भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 953

भविष्यपर्व ] अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ९२९

प्रभावशाली रुद्रदेवकी आकृति बड़ी ही रौद्र थी। उन्होंने कुपित होकर युद्धमें शत्रुसेनाका निवारण करनेवाले शतमुख राहुपर गहरा आघात किया ॥ ५६ ॥
तस्य काञ्चनचित्राङ्गं रथं साश्वं ससारथिम् ।
जघान समरे श्रीमान् क्रुद्धो दैत्यस्य सायकैः ॥ ५७ ॥
क्रोधमें भरे हुए श्रीमान् रुद्रदेवने समरभूमिमें अपने सायकोंद्वारा उस दैत्यके सुवर्णमय विचित्र अङ्गवाले रथको घोड़ों और सारथिसहित नष्ट कर दिया ॥ ५७ ॥
तस्य पारिषदस्त्वेकः शरशक्त्या महाबलः ।
बिभेद समरे हृष्टो दानवं तं स्तनान्तरे ॥ ५८ ॥
उनके हर्ष और उत्साहमें भरे हुए एक महाबली पार्षदने समरमें बाणोंकी शक्तिसे उस दानवकी छातीमें घाव कर दिया ॥ ५८ ॥
स भिन्नगात्रो रुद्रेण तथा पारिषदैरपि ।
रुद्रस्य रथमायान्तं स राहुर्दानवोत्तमः ॥ ५९ ॥
प्रममाथ तलेनाशु सहसा क्रोधमूर्च्छितः ।
भिन्नगात्रं शरैस्तीक्ष्णैर्मेरुं सूर्य इवांशुभिः ॥ ६० ॥
रुद्र तथा उनके पार्षदोंसे शरीरके क्षत-विक्षत कर दिये जानेपर दानवशिरोमणि राहु सहसा क्रोधसे मूर्च्छित हो गया। उसने रुद्रदेवके आते हुए रथको शीघ्रतापूर्वक थप्पड़से मारकर चूर-चूर कर डाला। जैसे सूर्य अपनी तीखी किरणोंसे मेरु-पर्वतको संतप्त करते हैं; उसी प्रकार वह दानव घायल अङ्गोंवाले रुद्रदेवको अपने तीखे बाणोंसे पीड़ा देने लगा ॥
हतैर्दानवमुख्यैस्तु रुद्रेणामिततेजसा ।
रुद्रपारिषदान् सर्वान् निजघान महासुरः ॥ ६१ ॥
जब अमिततेजस्वी रुद्रदेवके द्वारा मुख्य-मुख्य दानव मारे गये, तब महान् असुर राहुने रुद्रदेवके समस्त पार्षदोंको भी मारना आरम्भ किया ॥ ६१ ॥
सृजन्तं शरवर्षाणि दानवं घोरदर्शनम् ।
बिभेद समरे रुद्रो बाणैः संततपर्वभिः ॥ ६२ ॥
बाणोंकी वर्षा करते हुए उस घोर दृष्टिवाले दानवको रुद्रदेवने युद्धस्थलमें झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा घायल कर दिया ॥ ६२ ॥
वर्तमाने महाघोरे संग्रामे लोमहर्षणे ।
रुधिरौघा महावेगा महानद्यः प्रसुस्रुवुः ॥ ६३ ॥
उस रोमाञ्चकारी महाघोर संग्रामके होते समय वहाँ रक्तके प्रवाहसे युक्त महावेगशालिनी बड़ी-बड़ी नदियाँ बहने लगीं ॥ ६३ ॥
दानवं समरे रुद्रो नीलाञ्जनचयोपमम् ।
निर्बिभेद शरैस्तीक्ष्णैर्मेरुं सूर्य इवांशुभिः ॥ ६४ ॥
