भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 950
९२६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

तुरङ्गमाणां तु शतं युक्तं तस्य महारथे ।
महासुरवरस्येव हिरण्यकशिपोर्युधि ॥ ६ ॥
महान् असुरशिरोमणि एकचक्र युद्धमें हिरण्यकशिपुके समान था। उसके विशाल रथमें सौ घोड़े जुते हुए थे ॥ ६ ॥

तेषां चरणपातेन चक्रनेमिस्वनेन च ।
तस्य बाणनिपातैश्च हता वै शतशः सुराः ॥ ७ ॥
उन घोड़ोंकी टापोंके आघातसे, रथके पहियोंकी घरघराहटसे तथा एकचक्रके बाणोंकी मारसे सैकड़ों देवता नष्ट हो गये ॥ ७ ॥

ततः स लघुभिश्चित्रैः शरैः संनतपर्वभिः ।
सायुधानच्छिनत् क्रुद्धः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ८ ॥
रणाजिने कुपित होकर झुकी हुई गाँठवाले शीघ्रगामी विचित्र बाणोंद्वारा, आयुधोंसहित सैकड़ों और हजारों दैत्योंको छिन्न-भिन्न कर डाला ॥ ८ ॥

वध्यमानाः शरैस्तीक्ष्णै रथद्विरदवाजिनः ।
गमिताः प्रक्षयं केचित् त्रिदशैर्दानवा रणे ॥ ९ ॥
देवताओंने अपने तीखे बाणोंकी मारसे रथ, हाथी और घोड़ोंसहित कितने ही दानवोंका समराङ्गणमें संहार कर डाला ॥

ततः प्रक्षीयमाणांस्तानुप्रेक्ष्य दितेः सुताः ।
त्यक्त्वा प्राणान् न्यवर्तन्त प्रगृहीतवरायुधाः ॥ १० ॥
उन दानवोंका इस प्रकार विनाश होता देख वे दैत्य हाथोंमें श्रेष्ठ आयुध लिये प्राणोंका मोह छोड़कर वहाँ लौट पड़े ॥ १० ॥

ते दिशो विदिशश्चैव प्रतियुद्धप्रहारिणः ।
अभ्यघ्नन् निशितैः शस्त्रैर्देवान् दितिसुता रणे ॥ ११ ॥
युद्धमें शत्रुाका सामना और शत्रुसेनापर प्रहार करनेवाले उन दैत्योंने रणभूमिमें अपने तीखे शस्त्रोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओं और विदिशाओंमें खड़े हुए देवताओंको गहरी चोट पहुँचायी ॥ ११ ॥

रणाजिर्ज्वलितं घोरं परमं तिग्मतेजसम् ।
मुमोचास्त्रं महाबाहुर्मथनं नाम संयुगे ॥ १२ ॥
यह देख महाबाहु रणाजिने प्रचण्ड तेजवाले अत्यन्त घोर मथन नामक प्रज्वलित अस्त्रका उस युद्धस्थलमें प्रयोग किया ॥ १२ ॥

ततः शस्त्राणि शूलानि निशितानि सहस्रशः ।
अस्त्रवीर्येण महता दितिजः सम्प्रचिच्छिदे ॥ १३ ॥
तदनन्तर उससे निकले हुए सहस्रों तीखे शूल आदि शस्त्रोंको एकचक्र दैत्यने अपने महान् अस्त्रबलसे काट डाला॥

छित्त्वा शूलेन तान् सर्वानैकचक्रो महासुरः ।
अभ्यविध्यत तं साध्यं दशभिर्निशितैः शरैः ॥ १४ ॥
उस महान् असुर एकचक्रने शूलसे उन सब अस्त्रोंको छिन्न-भिन्न करके साध्यदेवता रणाजिको दस पैने बाणोंसे अच्छी तरह घायल किया ॥ १४ ॥

