विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 951, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ९२७
जालियोंसे युक्त झूलें पड़ी हुई थीं तथा वे प्रातःकालके सूर्यके समान दीप्तिमान् दिखायी देते थे ॥ २२ ॥
एकचक्रो गदापाणिर्बलवान् गदिनां वरः।
उत्सारयामास गजान् महाभ्राणीव मारुतः ॥ २३ ॥
हाथमें गदा लिये गदाधारियोंमें श्रेष्ठ बलवान् एकचक्रने उन समस्त गजराजोंका उसी प्रकार संहार कर डाला, जैसे वायु महान् मेघोंको छिन्न-भिन्न कर देती है ॥ २३ ॥
निहत्य गदया सर्वांस्तान् गजान् गजमर्दनः।
भूयोऽश्वसंघान् स बली निरैक्षत महासुरः ॥ २४ ॥
गजॉंका मर्दन करनेवाले उस महान् बलवान् असुरने अपनी गदाके द्वारा उन समस्त हाथियोंको मौतके घाट उतारकर पुनः अश्वसमूहोंपर दृष्टिपात किया ॥ २४ ॥
शुकवर्णानृष्यवर्णान् मयूरसदृशांस्तथा।
पारावतसवणांश्च हंसवर्णांस्तथैव च ॥ २५ ॥
कुछ घोड़ोंके रंग तोतोंके समान हरे थे; कुछ मृगके समान धूसर वर्णवाले थे। कितने ही घोड़ोंके रंग मोरोंके समान थे; कितने ही कबूतरों और हंसोंके समान वर्णसे विभूषित थे ॥ २५ ॥
मल्लिकाक्षान् विरूपाक्षान् क्रौञ्चवर्णान् मनोजवान्।
अश्वसैन्यं महाबाहुस्तदप्रतिमपौरुषः।
निष्पेदयामास बली गदया भीमविक्रमः ॥ २६ ॥
किन्हींकी आँखें मल्लिकाके समान थीं और किन्हींकी विरूप । कुछ घोड़ोंके वर्ण क्रौञ्च पक्षीके समान थे। वे सभी मनके समान वेगशाली थे। अनुपम पुरुषार्थ और भयंकर पराक्रमसे युक्त बलवान् महाबाहु एकचक्रने पूर्वोक्त अश्वोंकी सेनाको अपनी गदाके आघातसे नष्ट कर दिया ॥ २६ ॥
रणाजिर्व्यस्य समरे सर्वान् दृष्ट्वा सुरद्विपः।
अचिन्त्यविक्रमः श्रीमान् स युद्धाद् विरराम ह ॥ २७ ॥
अचिन्त्यपराक्रमी श्रीमान् रणाजि उस समरमें समस्त देवद्रोहियोंको उपस्थित देख उन सबको त्यागकर युद्धसे विरत हो गये ॥ २७ ॥
गदायुद्धेषु कुशलो रथेन रथयूथपः।
नष्टसैन्यो महाबाहुः प्रस्थितः शक्रसंनिधौ ॥ २८ ॥
गदायुद्धमें कुशल तथा रथ-यूथपति महाबाहु रणाजि, जिनकी सेना प्रायः नष्ट हो गयी थी, रथके द्वारा इन्द्रके समीप चले गये ॥ २८ ॥
त्रिंशच्छतसहस्राणि रथानां विनिहत्य सः।
रणेऽतिष्ठत दैत्येन्द्रो विधूम इव पावकः ॥ २९ ॥
दैत्यराज एकचक्र वहाँ तीस लाख रथियोंका संहार करके रणभूमिमें धूमरहित अग्निके समान स्थित हो गया ॥ २९ ॥
तस्मिन्नेव तु संग्रामे बलो दृप्तो महासुरः।
