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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

भविष्यपर्व ] एकोनषष्टितमोऽध्यायः ९३५


होनेवाले भयको त्याग दो। आज मैं रणभूमिमें अपने धनुषसे कालके स्वामी यमराजका वध कर डालूँगा ॥ ५६ ॥
तोषयिष्यामि राजानं बलिं बलवतां वरम्।
त्रिदशान् सगणान् हत्वा रणे चान्तकमन्तिकात् ॥ ५७॥
'समरभूमिमें सेवकगणोंसहित देवताओंका और निकटसे यमराजका भी वध करके आज मैं बलवानोंमें श्रेष्ठ राजा बलिको भी संतुष्ट करूँगा' ॥ ५७ ॥
अक्षयाः सन्ति मे तूणाः शराश्चाशीविषोपमाः।
स्थातुं मे पुरतः शक्ताः के रणे जीवितेप्सवः ॥ ५८ ॥
'मेरे तरकस अक्षय हैं, उनमें बाणोंकी कभी कमी नहीं होती है तथा मेरे बाण विषधर सर्पोंके समान भयंकर हैं। जो अपने जीवनकी इच्छा रखनेवाले हैं, ऐसे कौन योद्धा रणभूमिमें मेरे सामने ठहर सकते हैं ? ॥ ५८ ॥
हत्वा रिपुगणांस्तुष्टिरनुरागश्च राजसु।
हतस्य त्रिदिवे वासो नास्ति युद्धसमा गतिः ॥ ५९ ॥
'शत्रुओंका वध करनेसे मनमें संतोष होगा, राजाओंमें अनुराग उत्पन्न होगा और यदि युद्धमें वीर पुरुष स्वयं ही मारा गया तो उसका स्वर्गलोकमें निवास होगा; अतः युद्धके समान दूसरी कोई गति नहीं है ॥ ५९ ॥
तद् भयं पृष्ठतः कृत्वा रणे दानवसत्तमाः।
निहत्येमानरीन् सर्वान् मोदध्वं नन्दने वने ॥ ६० ॥
'अतः दानवशिरोमणियो ! रणभूमिमें भयको पीछे करके इन समस्त शत्रुओंका वध करो और नन्दनवनमें आनन्द भोगो' ॥ ६० ॥
एवमुक्त्वा महत्सैन्यं प्रह्लादो दानवोत्तमः।
कालसैन्यं महारौद्रं तरसामर्दतासुरः ॥ ६१ ॥
दानवशिरोमणि असुर प्रह्लाद अपनी विशाल सेनाके सैनिकोंसे उपर्युक्त बात कहकर कालकी महाभयंकर सेनाका वेगपूर्वक मर्दन करने लगे ॥ ६१ ॥
सर्वास्त्रविद्वान् वीरश्च नित्यं चाप्यपराजितः।
युद्धे ह्यभिमुखो नित्यं स्वाबाहुबलदर्पितः ॥ ६२ ॥
वे सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता, वीर तथा नित्यविजयी थे। कभी उनकी पराजय नहीं होती थी। उन्हें अपने बाहुबलपर गर्व था; अतः वे युद्धमें सदा सामने रहकर लड़ते थे ॥ ६२ ॥
षष्टि रथसहस्राणि विविधाSTR धारिणाम् ।
(विविधायुधधारिणाम् ।)
प्रह्लादस्यातिवीर्यस्य ते तस्य तनया निजाः ॥ ६३ ॥
नाना प्रकारके आयुध धारण करनेवाले साठ हजार रथी तथा अतिशय वीर्यशाली प्रह्लादके वे पूर्वोक्त औरस पुत्र सभी उस युद्धमें सम्मिलित थे ॥ ६३ ॥
तैस्तु क्रतुशतैरिष्टं विपुलैराप्तदक्षिणैः।
क्षान्ता धर्मपरा नित्यं सत्यव्रतपरायणाः ॥ ६४ ॥
उन सबने पर्याप्त दक्षिणावाले सौ विशाल यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। वे सभी क्षमाशील, धर्मपरायण तथा सदैव सत्यव्रतका पालन करनेवाले थे ॥ ६४ ॥
दातारः प्रियवक्तारो वक्तारः शास्त्रवस्तुषु।
स्वदारनिरता दान्ता ब्राह्मण्याः सत्यसंगराः ॥ ६५ ॥
दानी, प्रियभाषी, शास्त्रीय विषयोंके वक्ता, अपनी ही स्त्रीमें अनुराग रखनेवाले, जितेन्द्रिय, ब्राह्मणभक्त तथा सत्यप्रतिज्ञ थे ॥ ६५ ॥
यष्टारः क्रतुभिर्नित्यं नित्यं चाध्ययने रताः।
इष्वस्त्रकुशलाः सर्वे धनुषो दृढविक्रमाः ॥ ६६ ॥
वे सदा यज्ञोंका अनुष्ठान करते और प्रतिदिन वेद-शास्त्रोंके स्वाध्यायमें लगे रहते थे। सब-के-सब धनुर्वेदमें कुशल तथा वारंवार सुदृढ़ पराक्रमका परिचय देनेवाले थे ॥ ६६ ॥
मत्तवारणविक्रान्ताः शत्रुसैन्यप्रमर्दकाः।
दारयन्तः पदाक्षेपैः सुघोरान् वातरेचकान् ॥ ६७ ॥
उनका पराक्रम मतवाले हाथियोंके समान था। वे शत्रुसेनाका मर्दन करनेवाले थे तथा अपने पैरोंके आघातसे घोर वृक्ष आदिको भी विदीर्ण कर डालते थे ॥ ६७ ॥
युद्धोत्सुकधिया नित्यं क्रोधरञ्जितलोचनाः।
संदष्टौष्ठपुटा दैत्या विनेदुभीमविक्रमाः।
क्ष्वेडितास्फोटितरवैर्यन्योन्यं समहर्षयन् ॥ ६८ ॥
उनकी चित्तवृत्ति सदा युद्धके लिये उत्सुक रहती थी, इसलिये उनकी आँखें क्रोधसे लाल बनी रहती थीं। अपने ओठको दाँतों तले दबाये हुए वे भयंकर पराक्रमी दैत्य वहाँ जोर-जोरसे गर्जना करते और सिंहनाद तथा ताल ठोंकनेकी आवाजसे एक-दूसरेके हर्ष बढ़ाते थे ॥ ६८ ॥
वेणुशङ्खखरैश्चैव सिंहनादैश्च पुष्कलैः।
आप्लुत्याप्लुत्य सहसा रणे ववुरनेकशः ॥ ६९ ॥
वेणु और शङ्खकी ध्वनि तथा पुष्कल सिंहनादके साथ सहसा उछल-उछलकर वे बहुसंख्यक दैत्य युद्धमें आने और हथियार ग्रहण करने लगे ॥ ६९ ॥
तालमात्राणि चापानि विकृष्य सुमहाबलाः।
अमृष्यमाणाः सहसा दानवाश्चापपाणयः ॥ ७० ॥
सुरासुरैरपराजितं योधयन्ति रणेऽन्तकम्।
वे महाबली दानव हाथमें धनुष लिये अमर्षमें भरे हुए थे। वे तालके बराबर लंबे धनुषोंको खींचकर देवताओं और असुरोंसे भी पराजित न होनेवाले कालके साथ समराङ्गणमें युद्ध करने लगे ॥ ७० ॥
प्रतप्तहेमाभरणाः सर्वे ते श्वेतवाससः ॥ ७१ ॥
दानवा मानिनः सर्वे सर्वे स्वर्गमभिकाङ्क्षिणः।
सर्वे जयैषिणो वीराः सर्वे शत्रुवधोद्यताः ॥ ७२ ॥
सभी दानव तपाये हुए सुवर्णके आभूषण पहने हुए थे। सबके अङ्गोंमें श्वेत वस्त्र शोभा पा रहे थे। सब-के-सब मानी थे और सभी स्वर्गलोककी अभिलाषा रखते थे। शत्रुवधके

