भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 940
९१६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

जैसे वायुदेव अपने बलसे वृक्षोंको तोड़ डालते हैं, उसी प्रकार महातेजस्वी चन्द्रमाने समस्त दानवों तथा उनकी विशाल सेनाको अपने शीतास्त्रसे नष्टप्राय कर दिया ॥१५४॥

तदस्त्रमभवत् तस्य प्रदिग्धं शत्रुशोणितैः।
पिनाकमिव रुद्रस्य क्रुद्धस्याभिघ्नतः पशून् ॥१५५॥

उनका वह अस्त्र क्रोधपूर्वक पशुओंका संहार करनेवाले रुद्रदेवके पिनाककी भाँति शत्रुओंके रक्तसे सन गया ॥१५५॥

युगान्तकोपमः श्रीमान् दैत्येषु व्यचरद् बली।
वारार्य महतीं सेनां प्राद्रवन्तीं पुनः पुनः ॥१५६॥

वे बलवान् एवं कान्तिमान् चन्द्रदेव युगान्तकारी कालके समान दैत्योंकी सेनामें विचरने लगे। वे भागती हुई विशाल दैत्य-सेनाको बारंबार रोककर उसका संहार करते थे ॥

चन्द्रं मृत्युमिवायान्तं दृष्ट्वा योधा विसिस्मियुः।
यतो यतः प्रक्षिपति शिशिरास्त्रं तमोनुदः ॥१५७॥
ततस्ततो व्यशीर्यन्त दैत्यसैन्यानि संयुगे।
व्यदारयत् स सैन्यानि स्वबलेनाभिसंवृतः ॥१५८॥

चन्द्रमाको मृत्युके समान आते देख सारे दैत्य योद्धा विस्मित हो जाते थे। अन्धकारका निवारण करनेवाले चन्द्रदेव युद्धस्थलमें जिस-जिस ओर शिशिरास्त्रका प्रहार करते थे, उस-उस ओरकी सारी दैत्यसेनाएँ अकड़कर धराशायी हो जाती थीं। वे अपने बलसे सुरक्षित हो सारी दैत्य-सेनाओंको विदीर्ण करने लगे ॥ १५७-१५८ ॥

ग्रसमानमनीकानि व्यादितास्यमिवान्तकम्।
तं तथा भीमकर्माणं गृहीतास्त्रं महाहवे ॥१५९॥
दृष्ट्वा शशांकमायान्तं दैत्याभं चन्द्रभास्करौ।
तालमात्राणि चापानि कर्षमाणौ महाबलौ ॥१६०॥
छादयेतां शरैश्चन्द्रं वृष्टिमन्ताविवाम्बुदौ।

उस महासमरमें भयंकर कर्म करनेवाले चन्द्रमाको इस प्रकार मुँह बाये यमराजके समान दैत्यसेनाओंको अपना ग्रास बनाते तथा दैत्यकी भाँति भयानक रूपसे अपनी ओर आते देख चन्द्र और सूर्य नामवाले महाबली दैत्य धनुष खींचकर वर्षा करनेवाले दो मेघोंके समान अपने बाणोंसे उन चन्द्रदेवको आच्छादित करने लगे ॥ १५९-१६०॥

अथ विस्फार्यमाणानां कार्मुकाणां सुरासुरैः ॥१६१॥
अभवत् सुमहाशब्दो दिशः संनादयन्निव।

तदनन्तर देवता और असुर सभी अपने धनुषोंकी टंकार करने लगे। उनका वह महान् शब्द सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित-सा करने लगा ॥ १६१॥

विनदद्भिर्महानागैर्हेषमाणैश्च वाजिभिः ॥१६२॥
भेरीशङ्खनिनादैश्च तुमुलं सर्वतोऽभवत्।

चिंघाड़ते हुए बड़े-बड़े हाथियों और हिनहिनाते हुए घोड़ोंकी आवाजों तथा शङ्ख और भेरियोंके घोषोंसे वहाँ सब ओर बड़ा भयंकर शब्द गूँजने लगा ॥ १६२॥

युयुत्सवस्ते संरब्धा जयगृद्धा यशस्विनः ॥१६३॥
अन्योन्यमभिगर्जन्तो गोष्ठेष्विव महावृषाः।

जयकी अभिलाषासे युद्धके लिये उत्सुक वे यशस्वी योद्धा गोशालाओंमें हँकड़नेवाले साँड़ोंके समान एक दूसरेके प्रति भयंकर गर्जना करने लगे ॥ १६३॥

शिरसां पात्यमानानां समरे निशितैः शरैः ॥१६४॥
अश्मवृष्टिरिवाकाशे ह्यभवत् सेनयोस्तथा।

समराङ्गणमें दोनों सेनाओंके भीतर तीखे बाणोंसे गिराये जाते हुए योद्धाओंके मस्तकोंका शब्द ऐसा जान पड़ता था, मानो आकाशसे पत्थरोंकी वर्षा हो रही हो ॥ १६४॥

कुण्डलोष्णीषधारीणि जातरूपस्रजांसि च ॥१६५॥
पतितानि स्म दृश्यन्ते शिरांसि रणमूर्धनि।

युद्धके मुहानेपर कुण्डल, पगड़ी तथा सोनेके हार धारण करनेवाले योद्धाओंके मस्तक पृथ्वीपर पड़े हुए दृष्टिगोचर होते थे ॥ १६५॥

विशिखैर्मथितैर्गात्रैर्वाहुभिश्च सकार्मुकैः ॥१६६॥
सहस्ताभरणैश्चान्यैर्विच्छिन्नै रुधिरोक्षितैः।
कवचैरावृतैर्गात्रैरुरुभिश्चन्दनोक्षितैः ॥१६७॥
मुखैश्च चन्द्रसंकाशैस्तत्तत्कुण्डलभूषणैः।
गजवाजिमनुष्याणां सर्वगात्रैः समन्ततः ॥१६८॥
आसीत् सर्वा समाकीर्णा मुहूर्तेन वसुंधरा।

वहाँ सब ओर दो ही घड़ीमें सारी भूमि योद्धाओंके बाणोंद्वारा मथे गये शरीरों, धनुषसहित कटी हुई भुजाओं, हस्त-भूषणसहित हाथों, अन्यान्य रक्तरंजित कटे हुए अङ्गों, कवचावृत शरीरों, चन्दनचर्चित बहुतसे अवयवों, तप्त सुवर्णके कुण्डल आदि भूषणोंसे अलंकृत चन्द्रोपम मुखों तथा हाथी, घोड़े और मनुष्योंके सम्पूर्ण गात्रों (लाशों) से आच्छादित हो गयी ॥ १६६-१६८॥

चापमेघाश्च विपुलाः शस्त्रविद्युत्प्रकाशिनः।
वाहनानां च निर्घोषः स्तनयित्नुसमोऽभवत् ॥१६९॥

वहाँ विशाल धनुष मेघोंके समान शस्त्ररूपी विद्युत्से प्रकाशित हो रहे थे। रथ आदि वाहनोंका घोष घनमण्डलकी गर्जनाके समान प्रतीत होता था ॥ १६९ ॥

स सम्प्रहारस्तमुलः कङ्ककः शोणितोदकः।
प्रावर्तत सुराणां च दानवानां च संयुगे ॥१७०॥

युद्धस्थलमें देवताओं और दानवोंका वह घोर संग्राम रक्तरूपी जलकी धारा बहाता हुआ उग्र रूप धारण करता जा रहा था ॥ १७० ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे देवासुरयुद्धे पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें देवताओं और असुरोंका युद्धविषयक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५५ ॥