विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 956, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९३२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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क्रोधमूर्च्छितवक्त्रस्तु धुन्वन् परमकार्मुकम्।
धनूंषि प्रेक्ष्य शत्रूणां सारथिं त्वरितोऽब्रवीत् ॥ २ ॥
उसकी मुखाकृति क्रोधसे व्याप्त थी। वह अपने उत्तम धनुषको बारंबार खींच रहा था। उसने शत्रुओंके धनुषोंको देखकर तुरंत अपने सारथिसे कहा—॥ २ ॥
अत्रैव तावत् त्वरितं नय मे सारथे रथम्।
एते देवाश्च सहिता घ्नन्ति नः समरे बलम् ॥ ३ ॥
'सारथे! ये देवता एक साथ होकर समरभूमिमें हमारी सेनाका संहार करते हैं, अतः तुम मेरे रथको तुरंत पहले यहीं ले चलो ॥ ३ ॥
एतान् निहन्तुमिच्छामि समरश्लाघिनो रणे।
एतैर्हि दानवानीकं कृतच्छिद्रमिदं महत् ॥ ४ ॥
'समरभूमिमें अपने बल-पौरुषकी प्रशंसा करनेवाले इन देवताओंका मैं युद्धमें वध करना चाहता हूँ; क्योंकि इन्होंने दानवसेनामें यह विशाल छिद्र उत्पन्न कर दिया है' ॥ ४ ॥
ततः प्रजविताश्वेन रथेन रथिनां वरः।
अरीनभ्यहनत् क्रुद्धः शरजालैर्महासुरः ॥ ५ ॥
तदनन्तर वेगशाली घोड़ोंसे युक्त रथके द्वारा वहाँ उपस्थित हो रथियोंमें श्रेष्ठ महान् असुर वृषपर्वाने क्रोधपूर्वक शत्रुओंपर बाणसमूहोंद्वारा प्रहार आरम्भ किया ॥ ५ ॥
न स्थातुं देवताः शक्ताः किं पुनर्योद्धुमाहवे।
वृषपर्वपुनिर्मिन्नाः सर्व एवाभिदुद्रुवुः ॥ ६ ॥
उस समय देवता उस युद्धस्थलमें खड़े भी न रह सके, फिर युद्ध करनेकी तो बात ही क्या है? वृषपर्वाके बाणोंसे विदीर्ण होकर सब-के-सब वहाँसे भाग चले ॥ ६ ॥
तान् मृत्युवशमापन्नान् वैवस्वतवशं गतान्।
समीक्ष्य निहताञ्ज्ञातीनवतस्थे महासुरः ॥ ७ ॥
वहाँ मृत्युके वशमें पड़कर यमराजके अधीन हुए अपने मारे गये भाई-बन्धुओंको देखकर महान् असुर वृषपर्वा वहीं ठहर गया ॥ ७ ॥
दृष्ट्वा तं तत्र निष्कुम्भं सर्वे ते त्रिदशोत्तमाः।
समेत्य सहिताः सर्वे द्रुतं तं पर्यवारयन् ॥ ८ ॥
निष्कुम्भ नामक विश्वेदेवको वहाँ उपस्थित देख वे सभी देवशिरोमणि एकत्र होकर एक साथ वहाँ आये और सब-के सब तुरंत उन्हें घेरकर खड़े हो गये ॥ ८ ॥
व्यवस्थितं तु निष्कुम्भं दृष्ट्वा त्रिदशसत्तमम्।
बभूवुर्बलवन्तो वै तस्यास्त्रबलतेजसा ॥ ९ ॥
देवश्रेष्ठ निष्कुम्भको वहाँ डटा हुआ देख उनके अस्त्र-बल और तेजसे सभी देवता सबल हो गये ॥ ९ ॥
वृषपर्वा तु शैलाभं निष्कुम्भं समरे स्थितम्।
महेन्द्र इव धाराभिः शरवर्षैरवाकिरत् ॥ १० ॥