९३६ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे


लिये उद्यत हुए वे सभी वीर अपने पक्षकी विजय चाहते थे॥
शुशुभे सा चमूर्दीप्ता पताकाध्वजमालिनी।
गजाश्वरथसंवाधा स्वर्गमार्गाभिकाङ्क्षिणी ॥ ७३॥
ध्वजा-पताकाओंसे अलंकृत हाथी, घोड़े और रथोंसे भरी हुई तथा स्वर्गलोकके मार्गपर जानेकी इच्छा रखनेवाली वह दीप्तिशालिनी दैत्यसेना बड़ी शोभा पा रही थी॥ ७३॥
ततः कालः सुनिर्यातो भीमो भीमपराक्रमः।
निनदन् सुमहाकायो व्याधिभिर्बहुभिर्वृतः ॥ ७४॥
तदनन्तर भीषण पराक्रमी भयंकर कालदेवता बहुत-सी व्याधियोंसे घिरे हुए युद्धके लिये निकले। उनकी काया विशाल थी और वे जोर-जोरसे सिंहनाद कर रहे थे ॥ ७४ ॥
ददर्श महतीं सेनां दानवानां बलीयसाम्।
अभिसंजातदर्पाणां कालं समभिगर्जताम् ॥ ७५ ॥
उन्होंने अपने सामने गर्जते और अभिमानमें भरे हुए महाबली दानवोंकी उस विशाल सेनाको देखा ॥ ७५ ॥
तदायान्तं तदानीकं दानवानां तरस्विनाम्।
प्रतिलोमं चकाराशु व्याधिभिः सहितोऽन्तकः ॥ ७६॥
वेगशाली दानवोंकी उस आती हुई सेनाको व्याधियों-सहित कालने तुरंत प्रतिकूल दिशामें ठेल दिया ॥ ७६ ॥
प्रविश्य ध्वजिनीं चैषां पातयामास दानवान्।
कालो रुधिररक्ताक्षः स्वेनानीकेन संवृतः ॥ ७७॥
तत्पश्चात् अपनी सेनासे घिरे हुए लाल नेत्रवाले कालदेव दानवोंकी सेनामें प्रवेश करके उन्हें धराशायी करने लगे ॥
प्रह्लादबलमत्युग्रं प्रह्लादं च महाबलम्।
आजघान रणे कालो दण्डमुद्गरपट्टिशैः ॥ ७८ ॥
उस युद्धमें कालदेव दण्ड, मुद्गर और पट्टिश आदि अस्त्रोंद्वारा महाबली प्रह्लाद तथा उनकी अत्यन्त भयंकर सेनापर घातक प्रहार करने लगे ॥ ७८ ॥
शरशक्त्यसिखड्गांश्च शूलानि मुसलानि च।
गदाश्च परिघांश्चैव विचित्रांश्च परश्वधाः ॥ ७९॥
धनूंषि च विचित्राणि शतघ्नीश्च स्थिरायसीः।
पात्यन्ते व्याधिभिर्युद्धे दानवानां चमूमुखे ॥ ८० ॥
कालके सैनिक व्याधियोंने रणक्षेत्रमें बाण, शक्ति, ऋष्टि, खड्ग, शूल, मुसल, गदा, परिघ, विचित्र फरसे, भाँति-भाँतिके धनुष तथा लोहेकी बनी हुई सुदृढ़ शतघ्नी आदि बहुत-से अस्त्र-शस्त्र दानव-सेनाके ऊपर गिराये ॥ ७९-८० ॥
बहवो व्याधयो युद्धे जघ्नुसुरपुङ्गवान्।
व्याधीनपि च दैत्यौघा निजघ्नुर्बहवो बहून् ॥ ८१॥
उस युद्धमें बहुसंख्यक व्याधियोंने बहुत-से असुरशिरो-मणियाेंका वध किया और बहुत से दैत्यों ने भी बहुसंख्यक व्याधियोंका विनाश कर डाला ॥ ८१ ॥
शूलैः प्रमथिताः केचित् केचिच्छिन्नाः परश्वधैः।
परिघैराहताः केचित् केचिच्च परमायुधैः ॥ ८२ ॥
कितने ही योद्धा शूलोंसे मथ डाले गये। कितनोंके फरसोंसे टुकड़े-टुकड़े कर दिये गये। कोई परिघोंसे आहत हुए तो कोई दूसरे-दूसरे उत्तम आयुधोंसे ॥ ८२ ॥
केचिद् द्विधा कृताः खड्गैः स्फुरन्तः पतिता भुवि।
व्याधयो दानवैरेव नानाशास्त्रैर्विदारिताः ॥ ८३ ॥
