भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 954

९३० | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे


जन्तुओंसे व्याप्त हो रहा था। उस समराङ्गणमें चारों ओर कबन्ध (बिना सिरके धड़) उछल रहे थे ॥ ७१-७३॥

अन्योन्यबद्धवैराणां दैत्यानां जयगृद्धिनाम्।
सम्पहारस्तथा युद्धे वर्ततेऽतिभयंकरः ॥ ७४ ॥

विजयकी अभिलाषा रखनेवाले देवता और दैत्य परस्पर वैर बाँधकर लड़ते थे। उस युद्धमें एक दूसरेके प्रति होनेवाला उनका प्रहार बड़ा भयंकर था ॥ ७४ ॥

सैन्यानां संप्रयुद्धानां शूराणामनिवर्तिनाम् ।
अजस्य चैकपादस्य राहोश्चैव महात्मनः ॥ ७५ ॥
तेषां तु तत्र पततां क्रुद्धानामतिनिःस्वनः।
उद्धतं इव भूतानां समुद्राणां तु शुश्रुवे ॥ ७६ ॥

उस युद्धमें सम्मिलित हुए शूरवीर सैनिक पीछे हटनेवाले नहीं थे। महात्मा अजैकपाद तथा महामनस्वी राहुकी भी यही स्थिति थी। वे सब क्रोधमें भरकर जब वहाँ एक दूसरेपर आक्रमण करते थे, उस समय उनका अत्यन्त घोर कोलाहल प्रलयकालमें प्राणियोंके भीषण आर्तनाद तथा समुद्रोंके महान् गर्जनकी भाँति सुनायी पड़ता था ॥७५-७६॥

तत्रैकस्तु सुधूम्राक्षः श्रीमान् रुद्रो मुनीश्वरः।
बिभेद केशिनं शक्त्या गदापरिघशूलभृत् ॥ ७७ ॥

वहाँ एक तेजस्वी रुद्र सुधूम्राक्ष नामसे प्रसिद्ध एवं मुनीश्वर थे। वे शक्तिके साथ ही गदा, परिघ और शूल धारण करते थे। उन्होंने शक्तिके द्वारा केशीको घायल कर दिया ॥ ७७ ॥

नानाप्रहरणा घोरा भीमाक्षा भीमविक्रमाः ।
निष्पेतु रुद्रदयिता महापारिपदास्तथा ॥ ७८ ॥

उस समय नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण करनेवाले, भयानक नेत्रवाले, भयंकर पराक्रमी तथा रुद्रदेवके प्रिय घोर महापार्षद वहाँ आ पहुँचे ॥ ७८ ॥

रथमास्थाय च श्रीमांस्तप्तकाञ्चनकुण्डलः ।
दानवैः संवृतः केशी युध्यते युद्धदुर्जयः ॥ ७९ ॥

केशी नामक दैत्य तपाये हुए सुवर्णके कुण्डलोंसे अलंकृत और उत्तम शोभासे सम्पन्न था। वह रणदुर्जय दानवोंसे घिरा हुआ रथपर आरूढ़ होकर युद्ध करता था ॥ ७९ ॥

तस्य संग्रामशौण्डस्य संग्रामेषु युयुत्सतः ।
निपेतुरुग्रवीर्यस्य ज्वाला हि प्रस्रुता मुखात् ॥ ८० ॥

वह संग्राममें कुशल और उग्र बल-पराक्रमसे सम्पन्न था। जिस समय वह युद्धमें प्रवृत्त होता था, उस समय उसके मुखसे ज्वालाएँ प्रकट होकर फैलने लगती थीं ॥ ८० ॥

स तु सिंहर्षभस्कन्धः शार्दूलसमविक्रमः ।
महाजलदसंकाशो मृदङ्गध्वनिनिःस्वनः ॥ ८१ ॥

उसके कंधे सिंह और बैलोंके समान थे। उसका पराक्रम भी सिंहके ही समान था। उसका सिंहनाद महामेघोंकी गम्भीर गर्जना और मृदङ्गोंकी ध्वनिके समान होता था ॥

