भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 957

भविष्यपर्व ] एकोनषष्टितमोऽध्यायः ९१३


विद्धः स रणमध्यस्थो रुधिरं प्रास्रवद् बहु।
तब दैत्यराज वृषपर्वाने भी भयंकर बाणों और शक्तियों-द्वारा निष्कुम्भको घायल कर दिया। घायल होनेपर वे रणभूमिमें खड़े-खड़े बहुत रक्त बहाने लगे ॥ २०½ ॥

उद्विग्ना मुक्तकेशास्ते भग्नदर्पाः पराजिताः ॥ २१ ॥
श्वसन्तो दुद्रुवुः सर्वे भयाद् वै वृषपर्वणः।
फिर तो वृषपर्वाके भयसे उद्विग्न हो केश खोले दर्पहीन एवं पराजित हुए समस्त देवता लंबी साँस खींचते हुए वहाँसे भाग चले ॥ २१½ ॥

अन्योन्यं प्रममन्थुस्ते त्रासिता वृषपर्वणा ॥ २२ ॥
पृष्ठवक्त्राः सुसंविग्नाः प्रेक्षमाणा मुहुर्मुहुः।
त्यक्तप्रहरणाः सर्वे कृतास्ते वृषपर्वणा ॥ २३ ॥
संग्रामे युद्धशौण्डेन तदा निष्कुम्भसैनिकाः।
वृषपर्वासे डराये हुए देवता भागते समय एक दूसरेको कुचल डालते थे और भयभीत हो पीछेकी ओर मुँह फेरकर बारंबार देखते जाते थे। युद्धकुशल वृषपर्वाने उस समय संग्राममें निष्कुम्भके उन सब सैनिकोंको हथियार नीचे डालनेके लिये विवश कर दिया था ॥ २२-२३½ ॥

तत्रैव तु महावीर्यः प्रह्लादः कालमाहवे ॥ २४ ॥
योधयामास रक्ताक्षो हिरण्यकशिपोः सुतः।
उसी युद्धमें लाल नेत्रवाले हिरण्यकशिपुकुमार महापराक्रमी प्रह्लाद कालके साथ युद्ध कर रहे थे ॥ २४½ ॥

तस्य दानववीरस्य युद्धकाले जयक्रियाः ॥ २५ ॥
चकार त्वरया युक्तो भार्गवो विजयावहाः।
उन दानववीर प्रह्लादके लिये युद्धकालमें विजय दिलानेवाली सारी क्रियाएँ शुक्राचार्यने बड़ी शीघ्रताके साथ सम्पन्न की थीं ॥ २५½ ॥

हुताशनं तर्पयतो ब्राह्मणांश्च नमस्यतः ॥ २६ ॥
आज्यगन्धप्रतिवहो मारुतः सुरभिर्ववौ।
उन्होंने अग्निको घीकी आहुतिसे तृप्त किया और ब्राह्मणोंको मस्तक झुकाया; उस समय उनके होमे हुए घृतकी सुगन्ध लेकर मन्द-मन्द सुगन्धित वायु चल रही थी ॥

स्रजश्च विविधाश्चित्रा जयार्थमभिमन्त्रिताः ॥ २७ ॥
प्रह्लादस्य शुभे मूर्ध्नयाबबन्धोशनाः स्वयम्।
साक्षात् शुक्राचार्यने प्रह्लादके सुन्दर मस्तकपर विजयके लिये अभिमन्त्रित किये हुए नाना प्रकारके विचित्र पुष्पहार बाँधे थे ॥ २७½ ॥

कालेन सह संग्रामे प्रयुद्धस्य महात्मनः ॥ २८ ॥
प्रह्लादस्र्यातिवीर्यस्य शान्तिं चक्रे स भार्गवः।
युद्धपरायण, अतिशय पराक्रमी, महात्मा प्रह्लादके कालके साथ होनेवाले संग्राममे भृगुनन्दन शुक्राचार्यने शान्तिकर्मका सम्पादन किया था ॥ २८½ ॥