किन्हींके खड्गोंद्वारा दो टुकड़े कर दिये गये और वे पृथ्वीपर गिरकर छटपटाने लगे। दानवोंने नाना प्रकारके शस्त्रोंद्वारा व्याधियोंको विदीर्ण कर डाला ॥ ८३ ॥
ते चापि व्याधिभिः सर्वे विविधैरायुधोत्तमैः।
खड्गैश्च मुसलैस्तीक्ष्णैः प्रासतोमरमुद्गरैः।
भिन्नाश्च दानवाः सर्वे निकृत्ताश्च परश्वधैः ॥ ८४ ॥
व्याधियोंने भी नाना प्रकारके उत्तम आयुधों, खड्गों, तीखी धारवाले मुसलों, प्रास, तोमर और मुद्गरों तथा फरसों-से समस्त दानवोंको छिन्न-भिन्न करके काट डाला ॥ ८४ ॥
मुद्गरैः पट्टिशैश्चैव व्याधिभिश्च महाबलैः।
कृत्वा शस्त्रैरनेकैश्च मुष्टिभिश्च हता भृशम् ॥ ८५ ॥
महाबली व्याधियोंने मुद्गरों, पट्टिशों तथा अनेक प्रकार-के शस्त्रोंद्वारा दैत्योंके टुकड़े-टुकड़े करके बहुतोंको मुक्कोंसे भी मार गिराया ॥ ८५ ॥
वेमुः शोणितमन्योन्यं विष्टब्धदशनेक्षणाः।
आर्तस्वरं च नदतां सिंहनादं च गर्जताम् ॥ ८६ ॥
बभूव तुमुलः शब्दः संग्रामे लोमहर्षणे।
एक-दूसरेके द्वारा दाँतोंके तोड़ दिये जानेपर और आँखोंके फोड़ दिये जानेपर वे सब योद्धा मुँहसे रक्त वमन करने लगे। उस रोमाञ्चकारी संग्राममें आर्तस्वरसे कराहते और सिंहोंके समान गर्जते हुए योद्धाओंका शब्द बड़ा भयंकर प्रतीत होता था ॥ ८६ १/२ ॥
मुष्टिभिश्चोत्तमाङ्गानि तल्लैर्गात्राणि चासकृत् ॥ ८७ ॥
सादितानि महीं जग्मुस्तिष्ठतामेव संयुगे।
युद्धस्थलमें खड़े हुए योद्धाओंके मस्तक तथा दूसरे-दूसरे अङ्ग बारंवार मुक्कों और तमाचोंकी मार पड़नेसे कटकर पृथ्वीपर गिर पड़ते थे ॥ ८७ १/२ ॥
अस्रफेना ध्वजावर्ता च्छिन्नबाहुमहोरगा ॥ ८८ ॥
शूलशक्तिमहामत्स्या चापग्राहसमाकुला।
रथेपोपलसम्बाधा ध्वजद्रुमलतावृता ॥ ८९ ॥
सशब्दघोषविस्तारा लोहितोदाभवन्नदी।
उस समय वहाँ भारी कोलाहलके साथ खूनकी विस्तृत नदी बह चली। आँसू ही उसमें फेन थे। ध्वजोंकी भँवर उठ रही थी। कटी हुई बाँहें बड़े-बड़े सर्पोंके समान जान पड़ती थीं। शूल और शक्तिनामक अस्त्र महान् मत्स्य से प्रतीत होते थे। धनुरूपी ग्राहोंसे वह भरी हुई थी। रथोंके ईपादण्ड-रूपी प्रस्तरखण्डोंसे वह नदी व्याप्त थी तथा ध्वजरूपी वृक्षों और लताओंसे आवृत्त दिखायी देती थी ॥ ८८-८९ १/२ ॥

भविष्यपर्व ] एकोनषष्टितमोऽध्यायः ९३७


स्वधनुःशक्रधनुषौ काञ्चनाङ्गदविद्युतौ ॥ ९० ॥
तौ दैत्यकालजलदौ शरधारां व्यमुञ्चताम् ।
दैत्य प्रह्लाद और कालदेवता दोनों मेघके समान होकर बाणरूपी जलकी धारा गिरा रहे थे । दोनोंके अपने धनुष ही इन्द्रधनुषकी प्रतीति कराते थे और उनकी बाँहोंमें जो सोनेके बाजूबंद थे, वे विद्युतके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ९० १/२ ॥

तौ महामेघसंकाशौ रथनागगतौ तदा ॥ ९१ ॥
बभूवतुरभिक्रुद्धौ साम्बुगर्भाविवाम्बुदौ ।
क्रमशः रथ और हाथीपर बैठे हुए वे दोनों योद्धा महान् मेघके समान जान पड़ते थे । दोनों ही एक दूसरेके प्रति क्रोधसे भरे हुए थे और सजल जलधरोंके समान शोभा पाते थे ॥ ९१ १/२ ॥

