भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 958

९३४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

बाँधनेवाले सहस्रों दैत्य गर्जना करते हुए चलते थे ॥ ३७ ॥
सैन्यपक्षहितास्तस्य रथाः परमदुर्जयाः ।
सप्ततिर्वै सहस्राणि गजास्तावन्त एव च ॥ ३८ ॥
उनकी सेनामें परम दुर्जय सत्तर हजार रथ थे। हाथियोंकी संख्या भी उतनी ही थी ॥ ३८ ॥
मध्ये व्यूहोदरस्थस्तु कालनेमिर्महासुरः ।
धनुर्विस्फारयन् घोरं ननाद प्रजहास च ॥ ३९ ॥
सेनाके मध्यभागमें जो व्यूहका उदर था, उसमें स्थित हुआ कालनेमि नामक महान् असुर अपने भयंकर धनुषको खींचता हुआ गरजता और अट्टहास करता था ॥ ३९ ॥
तस्मिञ्छतसहस्राणि पुरो यान्ति महाद्युतेः ।
दानवानां बलवतां शक्रप्रतिमतेजसाम् ॥ ४० ॥
उस सैन्यव्यूहमें महातेजस्वी कालनेमिके आगे इन्द्रतुल्य तेजस्वी एक लाख बलवान् दानव चलते थे ॥ ४० ॥
स समं वर्तमानस्तु पक्षाभ्यां विस्तृतो महान् ।
अभवद् दानवव्यूहो दुर्भेद्यः सर्वदैवतैः ॥ ४१ ॥
समभावसे विद्यमान तथा दोनों पक्षोंसे महान् विस्तृत वह दानवव्यूह समस्त देवताओंके लिये दुर्भेद्य हो गया था ॥
षष्टी रथसहस्राणि दानवानां धनुर्भूताम् ।
नानाप्रहरणानां च परिमाणं न विद्यते ॥ ४२ ॥
धनुर्धर दानवोंके साठ हजार रथ वहाँ शोभा पाते थे । नाना प्रकारके आयुधोंकी कोई गणना ही नहीं थी ॥ ४२ ॥
गदापरिघनिस्त्रिंशैः शूलमुद्गरपट्टिशैः ।
प्रगृहीतैर्व्यरराजन्त दानवाः पर्वतोपमाः ॥ ४३ ॥
पर्वताकार दानव अपने हाथोंमें गदा, परिघ, खड्ग, शूल, मुद्गर और पट्टिश लेकर बड़ी शोभा पा रहे थे ॥४३॥
गर्जन्तो निनदन्तश्च विक्रोशन्तः पुनः पुनः ।
अयुध्यन्त महावीर्याः समरेष्वनिवर्तिनः ॥ ४४ ॥
वे गर्जते, सिंहनाद करते और वारंवार चिल्लाते थे । उनका पराक्रम महान् था । वे समरभूमिसे पीछे हटनेवाले नहीं थे । अतः उत्साहपूर्वक युद्धमें लगे रहते थे ॥ ४४ ॥
तत्र तूर्यसहस्राणि भेरीशङ्खरवाणि च ।
हयानां च गजानां च गर्जतामतिवेगिनाम् ॥ ४५ ॥
दुन्दुभीनां च निर्घोषः पर्जन्यनिनदोपमः ।
शुश्रुवे शङ्खशब्दश्च पटहानां च निःस्वनः ॥ ४६ ॥
वहाँ सहस्रों तुरहियाँ बजने लगीं, भेरियों और शङ्खोंकी ध्वनि होने लगी । अत्यन्त वेगशाली घोड़ों और हाथियोंके गर्जनका शब्द होने लगा । इन सबके साथ दुन्दुभियोंका गम्भीर घोष मेघगर्जनाके समान जान पड़ता था । शङ्खनाद और पटहोंकी ध्वनि विशेषरूपसे सुनायी पड़ती थी।४५-४६।
