विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 946, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९२२ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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परश्वधनखः श्रीमान् मृदङ्गापूरितध्वनिः ॥ १३ ॥ तिष्ठते दानवश्रेष्ठः संयुगे व्याघ्रवद् बली।
देवताओंकी सेनाको अपना ग्रास बनाते हुए उस प्रतापी असुरके बाण ही उसकी दाढ़ थे। तलवार ही उसकी जिह्वा थी। चक्र ही हाथ थे। तना हुआ धनुष ही उसका खुला हुआ मुख था। फरसे उसके नख थे। मृदङ्ग आदि वाद्योंकी ध्वनि ही उसके दहाड़नेकी आवाज थी। इस प्रकार वह बलवान् दानवशिरोमणि असिलोमा उस युद्धस्थलमें व्याघ्रके समान खड़ा था ॥ १२-१३॥
मौर्वीघोषस्तनयित्नुः पृषत्कः प्रथितो महान् ॥ १४ ॥ धनुर्विद्युद्गणश्चापो महामेघ इवापरः।
वह दानव दूसरे महामेघके समान प्रतीत होता था। प्रत्यञ्चाकी टंकार ही उसकी गर्जना थी। सुविख्यात बाणोंका महान् समूह ही उसके द्वारा बरसाये जानेवाले जलकी बूँदें थीं तथा उसका धनुष ही इन्द्रधनुष एवं विद्युत्का समुदाय था ॥ १४॥
इष्वस्त्रसागरो घोरो बाहुग्राहो दुरासदः ॥ १५ ॥ कार्मुकोर्मितरङ्गौघो बाणावर्तमहाह्रदः। गदासिमकरो रौद्रो ज्यावेलः शिक्षयोद्धतः ॥ १६ ॥ पदातिमीनः सुमहान् गर्जितोत्कृष्टघोषवान्।
जिसमें बाण आदि अस्त्रोंका प्रयोग होता था, वह संग्राम एक भयङ्कर समुद्रके समान था। उसकी भुजाएँ ही उसमें ग्राह थीं। उसे पार करना अत्यन्त कठिन था। धनुष ही उस सागरकी छोटी-बड़ी लहरोंका समुदाय था। बाणोंका जो आवर्तन है, वही भँवरोंसे युक्त महान् ह्रद था। गदा और तलवार उसमें मगरके समान थीं। वह देखनेमें रौद्र प्रतीत होता था। धनुषकी प्रत्यञ्चा ही उस समुद्रकी वेला (तटभूमि) थी। शिक्षारूपी वायुके वेगसे उसमें ज्वार-सा उठता था। पैदल सैनिक उस सागरके मत्स्य थे। वह महान् रणसागर योद्धाओंके गर्जने और चीखने-चिल्लानेके गम्भीर घोषसे परिपूर्ण था ॥ १५-१६॥
हयान् गजान् पदातींश्च रथांश्च सहसा वहून् ॥ १७ ॥ न्यमज्जयत समरे परवीरान् महारथान्। आप्लावयत् स देवौघान् दारुणो दानवेश्वरः ॥ १८ ॥
उस दारुण दानवराज असिलोमाने शत्रुपक्षके महारथी वीरों, घोड़ों, हाथियों, पैदलों और बहुसंख्यक रथोंको तथा कितने ही देवताओंको भी सहसा उस समरसागरमें निमज्जित एवं आप्लावित कर दिया ॥ १७-१८ ॥
प्रावर्तत युधि श्रीमान् युधि श्रेष्ठो युधि स्थिरः। अपश्यंस्त्रिदशाः सर्वे शुद्धजाम्बूनदप्रभम् ॥ १९ ॥ सन्नद्धं तत्र युध्यन्तं ज्वलन्तमिव पावकम्। संलग्न रहा। समस्त देवताओंने देखा—उसकी अङ्गकान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान प्रकाशित हो रही थी। वह कवच धारण करके वहाँ युद्ध करते समय प्रज्वलित अग्निके समान जान पड़ता था ॥ १९॥
मध्यंदिनगतं सूर्य ज्वलन्तमिव तेजसा ॥ २० ॥ न शेकुः सर्वभूतानि दानवं प्रसमीक्षितुम्।
वह दानव अपने तेजसे दोपहरके सूर्यकी भाँति देदीप्य-मान हो रहा था। सम्पूर्ण भूतोंमेंसे कोई भी उसकी ओर आँख उठाकर देख नहीं पाता था ॥ २०॥
यथा प्ररूढं धर्मान्ते दहेत् कक्षं हुताशनः ॥ २१ ॥ तथा सुरचरान् दैत्यो दहति स्म सुतेजसः।
जैसे ग्रीष्मऋतुमें आग बढ़े और सूखे हुए घास-फूसको शीघ्र ही जला देती है, उसी प्रकार वह दैत्य अपने तेजसे उन श्रेष्ठ देवताओंको दग्ध कर रहा था ॥ २१॥
देवानां दानवानां च बलं नर्दति दारुणम् ॥ २२ ॥ विरुद्धमभवत् सर्वमाकुलं च समन्ततः।
देवताओं और दानवोंकी सेनाएँ बड़ी भयंकर गर्जनाएँ कर रही थीं। वे सारी सेनाएँ सब ओरसे परस्पर चढ़ आयीं और आपसमें घोल-मेल हो गयीं ॥ २२ ॥
शूराश्च ते बलोदग्रा हस्त्यश्वरथधूर्गताः ॥ २३ ॥ आर्यां बुद्धिं समास्थाय न त्यजन्ति महार णम्।
वे सभी सैनिक प्रचण्ड बलशाली और शूरवीर थे। हाथी, घोड़े तथा रथोंपर बैठे हुए वे उभय पक्षके वीर श्रेष्ठ बुद्धिका आश्रय लेकर उस महासमरका त्याग नहीं करते थे ॥ २३॥
तदुत्पिञ्जलकं युद्धमभवद् रोमहर्षणम् ॥ २४ ॥ देवदानवयोः संख्ये रुधिरास्रावकर्दमम्।
देवता और दानव-जातिका वह युद्ध अमर्यादित तथा रोमाञ्चकारी था। उस युद्धस्थलमें अधिक रक्त बहनेके कारण कीच मच गयी थी ॥ २४॥
न दिशः प्रत्यजानन्त भयग्राहनिपीडिताः। शस्त्रपातांश्च विविधान् दानवानां महारणे ॥ २५ ॥
उस महासमरमें भयरूपी ग्राहसे पीड़ित हुए देवसैनिक न तो दिशाओंको जान पाते थे और न दानवोंके चलाये हुए नाना प्रकारके शस्त्रोंको ही समझ पाते थे ॥ २५ ॥
अन्योन्यं मूढचित्तास्ते निजघ्नुर्व्याकुलीकृताः। स्वान् परान्नाभिजानन्ति विमूढाः शस्त्रपाणयः॥ २६॥
उनके चित्तमें मोह छा गया था। वे व्याकुल होकर हाथमें शस्त्र ले एक दूसरेको मार रहे थे और इतने मूढ़ हो गये थे कि अपने-परायेकी भी पहचान नहीं कर पाते थे ॥
शिरोरुहेषु संगृह्य कश्चिच्छूरस्य संयुगे। शूरश्छिनत्ति मूर्धानं संदष्टौष्ठपुटाननम् ॥ २७॥
कोई शूरवीर युद्धस्थलमें दूसरे शूरवीरके केश पकड़कर