दश शिष्यसहस्राणि भार्गवस्य महात्मनः ॥ २९ ॥
यानि दानववीराणां जेपुः शान्तिमनुत्तमाम्।
महात्मा शुक्राचार्यके दस हजार शिष्य थे, जो दानववीरोंके लिये परम उत्तम सुख-शान्तिकी प्राप्तिके निमित्त जप करते थे ॥ २९½ ॥

अथर्वाणमथो दिव्यं ब्रह्मसंस्तवचोदितम् ॥ ३० ॥
रणप्रवेशसदृशं कर्म वैजयिकं कृतम्।
उन्होंने दानवोंके लिये अथर्ववेदके अनुसार परमात्माकी स्तुतिसे युक्त और रणप्रवेशके अनुरूप विजयसाधक दिव्यकर्मका भी अनुष्ठान किया था ॥ ३०½ ॥

ततः सर्वास्त्रविदुषः समरेष्वनिवर्तिनः ॥ ३१ ॥
विद्यया तपसा युक्ताः कृतस्वस्त्ययनक्रियाः।
धनुर्हस्ताः कवचिनो वेगेनाप्लुत्य दानवाः।
बलिमभ्यर्च्य राजानं प्रह्लादं पर्यवारयन् ॥ ३२ ॥
तदनन्तर सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता, युद्धसे कभी पीछे न हटनेवाले, विद्वान्, तपस्वी, स्वस्तिवाचन आदि माङ्गलिक कृत्यसे सम्पन्न, धनुर्धर तथा कवचधारी दानवोंने बड़े वेगसे उछलकर राजा बलिको सम्मान करते हुए प्रह्लादको चारों ओरसे घेर लिया ॥ ३१-३२ ॥

आस्थाय परमं दिव्यं रथं पररथारुजम्।
नानाप्रहरणाकीर्णं सवज्रमिव पर्वतम् ॥ ३३ ॥
शत्रुओंके रथको तोड़ डालनेमें समर्थ एक परम उत्तम दिव्य रथ नाना प्रकारके आयुधोंसे भरा हुआ था, जो वज्रयुक्त पर्वतके समान जान पड़ता था। प्रह्लाद उसी रथपर आरूढ होकर आये थे ॥ ३३ ॥

तद् बभूव मुहूर्तेन क्ष्वेडितास्फोटिताकुलम्।
मेरोः शिखरमाकीर्णं द्यौरिवाम्बुधरागमे ॥ ३४ ॥
जैसे वर्षाकालमें आकाश मेघोंकी घटासे घिर जाता है, उसी प्रकार मेरु पर्वतका वह शिखर दो ही घड़ीमें दैत्योंके गर्जन-तर्जन तथा ताल ठोंकनेकी ध्वनिसे व्याप्त हो उठा ॥

स्रजः पद्मपलाश्रानामामुच्य सुविभूषिताः।
बान्धवान् सम्परित्यज्य निपतन्ति रणप्रियाः ॥ ३५ ॥
युद्धप्रेमी दैत्य कमलदलोंकी मालाएँ पहनकर वस्त्राभूषणोंसे भलीभाँति विभूषित हो बन्धु-बान्धवोंको त्यागकर वहाँ टूटे पड़ते थे ॥ ३५ ॥

महायूथधरः श्रीमान्छुभचर्मधरः प्रभुः।
सतनुत्रशिरस्त्राणो धन्वी परमदुर्जयः ॥ ३६ ॥
महान् आयुध, सुन्दर ढाल, कवच और शिरस्त्राण (टोप) धारण करके हाथमें धनुष लिये प्रभावशाली श्रीमान् प्रह्लाद शत्रुओंके लिये अत्यन्त दुर्जय हो गये थे ॥ ३६ ॥

सिंहशार्दूलदर्पाणां गदतां किङ्किणीकिनाम्।
दैत्यानां च सहस्राणि प्रयान्त्यग्रे महारणे ॥ ३७ ॥
उनके आगे उस महासमरमे सिंह और व्याघ्रके समान बलाभिमानी तथा कमरमें क्षुद्र घण्टिकाओंसे युक्त करधनी