्णभूषित चौंसठ बाणोंसे बींध डाला ॥ १२६-१२७ ॥
तदा तत् सुचिरं कालं युद्धं सममिवाभवत् ।
शम्बरस्य च मायाभिर्नादृश्यत ततोऽम्बरम् ॥ १२८॥
उस समय उन दोनोंमें बहुत देरतक एक-सा युद्ध चलता रहा । शम्बरासुरकी मायाओंसे आकाशका दिखायी देना बंद हो गया ॥ १२८ ॥
दोर्भ्यां विक्षिप्तशस्त्रापं रणे विष्टभ्य तिष्ठतः ।
श्रूयते धनुषः शब्दो विस्फूर्जितमिवाशनेः ॥ १२९॥
रणभूमिमें धनुषको तान करके खड़े हुए और दोनों हाथोंसे बाण चलाते हुए शम्बरासुरके धनुषका शब्द वज्रकी गड़गड़ाहटके समान सुनायी देता था ॥ १२९ ॥

स भगस्य हयान् हत्वा सारथिं च महाहवे ।
अभ्यवर्षच्छरैरेनं पर्जन्य इव वृष्टिमान् ॥ १३० ॥
शम्बरासुर उस महासमरमें भगके घोड़ों और सारथिको मारकर भगके ऊपर वर्षा करनेवाले मेघकी भाँति बाणोंकी वृष्टि करने लगा ॥ १३० ॥
न तस्यासीदनिर्भिन्नं गात्रे द्वयंगुलमन्तरम् ।
भगदेवस्य दैत्येन शम्बरेणास्त्रघातिना ॥ १३१॥
भग देवताके शरीरमें दो अङ्गुल भी ऐसा स्थान नहीं रह गया, जिसे अस्त्रघाती दैत्य शम्बरने बाणोंद्वारा विदीर्ण न किया हो ॥ १३१ ॥
देवस्य चाद्भुतं दिव्यमस्त्रमस्त्रेण वारयन् ।
मायायुद्धेन मायावी शम्बरस्तमयोधयत् ॥ १३२॥
मायावी शम्बरासुर भग देवताके अद्भुत दिव्यास्त्रका अपने अस्त्रद्वारा वारण करता हुआ मायामय युद्धके द्वारा उनके साथ जूझता रहा ॥ १३२ ॥
अवञ्चयद् भगं दैत्यो मायाभिर्लाघवेन च ।
भगस्तस्य रथं साश्वं शरवर्षैरवाकिरत् ॥ १३३॥
वह दैत्य अपनी मायाओं तथा फुर्तीसे भग देवताको चकमा देने लगा और भग देवता उसके घोड़ोंसहित रथपर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ १३३ ॥
सहस्रमायो द्युतिमान् देवसेनां निपीडयन् ।
अदृश्यत शरैश्छन्नः शम्बरः शतशो रणे ॥ १३४॥
सहस्रों मायाओंका ज्ञाता तेजस्वी शम्बरासुर देवसेनाका संहार करता हुआ बाणोंसे आच्छन्न हो समरभूमिमें सैकड़ोंकी संख्यामें दिखायी देने लगा ॥ १३४ ॥
अदृश्यत् पतितो भूमौ गतचेता इवासुरः ।
अथ स्म युध्यते भूयः शतधा शैलसंनिभः ॥ १३५॥
वह असुर कभी भूमिपर अचेत-सा होकर गिरा हुआ दिखायी देता था और पुनः सैकड़ों पर्वताकार शरीर धारण करके युद्ध करने लगता था ॥ १३५ ॥
दिशां गजेन्द्रमारूढो दृश्यते स पुनर्वली ।
प्रादेशमात्रश्च पुनः पुनर्भवति शैलवत् ॥ १३६॥
पुनः वह बलवान् दैत्य दिग्गजकी पीठपर बैठा हुआ दृष्टिगोचर होता था । फिर कुछ ही देरमे वह प्रादेशमात्रका हो जाता और दूसरे ही क्षणमें पुनः पर्वत-जैसा रूप धारण कर लेता था ॥ १३६ ॥
महामेघ इव श्रीमांस्तिर्यगूर्ध्वं च सोऽभवत् ।
पुनः कृत्वा विरूपाणि विकृतानि च सर्वशः ॥ १३७॥
सर्वो भीषयते सेनां देवानां भीमदर्शनः ।
ते भीताः प्रपलायन्ते सिंहं दृष्ट्वा मृगा यथा ॥ १३८॥
वह तेजस्वी दैत्य महान् मेघोंकी घटाके समान ऊपर और अगल-बगलकी दिशाओंमें छा जाता था । फिर विकृत एवं विकराल रूप धारण करके भयानक दिखायी देनेवाला

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