तप्तकाञ्चनसंन्नाहौ दिव्यहारविभूषितौ ॥ ९२ ॥
तौ विरेजतुरायस्तौ सूर्यवैश्वानरोपमौ ।
तपाये हुए सुवर्णमय कवच तथा दिव्य हारोंसे विभूषित वे दोनों विजयके लिये प्रयत्नशील योद्धा सूर्य और अग्निके समान शोभा पाते थे ॥ ९२ १/२ ॥

तौ महाचलसंकाशावन्योन्यस्य चमूमुखे ॥ ९३ ॥
शक्राशनिसमस्पर्शैर्बाणैर्जघ्नतुराहवे ।
महान् पर्वतके समान विशाल शरीरवाले वे दोनों वीर सेनाके मुहानेपर युद्धस्थलमें एक-दूसरेको इन्द्रके वज्रकी भाँति दुःसह बाणोंद्वारा चोट पहुँचाते थे ॥ ९३ १/२ ॥

परस्परं समासाद्य तयोर्युद्धे दुरासदे ॥ ९४ ॥
नाशंसन्त तदा योधा जीवितान्यपि संयुगे ।
उन दोनोंके दुर्जय युद्धमें परस्पर भिड़े हुए योद्धा समर-भूमिमें अपने जीवनकी भी आशा छोड़ बैठे थे ॥ ९४ १/२ ॥

शरैर्विभिन्नसर्वाङ्गा युधि प्रक्षीणबान्धवाः ।
निपेतुर्योधमुख्यास्तु रुधिरोक्षितवक्षसः ॥ ९५ ॥
उनके सारे अङ्ग बाणोंसे क्षत-विक्षत हो गये थे । उनके बन्धु-बान्धव भी युद्धमें काम आ गये थे और उन प्रमुख योद्धाओंकी छाती खूनसे रँगी हुई थी । इस अवस्थामें वे धराशायी हो गये ॥ ९५ ॥

पतितैर्निष्पतद्द्भिश्च पात्यमानैश्च संयुगे ।
बभूव भूः समाकीर्णा योधैरुद्गतजीवितैः ॥ ९६ ॥
युद्धस्थलमें गिरे हुए, गिरते हुए और गिराये जाते हुए निष्प्राण योद्धाओंकी लाशोंसे भूमि पट गयी थी ॥ ९६ ॥

संगृह्णतोः शरान् घोरान्न च संदधतोस्तयोः ।
अन्तरं ददृशे कश्चित् प्रयत्नादपि संयुगे ॥ ९७ ॥
उस युद्धस्थलमें घोर बाणोंको हाथमें लेते और धनुषपर रखते हुए उन दोनों वीरोंमें कितना अन्तर है, इस बातको कोई प्रयत्न करके भी न देख सका ॥ ९७ ॥

लघुत्वाच्च महाबाहू युद्धशौण्डौ महाबलौ ।
मण्डलीभूतधनुषौ सकृदेव बभूवतुः ॥ ९८ ॥
वे दोनों महाबली, महाबाहु युद्धमें कुशल थे । उन दोनोंने फुर्तीके कारण एक साथ ही अपने धनुषोंको खींचकर मण्डलाकार बना लिया ॥ ९८ ॥

प्रह्लादस्य च बाणौघैर्दुद्रावान्तकवाहिनी ।
उह्यमानं बलवता वायुनेवाभ्रमण्डलम् ॥ ९९ ॥
प्रह्लादके बाणसमूहोंसे घायल होकर कालकी सेना भाग चली । ठीक उसी तरह जैसे बलवान् वायुके द्वारा ढोये जाते हुए मेघोंका समूह छिन्न-भिन्न हो जाता है ॥ ९९ ॥

हतदर्पं तु विज्ञाय प्रह्लादः कालमाहवे ।
अपयातं च समरे द्विपन्तं सम्प्रतर्क्य-तम् ॥ १००॥
मत्वा वशगतं चैव प्रह्लादो युद्धदुर्मदः ।
तत्रैवान्यां चमूं भूयः सम्ममर्द महासुरः ॥ १०१॥
उस समराङ्गणमें कालका घमंड चूर हुआ जान तथा अपने उस शत्रुको युद्धसे भागा हुआ समझकर रणदुर्मद महान् असुर प्रह्लाद उन्हें पराजित मानकर पुनः दूसरी देव-सेनाका मर्दन करने लगे ॥ १००-१०१ ॥

कालप्रह्लादयोर्युद्धमभवद् यादृशं पुरा ।
तादृशं सर्वलोकेषु न भूतं न भविष्यति ॥ १०२॥
पूर्वकालमें प्रह्लाद और कालका जैसा युद्ध हुआ था, वैसा युद्ध सम्पूर्ण लोकोंमें न तो कभी हुआ है और न होगा ही ॥ १०२ ॥

एवमद्भुतवीर्यौजा महार णकृतव्रणः ।
प्रह्लादस्त्वथ वृद्धोऽत्र कालस्त्वपसृतो रणात् ॥ १०३॥
इस प्रकार अद्भुत बल पराक्रम और ओजसे सम्पन्न तथा उस महासमरमें घायल हुए प्रह्लाद उस युद्धमें बढ़ गये—विजयी हुए और कालदेवता रणक्षेत्रसे भाग गये ॥ १०३ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामने देवासुरयुद्धे कालप्रह्लादयुद्धे
एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५९ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें देवासुरसंग्राममें काल और प्रह्लादका युद्धविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५९ ॥

