भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 943

भविष्यपर्व ] . षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ९१९

केचिद् वरासिना रुग्णा दानवेन महात्मना।
विनेदुश्छिन्नवर्माणो निपेतुश्च गतासवः ॥ ३३ ॥
उस महामनस्वी दानवने कितनोंको अपनी उत्तम तलवारसे बहुत ही घायल कर दिया, उनके कवच भी छिन्न-भिन्न कर दिये, अतः वे आर्तनाद करने लगे और प्राणशून्य होकरं पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३३ ॥

छिन्नपृष्ठा हतारोहा दानवेन महात्मना।
विद्रुताः स्वान्यनीकानि जघ्नुर्द्विपदशवारणाः ॥ ३४ ॥
उस महाकाय दैत्य विरोचनने देवताओंके हाथियोंके पृष्ठभागमें घाव कर दिये और उनके सवारोंको मार डाला, अतः वे भागते हुए अपनी ही सेनाओंको कुचलने लगे ॥ ३४ ॥

निपेतुरुर्व्यामाकाशे निकृत्ता दृढधन्विना ।
विविधास्तोमरश्चापा महामात्रशिरांसि च ॥ ३५ ॥
सुदृढ धनुष धारण करनेवाले उस दानव वीरने नाना प्रकारके तोमर, धनुष और महावतोंके सिर आकाशमे ही काट दिये । वे कटे हुए तोमर आदि पृथ्वीपर गिर पड़े ॥

प्रतीपमाहरन्नागानश्वांश्च दृढविक्रमान् ।
चक्रीं रथिनः कांश्चित् परामृश्य महाबलः ।
सूतांश्चिच्छेद खड्गेन रथानपि च दानवः ॥ ३६ ॥
महाबली दानव विरोचन सुदृढ पराक्रमवाले हाथियों और घोड़ोंको भी पीछे खींच लेता था । कितने ही रथियोंको पकड़कर तलवारसे काट डालता था तथा सारथियों और रथोंके भी टुकड़े-टुकड़े कर देता था ॥ ३६ ॥

मुहुरुत्पततो दिक्षु धावतश्च यशस्विनः ।
मार्गांश्चरति वैचित्र्यान् व्यस्मयन्त ततोऽसुराः ॥ ३७ ॥
सम्पूर्ण दिशाओंमें बारंबार उछलते और दौड़ते हुए यशस्वी वीरोंको भी उसने तलवारके घाट उतार दिया । वह विचित्र मार्गों (पैतरों) से चलता था, जिससे असुर भी विस्मयमें पड़ जाते थे ॥ ३७ ॥

निजघान पदा कांश्चिदाक्षिप्यान्यानपोथयत् ।
खड्गेन चान्यांश्चिच्छेद नादेनान्र्यांश्च भीषणन् ॥ ३८ ॥
उसने कितने ही वीरोंको पैरोंसे कुचल डाला, दूसरे बहुत-से योद्धाओंको घुमाकर पृथ्वीपर दे मारा, कितनोंको तलवारसे काट डाला और अन्य कितने ही सैनिकोंको भीषण सिंहनादसे डरा दिया ॥ ३८ ॥

ऊरुस्तम्भगृहीताश्च निपतन्यपरे भुवि ।
अपरे दैत्यमालोक्य भयात् प्राणानवासृजन् ॥ ३९ ॥
कितने ही योद्धाओंकी जाँघें अकड़ गयीं और वे पृथ्वी-पर गिर पड़े । दूसरे बहुत-से सैनिकोंने उस दैत्यको देखते ही भयके मारे प्राण त्याग दिये ॥ ३९ ॥

तस्मिंस्तथा वर्तमाने युद्धे महति दारुणे ।
रथौघगजपत्तीनां सुराणां च महाक्षये ॥ ४० ॥
कुजम्भो दानवश्रेष्ठो ह्यंशमादित्यमाहवे ।
योधयामास समरे वृषः प्रतिवृषं यथा ॥ ४१ ॥
रथसमूह, हाथी और पैदल योद्धाओं तथा देवताओंका महान् विनाश करनेवाला वह अत्यन्त भयंकर महायुद्ध अभी चल ही रहा था कि दानवशिरोमणि कुजम्भ युद्धस्थलमें आकर अंश नामक आदित्यके साथ युद्ध करने लगा, जैसे एक साँड़ अपने विरोधी साँड़से जा भिड़ा हो ॥ ४०-४१ ॥

जघानाचलसंकाशो मत्तवारणविक्रमः ।
स्फुरद्भिर्निशितैस्तीक्ष्णरैर्बहुभिराशुगैः ॥ ४२ ॥
देवसैन्यसहस्राणि सरथानि महाहवे ।
पर्वतके समान विशालकाय और मतवाले हाथीके समान पराक्रमी कुजम्भने अपने तीखे, चमकीले, बहुसंख्यक, शीघ्रगामी और पैने बाणोंद्वारा उस महासमरमे देवसेनाके सहस्रों योद्धाओंका रथोंसहित संहार कर डाला ॥ ४२ ॥

तस्य बाणपथं प्राप्य नाभ्यवर्तन्त सर्वशः ॥ ४३ ॥
प्रणेदुः सर्वभूतानि बभूवुस्तिमिरा दिशः ।
देवानांमजयः क्रूरः प्रत्यपद्यत दारुणः ॥ ४४ ॥
उसके बाणके मार्गमें पड़कर कोई भी ठहर न सका । सभी प्राणी आर्तनाद करने लगे तथा समस्त दिशाओंमें अन्धकार छा गया । देवताओंको बड़ी ही कठोर एवं भयंकर पराजय प्राप्त हुई ॥ ४३-४४ ॥

अंशस्तु दानवेन्द्रस्य जघानोत्तमविक्रमः ।
अनीकं दशसाहस्रं कुञ्जराणां तरस्विनाम् ॥ ४५ ॥
उत्तम पराक्रमी अंशने दानवराज कुजम्भके दस हजार वेगशाली हाथियोंकी सेनाका संहार कर डाला ॥ ४५ ॥

आपतन्तं गजानीकं कुजम्भो वीक्ष्य दानवः ।
गदापाणिरवारोहद् रथोवस्थादरिंदमः ॥ ४६ ॥
देवताओंकी गजसेनाको अपने ऊपर आक्रमण करती देख शत्रुओंका दमन करनेवाला दानव कुजम्भ हाथमें गदा लेकर रथकी बैठकसे उतर पड़ा ॥ ४६ ॥

अद्रिसारमयीं गुर्वी प्रगृह्य महतीं गदाम् ।
अभ्यद्रवद् गजानीकं व्यादितास्य इवान्तकः ॥ ४७ ॥
पर्वतके सारभूत लोहेकी बनी हुई उस भारी एवं विशाल गदाको हाथमे लेकर कुजम्भ मुँह बाये हुए कालके समान देवताओंकी गजसेनाकी ओर दौड़ा ॥ ४७ ॥

स गजान् गदया निघ्नन् व्यचरत् समरे बली।
कुजम्भो दानवश्रेष्ठो गदापाणिर्बलाधिकः ॥ ४८ ॥
दानवशिरोमणि कुजम्भ बलमें बहुत बढ़ा-चढ़ा था । वह गदाधारी बलवान् वीर गदासे हाथियोंका वध करता हुआ समराङ्गणमें विचरने लगा ॥ ४८ ॥

विशीर्णदन्तांश्च बहून् भिन्नकुम्भांश्च दारुणान् ।