विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 939, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ९१५
वह असुर सब ओरसे सारी देवसेनाको भयभीत करने लगता था। जैसे सिंहको देखकर मृग भाग जाते हैं, उसी प्रकार उसे देखकर देवताओंके सैनिक भयभीत होकर भागने लगे ॥
ततः सोऽन्यं वरं देहं कृत्वा प्रांशुतरं पुनः ।
गच्छत्यूर्ध्वंगतिं घोरो दिशः शब्देन पूरयन् ॥ १३९ ॥
तत्पश्चात् वह घोर दैत्य पुनः दूसरा श्रेष्ठ एवं बहुत ही ऊँचा शरीर धारण करके ऊपरकी ओर चला गया और वहींसे भयंकर सिंहनाद करके सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करने लगा ॥ १३९ ॥
नभस्तलगतश्चापि वर्षते वासवो यथा ।
संवर्तकाम्बुदप्रख्यः पूरयन् पृथिवीतलम् ॥ १४० ॥
आकाशमें पहुँचकर संवर्तक नामक मेघके समान रूप धारण करके पृथ्वीतलको पूर्ण करता हुआ इन्द्रकी भाँति वर्षा करने लगा ॥ १४० ॥
संवर्तकोऽनलश्चैव भूत्वा भीमपराक्रमः ।
शतवर्त्मा शतशिखो ददाह च पुनः सुरान् ॥ १४१ ॥
फिर वह भयंकर पराक्रमी दैत्य संवर्तक अग्नि बनकर सैकड़ों ज्वालाओंसे युक्त हो, सैकड़ों मार्गोंसे चलकर देवताओंको बारंबार दग्ध करने लगा ॥ १४१ ॥
मुहूर्ताच्च महाशैलः शतशीर्षा शतोदरः ।
अदृश्यत दिवः स्तम्भः शतशृङ्ग इवाचलः ॥ १४२ ॥
फिर दो ही घड़ीमें महान् पर्वतके समान रूप धारण करके वह सौ मस्तकों और सौ पेटोंसे युक्त हो गया (अथवा महान् पूर्वरूप होकर सैकड़ों शिखरों एवं कन्दराओंसे सम्पन्न हो गया)। उस समय वह शतशृङ्ग पर्वतकी भाँति स्वर्गलोक-का स्तम्भ-सा दिखायी देता था ॥ १४२ ॥
येऽन्ये देवाश्च साध्याश्च ये च विश्वे च देवताः ।
क्षिपन्त्यस्त्राणि दिव्यानि तानि सोऽग्रसतासुरः ॥ १४३ ॥
जो दूसरे देवता, साध्यगण और विश्वेदेव उसके ऊपर दिव्यास्त्र चलाते थे । उनके उन सभी अस्त्रोंको वह असुर अपना ग्रास बना लेता था ॥ १४३ ॥
युद्धयमानश्च समरे सरथः सोऽसुरोत्तमः ।
गन्धर्वनगराकारस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ १४४ ॥
समराङ्गणमें युद्ध करता हुआ वह असुरशिरोमणि शम्बर अपने रथके साथ गन्धर्व-नगरकी भाँति वहीं अन्तर्धान हो गया ॥ १४४ ॥
ते भीताः समुदीक्षन्त त्रिदशा भीमविक्रमाः ।
सहस्रमायं समरे शम्बरं चित्रयोधिनम् ॥ १४५ ॥
भयानक पराक्रम दिखानेवाले वे प्रसिद्ध देवता समरभूमिमें विचित्र युद्ध करनेवाले सहस्र मायाधारी शम्बरासुरको भयभीत होकर देखने लगे ॥ १४५ ॥
स भगो भयसंत्रस्तो दानवेन्द्रस्य संयुगे ।
रथं त्यक्त्वा महाभागो महेन्द्रं शरणं गतः ॥ १४६ ॥
उस युद्धस्थलमें दानवराज शम्बरासुरके भयसे त्रस्त हो महाभाग भग देवता अपना रथ छोड़कर देवराज इन्द्रकी शरणमें चले गये ॥ १४६ ॥
पराजित्य तु तं देवं दानवेन्द्रः प्रतापवान् ।
गतो यत्र महातेजा जातवेदा महाप्रभः ॥ १४७ ॥
भग देवताको पराजित करके प्रतापी दानवराज शम्बर उस स्थानपर गया, जहाँ महातेजस्वी तथा महान् प्रभावपुञ्जसे परिपूर्ण जातवेदा (सर्वज्ञ) अग्निदेव विराजमान थे ॥ १४७ ॥
स वह्निं वाग्भिरुग्राभिः क्रुद्धस्तर्जयते बली ।
भवाम्येष हि ते मृत्युरित्युक्त्वान्तरधीयत ॥ १४८ ॥
वह बलवान् दैत्य कुपित हो अपनी कठोर वाणीसे अग्निदेवको डाँट बताता हुआ बोला—'मैं अभी तुम्हारे लिये मृत्युरूप होता हूँ।' ऐसा कहकर वह अन्तर्धान हो गया ॥ १४८ ॥
वैशम्पायन उवाच
एतस्मिन्नन्तरे चैव ब्राह्मणेन्द्रो महाबलः ।
जघान सोमः शीतास्त्रो दानवानां चमूं रणे ॥ १४९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इसी बीचमें ब्राह्मणोंके राजा महाबली सोम रणभूमिमें शीतास्त्र लेकर दानवोंकी सेनाका संहार करने लगे ॥ १४९ ॥
कैलासशिखराकारो द्युतिमद्भिर्गणैर्वृतः ।
अवधीद् दानवान् दृष्ट्वा दण्डपाणिरिवान्तकः ॥ १५० ॥
उनकी आकृति कैलास-शिखरके समान गौर थी; वे तेजस्वी नक्षत्रगणोंसे घिरे हुए थे, उन्होंने दण्डधारी यमराजके समान दानवोंको देख-देखकर मारना आरम्भ किया ॥ १५० ॥
पोथयद् रथवृन्दानि वाजिवृन्दानि वै प्रभुः ।
दैत्येषु विचरञ्छ्रीमान् युगान्ते कालवद् बली ॥ १५१ ॥
सामर्थ्यशाली एवं कान्तिमान् चन्द्रदेव प्रलयकालमें प्रकट हुए कालके समान दैत्योंकी सेनामें विचरते हुए उनके रथसमूहों और अश्वसमुदायोंका संहार करने लगे ॥ १५१ ॥
सोऽमर्षाद् रथजातानि उरुवेगेन चन्द्रमाः ।
ददाह दानवान् सर्वान् दावाग्निरिव चोदितः ॥ १५२ ॥
चन्द्रमाने अमर्षवश बड़े वेगसे समस्त दानवों और उनके रथसमूहोंको उसी तरह दग्ध करना आरम्भ किया, जैसे वनमें प्रकट हुआ दावानल सारे वृक्षोंको जलाकर भस्म कर देता है ॥ १५२ ॥
मृद्नन् रथेभ्यो रथिनो गजेभ्यो गजयोधिनः ।
सादिनश्चाश्वपृष्ठेभ्यो भूमौ चापि पदातिनः ॥ १५३ ॥
वे रथोंसे रथियों, हाथियोंसे हाथी-सवार योद्धाओं और घोड़ोंकी पीठोंसे घुड़सवारों तथा पैदल सैनिकोंको भी पृथ्वीपर गिराकर रौंद डालते थे ॥ १५३ ॥
शीतेन व्यधमत् सर्वान् वायुर्वृक्षानिवौजसा ।
चन्द्रमाः सुमहातेजा दानवानां महाचमूर् ॥ १५४ ॥