९३८ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे


षष्टितमोऽध्यायः

कुबेर और अनुह्लादका भयंकर युद्ध

वैशम्पायन उवाच

धनाध्यक्षमनुह्लादः प्रह्लादस्यानुजो बली।
ससैन्यं योधयामास क्षोभयन् यक्षवाहिनीम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! प्रह्लादका बलवान् भाई अनुह्लाद यक्षसेनाको क्षोभमें डालता हुआ सेनासहित धनाध्यक्ष कुबेरके साथ युद्ध करने लगा ॥ १ ॥

महता च बलौघेन त्वनुह्लादोऽसुरोत्तमः।
अर्दयामास संक्रुद्धो धनाध्यक्षं प्रतापवान् ॥ २ ॥

असुरोंमें श्रेष्ठ प्रतापी अनुह्लाद कुपित हो अपने विशाल सैन्यसमूहद्वारा कुबेरको पीड़ा देने लगा ॥ २ ॥

अमृष्यमाणस्त्रिदशानावस्थानुदायुधान् ।
चकार कदनं घोरं धनुष्पाणिर्महासुरः ॥ ३ ॥

वह महान् असुर युद्धस्थलमें खड़े हुए देवताओंको शस्त्र उठाये देख उन्हें सहन न कर सका। उसने हाथमें धनुष लेकर उनका घोर संहार मचाया ॥ ३ ॥

आवर्त इव संजज्ञे बलस्य महतो महान् ।
क्षुभितस्याप्रमेयस्य सागरस्येव सम्प्लवे ॥ ४ ॥

जैसे प्रलयकालमें क्षुब्ध हुए अपार महासागरमें भँवरें उठने लगती हैं, उसी प्रकार उस क्षुब्ध हुई विशाल सेनामें आवर्त ( मन्थन)-सा होने लगा ॥ ४ ॥

त्रिदशानां शरीरैस्तु दानवानां च मेदिनी।
बभूव निचिता घोरैः पर्वतैरिव सम्प्लवे ॥ ५ ॥

देवताओं और दानवोंकी लाशोंसे वहाँकी धरती पट गयी, मानो प्रलयकालमें ढहे हुए भयंकर पर्वतोंसे आच्छादित हो गयी हो ॥ ५ ॥

मेरुपृष्ठं तु रक्तेन रञ्जितं सम्प्रकाशते ।
सर्वतो माधवे मासि पुष्पितैरिव किंशुकैः ॥ ६ ॥

मेरुपर्वतकी वह घाटी रक्तसे रञ्जित होकर वैशाख मासमें सब ओरसे लाल फूलोंसे युक्त पलाशवृक्षकी भाँति प्रकाशित हो रही थी ॥ ६ ॥

हतैर्वीरैर्गजैरश्वैः प्रावर्तत महानदी।
शोणितौघा महाघोरा यमराष्ट्रविवर्धिनी ॥ ७ ॥

मारे गये वीरों, हाथियों और घोड़ोंसे वहाँ खूनकी एक महानदी बह चली, जिसमें जलके स्थानमें रक्तका स्रोत बह रहा था। वह महाघोर नदी यमराजके राज्यकी वृद्धि करने-वाली थी ॥ ७ ॥

शकृन्मेदोमहापङ्का सम्प्रकीर्णान्त्रशैवला।
छिन्नकायशिरोमीना अङ्गावयवशाद्वला ॥ ८ ॥

उसमें विष्ठा और चरबी बड़ी भारी कीचड़के समान प्रतीत होती थी। सब ओर बिखरी हुई आँतें सेवार-सी जान पड़ती थीं। कटे हुए सिर और धड़ ही उस नदीके मत्स्य थे। अङ्गोंके अवयव ही घास थे ॥ ८ ॥

गृध्रहंससमाकीर्णा केकिसारसनादिता।
वसाफेनसमाकीर्णा प्रोत्कृष्टस्तनितस्वरा ॥ ९ ॥

गीधरूपी हंस वहाँ छा रहे थे। मोरों और सारसोंके कलरवोंसे वह मुखरित हो रही थी। वसारूपी फेन उसमें व्याप्त थे। चारों ओर मची हुई चीख-पुकार ही उसका कलकलनाद थी ॥ ९ ॥

तां कापुरुषदुस्तारां युद्धभूमौ महानदीम्।
नदीमिवातपापाये हंससंघोपशोभिताम् ॥ १० ॥

युद्धभूमिमें बहनेवाली वह महानदी कायरोंके लिये दुस्तर थी। ठीक वैसे ही जैसे वर्षा-ऋतुमें बढ़ी हुई नदीको पार करना किसीको भी कठिन हो जाता है। हंस आदि पक्षियोंके समुदाय उसकी शोभा बढ़ाते थे ॥ १० ॥

त्रिदशा दानवाश्चैव तेरुस्ते दुस्तरां नदीम् ।
यथा पद्मरजोध्वस्तां नलिनीं गजयूथपाः ॥ ११ ॥

देवता और दानव उस दुस्तर नदीको उसी प्रकार पार कर गये जैसे कमलोंके परागसे धूसर वर्णवाली पुष्करिणीको गजयूथपति लाँघ जाते हैं ॥ ११ ॥

ततः सृजन्तं वाणौघाननुह्लादं रथे स्थितम् ।
ददर्श तरसा देवो निघ्नन्तं यक्षवाहिनीम् ॥ १२ ॥

रथपर बैठा हुआ अनुह्लाद बाणसमूहोंकी वर्षा करके यक्षसेनाका वेगपूर्वक विनाश कर रहा था। यह बात स्वयं कुबेरने देखी ॥ १२ ॥

क्रुद्धस्ततो दैत्यबलं सूदयामास वित्तपः।
विक्षिप्तन्निव खे वायुर्महाभ्रपटलं बलात् ॥ १३ ॥

फिर तो जैसे वायु आकाशमें फैली हुई मेघोंकी भारी घटाको बलपूर्वक छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार क्रोधमें भरे हुए धनाध्यक्ष कुबेरने दैत्योंकी सेनाका संहार कर डाला॥