रुद्रदेवने समरभूमिमें काले कोयलेकी राशिके 'समान कान्तिवाले दानव राहुको अपने तीखे बाणोंसे उसी प्रकार क्षत-विक्षत कर दिया, जैसे सूर्य अपनी प्रखर किरणोंसे मेरु पर्वतको संतप्त करते हैं ॥ ६४ ॥
हतैर्दानवमुख्यैश्च शक्तिशूलपरश्वधैः ।
पतितैः पर्वताभैश्च दानवैः कामरूपिभिः ॥ ६५ ॥
वर्तमाने महाघोरे संग्रामे लोमहर्षणे ।
विरेजुस्ते तदा दैत्याः पुष्पिता इव किंशुकाः ॥ ६६ ॥
शक्ति, शूल और फरसोंकी मारसे जब इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले पर्वताकार मुख्य-मुख्य दानव मरकर धरा-शायी हो गये और वह महाघोर रोमाञ्चकारी संग्राम चालू ही रह गया, तब उसमें घायल हुए दैत्य फूले हुए पलास वृक्षके समान शोभा पाने लगे ॥ ६५-६६ ॥
महाभेरीमृदङ्गानां पणवानां च निःस्वनः ।
शङ्खवेणुस्वनोन्मिश्रः सम्बभूवाद्भुतोपमः ॥ ६७ ॥
उस समय महाभेरी, मृदङ्ग तथा पणवोंका गम्भीर नाद जब शङ्ख और वेणुकी ध्वनिसे मिल गया, तब अद्भुत-सा ही प्रतीत होने लगा ॥ ६७ ॥
हतानां स्वनतां तत्र दैत्यानां चापि निःस्वनः ।
देवानां च तथा तत्र शुश्रुवे दारुणो महान् ॥ ६८ ॥
वहाँ आहत होकर आर्तनाद करते हुए दैत्यों तथा देवताओंका अत्यन्त दारुण शब्द सुनायी दे रहा था ॥ ६८ ॥
तुरङ्गमखुरोत्कीर्णं रथनेमिसमुत्थितम् ।
रुरोध मार्गं योधानां चक्षूंषि च धरारजः ॥ ६९ ॥
घोड़ोंके टापों तथा रथके पहियोंसे उठी हुई धरतीकी धूलने वहाँ जूझते हुए योद्धाओंके मार्ग तथा नेत्रोंको अवरुद्ध कर दिया ॥ ६९ ॥
शस्त्रपुष्पोपहारा सा तत्रासीद् युद्धमेदिनी ।
दुर्दशा दुर्विगाह्या च मांसशोणितकर्दमा ॥ ७० ॥
वहाँ रणभूमिको अस्त्र शस्त्ररूपी पुष्पोंका उपहार अर्पित हो रहा था। उसमें मांस और रक्तकी ऐसी कीच जम गयी थी कि उसकी ओर देखना कठिन हो गया था और उसमें प्रवेश करना या चलना-फिरना तो और भी कठिन था ॥७०॥
भग्नैः खड्गैर्गदाभिश्च शक्तितोमरपट्टिशैः ।
अपविद्धैश्च भग्नैश्च रथैः सांग्रामिकैर्हतैः ॥ ७१ ॥
निहतैः कुञ्जरैर्मत्तैस्तथा त्रिदशदानवैः ।
चक्राक्षयुगशङ्खैश्च भग्नैरवनिपातितैः ॥ ७२ ॥
बभूवायोधनं घोरं पिशिताशनसंकुलम् ।
उत्पेतुश्च पयन्ध्वानि दिक्षु सर्वासु संयुगे ॥ ७३ ॥
टूटी हुई तलवारों, गदाओं, शक्ति, तोमर और पट्टिशों, टूटे-फूटे होनेके कारण फेंके गये रथों, नष्ट हुए युद्धसम्बन्धी उपकरणों, मारे गये मतवाले हाथियों तथा देवताओं और दानवों, खण्डित होकर पृथ्वीपर पड़े हुए पहियों, धुरों, जूओं और शंखोंसे भरा हुआ वह भयंकर युद्धक्षेत्र मांसाहारी

मं० १० ४. १७० -