मृगव्याधं महात्मानं योधयत्यजितं रणे ॥ ३० ॥
उसी युद्धमें महान् असुर बल, जिसे अपने बलपर घमंड था, अपराजित महात्मा मृगव्याध (रुद्र) के साथ युद्ध करने लगा ॥ ३० ॥
मृगव्याधस्य रुद्रस्य महापारिषदस्तथा।
समुत्पेतुर्बलं दृष्ट्वा हुताग्निसमतेजसः ॥ ३१ ॥
मृगव्याध नामक रुद्रदेवके महान् पार्षद घीकी आहुति पाकर प्रज्वलित हुए अग्निके समान तेजस्वी थे। वे बलको देखते ही वहाँ उछलते-कूदते हुए आ पहुँचे ॥ ३१ ॥
गजैर्मत्तै रथैर्दिव्यैर्वाजिभिश्च महाजवैः।
अस्त्रैश्च निशितैर्बाणैः शरैश्चानलसंनिभैः ॥ ३२ ॥
कुछ पार्षद मतवाले हाथियोंसे, कुछ दिव्य रथोंसे और कुछ महान् वेगशाली घोड़ोंसे आये। वे सब-के-सब अग्निके समान तेजस्वी, तीखे अस्त्र एवं बाणोंसे सम्पन्न थे ॥ ३२ ॥
ददृशुस्ते ततो वीरा दीप्यमानं महासुरम् ।
रश्मिवन्तमिवोद्यन्तं सुतेजोरश्मिमालिनम् ॥ ३३ ॥
तत्पश्चात् उन वीरोंने उस महान् असुरको उगते हुए सूर्यके समान तेजोमयी किरणमालाओंसे अलंकृत एवं देदीप्यमान देखा ॥ ३३ ॥
संग्रामस्थं महावेगं महासत्त्वं महाबलम्।
महामतिं महोत्साहं महाकायं महारथम् ॥ ३४ ॥
समीक्ष्य तं महायोधं दिक्षु सर्वासववस्थितम् ।
ततः प्रहरजैर्घोरैरभिपेतूः समन्ततः ॥ ३५ ॥
युद्धस्थलमें खड़े हुए उस महान् वेग, महान् सत्त्व, महान् बल, महती बुद्धि, महान् उत्साह और विशाल कायासे सम्पन्न महारथी महायोद्धाको सम्पूर्ण दिशाओंमें अवस्थित देख वे रुद्रपार्षद घोर अस्त्र-शस्त्र लिये चारों ओरसे उसपर टूट पड़े ॥ ३४-३५ ॥
तस्य सर्वांयसास्तीक्ष्णाः शराः पीतमुखाः शिताः।
शिरस्यद्रिप्रतीकाशे मृगव्याधेन पातिताः ॥ ३६ ॥
मृगव्याधने उसके पर्वत-सदृश मस्तकपर पूर्णतः लोहेके बने हुए तीखे और तेज धारवाले बाण बरसाये। जिनके मुख (धार) पर पानी चढ़ाया गया था ॥ ३६ ॥
तैश्च सप्तभिराविद्धः शरैः शिरसि चार्पितैः।
उत्पपात तदा व्योम्नि दिशो दश विनादयन् ॥ ३७॥
मृगव्याधके वे सात बाण उसके सिरमें धँस गये। उन बाणोंसे आविद्ध होकर महान् असुर बल अपने चीत्कारसे दसों दिशाओंको निनादित करता हुआ आकाशमें उड़ गया ॥३७॥
ततस्तं त्रिदशो वीरः सरथः सज्जकार्मुकः।
अनुवव्राज संहृष्टः खे तदा स महाबलः ॥ ३८ ॥
तब उन देववीर महाबली मृगव्याधने रथ और धनुष-सहित बड़े हर्षके साथ आकाशमें उस समय उस दानवका पीछा किया ॥ ३८ ॥
असुरं छादयामास तं व्योम्नि शरवृष्टिभिः।
वृष्टिमानिव जीमूतो निदाघान्ते धराधरम् ॥ ३९ ॥