समीक्ष्य तुमुलं युद्धमनुह्लादश्च वीर्यवान् ।
रथेनादित्यवर्णेन कुबेरमभिदुद्रुवे ॥ १४ ॥

वह भयंकर युद्ध देखकर पराक्रमी अनुह्लादने सूर्यके समान तेजस्वी रथके द्वारा कुबेरपर धावा किया ॥ १४ ॥

स धनुर्धन्विनां श्रेष्ठो विकृष्य रणमूर्धनि ।
उत्ससर्ज शितान् बाणान् वित्तेशस्य महात्मनः ॥ १५ ॥

धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ उस दैत्यवीरने युद्धके मुहानेपर अपने धनुषको खींचकर महामनस्वी धनाध्यक्ष कुबेरपर पैने बाणोंका प्रहार किया ॥ १५ ॥

कुबेरं प्राप्य ते बाणा निर्भिद्य सुसमाहिताः।
अपरान् पृष्ठतोजघ्नुर्ध्यासकान् यक्षराक्षसान् ॥ १६ ॥

भविष्यपर्व ] षष्टितमोऽध्यायः [ ९३९

वे बाण कुबेरके पास पहुँचकर उनके शरीरको विदीर्ण करते हुए पीठकी ओरसे निकल गये और युद्धमें लगे हुए दूसरे-दूसरे यक्षों तथा राक्षसोंको एकाग्रतापूर्वक घायल करने लगे ॥ १६ ॥
देवः शरैरभिहतो निशितैर्ज्वलनोपमैः।
अनुह्लादं प्रत्युदियात् संक्रुद्धः पर माहवे ॥ १७ ॥
अग्निके समान तेजस्वी तथा पैने बाणोंसे घायल हुए धनाध्यक्ष कुबेर उस महासमरमें बहुत कुपित हुए और अनुह्लादका सामना करनेके लिये आगे बढ़े ॥ १७ ॥
ततो वैश्रवणो राजा क्रुद्धो यक्षगणैः सह।
ववर्ष शरवर्षाणि दानवं प्रति वीर्यवान् ॥ १८ ॥
क्रोधमें भरे हुए पराक्रमी राजा कुबेरने यक्षोंके साथ रहकर उस दानवपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ १८ ॥
तद्यथा शारदं वर्षं गोवृषः शीघ्रमागतम्।
अपारयन् वारयितुं प्रतिगृह्णन् निमीलितः ॥ १९ ॥
एवमेव कुबेरस्य शरवर्षं महासुरः।
निमीलिताक्षः सहसा दैत्यः सहति दारुणम् ॥ २० ॥
जैसे साँड़ शीघ्र आयी हुई शरद्-ऋतुकी वृष्टिको रोकनेमें असमर्थ हो आँख बंद करके उसके आघातको चुपचाप ग्रहण करता है, उसी प्रकार वह महान् असुर दैत्य कुबेर-द्वारा सहसा की गयी भयंकर बाणवर्षाको नेत्र मूंदकर चुपचाप सहन करने लगा ॥ १९-२० ॥
रोषितः शरवर्षेण धनदेन महासुरः।
इन्द्रकेतुप्रतीकाशमभीतोऽपश्यत द्रुमम् ॥ २१ ॥
प्रवृद्धशाखाविटपं तरुणाङ्कुरपल्लवम्।
उत्पाट्य कुपितो दैत्यस्तरुं फलसमन्वितम् ॥ २२ ॥
निजघान हयाञ्छ्रेष्ठान् कुबेरस्य महात्मनः।
कुबेरकी बाणवर्षासे रोषमे भरे हुए उस महान् असुरने तनिक भी भयभीत न होकर इन्द्रध्वजके समान एक विशाल वृक्षको देखा, जिसकी शाखाएँ और टहनियाँ विशेषरूपसे बढ़ी हुई थीं। उसमे नये-नये अङ्कुर और पल्लव निकले हुए थे तथा वह फलसे भी सम्पन्न था। उस कुपित हुए दैत्यने उस वृक्षको उखाड़कर उसके द्वारा महात्मा कुबेरके श्रेष्ठ घोड़ोंको मार डाला ॥ २१-२२ १/२ ॥
तस्य कर्म महाघोरं दृष्ट्वा सर्वे महासुराः ॥ २३ ॥
सिंहनादं नदन्ति स्म अनुह्लादप्रहर्षिताः।
उसके उस महाघोर-कर्मको देखकर सभी बड़े-बड़े असुर अनुह्लादसे प्रसन्न हो जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे ॥ २३ १/२ ॥
तयोस्तु तुमुलं युद्धं संजज्ञे देवदैत्ययोः ॥ २४ ॥
ततस्तौ क्रोधरक्ताक्षावन्योन्यवधकाङ्क्षिणौ।
अन्योन्यं विविधैः शस्त्रैर्घोरैर्जघ्नतुराहवे ॥ २५ ॥
उन देवता (कुबेर) और दैत्य (अनुह्लाद) में तुमुल युद्ध होने लगा। दोनोंके नेत्र क्रोधसे लाल हो रहे थे। दोनों ही उस युद्धमें एक-दूसरेके वधकी इच्छासे भाँति-भाँतिके घोर शस्त्रोंद्वारा परस्पर आघात कर रहे थे ॥ २४-२५ ॥
त्रिदशा दानवान् सर्वे मथित्वा प्राणदंस्तदा।
दानवैस्त्रिदशाश्चापि क्रुद्धैर्भुवि निपातिताः ॥ २६ ॥
समस्त देवता दानव-योद्धाओंको रौंदकर जोर-जोरसे गर्जना करते थे। इसी प्रकार कुपित हुए दानवोंने भी देवताओंको पृथ्वीपर मार गिराया था ॥ २६ ॥
दानवास्त्वथ संक्रुद्धास्त्रिदशान् निशितैः शरैः।
विध्युर्वज्रसंकाशैः कङ्कपत्रैरजिह्मगैः ॥ २७ ॥
दानव अत्यन्त कुपित हो वज्रके तुल्य तेजस्वी तथा कङ्कपत्र लगे हुए सीधे जानेवाले तीखे बाणोंसे देवताओंको घायल करने लगे ॥ २७ ॥
विदार्यमाणा दैत्यौघैस्त्रिदशास्तु महाबलाः।
अमर्षिततराश्चक्रुर्युद्धकर्माण्यभीतवत् ॥ २८ ॥
दैत्यसमूहोंद्वारा घायल किये जाते हुए महाबली देवता अत्यन्त अमर्षमें भरकर निर्भयकी भाँति युद्धकर्म करने लगे ॥
तैर्गदाभिः सुभीमाभिः पट्टिशैः शूलमुद्गरैः।
परिघैश्च सुतीक्ष्णाग्रैर्दानवाः पीडिताः शरैः ॥ २९ ॥
उन्होंने भयंकर गदा, पट्टिश, शूल, मुद्गर, परिघ तथा तेज धारवाले बाणोंद्वारा दानवोंको बड़ी पीड़ा दी ॥ २९ ॥
शरनिर्भिन्नगात्राश्च खड्गविच्छिन्नवक्षसः।
जगृहुस्ते शिलाश्चैव द्रुमांश्चासुरसत्तमाः ॥ ३० ॥
उन असुरशिरोमणि योद्धाओंके अङ्ग बाणोंसे क्षत-विक्षत हो रहे थे। उनकी छाती खड्गसे छिन्न-भिन्न हो गयी थी; अतः उन्होंने भी बड़ी-बड़ी शिलाएँ और वृक्ष हाथमें ले लिये॥
ते भीमवेगा दितिजा नर्दमानाः पुनः पुनः।
ममन्थुस्त्रिदशान् वीर्याच्छतशोऽथ सहस्रशः ॥ ३१ ॥
उन भयंकर वेगवाले सैकड़ों और हजारों दैत्योंने वारंवार गर्जना करके अपने बल-पराक्रमसे देवताओंको मथ डाला ॥ ३१ ॥
ततस्तु तुमुलं युद्धं तेषां समभिवर्तत।
शिलाभिर्विपुलाभिश्च शतशश्चैव पादपैः ॥ ३२ ॥
परिघैः पट्टिशैर्भल्लैर्भिन्दिपालैः परश्वधैः।
तदनन्तर उनमें घमासान युद्ध आरम्भ हो गया। वे बड़ी-बड़ी शिलाओं, सैकड़ों वृक्षों तथा परिघ, पट्टिश, भल्ल, भिन्दिपाल और फरसोंद्वारा एक-दूसरेको मारने लगे ॥ ३२ १/२ ॥
केचिन्निवृत्तशिरसः केचिच्च विडलीकृताः ॥ ३३ ॥
केचिद् विनिहता भूमौ रुधिराद्रीः सुरासुराः।
किसीके सिर उड़ गये, कोई विदीर्ण हो गये, कोई भूमिपर गिराकर मार डाले गये। इस प्रकार सभी देवता और असुर खूनसे लथपथ हो रहे थे ॥ ३३ १/२ ॥
केचिद् रणाजिराग्रण्णाः परस्परवधार्दिताः ॥ ३४ ॥
विभिन्नहृदयाः केचिच्छिन्नपादाश्च शेरते।

