भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 942, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 942
९१८श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

तेजस्वी तथा शीघ्रगामी बाणोंद्वारा युद्धस्थलमें विष्वक्सेनको विदीर्ण कर दिया ॥ १५ ॥
सोऽतिविद्धो बलवता दानवेन सुरोत्तमः ।
मूर्च्छामभिजगामाशु ध्वजं चाप्याश्रयत्प्रभुः ॥ १६ ॥
उस बलवान् दानवके द्वारा गहरा आघात पाकर प्रभाव-शाली सुरश्रेष्ठ विष्वक्सेनको तुरंत मूर्च्छा आ गयी और वे ध्वजका सहारा लेकर टिक गये ॥ १६ ॥
ततः स पुनराश्वस्य साध्यो युद्धे मनो दधे ।
विस्फार्य च महाचापं दैत्यमध्ये व्यवस्थितः ॥ १७ ॥
तदनन्तर पुनः होशमें आकर दैत्योंके बीचमें खड़े हुए साध्य देवताने अपने विशाल धनुषको तानकर युद्धमें मन लगाया ॥ १७ ॥
विरोचनस्तु बलवानभ्ययुध्यत सर्वशः ।
क्षोभयन् सुरसैन्यानि समन्तान्निशितैः शरैः ॥ १८ ॥
उधर बलवान् विरोचन अपने तीखे बाणोंद्वारा देव-सेनाओंको सब ओरसे क्षोभमें डालता हुआ सबके सामने युद्ध करने लगा ॥ १८ ॥
ततस्तस्यासुरेन्द्रस्य युध्यमानस्य संयुगे ।
श्रूयते तुमुलः शब्दो जीमूतस्येव गर्जतः ॥ १९ ॥
युद्धस्थलमें जूझते हुए उस असुरशिरोमणिका गर्जते हुए मेघके समान भयंकर सिंहनाद सुनायी पड़ता था ॥ १९ ॥
जगर्ज च महाघोषो विनिघ्नन् देववाहिनीम् ।
चण्डवेगाश्मवर्षी च सविद्युत्स्तनयित्नुमान् ॥ २० ॥
वह महान् घोष करनेवाला दैत्य प्रचण्ड वेगसे पत्थरोंकी वर्षा करनेवाले बिजलीसहित मेघसमूहकी भाँति देवसेनाका संहार करता हुआ जोर-जोरसे गर्जना करने लगा ॥ २० ॥
दिशो विद्रावयामास शरवर्षेण दानवः ।
सर्वसैन्यानि देवानामुद्यतास्त्रो महाहवे ॥ २१ ॥
उस महायुद्धमें अस्त्र उठाये हुए उस दानवने अपने बाणोंकी वर्षासे देवताओंकी समस्त सेनाओंको मार भगाया ॥
ते प्राद्रवन्त वित्रस्ता रथेभ्यो रथिनस्तदा ।
सादिनश्चाश्वपृष्ठेभ्यो भूमौ चापि पदातयः ॥ २२ ॥
वे देवसैनिक रथी रथोंसे और घुड़सवार घोड़ोंकी पीठोंसे उतरकर भयभीत होकर भागे, भूमिपर खड़े हुए पैदल योद्धा भी पलायन करने लगे ॥ २२ ॥
श्रुत्वा कार्मुकनिर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः ।
सर्वसैन्यानि भीतानि निल्यलीयन्त संयुगे ॥ २३ ॥
वज्रकी गड़गड़ाहटके समान उसके धनुषकी टंकार सुनकर सारी देवसेनाएँ भयभीत हो युद्धस्थलमें लुकने-छिपने लगीं ॥ २३ ॥
विरोचनभयग्रस्ता रथेभ्यो रथिनस्तदा ।
पदातीनां ययुः संघा यत्र देवः शचीपतिः ॥ २४ ॥
विरोचनके भयसे डरे हुए रथी रथोंसे उतरकर पैदल-समूहोंको साथ ले उस स्थानपर चले गये, जहाँ शचीवल्लभ इन्द्रदेव विराजमान थे ॥ २४ ॥
विष्वक्सेनस्य साध्यस्य सर्वतः सुमहाबलः ।
पदा रक्षःसहस्राणि निजघान चतुर्दश ॥ २५ ॥
साध्य देवता विष्वक्सेनके चारों ओर जो चौदह हजार राक्षस (कुबेरकी सेनामें देवपक्षकी ओरसे आये) थे, उन्हें महाबली विरोचनने लातोंसे ही मार गिराया ॥ २५ ॥
अश्ववृन्देषु नागेषु रथानीकेषु चाभिभूः ।
पदातीनां च संघेषु विनिघ्नन् प्रत्यदृश्यत ॥ २६ ॥
शत्रुओंको पराजित करनेवाला विरोचन देवताओंके अश्वसमूहों, नागों, रथसमुदायों तथा पैदलोंके दलोंमें भी मारकाट मचाता हुआ दृष्टिगोचर होता था ॥ २६ ॥
वितत्य श्येनवत् पक्षौ सर्वतः स वरूथिनीम् ।
भित्त्वा छित्त्वा महाबाहुः शिरांस्याजौ ह्यकृन्तत ॥ २७ ॥
वह महाबाहु वीर पंख फैलाकर आक्रमण करनेवाले बाजकी भाँति देवसेनाको सब ओरसे छिन्न-भिन्न करके योद्धाओंके सिर काट लेता था ॥ २७ ॥
सादिनश्च पदाताश्च हतशेषा रथास्तथा ।
विष्वक्सेनेन सहिता विरोचनमथाद्रवन् ॥ २८ ॥
मरनेसे बचे हुए घुड़सवार, पैदल और रथी विष्वक्सेन के साथ होकर विरोचनपर टूट पड़े ॥ २८ ॥
तेऽसिचर्मगदाशक्तिपरिघप्रासतोमरैः ।
तमेकमभ्यधावन्त सिंहनादं प्रचक्रिरे ॥ २९ ॥
वे ढाल, तलवार, गदा, शक्ति, परिघ, प्रास और तोमरोंद्वारा उस एकमात्र विरोचनकी ओर दौड़े तथा सिंहनाद करने लगे ॥ २९ ॥
ततः सोऽसिं समुद्यम्य जवमास्थाय दानवः ।
चकर्त रथिनामाजौ शिरांसि च धनूंषि च ॥ ३० ॥
परंतु उस दानवने उत्तम वेगका आश्रय ले तलवार उठाकर युद्धस्थलमें शत्रुपक्षके रथी योद्धाओंके सिर और धनुष काट लिये ॥ ३० ॥
रथनागाश्ववृन्देषु बलवानरिसूदनः ।
विरोचनश्चरन् मार्गान् प्रकारानेकविंशतिम् ॥ ३१ ॥
भ्रान्तमुद्भ्रान्तमाविद्धमाप्लुतं विप्लुतं प्लुतम् ।
सम्पातं समुदीर्णं च दर्शयामास दानवः ॥ ३२ ॥
बलवान् शत्रुसूदन विरोचन रथ, नाग तथा अश्वोंके समुदायमें विचरता हुआ भ्रान्त, उद्भ्रान्त, आविद्ध, आप्लुत, विप्लुत, प्लुत, सम्पात और समुदीर्ण आदि तलवारके इक्कीस* पैंतरे दिखाने लगा ॥ ३१-३२ ॥


* हरिवंश पृ० ६९० की टिप्पणीमें तलवारके बत्तीस हाथ बताये गये हैं। उन्हींमेंसे इक्कीसको यहाँ समझ लेना चाहिये। भ्रान्त आदिकी व्याख्या भी वहीं देखें।