विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 941, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ११७
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः
देवताओं और दानवोंका घोर संग्राम—विरोचनका विष्वक्सेनके साथ और कुजम्भका अंश देवताके साथ युद्ध करते समय घोर पराक्रम प्रकट करना
वैशम्पायन उवाच
तस्मिन् महाहवे रौद्रे तुमुले लोमहर्षणे।
ववर्षुः शरवर्षाणि संरब्धा देवदानवाः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वह महायुद्ध बड़ा ही भयंकर, तुमुल और रोमाञ्चकारी था। उसमें देवता और दानव उभय पक्षके योद्धा रोषमें भरकर बाणोंकी वर्षा करते थे ॥ १ ॥
ध्याक्रोशन्त गजास्तत्र शरघातप्रपीडिताः।
अश्वाश्च पर्यधावन्त हतारोहा दिशो दश ॥ २ ॥
वहाँ बाणोंके आघातसे अत्यन्त पीड़ित हो हाथी घोर चीत्कार कर रहे थे और जिनके सवार मारे गये थे, वे घोड़े दसों दिशाओंमें चक्कर लगा रहे थे ॥ २ ॥
उत्पत्य निपतन्त्यन्ये शरवर्षप्रपीडिताः।
देवानां दानवानां च गजाश्वरथिनां रणे ॥ ३ ॥
समरे तत्र शूराणामन्योन्यमभिधावताम्।
धनुर्ज्यातलशब्देन न प्राज्ञायत किंचन ॥ ४ ॥
कितने ही घोड़े बाणोंकी वर्षासे अत्यन्त व्यथित हो उछलकर गिर पड़ते थे। देवताओं और दानवोंके शूरवीर गजारोही, अश्वारोही तथा रथी समराङ्गणमें एक दूसरेपर धावा करते थे। उनके धनुषोंकी प्रत्यङ्गाके शब्दसे इतना कोलाहल होता था कि दूसरी किसी बातका ज्ञान नहीं होता था ॥ ३-४ ॥
शरशक्तिगदाभिस्ते खड्गैश्चामिततेजसः।
निजघ्नुर्महतीं सेनामन्योन्यस्य परंतप ॥ ५ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश्वर ! वे अमिततेजस्वी योद्धा बाण, शक्ति, गदा और खड्गोंसे एक दूसरेकी विशाल सेनाका संहार कर रहे थे ॥ ५ ॥
बाहूनामुत्तमाङ्गानां कार्मुकाणां च संयुगे।
राशयस्तत्र दृश्यन्ते देवदैत्यसमागमे ॥ ६ ॥
देवताओं और दैत्योंके उस संग्राममें युद्धक्षेत्रके भीतर कटी हुई भुजाओं, मस्तकों और धनुषोंकी बहुत-सी राशियाँ दिखायी देती थीं ॥ ६ ॥
अश्वानां कुञ्जराणां च रथानां च वरूथिनाम्।
नान्तं समभिगच्छन्ति निहतानां सुरासुरैः ॥ ७ ॥
वहाँ देवताओं और असुरोंद्वारा मारे गये घोड़ों, हाथियों, आवरणयुक्त रथों और रथियोंका कोई अन्त नहीं पाता था ॥ ७ ॥
गदाभिरसिभिः प्रासैर्भल्लैः संततपर्वभिः।
योधास्तत्राभ्यहन्यन्त हस्त्यश्वं चामितं बहु ॥ ८ ॥
उस युद्धमें गदाओं, तलवारों, प्रासों और झुकी हुई गाँठवाले भल्लोंद्वारा बहुत-से योद्धा और असंख्य हाथी-घोड़े मारे गये ॥ ८ ॥
प्रावर्तत नदी घोरा शोणितौघा तरङ्गिणी।
तदा मध्ये तु सैन्यानां केशशैवलशाद्वला ॥ ९ ॥
उस समय दोनों सेनाओंके बीचमें खूनकी भयंकर नदी बह चली। जिसमें रक्तके स्रोत और तरङ्गें दिखायी देती थीं। योद्धाओंके केश उसमें सेवार और घासके समान प्रतीत होते थे ॥ ९ ॥
हाहाकारो महाशब्दो योधानांमभवत् तदा।
दानवैर्हन्यमानानां त्रिदशानां महारणे ॥ १० ॥
उस महायुद्धमें दानवोंद्वारा मारे जाते हुए देवयोद्धाओंका महान् हाहाकार शब्द उस समय सब ओर गूँज रहा था ॥
वैशम्पायन उवाच
तेषां तदभवद् युद्धं देवानामसुरैः सह।
विभीषणं महारौद्रं विकृतं भीमदर्शनम् ॥ ११ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उन देवताओंका असुरोंके साथ बड़ा भयंकर, महारौद्र, विकराल तथा देखनेमें डरावना युद्ध हो रहा था ॥ ११ ॥
विरोचनस्तु तत्रैव विष्वक्सेनं महाहवे।
जघान रुधिराक्षाक्षं साध्यं परमधन्विनम् ॥ १२ ॥
वहीं उस महासमरमें विरोचने लाल नेत्रवाले उत्तम धनुर्धर साध्य देवता विष्वक्सेनको अपने बाणोंका निशाना बनाया ॥ १२ ॥
तमायान्तमभिप्रेक्ष्य विष्वक्सेनः सुरैर्वृतः।
अमेयात्मा सुरश्रेष्ठः प्रत्यविध्यत् स्तनान्तरे ॥ १३ ॥
देवताओंसे घिरे हुए अमेय आत्मबलसे सम्पन्न सुरश्रेष्ठ विष्वक्सेनने विरोचनको आते देख उसकी छातीमें बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥ १३ ॥
साध्यस्य बाणाभिहतस्तोत्रांर्दित इव द्विपः।
विरोचनः प्रजज्वाल क्रोधेनाग्निरिवाध्वरे ॥ १४ ॥
साध्य देवताके बाणोंसे आहत हुए विरोचनको अंकुशकी मार खाये हाथीके समान बड़ा कोप हुआ। वह यज्ञशालामें अग्निकी भाँति उस रणभूमिमें क्रोधसे प्रज्वलित हो उठा ॥
स कार्मुकविनिर्मुक्तैः शरैर्दानवसत्तमः।
विष्वक्सेनं बिभेदाजौ दीप्तैः सप्तभिराशुगैः ॥ १५ ॥
उस दानवशिरोमणिने अपने धनुषसे छूटे हुए सात