विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 944, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १२० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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अकरोद् दानवश्रेष्ठ उद्दिश्योद्दिश्य तान् बली ॥ ४९ ॥
बलवान् दानवशिरोमणि कुजम्भने नाम ले-लेकर बहुतेरे भयंकर गजराजोंके दाँत तोड़ दिये और कुम्भस्थल फोड़ डाले ॥ ४९ ॥
विशीर्णदन्ता बहवो भिन्नकुम्भास्तथा परे।
कुजम्भेनाद्दिता नागा व्यद्रवन्त दिशो दश ॥ ५० ॥
कुजम्भसे पीड़ित हो टूटे दाँत और फूटे कुम्भस्थलवाले बहुत-से हाथी दसो दिशाओंमें भाग रहे थे ॥ ५० ॥
कुजम्भस्य च येऽमात्या दानवा घोरविक्रमाः ।
नाराचैर्विविधैस्तीक्ष्णैरपातयन्गजयोधिनः ॥ ५१ ॥
कुजम्भके जो मन्त्री थे, उन घोर पराक्रमी दानवोंने नाना प्रकारके तीखे नाराचोंसे गजारोहियोंको धराशायी कर दिया ॥ ५१ ॥
क्षुरैः क्षुरप्रैर्भल्लैश्च पातैरञ्जलिकैः शितैः ।
चिच्छेद चोत्तमाङ्गानि कुजम्भो दानवोत्तमः ॥ ५२ ॥
दानवराज कुजम्भने क्षुर, क्षुरप्र, भल्ल, पात तथा तीखे अञ्जलिक नामक बाणोंसे शत्रुपक्षके हाथियोंके मस्तक काट डाले ॥ ५२ ॥
शिरोभिः प्रपतद्भिरतु गगनं प्रत्यपूर्यत ।
अश्मवृष्टिरिवाकाशे बहुभिश्च सहाङ्कुशैः ॥ ५३ ॥
अङ्कुशोंसहित हाथियोंके बहुसंख्यक मस्तकोंके गिरनेसे सारा आकाश भर गया। उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो आकाशमें पत्थरोंकी वर्षा हो रही हो ॥ ५३ ॥
कृत्तोत्तमाङ्गाः स्कन्धेषु गजानां गजयोधिनः ।
अदृश्यन्त महाराज ताला विशिरसो यथा ॥ ५४ ॥
महाराज ! हाथियोंके कंधोंपर बैठे हुए गजारोही योद्धा मस्तकोंके कट जानेपर शिखररहित ताड़ वृक्षोंके समान जान पड़ते थे ॥ ५४ ॥
आपतन्तं महानागमंशस्यासुरसत्तमः ।
जघानैकेषुणा क्रुद्धस्ततः स विमुखोऽभवत् ॥ ५५ ॥
अपनी ओर आते हुए अंशके महान् गजराजको असुर-शिरोमणि कुजम्भने कुपित होकर एक बाण मारा, जिससे वह युद्धसे विमुख हो गया ॥ ५५ ॥
विगाह्यैवं गजानीकं कुजम्भो दानवोत्तमः।
विनिघ्नन् प्रवरान् सैन्यान् गदया बलिनां वरः ॥ ५६ ॥
इस प्रकार हाथियोंकी सेनामें प्रविष्ट होकर बलवानोंमें श्रेष्ठ दानवप्रवर कुजम्भ गदासे उस सेनाके बड़े-बड़े गज-राजोंका वध करता हुआ वहाँ विचरने लगा ॥ ५६ ॥
एकप्रहाराभिहतान् कुजम्भेन महागजान् ।
अपश्यन्त सुराः सर्वे पर्वतानिव पातितान् ॥ ५७ ॥
कुजम्भके एक ही प्रहारसे मारे गये महान् गजराजोंको समस्त देवताओँने धराशायी हुए पर्वतोंके समान देखा ।५७।
कुजम्भस्य च मार्गेषु विशीर्णास्ते महागजाः ।
वज्राहता इवेन्द्रेण विशीर्णा इव पर्वताः ॥ ५८ ॥
कुजम्भके मार्गोंपर छिन्न-भिन्न होकर पड़े हुए महान् गज इन्द्रके वज्रसे आहत एवं चूर-चूर होकर ढहे हुए पर्वतोंके समान प्रतीत होते थे ॥ ५८ ॥
अपश्यंस्त्रिदशाः सर्वे मूर्तिमन्तमिवान्तकम् ।
गजास्तथा व्यदीर्यन्त सिंहस्येवेतरे मृगाः ॥ ५९ ॥
समस्त देवता कुजम्भको मूर्तिमान् कालके समान देखने लगे। जैसे सिंहके डरसे दूसरे वन्य पशु भाग जाते हैं, उसी प्रकार उसे देखकर हाथियोंकी सेनामें दरार पड़ जाती थी ॥ ५९ ॥
स वभौ तां गदां बिभ्रत् प्रोक्षितां गजशोणितैः ।
व्यादितास्योऽनदत् क्रुद्धो रौद्ररूपो भयानकः ॥ ६० ॥
हाथियोंके खूनसे रँगी हुई उस गदाको धारण किये रौद्ररूपधारी भयानक दैत्य कुजम्भ कुपित हो मुँह बाकर जोर-जोरसे गर्जना कर रहा था ॥ ६० ॥
यथा हि भगवान् क्रुद्धः प्रजानां संक्षये पुरा ।
विक्रीडमानो गदया रणमध्ये महासुरः ॥ ६१ ॥
जैसे पूर्वकालमें प्रजाओंके संहारके समय कुपित हुए भगवान् रुद्र क्रीडा करते हैं, उसी प्रकार उस रणभूमिमें महान् असुर कुजम्भ गदासे खेल रहा था ॥ ६१ ॥
गोपाल इव दण्डेन कलयन् स महागजान् ।
क्रुद्धं कालमिवाकाले दण्डमुद्यम्य दानवम् ।
अपश्यन्त सुराः सर्वे कुजम्भं भीमविक्रमम् ॥ ६२ ॥
जैसे ग्वाला डंडेसे गौओंको हाँकता है, उसी प्रकार वह गदासे बड़े-बड़े गजराजोंको खदेड़ रहा था । उस समय सब देवता भयंकर पराक्रमी दानव कुजम्भको असमयमें कुपित हो कालदण्ड उठाये हुए कालके समान देखते थे ॥
हतारोहास्तु तत्रान्ये प्रभिन्ना वारणोत्तमाः ।
ते हन्यमाना गदया बाणैश्च भृशविक्षताः ॥ ६३ ॥
जिनके सवार मारे गये थे, वे दूसरे-दूसरे मदवर्षी गजराज उसकी गदासे आहत और बाणोंसे बहुत ही क्षत-विक्षत हो गये थे ॥ ६३ ॥
असहन्तः कुजम्भस्य गदावेगं महाहवे ।
स्वान्यनीकानि मृद्गन्तः प्राद्रवन्त महागजाः ॥ ६४ ॥
उस महासमरमें कुजम्भकी गदाके वेगको सहन न कर सकनेके कारण बड़े-बड़े गजराज अपनी ही सेनाओंको कुचलते हुए भागने लगे ॥ ६४ ॥