९४० श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे

विदारितास्त्रिशूलैश्च केचित् तत्र गतासवः ॥ ३५ ॥ परस्परकी मारसे पीड़ित हो कितने ही योद्धा समराङ्गणसे भाग गये। किन्हींके हृदय विदीर्ण हो गये। कोई पैर कट जानेसे पृथ्वीपर सो रहे थे और कितने ही त्रिशूलोंसे विदीर्ण हो वहाँ प्राणोंसे हाथ धो बैठे थे ॥ ३४-३५॥

तत् सुभीमं महद्युद्धं देवदानवसंकुलम् । बभूव तुमुलं युद्धं शिलापादपसंकुलम् ॥ ३६ ॥ वह देवताओं और दानवोंसे भरा हुआ महायुद्ध बड़ा भयंकर प्रतीत होता था; शिलाओं और वृक्षोंके प्रहारसे व्याप्त होनेके कारण उसकी भयंकरता और भी बढ़ गयी थी ॥ ३६ ॥

धनुर्ज्यातन्त्रिमधुरं हिक्कातालसमन्वितम् । आर्तस्तनितघोषार्थं युद्धं गान्धर्वमावभौ ॥ ३७ ॥ वहाँ धनुषकी प्रत्यञ्चारूपी वीणाकी मधुर तान छिड़ी हुई थी। योद्धाओंको जो हिचकियाँ आती थीं, वे ही मानो ताल थीं। पीड़ितोंके आर्तनाद ही मृदङ्ग आदि वाद्योंके घोष एवं आलाप थे। इस प्रकार वह युद्ध गान्धर्वमहोत्सव (संगीतसमारोह) के समान प्रतीत होता था ॥ ३७ ॥

कुवेरः स धनुष्पाणिर्दानवान् रणमूर्धनि । दिशो विद्रावयामास संक्रुद्धः शरवृष्टिभिः ॥ ३८ ॥ उस समय क्रोधमें भरे हुए कुवेर हाथमें धनुष लेकर युद्धके मुहानेपर बाणोंकी वर्षा करके दानवोंको सम्पूर्ण दिशाओंमें खदेड़ने लगे ॥ ३८ ॥

