भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 959, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 959

भविष्यपर्व ] एकोनषष्टितमोऽध्यायः ९३५


होनेवाले भयको त्याग दो। आज मैं रणभूमिमें अपने धनुषसे कालके स्वामी यमराजका वध कर डालूँगा ॥ ५६ ॥
तोषयिष्यामि राजानं बलिं बलवतां वरम्।
त्रिदशान् सगणान् हत्वा रणे चान्तकमन्तिकात् ॥ ५७॥
'समरभूमिमें सेवकगणोंसहित देवताओंका और निकटसे यमराजका भी वध करके आज मैं बलवानोंमें श्रेष्ठ राजा बलिको भी संतुष्ट करूँगा' ॥ ५७ ॥
अक्षयाः सन्ति मे तूणाः शराश्चाशीविषोपमाः।
स्थातुं मे पुरतः शक्ताः के रणे जीवितेप्सवः ॥ ५८ ॥
'मेरे तरकस अक्षय हैं, उनमें बाणोंकी कभी कमी नहीं होती है तथा मेरे बाण विषधर सर्पोंके समान भयंकर हैं। जो अपने जीवनकी इच्छा रखनेवाले हैं, ऐसे कौन योद्धा रणभूमिमें मेरे सामने ठहर सकते हैं ? ॥ ५८ ॥
हत्वा रिपुगणांस्तुष्टिरनुरागश्च राजसु।
हतस्य त्रिदिवे वासो नास्ति युद्धसमा गतिः ॥ ५९ ॥
'शत्रुओंका वध करनेसे मनमें संतोष होगा, राजाओंमें अनुराग उत्पन्न होगा और यदि युद्धमें वीर पुरुष स्वयं ही मारा गया तो उसका स्वर्गलोकमें निवास होगा; अतः युद्धके समान दूसरी कोई गति नहीं है ॥ ५९ ॥
तद् भयं पृष्ठतः कृत्वा रणे दानवसत्तमाः।
निहत्येमानरीन् सर्वान् मोदध्वं नन्दने वने ॥ ६० ॥
'अतः दानवशिरोमणियो ! रणभूमिमें भयको पीछे करके इन समस्त शत्रुओंका वध करो और नन्दनवनमें आनन्द भोगो' ॥ ६० ॥
एवमुक्त्वा महत्सैन्यं प्रह्लादो दानवोत्तमः।
कालसैन्यं महारौद्रं तरसामर्दतासुरः ॥ ६१ ॥
दानवशिरोमणि असुर प्रह्लाद अपनी विशाल सेनाके सैनिकोंसे उपर्युक्त बात कहकर कालकी महाभयंकर सेनाका वेगपूर्वक मर्दन करने लगे ॥ ६१ ॥
सर्वास्त्रविद्वान् वीरश्च नित्यं चाप्यपराजितः।
युद्धे ह्यभिमुखो नित्यं स्वाबाहुबलदर्पितः ॥ ६२ ॥
वे सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता, वीर तथा नित्यविजयी थे। कभी उनकी पराजय नहीं होती थी। उन्हें अपने बाहुबलपर गर्व था; अतः वे युद्धमें सदा सामने रहकर लड़ते थे ॥ ६२ ॥
षष्टि रथसहस्राणि विविधाSTR धारिणाम् ।
(विविधायुधधारिणाम् ।)
प्रह्लादस्यातिवीर्यस्य ते तस्य तनया निजाः ॥ ६३ ॥
नाना प्रकारके आयुध धारण करनेवाले साठ हजार रथी तथा अतिशय वीर्यशाली प्रह्लादके वे पूर्वोक्त औरस पुत्र सभी उस युद्धमें सम्मिलित थे ॥ ६३ ॥
तैस्तु क्रतुशतैरिष्टं विपुलैराप्तदक्षिणैः।
क्षान्ता धर्मपरा नित्यं सत्यव्रतपरायणाः ॥ ६४ ॥
