भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 948

९२४ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


प्रयुक्तौ सह वृत्रेण बलिना देवतारिणा ॥ ४४ ॥
इसी प्रकार उस महायुद्धमें सेनासहित दोनों अश्विनीकुमार बलवान् देवद्रोही वृत्रासुरके साथ युद्ध कर रहे थे ॥

बाणखड्गधनुष्पाणिः समरे त्यक्तजीवितः ।
आसाद्य सोऽश्विनौ दैत्यः स्थितो गिरिरिवाचलः ॥ ४५ ॥
वृत्रासुरके हाथमें बाण, खड्ग और धनुष थे। वह जीवनका मोह छोड़कर समरभूमिमें आया था। वह दैत्य दोनों अश्विनीकुमारोंके पास पहुँचकर पर्वतके समान अविचल भावसे खड़ा हो गया ॥ ४५ ॥

सतः शङ्खमुपाध्माय द्विषतां लोमहर्षणम् ।
ज्याघोषतलशब्दैश्च सर्वभूतान्यवेजयत् ॥ ४६ ॥
तदनन्तर शत्रुओंके रोंगटे खड़े कर देनेवाले शङ्खको बजाकर धनुषकी प्रत्यञ्चाके टङ्कार-घोषसे उसने सम्पूर्ण प्राणियोंको कम्पित कर दिया ॥ ४६ ॥

ततः संहृष्टरोमाणः शङ्खशब्दं विशुश्रुवुः ।
यक्षराक्षसदेवौघा वृत्रस्यापि च निःस्वनम् ॥ ४७ ॥
उस समय यक्ष, राक्षस और देवताओंके समुदायने रोमाञ्चित शरीरसे उस शङ्खकी ध्वनि और वृत्रासुरकी गर्जना सुनी ॥ ४७ ॥

गदातोमरनिस्त्रिंशशूलशक्तिपरश्वधाः ।
प्रगृहीता व्यराजन्त यक्षराक्षसबाहुभिः ॥ ४८ ॥
फिर तो यक्षों और राक्षसोंके हाथोंमें गदा, तोमर, खड्ग, शूल, शक्ति और फरसे शोभा पाने लगे ॥ ४८ ॥

तैः प्रयुक्तान् महाकायैः शूलशक्तिपरश्वधान् ।
भल्लैर्वृत्रः प्रचिच्छेद भीमवेगरवैस्तथा ॥ ४९ ॥
उन महाकाय यक्ष आदिके द्वारा छोड़े गये उन शूल, शक्ति और फरसोंको वृत्रासुरने भयंकर वेग और शब्दवाले भल्लोंसे काट डाला ॥ ४९ ॥

अन्तरिक्षचराणां च भूमिस्यानां च गर्जताम् ।
शरैर्विंन्याध गात्राणि देवानां प्रियदर्शिनाम् ॥ ५० ॥
अन्तरिक्षमें विचरने और पृथ्वीपर खड़े होकर गर्जनेवाले प्रियदर्शी देवताओंके सारे अङ्गोंमें उस दैत्यने अपने बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥ ५० ॥

वृत्रासुरभुजोत्सृष्टैर्वहुधा यक्षरक्षसाम् ।
निकृत्तान्येव दृश्यन्ते शरीराणि शिरांसि च ॥ ५१ ॥
वृत्रासुरकी भुजाओंसे छोड़े गये उन अस्त्रोंद्वारा बहुधा यक्ष और राक्षसोंके शरीर और मस्तक कटे हुए ही देखे जाते थे ॥ ५१ ॥

अथ रक्तमहावृष्टिरभ्यवर्षत मेदिनीम् ।
गदापरिघभिन्नानां देवानां गात्रसम्भवा ॥ ५२ ॥
तदनन्तर पृथ्वीपर खूनकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी । गदा और परिघसे घायल हुए देवताओंके शरीरसे ही वह रक्तवर्षा हो रही थी ॥ ५२ ॥