पर्वताकार निष्कुम्भको समराङ्गणमें खड़ा देख वृषपर्वा उनके ऊपर बाणोंकी वर्षा करने लगा, ठीक उसी तरह जैसे देवराज इन्द्र जलकी धाराओंसे पर्वतको आच्छादित करते हैं॥
अचिन्तयित्वा तु शराञ्शरीरे पतितान् बहून्।
स्थितश्च प्रमुखे श्रीमान् ससैन्यः स महाबलः॥ ११ ॥
अपने शरीरपर पड़े हुए उन बहुसंख्यक बाणोंकी कोई परवा न करके महाबली श्रीमान् निष्कुम्भ युद्धके मुहानेपर सेनासहित डटे रहे ॥ ११ ॥
सम्प्रेक्ष्य महातेजा वृषपर्वाणमाहवे।
अभिदुद्राव वेगेन कम्पयन्निव मेदिनीम् ॥ १२ ॥
तस्य त्वाधावमानस्य दीप्यमानस्य तेजसा।
बभूव रूपं दुर्धर्षं दीप्तस्येव विभावसोः ॥ १३ ॥
उन महातेजस्वी विश्वेदेवने युद्धक्षेत्रमें हँसकर पृथ्वीको कम्पित करते हुए-से बड़े वेगसे वृषपर्वापर आक्रमण किया। धावा करते समय वे तेजसे दीप्तिमान् हो रहे थे। उस समय उनका रूप प्रज्वलित अग्निके समान दुर्धर्ष हो रहा था॥
रथं त्यक्त्वा महातेजाः सक्रोधः समपद्यत।
वृक्षमुत्पाटयामास महातालं महोच्छ्रयम् ॥ १४ ॥
वे महातेजस्वी निष्कुम्भ रथको त्यागकर अत्यन्त कुपित हो उठे; उन्होंने एक बहुत ऊँचे और विशाल तालवृक्षको उखाड़ लिया ॥ १४ ॥
ततश्चिक्षेप तं वृक्षं निष्कुम्भो वृषपर्वणः।
तं गृहीत्वा महावृक्षं पाणिनेकेन दानवः ॥ १५ ॥
विनद्य सुमहानादं भ्रामयित्वा च वीर्यवान्।
सगजान् सगजारोहान् सरथान् रथिनस्तथा ॥ १६ ॥
जघान दानवस्तेन शाखिना त्रिदशांस्तदा।
तत्पश्चात् निष्कुम्भने वृषपर्वापर उस वृक्षको दे मारा; किंतु उस पराक्रमी दानवने एक ही हाथसे उस विशाल वृक्षको पकड़कर बड़े जोरसे सिंहनाद किया और उसे घुमाकर उसके द्वारा सवारोंसहित हाथियों, रथोंसहित रथियों एवं बहुत-से देवताओंको मार गिराया ॥ १५-१६ ½ ॥
तमन्तकमिव क्रुद्धं समरे प्राणहारिणम् ॥ १७ ॥
वृषपर्वाणमासाद्य त्रिदशा विप्रदुद्रुवुः।
समरभूमिमें कुपित हुए प्राणहारी कालके समान वृषपर्वासे पाला पड़नेपर सब देवता भाग खड़े हुए ॥ १७ ½ ॥
तमापतन्तं संक्रुद्धं त्रिदशानां भयावहम् ॥ १८ ॥
आलोक्य धन्वी निष्कुम्भश्चुक्रोध च ननाद च।
देवताओंको भय देनेवाले उस कुपित दानवको आक्रमण करते देख निष्कुम्भको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने धनुष लेकर बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ १८ ½ ॥
स तन्निशितैर्बाणैस्त्रिंशद्भिर्मर्मभेदिभिः ॥ १९ ॥
निर्विभेद महावीर्यो निष्कुम्भो दानवाधिपम्।
उन महापराक्रमी निष्कुम्भने तेज धारवाले तीस मर्मभेदी बाणोंद्वारा दानवराज वृषपर्वाको घायल कर दिया ॥ १९ ½ ॥
शरशक्तिभिरुग्राभिर्दैत्यानामधिपोऽप्यमुम् ॥ २० ॥