विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 952, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९२८ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
जैसे वर्षाकालमें पानी बरसानेके लिये उद्यत हुआ मेघ पर्वतको अपनी जलधाराओंसे ढक देता है, उसी प्रकार मृगव्याधने आकाशमें अपने बाणोंकी वर्षासे उस असुरको आच्छादित कर दिया ॥ ३९ ॥
अर्द्यमानस्ततस्तेन मृगव्याधेन दानवः।
चकार निनदं घोरमम्बरे जलदो यथा ॥ ४० ॥
मृगव्याधसे पीड़ित किये जानेपर उस दानवने आकाशमें ही मेघकी भाँति घोर गर्जना की ॥ ४० ॥
स दूरं सहसोत्पत्य मृगव्याधरथं प्रति।
निपपात महावेगः पक्षवातैर्गिरिर्यथा ॥ ४१ ॥
तदनन्तर वह महान् वेगशाली दानव सहसा दूरतक उछलकर मृगव्याधके रथपर पाँखोंकी हवासे युक्त पर्वतकी भाँति कूद पड़ा ॥ ४१ ॥
बभञ्ज च ततो दैत्यो भग्नेषाकूवरं रथम्।
मृगव्याधः परित्यज्य स्थितो भूमौ महाबलः ॥ ४२ ॥
ऐसा करके उस दैत्यने उस रथके ईषादण्ड और कूबरको तोड़ दिया तथा उस रथको भी चौपट कर दिया। महाबली मृगव्याध वह रथ त्यागकर पृथ्वीपर खड़े हो गये ॥
विरथं प्रेक्ष्य रुद्रं तु तस्य पारिषदाः शुभाः।
उत्थिता घोररक्ताक्षा व्योम्नि मुद्गरपाणयः ॥ ४३ ॥
रुद्रको रथहीन हुआ देख उनके शुभ पार्षद आकाशमें मुद्गर लिये खड़े हो गये। उनकी भयंकर आँखें क्रोधसे लाल हो रही थीं ॥ ४३ ॥
स तु तैः सहसोत्थाय वेष्टितो विमलेऽम्बरे।
मुद्गरैरर्दितो भीमैर्वृक्षः परशुभिर्यथा ॥ ४४ ॥
उन सबने सहसा ऊपर उठकर निर्मल आकाशमें वलासुरको घेर लिया और जैसे फरसोंसे वृक्ष काटा जाता है, उसी प्रकार भयंकर मुद्गरोंसे उसे पीड़ित करना आरम्भ किया ॥
तेषां वेगवतां वेगं निहत्य स महारथः।
निपपात पुनर्भूभौ सुपर्णसमविक्रमः ॥ ४५ ॥
परंतु वह महारथी बल गरुड़के समान पराक्रमी था। वह उन वेगवानोंका वेग नष्ट करके पुनः पृथ्वीपर कूद पड़ा ॥
स शालवृक्षमुत्पाट्य महाशाखं महाबलः।
सर्वान् पारिषदान् संख्ये सूदयामास दानवः ॥ ४६ ॥
वहाँ विशाल शाखावाले एक शाल वृक्षको उखाड़कर उस महाबली दानवने युद्धस्थलमें उन समस्त पार्षदोंपर उसका प्रहार किया ॥ ४६ ॥
स तैर्विशतदेहस्तु रुधिरौघपरिप्लुतः।
शुशुभे दानवश्रेष्ठो बालसूर्य इवोदितः ॥ ४७ ॥
उन पार्षदोंने बलके शरीरको क्षत-विक्षत कर दिया था, अतः खूनसे लथपथ हुआ दानवशिरोमणि बल उगे हुए बालसूर्यके समान शोभा पाने लगा ॥ ४७ ॥
अथोत्पाट्य गिरेः शृङ्गं समृगव्यालपादपम्।
जघान तान् पारिषदान् समरे दानवेश्वरः ॥ ४८ ॥
तदनन्तर मृगों, सर्पों और वृक्षोंसहित एक पर्वतशिखरको उखाड़कर दानवराज बलने समराङ्गणमें उन पार्षदोंपर आघात किया ॥ ४८ ॥
ततस्तेषु च भग्नेषु महापारिषदेषु वै।
बलं तदवशेषं तु नाशयामास वीर्यवान् ॥ ४९ ॥
तत्पश्चात् उन महान् पार्षदोंके व्यूह टूट जानेपर उस पराक्रमी असुरने शेष सेनाका नाश कर दिया ॥ ४९ ॥
अश्वैरश्वान् गजैर्नागान् योधान् योधै रथैन् रथैः।
दानवः सूदयामास युगान्तेऽन्तकवत् प्रजाः ॥ ५० ॥
जैसे प्रलयकालमें संवर्तक यम सारी प्रजाका संहार कर डालते हैं, उसी प्रकार उस दानवने घोड़ोंसे घोड़ोंको, हाथियोंसे हाथियोंको, पैदल योद्धाओंसे पैदल योद्धाओंको तथा रथोंसे रथोंको नष्ट कर दिया ॥ ५० ॥
हतैरश्वैश्च नागैश्च भग्नाक्षैश्च महारथैः।
त्रिदशैश्चाभवद् भूमी रुद्धमार्गा समन्ततः ॥ ५१ ॥
वहाँ मारे गये घोड़ों, हाथियों, टूटे धुरेवाले विशाल रथों और देवताओंसे वहाँकी भूमिका मार्ग सब ओरसे अवरुद्ध हो गया था ॥ ५१ ॥
एवं बलः स दैत्येन्द्रो मृगव्याधश्च वीर्यवान्।
युधि प्रवृद्धौ बलिनौ प्रभिन्नाविव वारणौ ॥ ५२ ॥
इस प्रकार दैत्यराज बल और पराक्रमी मृगव्याध दोनों बलवान् वीर मदकी धारा बहानेवाले हाथियोंके समान युद्धमें बढ़े-चढ़े थे ॥ ५२ ॥
वैशम्पायन उवाच
तत्रैव युध्यते रुद्रो द्वितीयो राहुणा सह।
विश्रुतस्त्रिषु लोकेषु क्रोधात्मा ह्यज एकपात् ॥ ५३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! वहीं तीनो लोकोंमें प्रसिद्ध क्रोधात्मा अजैकपात् नामक द्वितीय रुद्र राहुके साथ युद्ध करते थे ॥ ५३ ॥
तद् यथा सुमहद् युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम्।
आसीत् प्रतिभयं रौद्रं वीराणां जयमिच्छताम् ॥ ५४ ॥
विजयकी इच्छा रखनेवाले वीरोंका वह महान् युद्ध तुमुल, रोमाञ्चकारी, भयानक तथा रौद्ररूप था ॥ ५४ ॥
देवदानवदेहैस्तु दुस्तरा केशशाद्वला।
शरीरसंघातवहा प्रसुता लोहितापगा ॥ ५५ ॥
देवताओं और दानवोंके शरीरोंसे वहाँ खूनकी एक दुस्तर नदी बह चली, जो विभिन्न शरीरसमूहोंको बहाये लिये जाती थी। मनुष्योंके केश उसमें घास और सेवारके समान जान पड़ते थे ॥ ५५ ॥
आजघानाथ संक्रुद्धो रुद्रो रौद्राकृतिः प्रभुः।
राहुं शतमुखं युद्धे शत्रुसैन्यनिवारणम् ॥ ५६ ॥