तस्य निष्पतमानस्य दानवैः संवृतस्य च।
बभूव सुमहानादः क्षोभयंस्त्रिदिवं यथा ॥ ८२॥

दानवोंसे घिरा हुआ वह दैत्य जब युद्धभूमिमें कूदा था, उस समय जो उसका महान् सिंहनाद हुआ, वह स्वर्गलोकको क्षोभमें डालनेवाला था ॥ ८२ ॥

तेन शब्देन वित्रस्ता त्रिदशानां महाचमूः।
द्रुमशैलप्रहरणा योद्धुमेवाभ्यवर्तत ॥ ८३ ॥

उसकी उस गर्जनासे देवताओंकी विशाल सेना संत्रस्त हो उठी तो भी वृक्षों तथा पर्वतखण्डोंका प्रहार करती हुई युद्ध करनेके लिये ही सामने आकर डट गयी ॥ ८३ ॥

तेषां च देवदैत्यानां युयुत्सूनां परस्परम्।
संनिपातः सुतुमुलों रौद्रो लोकभयावहः ॥ ८४ ॥

परस्पर जूझनेकी इच्छावाले देवताओं और दैत्योंका वह घमासान युद्ध बड़ा ही रौद्र तथा जगत्‌को भय देनेवाला था ॥

तेषां युद्धं महाघोरं संजज्ञे लोमहर्षणम् ।
देवदानवसंघानां प्राणांस्त्यक्त्वा महाहवे ॥ ८५ ॥

देवताओं और दानवोंके समुदायोंका वह महाघोर युद्ध प्राणोंका मोह छोड़कर हो रहा था । उस महासमरमें उस युद्धका वह दृश्य बड़ा ही रोमाञ्चकारी था ॥ ८५ ॥

सर्वे ह्यतिबलाः शूराः सर्वे पर्वतसंनिभाः ।
सर्वे सर्वास्त्रविद्वांसः सर्वे सर्वायुधोद्यताः ।
त्रिदशा दानवाश्चैव परस्परजिघांसवः ॥ ८६ ॥

वे सभी शूरवीर, अत्यन्त बलशाली तथा पर्वतके समान विशालकाय थे। सभी सम्पूर्ण अस्त्रोंके विद्वान् थे और सभी सब प्रकारके अस्त्रोंसे सम्पन्न हो युद्धके लिये उद्यत हुए थे। वे देवता और दानव दोनों ही एक दूसरेके वधकी इच्छा रखते थे ॥ ८६ ॥

तेषां वै नदतां शब्दः संयुगे मेघनिःस्वनः ।
शुश्रुवेऽतिमहाघोरश्चरस्थावरकम्पनः ॥ ८७ ॥

युद्धस्थलमें गर्जना करते हुए उन समस्त योद्धाओंका शब्द महान् मेघोंकी गर्जनाके समान सुनायी पड़ता था। वह महाघोर शब्द स्थावर-जङ्गम सभी प्राणियोंको कम्पित कर देनेवाला था ॥ ८७ ॥

रेणुश्चारुणसंकाशो भीमः स समपद्यत ।
उद्धूतो देवदैत्यौघैः संरुरोध दिशो दश ॥ ८८ ॥

देवताओं और दैत्योंके समूहोंद्वारा उड़ायी गयी लाल रंगकी धूल वहाँ सब ओर फैल गयी। वह बड़ी भयंकर जान पड़ती थी। उसने दसों दिशाओंको अवरुद्ध कर दिया ॥८८॥

अन्योन्यं रजसा तेन कौशेयारुणपाण्डुना ।
संवृता बहुरूपेण ददृशुर्न च किंचन ॥ ८९ ॥

लाल, पीली और सफेद बहुरंगी धूलसे परस्पर आच्छादित हुए सैनिक कोई भी वस्तु नहीं देख पाते थे ॥ ८९ ॥