अस्त्रवेगं निहत्यैवं सोऽस्त्रैस्तांस्तनुसैनिकान् ।
ज्वलितैरपरैः शीघ्रैस्तानविध्यत् सहस्रशः ॥ १५ ॥
उस दैत्यने अपने अस्त्रोंसे साध्यदेवताके अस्त्रवेगका इस प्रकार निवारण करके उनके पीछे चलनेवाले सहस्रों सैनिकोंको दूसरे शीघ्रगामी प्रज्वलित अस्त्रोंद्वारा बींध डाला ॥ १५ ॥

तेषां छिन्नानि गात्राणि विसृजन्ति स्म शोणितम् ।
प्रावृषीवाम्बुवृष्टीनि शृङ्गाणि धरणीभृताम् ॥ १६ ॥
उन सैनिकोंके छिदे हुए अङ्ग वर्षाकालमें जलकी वृष्टि करनेवाले पर्वतोंके शिखरोंकी भाँति रक्त बहा रहे थे ॥१६॥

इन्द्राशनिसमस्पर्शैर्निपतद्भिरजिह्मगैः ।
दितिजैर्वध्यमानास्ते वित्रेसुः सुरसत्तमाः ॥ १७ ॥
जिनका स्पर्श इन्द्रके वज्रकी भाँति दुःसह था, उन सीधे जानेवाले बाणोंके प्रहारसे दैत्योंद्वारा पीड़ित किये गये वे श्रेष्ठ देवता अत्यन्त भयभीत हो गये ॥ १७ ॥

एकचक्रो रथे तिष्ठन्नपश्यद् गजयूथपान् ।
वराभरणनिर्ह्रादान् समुद्रस्वननिःस्वनान् ॥ १८ ॥
मत्तान् सुविहितान् दृप्तान् महामात्रैरधिष्ठितान् ।
कुलीनान् वीर्यसम्पन्नान् प्रतिद्विरदघातिनः ॥ १९ ॥
शिक्षितान् गजशिक्षायामैरावतसमान् युधि ।
न्यहनत् सुरसैन्यस्य गजान् गज इवासुरः ॥ २० ॥
एकचक्रने रथमें बैठे हुए ही देखा कि देवताओंके गजयूथपति चले आ रहे हैं, उनके श्रेष्ठ आभूषणोंकी झंकार सुनायी पड़ती है। उनके चिग्घाड़नेका शब्द समुद्रकी गर्जनाको लज्जित करता है। वे मतवाले और बलाभिमानी गजराज अच्छी तरह सजाये गये हैं; उनके ऊपर महावत बैठे हैं। वे उत्तम कुलमें उत्पन्न तथा बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं और प्रतिद्वन्द्वी हाथियोंको मार डालनेकी शक्ति रखते हैं। गज-शिक्षामें पूर्णतः शिक्षित हैं तथा युद्धमें ऐरावतके समान पराक्रमी हैं। तब उसने गजासुरके समान देवसेनाके उन हाथियोंको मार डाला ॥ १८–२० ॥

विक्षरन्तो महानागान् भीमवेगांस्त्रिधा मदम् ।
मेघस्तनितनिर्घोषान् महाद्रीनिव चोदितान् ॥ २१ ॥
वे सब विशालकाय हाथी कण्ठ, सूँड और कुम्भस्थल—इन तीन स्थानोंसे मद बहा रहे थे; उनका वेग बड़ा भयंकर था। वे मेघकी गर्जनाके समान चिग्घाड़ते थे और खड़े विशाल पर्वतोंके समान प्रतीत होते थे ॥ २१ ॥

सहस्रसम्मितान् दिव्याञ्जाम्बूनदपरिष्कृतान् ।
सुवर्णजालैर्विततांस्तरुणादित्यवर्चसः ॥ २२ ॥
उन दिव्य हाथियोंकी संख्या लगभग एक सहस्र थी। वे सब-के-सब सुवर्णके अलंकारोंसे विभूषित थे। उनपर सोनेकी