प्रच्छादयन्तं बाणौघैर्वृत्रं भीमपराक्रमम् ।
ददृशुः सर्वभूतानि भानुमन्तमिवांशुभिः ॥ ५३ ॥
अपने बाणसमूहोंद्वारा शत्रुओंको आच्छादित करते हुए भयंकर पराक्रमी वृत्रासुरको समस्त प्राणियोंने अपने किरण-जालसे सारे जगत्‌को ढकनेवाले सूर्यदेवके समान देखा ॥ ५३ ॥

तीक्ष्णरश्मिरिवादित्यः प्रतपन् सर्वदेवताः ।
अविध्यद् बलवान् क्रुद्धः सायकैर्मर्मभेदिभिः ॥ ५४ ॥
प्रचण्ड किरणोंवाले सूर्यके समान सम्पूर्ण देवताओंको ताप देते हुए उस बलवान् दैत्यने कुपित होकर मर्मभेदी सायकोंद्वारा उन सबको घायल कर दिया ॥ ५४ ॥

नदतो विविधान् नादानर्दितस्यापि सायकैः ।
न मोहमसुरेन्द्रस्य ददृशुस्त्रिदशा रणे ॥ ५५ ॥
देवताओंके सायकोंसे पीड़ित होनेपर भी वह नाना प्रकारसे सिंहनाद करता रहा । रणभूमिमें देवताओंने असुरराज वृत्रको कभी मोह या मूर्च्छामें पड़ते नहीं देखा ॥ ५५ ॥

तेऽसिचर्मगदाभिश्च परिघप्रासतोमरैः ।
परश्वधैश्च शैलैश्च प्रववर्षुर्महारथाः ॥ ५६ ॥
वे महारथी देवता उसके ऊपर ढाल, तलवार, गदा, परिघ, प्रास, तोमर, फरसे और शूलोंकी वर्षा करने लगे ॥

ततो वृत्रः सुसंक्रुद्धस्तैस्तदाभ्यर्दितो बली ।
अभ्यवर्षच्छितैर्बाणैस्तान् सर्वान् सत्यविक्रमः ॥ ५७ ॥
उनके द्वारा इस प्रकार पीड़ित होनेपर बलवान् एवं सत्यपराक्रमी वृत्रासुर अत्यन्त कुपित हो उठा । उस समय उसने उन सब लोगोंपर पैने बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥

तेन वित्रासिता देवा विप्रकीर्णमहायुधाः ।
घोरमर्तस्वरं चक्रुर्वृत्रासुरभयार्दिताः ॥ ५८ ॥
उसके द्वारा आतंकित हुए देवताओंके बड़े-बड़े आयुध हाथसे छूटकर बिखर गये । वृत्रासुरके भयसे पीड़ित हुए वे देवता घोर आर्तनाद करने लगे ॥ ५८ ॥

उत्सृज्य ते गदाशक्तिशूलर्ष्टिपरिघाशनीन् ।
उत्तरां दिशमाजग्मुस्त्रासिता दृढधन्विना ॥ ५९ ॥
सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले उस दैत्यसे त्रास पाकर वे देवता गदा, शक्ति, शूल, ऋष्टि, परिघ और अशनि आदि अस्त्रोंको त्यागकर उत्तर दिशाकी ओर आ गये ॥ ५९ ॥

शूलशक्तिगदापाणिर्व्यूढोरस्को महाभुजः ।
प्रावर्तत रणे वृत्रस्त्रासयानश्चराचरान् ॥ ६० ॥
चौड़ी छातीवाला महाबाहु वृत्रासुर शूल, शक्ति और गदा हाथमें लेकर चराचर प्राणियोंको त्रास देता हुआ युद्धमें प्रवृत्त हुआ था ॥ ६० ॥

तत्रैकस्तु महाबाहुरसिशूलधरः प्रभुः ।
अभ्यधावत दैत्येन्द्रं वृत्रमप्रतिमं रणे ॥ ६१ ॥
उन दोनों अश्विनीकुमारोंमेंसे एक सामर्थ्यशाली महाबाहु नासत्य हाथमें तलवार और त्रिशूल लिये रणक्षेत्रमें अनुपम