विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 945, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| भविष्यपर्व ] | सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः | ९२१ |
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महावात इवाभ्राणि विघमन् गदया गजान् ।
अतिष्ठत् समरे दैत्यः कालः संवर्तको यथा ॥ ६५ ॥
जैसे आँधी बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार गदाके आघातसे गजराजोंको विदीर्ण करता हुआ वह दैत्य समराङ्गणमें संहारकारी कालके समान खड़ा था ॥ ६५ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे देवासुरयुद्धे कुजम्भोत्कर्षवर्णने षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें देवासुर-संग्राममें कुजम्भके उत्कर्षका वर्णनविषयक छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५६ ॥
सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
देवासुरसंग्राममें कुजम्भ, असिलोमा और वृत्रासुरके उत्कर्षका वर्णन तथा हरि एवं अश्विनीकुमारकी पराजय
वैशम्पायन उवाच
ततः सर्वाणि सैन्यानि देवराजस्य शासनात् ।
अभ्यद्रवन्त दितिजान् नदन्तो भैरवान् रवान् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! तदनन्तर देवराज इन्द्रकी आज्ञासे सारी देवसेनाएँ भैरव स्वरसे गर्जना करती हुई दैत्योंपर टूट पड़ीं ॥ १ ॥
तं बलौघमपर्यन्तं देवानां सुदुरासदम् ।
रथनागाश्वकलिलं शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनम् ॥ २ ॥
आपतन्तं सुदुष्पारं रजसा सर्वतोवृतम् ।
सैन्यसागरमक्षोभ्यं वेलेव मकरालयम् ॥ ३ ॥
तदाश्चर्यमपश्यन्त अश्रद्धेयमिवाद्भुतम् ।
देवताओंका वह सैन्यसमुदाय अनन्त एवं अत्यन्त दुर्जय था। उसमें रथ, हाथी और घोड़े भरे हुए थे। शङ्खों और दुन्दुभियोंका गम्भीर घोष गूँज रहा था। उसका पार पाना बहुत कठिन था। उसपर सब ओरसे धूल छा रही थी। वह अक्षोभ्य सैन्यसागर आश्चर्यमय, अविश्वसनीय और अद्भुत प्रतीत होता था। दैत्योंने आक्रमण करती हुई उस सेनाको देखा और जैसे तटभूमि समुद्रको आगेको बढ़नेसे रोकती है, उसी प्रकार उसको रोका ॥ २-३॥
उदीर्णां पृतनां सर्वां साश्वां सरथकुञ्जराम् ॥ ४ ॥
आवार्य समरेऽतिष्ठत् कुजम्भस्तरसाम्बली ।
सैन्यार्णवं देवतानां गिरिमन्दरिवाचलः ॥ ५ ॥
घोड़े, रथ और हाथियोंसहित आगे बढ़ती हुई उस सारी सेनाको वेगपूर्वक रोककर बलवान् कुजम्भ समराङ्गणमें खड़ा हो गया। देवताओंके सैन्यसमुद्रको रोकनेके लिये वह मन्दरपर्वतके समान अविचल भावसे खड़ा रहा ॥ ४-५ ॥
अनीकिनीं कुजम्भस्तु गदया स न्यवारयत् ।
सा तथा वारिता सेना विह्वलाभून्निरुद्यमा ॥ ६ ॥
कुजम्भने अपनी गदासे उस सेनाको रोक दिया। इस प्रकार रोकी गयी वह सेना विह्वल एवं उद्योगशून्य हो गयी ॥ ६ ॥
तस्मिंस्तथा वर्तमाने सम्प्रहारे सुदारुणे ।
असिलोमा तु बलवान् दानवो दानवाधिपः ॥ ७ ॥
देवसैन्यस्य सर्वस्य धूमकेतुरिवोत्थितः ।
तपत्यर्क इवामोघः सुरसैन्यानि संयुगे ॥ ८ ॥
वह भयंकर संग्राम उक्तरूपसे चल ही रहा था कि दनुकुलनन्दन बलवान् दानवराज असिलोमा समूची देवसेनाके लिये धूमकेतु नामक उत्पातग्रहके समान उठ खड़ा हुआ। जैसे अमोघ सूर्य सबको ताप देता है, उसी प्रकार उसने युद्धस्थलमें देवताओंकी सेनाको तपाना आरम्भ किया ॥ ७-८ ॥
सहस्ररश्मिप्रतिमो दानवस्य रथोत्तमः ।
शरैर्मेघ इवावर्षद् देवानीकं प्रतापवान् ॥ ९ ॥
उस दानवका उत्तम रथ सूर्यके समान तेजस्वी था। वह प्रतापी दैत्य जलकी वर्षा करनेवाले मेघके समान देवताओंकी सेनापर बाणोंकी वृष्टि करने लगा ॥ ९ ॥
शरौघरश्मिभिर्दीप्तैः प्रतप्तो घोरविक्रमः ।
रौद्रः क्रूरो दुराधर्षो दुरापो ध्वजिनीमुखे ॥ १० ॥
युध्यते दैवतैः सार्धं ग्रसमान इव प्रभुः ।
वह भयंकर पराक्रमी दानव बाणसमूहरूपी दीप्तिमती किरणोंसे तप रहा था। वह रौद्र, क्रूर, दुर्धर्ष और दुर्जय था। सेनाके मुहानेपर खड़ा हो वह प्रभावशाली दैत्य देवताओंके साथ इस प्रकार युद्ध करने लगा, मानो उन सबको अपना ग्रास बना लेगा ॥ १० ॥
उग्रेशुरुग्रवदनः समारुह्य महाग़जम् ॥ ११ ॥
सुराणामुत्तमाङ्गानि प्रचिनोति महाबलः ।
उसके बाण भयंकर थे। उसका मुख भी बड़ा ही उग्र था। वह महाबली दानव एक विशाल गजराजपर आरूढ़ हो देवताओंके मस्तकोंका चयन करता था (उन्हें काट गिराता था) ॥ ११ ॥
ग्रसन् दैवतसैन्यानि शरद्रंष्ट्रः प्रतापवान् ॥ १२ ॥
असिजिह्वश्चक्रहस्तश्चापव्यात्ताननोऽसुरः ।