भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 955

भविष्यपर्व ] एकोनषष्टितमोऽध्यायः [ ९३१


न ध्वजो न पताकाश्च न वर्म तुरगोऽपि वा।
आयुधं स्यन्दनो वापि दृश्यते नैव सारथिः॥ ९०॥
उस समय न ध्वजा दिखायी देती थी न पताका, न कवच सूझता था न घोड़ा। अस्त्र-शस्त्र, रथ अथवा सारथि कोई भी दृष्टिगोचर नहीं होता था ॥ ९० ॥

स शब्दस्तुमुलस्तेषामन्योन्यमभिधावताम् ।
श्रूयते तुमुलः शब्दो न रूपाणि चकाशिरे ॥ ९१॥
एक दूसरेके सम्मुख धावा करनेवाले उन योद्धाओंका भयंकर शब्द सब ओर गूँजने लगा। उनका वह तुमुलनाद तो सुनायी देता था, किंतु धूलके कारण किसीके रूप नहीं सूझते थे ॥ ९१ ॥

दानवास्तत्र संक्रुद्धा दानवानेव जघ्निरे।
त्रिदशास्त्रिदशांश्चैव निजघ्नुस्तुमुले तदा ॥ ९२ ॥
वहाँ उस तुमुल युद्धमें क्रोधमें भरे हुए दानव दानवोंपर ही प्रहार कर बैठे तथा देवता देवताओंको ही मारने लगे ॥

ते परांश्च विनिघ्नन्तः स्वांश्च युद्धे महासुरान्।
रुधिरार्द्रां तथा चक्रुर्मेदिनीमसुराः सुराः ॥ ९३ ॥
वे देवता और असुर उस युद्धमें शत्रुपक्षके तथा अपने पक्षके भी बड़े-बड़े देवताओं और असुरोंका संहार करने लगे। उन दोनों पक्षोंके योद्धाओंने पृथ्वीको रक्तसे गीली कर दिया ॥ ९३ ॥

ततस्तु रुधिरौघेण संसिकमुदितं रजः।
शरीरशतसंकीर्णं बभूव धरणीतलम् ॥ ९४ ॥
तदनन्तर वह उड़ती हुई धूल रक्तके प्रवाहसे भी भींग-कर बैठ गयी, वहाँका धरातल सैकड़ों लाशोंसे व्याप्त हो रहा था ॥ ९४ ॥

शूलशक्तिगदाखड्गपरिघप्रासतोमरैः ।
त्रिदशा दानवाश्चैव जघ्नुरन्योन्यमाहवे ॥ ९५ ॥
देवता और दानव युद्धमें परस्पर शूल, शक्ति, गदा, खड्ग, परिघ, प्रास और तोमरोंद्वारा प्रहार करते थे ॥ ९५ ॥

बाहुभिः परिघाकारैर्निघ्नन्तः परिघैस्तथा ।
रुद्रपारिषदान् सर्वान् सूदयन्ति स्म दानवाः ॥ ९६ ॥
परिघतुल्य भुजाओं तथा परिघोंसे प्रहार करनेवाले समस्त रुद्रगणोंपर दानव भी अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा आघात करते थे ॥ ९६ ॥

रुद्रपारिषदाश्चैव महाद्रुममहाश्मभिः ।
व्यदारयन्नतिक्रम्य शस्त्रैश्चादित्यसंनिभैः ॥ ९७ ॥
रुद्रके पार्षद भी बड़े-बड़े वृक्षों, विशाल प्रस्तरखण्डों तथा सूर्यतुल्य तेजस्वी शस्त्रोंद्वारा आगे बढ़कर दानवोंको विदीर्ण करने लगे ॥ ९७ ॥

एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धः केशी दानवसत्तमः।
संग्रामामर्षघोरः सन् स्वान्यनीकानि हर्षयन् ।
तेषां परमसंक्रुद्धो वज्रमस्त्रमुदीरयत् ॥ ९८ ॥
इसी बीचमें कुपित हुआ दानवशिरोमणि केशी संग्राममें अमर्षके कारण घोर रूप धारण करके अपने सैनिकोंका हर्ष बढ़ाने लगा। उसने अत्यन्त क्रुद्ध होकर उन रुद्रपार्षदोंपर वज्रास्त्रका प्रयोग किया ॥ ९८ ॥

वज्रेणास्त्रेण दिव्येन शस्त्रेण च महात्मना ।
महापारिषदाः सर्वे निहता युधि दुर्जयाः ॥ ९९ ॥
उस महामनस्वी दैत्यने दिव्य आयुध वज्रास्त्रके द्वारा समस्त महापार्षदोंको, जो युद्धमें दुर्जय थे, मार गिराया ॥ ९९ ॥

वज्रास्त्रपीडिता भ्रान्ता रुद्रपारिषदा युधि।
विप्रकीर्णद्रुमाः पेतुः शैला वज्रहता इव ॥१००॥
उस युद्धस्थलमें वज्रास्त्रसे पीड़ित हुए रुद्रपार्षद चक्कर काटने लगे और जिनके वृक्ष बिखरकर गिर पड़े थे, वज्रके मारे हुए उन पर्वतोंके समान धराशायी हो गये ॥ १०० ॥

एवं सुतुमुलं युद्धमभवल्लोमहर्षणम् ।
केशिनः सह रुद्रेण तदद्भुतमिवाभवत् ॥१०१॥
इस प्रकार केशीका रुद्रके साथ जो अत्यन्त भयंकर एवं रोमाञ्चकारी युद्ध हुआ, वह अद्भुत-सा प्रतीत होता था ॥ १०१ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे देवासुरयुद्धेकेशिरुद्रयुद्धकथने अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें देवासुरसंग्रामके भीतर केशी और रुद्रके युद्धका वर्णनविषयक अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५८ ॥


एकोनषष्टितमोऽध्यायः

वृषपर्वा और निष्कुम्भ नामक विश्वेदेवके तथा प्रह्लाद और कालके घोर युद्धका वर्णन

संस्कृतहिन्दी
वैशम्पायन उवाचवैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! दैत्यराज वृषपर्वाने अरुण-सूर्यके समान कान्तिमान् तथा अद्भुत दिखायी देनेवाले निष्कुम्भ नामक विश्वेदेवके साथ युद्ध किया॥
वृषपर्वा तु दैत्येन्द्रो विश्वमद्भुतदर्शनम्।<br>निष्कुम्भं योधयामास लोहितार्कसमद्युतिम् ॥ १ ॥