विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 947, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ १२१
उसका मस्तक काट लेता था। वह मस्तक, जिसका मुख दाँतोतले दबे हुए ओष्ठसे सुशोभित था ॥ २७ ॥
बाहुभिर्मुष्टिभिश्चैव वज्रकल्पैः सुदारुणैः ।
प्रहरन्ति रणे वीरा आत्तशस्त्राः परस्परम् ॥ २८ ॥
हाथोंमें हथियार लिये वीर रणभूमिमें एक दूसरेपर भुजाओं तथा अत्यन्त भयंकर वज्रतुल्य मुक्कोंसे प्रहार करते थे ॥ २८ ॥
योधप्राणहरे रौद्रे स्वर्गद्वारेऽनपावृते ।
संकुले तुमुले युद्धे वर्तमाने महाभये ॥ २९ ॥
हयो हयं गजो नागं वीरो वीरं महाहवे ।
अभ्यद्रवज्जिघांसन्तो ह्यसमञ्जसमाहवे ॥ ३० ॥
वह वर्तमान महाभयंकर तुमुल युद्ध उभय पक्षके योद्धाओं-से व्याप्त था। वह रौद्र संग्राम सभी योद्धाओंके प्राण हर लेने-वाला तथा उनके लिये स्वर्गका खुला हुआ द्वार था । उस महासमरमें घुड़सवारने घुड़सवारपर, हाथीसवारने हाथीसवार-पर और पैदल वीरने पैदल वीरपर आक्रमण किया। वे सब-के-सब एक दूसरेको मार डालनेकी इच्छासे अमर्यादितरूपसे परस्पर टूट पड़े ॥ २९-३० ॥
असुराश्च सुराश्चैव विक्रमाढ्या महारथाः ।
जुहुधुः समरे प्राणान् निजघ्नुश्चेतरेतरम् ॥ ३१ ॥
बल-पराक्रमसे सम्पन्न महारथी देवता और असुर एक दूसरेको मारने और समराग्निमें प्राणोंकी आहुति देने लगे ॥
मुक्तकेशा विकवचा विरथाश्छिन्नकार्मुकाः ।
हस्तैः पादैश्च युध्यन्ते दानवास्त्रिदशैः सह ॥ ३२ ॥
जिनके रथ नष्ट हो गये और धनुष कट गये थे, वे कवचरहित दानव केश खोले हुए वहाँ देवताओंके साथ केवल हाथों और पैरोंसे ही युद्ध करते थे ॥ ३२ ॥
हरिस्तु निशितं भल्लं प्रेषयामास संयुगे ।
स तस्य धनुषः कोटिं छित्त्वा भूमावपातयत् ॥ ३३ ॥
इसी समय हरिने युद्धस्थलमें असिलोमापर एक तेज धारवाला भल्ल चलाया । उस भल्लने उसके धनुषकी कोटिका छेदन करके उसे पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ ३३ ॥
पुनश्चापि पृषत्कानां शतानि नतपर्वणाम् ।
प्राहिणोत् सहसा तस्य दानवेन्द्रस्य संयुगे ॥ ३४ ॥
तत्पश्चात् उन्होंने पुनः रणभूमिमें उस दानवराजको लक्ष्य करके सहसा झुकी हुई गाँठवाले सौ बाण चलाये ॥ ३४ ॥
तस्य देहे विमुक्तास्ते मारुतेन समीरिताः ।
मग्नार्धकाया विविशुः पन्नगा इव पर्वते ॥ ३५ ॥
उनके छोड़े हुए वे बाण वायुसे प्रेरित हो उस दानवके शरीरमें उसी प्रकार घुस गये, जैसे पर्वतमें सर्प घुस जाते हैं। उन सभी बाणोंका आधा-आधा भाग उसके शरीरमें धँस गया था ॥ ३५ ॥
स तैर्निपतितैर्गात्रैः क्षरद्भिरसृगावलीः ।
बभौ दैत्यो महाबाहुर्मेरुर्धातुमिवोत्सृजन् ।
पुनश्चापि पृषत्कानां शतानि नतपर्वणाम् ॥ ३६ ॥
उन बाणोंकी मार पड़नेसे उसके सारे अङ्गोंसे खूनकी धाराएँ बह चलीं । उस समय वह महाबाहु दैत्य गेरूकी धारा बहानेवाले मेरुगिरिके समान शोभा पाता था । तदनन्तर पुनः उसपर झुकी हुई गाँठवाले सौ बाणोंका प्रहार हुआ ॥
ततोऽसिलोमा संक्रुद्धः प्रगृह्यान्यन्महाधनुः ।
रुक्मपुङ्खांश्च निशितान् प्रेषयामास सायकान् ॥ ३७ ॥
तब असिलोमाको बड़ा क्रोध हुआ। उसने दूसरा विशाल धनुष लेकर हरिपर सोनेके पंखवाले बहुत-से पैने बाणोंका प्रहार किया ॥ ३७ ॥
तैस्तु मर्मसु विव्याध सर्पानलविषोपमैः ।
गात्रं संछादयामास महाभ्रैरिव पर्वतम् ॥ ३८ ॥
वे बाण सर्प, अग्नि और विषके समान प्राणनाशक थे । उनके द्वारा उसने हरिके मर्मस्थानोंमें आघात किया तथा बड़े-बड़े बादलोंसे पर्वतकी भाँति अपने उन बाणोंसे उनके शरीरको ढक दिया ॥ ३८ ॥
भूयः संधाय च शरं सुमोचान्तकसंनिभम् ।
सुपुङ्खं सूर्यसंकाशं बाणमप्रतिमं रणे ॥ ३९ ॥
इसके बाद उसने पुनः रणभूमिमें सुन्दर पंखयुक्त सूर्य-सदृश तेजस्वी, अनुपम एवं कालके समान भयंकर बाणका संधान करके उसे हरिपर छोड़ दिया ॥ ३९ ॥
तेन बाणप्रहारेण संयुगे भीमकर्मणा ।
मुमोह सहसा देवो भूमौ चापि पपात ह ॥ ४० ॥
भयंकर कर्म करनेवाले उस दानवके उस बाणप्रहारसे युद्धस्थलमें हरिदेवता सहसा मूर्च्छित हो गये और पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ४० ॥
ततो हाहाकृतः सर्वै देवै भूतलमाश्रिते ।
जगत् संदेवमाविग्नं यथार्कपतनं तथा ॥ ४१ ॥
हरिदेवके धराशायी होते ही सब लोग हाहाकार करने लगे । देवताओंसहित सारा जगत् उद्विग्न हो उठा, मानो साक्षात् सूर्यदेव आकाशसे पृथ्वीपर टूट गिरे हों ॥ ४१ ॥
परिवारं तु समरे तस्य हत्वा महासुरः ।
एकत्रिंशत्सहस्राणि योधानां दानवोत्तमः ॥ ४२ ॥
हरिको सब ओरसे घेरकर खड़े हुए जो सैनिक थे, उन सबको मारकर उस दानवराजने समराङ्गणमें देवपक्षके इकतीस हजार योद्धाओंका संहार कर डाला ॥ ४२ ॥
जयश्रिया सेव्यमानो दीप्यमान इवाचलः ।
प्रगृह्य कार्मुकं घोरं गतः शक्ररथं प्रति ॥ ४३ ॥
विजयश्रीसे सेवित हो दीप्तिमान् पर्वतकी भाँति प्रतीत होनेवाला असिलोमा घोर धनुष लेकर इन्द्रके रथकी ओर चला गया ॥ ४३ ॥
तथैव तु महायुद्धे ससैन्यावश्विनावुभौ ।