उन सबने पर्याप्त दक्षिणावाले सौ विशाल यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। वे सभी क्षमाशील, धर्मपरायण तथा सदैव सत्यव्रतका पालन करनेवाले थे ॥ ६४ ॥
दातारः प्रियवक्तारो वक्तारः शास्त्रवस्तुषु।
स्वदारनिरता दान्ता ब्राह्मण्याः सत्यसंगराः ॥ ६५ ॥
दानी, प्रियभाषी, शास्त्रीय विषयोंके वक्ता, अपनी ही स्त्रीमें अनुराग रखनेवाले, जितेन्द्रिय, ब्राह्मणभक्त तथा सत्यप्रतिज्ञ थे ॥ ६५ ॥
यष्टारः क्रतुभिर्नित्यं नित्यं चाध्ययने रताः।
इष्वस्त्रकुशलाः सर्वे धनुषो दृढविक्रमाः ॥ ६६ ॥
वे सदा यज्ञोंका अनुष्ठान करते और प्रतिदिन वेद-शास्त्रोंके स्वाध्यायमें लगे रहते थे। सब-के-सब धनुर्वेदमें कुशल तथा वारंवार सुदृढ़ पराक्रमका परिचय देनेवाले थे ॥ ६६ ॥
मत्तवारणविक्रान्ताः शत्रुसैन्यप्रमर्दकाः।
दारयन्तः पदाक्षेपैः सुघोरान् वातरेचकान् ॥ ६७ ॥
उनका पराक्रम मतवाले हाथियोंके समान था। वे शत्रुसेनाका मर्दन करनेवाले थे तथा अपने पैरोंके आघातसे घोर वृक्ष आदिको भी विदीर्ण कर डालते थे ॥ ६७ ॥
युद्धोत्सुकधिया नित्यं क्रोधरञ्जितलोचनाः।
संदष्टौष्ठपुटा दैत्या विनेदुभीमविक्रमाः।
क्ष्वेडितास्फोटितरवैर्यन्योन्यं समहर्षयन् ॥ ६८ ॥
उनकी चित्तवृत्ति सदा युद्धके लिये उत्सुक रहती थी, इसलिये उनकी आँखें क्रोधसे लाल बनी रहती थीं। अपने ओठको दाँतों तले दबाये हुए वे भयंकर पराक्रमी दैत्य वहाँ जोर-जोरसे गर्जना करते और सिंहनाद तथा ताल ठोंकनेकी आवाजसे एक-दूसरेके हर्ष बढ़ाते थे ॥ ६८ ॥
वेणुशङ्खखरैश्चैव सिंहनादैश्च पुष्कलैः।
आप्लुत्याप्लुत्य सहसा रणे ववुरनेकशः ॥ ६९ ॥
वेणु और शङ्खकी ध्वनि तथा पुष्कल सिंहनादके साथ सहसा उछल-उछलकर वे बहुसंख्यक दैत्य युद्धमें आने और हथियार ग्रहण करने लगे ॥ ६९ ॥
तालमात्राणि चापानि विकृष्य सुमहाबलाः।
अमृष्यमाणाः सहसा दानवाश्चापपाणयः ॥ ७० ॥
सुरासुरैरपराजितं योधयन्ति रणेऽन्तकम्।
वे महाबली दानव हाथमें धनुष लिये अमर्षमें भरे हुए थे। वे तालके बराबर लंबे धनुषोंको खींचकर देवताओं और असुरोंसे भी पराजित न होनेवाले कालके साथ समराङ्गणमें युद्ध करने लगे ॥ ७० ॥
प्रतप्तहेमाभरणाः सर्वे ते श्वेतवाससः ॥ ७१ ॥
दानवा मानिनः सर्वे सर्वे स्वर्गमभिकाङ्क्षिणः।
सर्वे जयैषिणो वीराः सर्वे शत्रुवधोद्यताः ॥ ७२ ॥
सभी दानव तपाये हुए सुवर्णके आभूषण पहने हुए थे। सबके अङ्गोंमें श्वेत वस्त्र शोभा पा रहे थे। सब-के-सब मानी थे और सभी स्वर्गलोककी अभिलाषा रखते थे। शत्रुवधके

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