भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 949

भविष्यपर्व ] अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ९२५

वीरता प्रकट करनेवाले दैत्यराज वृत्रासुरकी ओर दौड़े ॥ ६१॥

तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य निर्भिन्नमिव वारणम् ।
वत्सदन्तैस्त्रिभिः पार्श्वे विव्याध सुरसत्तमम् ॥ ६२ ॥

मदकी धारा बहानेवाले हाथीके समान सुरश्रेष्ठ नासत्यको आक्रमण करते देख वृत्रासुरने उनके पार्श्वभागमें तीन वत्सदन्त नामक बाणोंका प्रहार किया ॥ ६२ ॥

सोऽपि विद्धो महेष्वासः शरैरमितविक्रमः ।
गदां जग्राह बलवान् गदायुद्धविशारदः ॥ ६३ ॥

तब नासत्यने वृत्रासुरको भी अपने बाणोंद्वारा घायल कर दिया। उनके बाणोंसे विद्ध हो अमित पराक्रमी, महाधनुर्धर, गदायुद्धविशारद, बलवान् वृत्रासुरने गदा हाथमें ले ली ॥ ६३ ॥

तां प्रगृह्य गदां भीमामयःसारमयीं दृढाम् ।
अश्विनं सहसाऽऽगम्य ताडयामास वीर्यवान् ॥ ६४ ॥

लोहेके सारतत्त्वकी बनी हुई उस सुदृढ़ एवं भयंकर गदाको लेकर वह पराक्रमी दैत्य सहसा अश्विनीकुमारके पास आया और आते ही उसने उनपर उस गदाका प्रहार किया ॥ ६४ ॥

दीप्यमानं ततः शूलमश्वी सुविपुलं दृढम् ।
प्रासृजद् वृत्रदैत्याय सहसा रोमहर्षणम् ॥ ६५ ॥

तब अश्वी (नासत्य) ने अत्यन्त विशाल सुदृढ़ दीप्तिमान् और रोमाञ्चकारी शूल लेकर सहसा उसे वृत्रासुरपर दे मारा ॥ ६५ ॥

भङ्क्त्वा शूलं गदाग्रेण गदायुद्धविशारदः ।
अश्विनं सहसाभ्येत्य गरुत्मानिव पन्नगम् ॥ ६६ ॥

गदायुद्धमें कुशल वृत्रासुर गदाके अग्रभागसे उस शूलके टुकड़े-टुकड़े करके सहसा अश्विनीकुमारके पास आ पहुँचा, मानो गरुड़ सर्पके पास आ गये हों ॥ ६६ ॥

सोऽन्तरिक्षात् समुत्पत्य विधूय महतीं गदाम् ।
नासत्योपरि चिक्षेप गिरिशृङ्गोपमां बली ॥ ६७ ॥

उस बलवान् वीरने अन्तरिक्षसे उछलकर पर्वतशिखरके समान उस विशाल गदाको घुमाकर नासत्यके ऊपर दे मारा ॥ ६७ ॥

गदयाभिहतः सोऽश्वी त्यक्त्वा शूलमनुत्तमम् ।
प्रयातः सहसा तत्र यत्र युध्यति वासवः ॥ ६८ ॥

उस गदासे आहत होकर अश्वी (नासत्य) अपने परम उत्तम शूलको त्यागकर सहसा उस स्थानको भाग गये जहाँ इन्द्र युद्ध कर रहे थे ॥ ६८ ॥

पराजित्य तु संग्रामे अश्विनं भीमविक्रमम् ।
जयश्रिया सेव्यमानो वृत्रो युद्धे व्यवस्थितः ॥ ६९ ॥

भयंकर पराक्रमी अश्वीको युद्धमें पराजित करके विजयलक्ष्मीसे सेवित वृत्रासुर उस समरभूमिमें स्थिरभावसे खड़ा हो गया ॥ ६९ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनावतारे देवासुरयुद्धे वृत्रासुरोत्कर्षवर्णने सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें देवासुरसंग्राममें वृत्रासुरके उत्कर्षका वर्णनविषयक सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५७ ॥


अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

रणाजि और एकचक्रके, मृगव्याध और वलासुरके, अजैकपाद् और राहुके तथा सुधूम्राक्ष एवं केशी दैत्यके युद्धका वर्णन

वैशम्पायन उवाच
तत्रैव तु महायुद्धे रणाजिर्देवसत्तमः ।
युध्यते सह दैत्येन एकचक्रेण धीमता ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उसी महायुद्धमें देवशिरोमणि रणाजि नामक साध्यदेवता बुद्धिमान् दैत्य एकचक्रके साथ युद्ध कर रहे थे ॥ १ ॥

प्रच्छाद्य रथपन्थानमुत्क्रोशंश्च महाबलः ।
एकचक्रस्य सैन्यं तच्छरवर्षैरवाकिरत् ॥ २ ॥

महाबली रणाजिने रथके मार्गको आच्छादित करके जोर-जोरसे गर्जना करते हुए एकचक्रकी सेनापर बाणोंकी झड़ी लगा दी ॥ २ ॥

महासुरा महावीर्या महापट्टिशयोधिनः ।
शूलानि च भुशुण्डीश्च क्षिपन्ति स्म महारणे ॥ ३ ॥

महापराक्रमी और महान् पट्टिशद्वारा युद्ध करनेवाले महान् असुर उस महासमरमें शूलों और भुशुण्डियोंका प्रहार करते थे ॥ ३ ॥

तच्छूलवर्षं सुमहद्गदाशक्तिसमाकुलम् ।
अविशद् दितिजैर्मुक्तं दुर्निवार्यं चराचरैः ॥ ४ ॥

दैत्योंद्वारा की गयी गदा और शक्तियोंसहित शूलोंकी वह बड़ी भारी वर्षा देवसेनामें व्याप्त हो गयी; समस्त चराचर प्राणियोंके लिये उसका निवारण करना कठिन था ॥ ४ ॥

अन्योन्यमभिवर्तन्ते देवासुरगणा युधि ।
महाद्रिशिखराकारा वीर्यवन्तो महाबलाः ॥ ५ ॥

उस युद्धस्थलमें देवता और असुरगण एक दूसरेके सामने खड़े थे; उनके आकार विशाल पर्वतोंके समान थे और वे सभी महाबलवान् तथा पराक्रमी थे ॥ ५ ॥