तेन शङ्खनिनादेन भेरीतूर्यरवेण च ।
निर्घोषेण रथानां च क्रोशतीव नभस्तलम् ॥ ४७ ॥
उस शङ्खनादसे, भेरी और तुरहीके शब्दसे और रथोंकी घरघराहटसे वहाँका आकाश कोलाहल करता-सा प्रतीत होता था ॥ ४७ ॥
सागरप्रतिमौघेन बलेन महता वृतः ।
प्रह्लादोऽयुध्यत रणे कालान्तकयमोपमः ॥ ४८ ॥
रणभूमिमें उस समुद्रतुल्य विशाल सेनासे घिरे हुए प्रह्लाद काल, अन्तक और यमके समान युद्ध कर रहे थे ॥ ४८ ॥
तस्य नादेन रौद्रेण घोरेणाप्रतिमौजसः ।
विनेदुः सर्वभूतानि त्रैलोक्यनिकृतैः स्वनैः ॥ ४९ ॥
अप्रतिम तेजस्वी प्रह्लादके घोर एवं भयंकर नादसे तथा तीनों लोकोंको तिरस्कृत करनेवाली गर्जनाओंसे भयभीत हो समस्त प्राणी आर्तनाद करने लगे ॥ ४९ ॥
अन्तरिक्षात् पपातोल्का वायुश्च परुषो ववौ ।
वमन्त्यः पावकं घोरं शिवाश्चैव ववाशिरे ॥ ५० ॥
अन्तरिक्षसे उल्कापात होने लगा । प्रचण्ड वायु चलने लगी तथा गीदड़ियाँ घोर आग उगलती हुई क्रन्दन करने लगीं ॥ ५० ॥
प्रह्लादस्तु महावीर्यः प्रहसन् युद्धदुर्मदः ।
उवाच वचनं श्रीमांस्तत्कालक्षममुत्तमम् ॥ ५१ ॥
महापराक्रमी रणदुर्मद श्रीमान् प्रह्लाद वहाँ जोर-जोरसे हँसते हुए उस समयके योग्य यह उत्तम वचन बोले-।५१।
अद्याहं दर्शयिष्यामि स्वबाहुबलमूर्जितम् ।
अद्य मद्वाणनिहतान् देवान् द्रक्ष्यथ संयुगे ॥ ५२ ॥
'वीरो ! आज मैं अपने बढ़े हुए बाहुबलका दर्शन कराऊँगा । आज युद्धस्थलमें तुम सब लोग मेरेद्वारा मारे गये देवताओंको प्रत्यक्ष देखोगे ॥ ५२ ॥
बान्धवा निहता येषां त्रिदशैरिह संयुगे ।
अद्य निर्वर्तयिष्यन्ति शत्रुमांसानि दानवाः ॥ ५३ ॥
'देवताओंने रणभूमिमें जिनके भाई-बन्धुओंका वध किया है, वे दानव आज अपने उन बन्धुओंके उद्देश्यसे शत्रुओंके मांस अर्पित करेंगे ॥ ५३ ॥
इममद्य समुद्भूतं रेणुं समरमूर्धनि ।
अहं तु शमयिष्यामि शत्रुशोणितविस्रवैः ॥ ५४ ॥
'युद्धके मुहानेपर जो यह धूल उड़ रही है, इसे आज मैं शत्रुओंके रक्तका स्रोत बहाकर शान्त करूँगा ॥ ५४ ॥
तिमिरौघहतार्कं तु सैन्यरेण्वरुणीकृतम् ।
आकाशं सम्पतिष्यन्ति खद्योता इव मे शराः ॥ ५५ ॥
'जहाँ अँधेरेके कारण सूर्यका दर्शन नहीं हो रहा है, जो सेनाकी धूलसे अरुण रंगका हो गया है, उस आकाशमें आज मेरे चमकीले बाण जुगुनुओंके समान उड़ेंगे ॥ ५५ ॥
हृष्टाः सम्परिमोदध्वं देवेभ्यस्त्यज्यतां भयम् ।
अद्याहं निहनिष्यामि कालेन्द्रं धनुषा रणे ॥ ५६ ॥
'अब तुमलोग हर्षपूर्वक आनन्द मनाओ। देवताओंसे