कुवेरेणार्दितं सैन्यं विद्रुतं प्रेक्ष्य दानवः । अभ्यद्रवदनुह्रादः प्रगृह्य महतीं शिलाम् ॥ ३९ ॥ अपनी सेनाको कुवेरसे पीड़ित हुई देख दानव अनुह्राद एक बहुत बड़ी शिला हाथमें लेकर कुवेरकी ओर दौड़ा ॥

क्रोधाद् द्विगुणरक्ताक्षः पितृतुल्यपराक्रमः । शिलां तां पातयामास कुवेरस्य रथोत्तमे ॥ ४० ॥ उस समय उसके नेत्र क्रोधसे दुगुने लाल हो रहे थे। वह अपने पिता हिरण्यकशिपुके समान पराक्रमी था। उसने कुवेरके उत्तम रथपर उस शिलाको दे मारा ॥ ४० ॥

आपतन्तीं शिलां दृष्ट्वा गदापाणिर्धनाधिपः । रथादाप्लुत्य वेगेन वसुधायां व्यतिष्ठत ॥ ४१ ॥ उस शिलाको आती देख हाथमें गदा लिये हुए कुवेर अपने रथसे वेगपूर्वक कूदकर पृथ्वीपर खड़े हो गये ॥ ४१ ॥

सचक्रकूवरहयं सध्वजं सशरासनम् । भङ्क्त्वा रथोत्तं तस्य निपपात शिला भुवि ॥ ४२ ॥ वह शिला कुवेरके उत्तम रथको चक्र, कूबर, घोड़े, ध्वज और धनुषसहित तोड़-फोड़कर भूमिपर गिर पड़ी ॥ ४२ ॥

विमथ्य तु कुवेरस्य प्रह्लादस्यानुजो रथम् । शूराणां कदनं चक्रे सस्कन्धविटपैर्द्रुमैः ॥ ४३ ॥ कुवेरके रथको नष्ट-भ्रष्ट करके प्रह्लादके छोटे भाई अनुह्रादने तनों और शाखाओंसहित वृक्षोंद्वारा देवपक्षके शूर-वीरोंका संहार आरम्भ किया ॥ ४३ ॥

निर्भिन्नशिरसो भग्नास्त्रिदशाः शोणितोक्षिताः । द्रुमप्रव्यथिताङ्गाश्च निपेतुर्धरणीतले ॥ ४४ ॥ देवताओंके सिर फूट गये। अङ्ग-भङ्ग हो गये। वे रक्तसे नहा गये। वृक्षोंकी मारसे उनके सारे अङ्ग व्यथित होने लगे और वे पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ४४ ॥

विद्राव्य विपुलं सैन्यमनुह्रादो महासुरः । गिरिशृङ्गं गृहीत्वा तु कुवेरमभिदुद्रुवे ॥ ४५ ॥ महान् असुर अनुह्रादने देवताओंकी विशाल सेनाको भगाकर एक पर्वतका शिखर हाथमें ले लिया और कुवेरपर धावा किया ॥ ४५ ॥

तमापतन्तं धनदो गदामुद्यम्य वीर्यवान् । विनदित्वाऽऽह्वयामास दानवेन्द्रं महाबलम् ॥ ४६ ॥ उसे आते देख पराक्रमी कुवेरने गदा उठा ली और बड़े जोरसे गरजकर उस महाबली दानवराजको ललकारा ॥

तस्य दैत्यस्य संक्रुद्धो गदां तां बहुकण्टकाम् । न्यपातयत वित्तेशो दानवस्योरसि प्रभो ॥ ४७ ॥ प्रभो ! धनके स्वामी कुवेरने कुपित होकर उस दैत्य एवं दानवकी छातीपर उस गदाको दे मारा, जिसमें बहुत-से काँटे लगे हुए थे ॥ ४७ ॥

दैत्यः स क्रोधताम्राक्षस्तं प्रहारमचिन्तयन् । वित्तेशस्योपरि तदा गिरिशृङ्गमपातयत् ॥ ४८ ॥ परंतु क्रोधसे लाल आँखें किये उस दैत्यने उनके उस प्रहारकी कोई परवा नहीं की और धनके स्वामी कुवेरपर तत्काल ही उस पर्वतशिखरको गिरा दिया ॥ ४८ ॥

स विह्वलितसर्वाङ्गो गिरिशृङ्गेन ताडितः । पपात सहसा भूमौ विशीर्ण इव पर्वतः ॥ ४९ ॥ पर्वतशिखरकी चोट खाकर कुवेरके सारे अङ्ग विह्वल हो गये और वे चूर-चूर हुए पर्वतकी भाँति सहसा पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ४९ ॥

वित्तेशं विह्वलं दृष्ट्वा सर्वे ते यक्षराक्षसाः । परिवार्य महात्मानं ररक्षुर्भीमविक्रमाः ॥ ५० ॥ महात्मा धनेशको विह्वल हुआ देख वे भयंकर पराक्रमी समस्त यक्ष और राक्षस उन्हें चारों ओरसे घेरकर उनकी रक्षा करने लगे ॥ ५० ॥

मुहूर्तं विह्वलो भूत्वा पुनर्वैश्रवसः सुतः । उपतस्थे च सहसा धनदः क्रोधमूर्च्छितः ॥ ५१ ॥ स ननाद महानादं त्रैलोक्यमभिनादयन् । जनयंश्च निर्घोषं विधमन्निव पर्वतान् ॥ ५२ ॥ दो घड़ीतक व्याकुल रहनेके पश्चात् विश्रवाके पुत्र धनदाता कुवेर सहसा उठकर खड़े हो गये और पुनः क्रोधसे मूर्च्छित हो तीनों लोकोंको प्रतिध्वनित करते हुए बड़े जोर-

भविष्यपर्व ] षष्टितमोऽध्यायः ९४१

जोरसे सिंहनाद करने लगे। उस समय वे मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके समान घोष उत्पन्न करने और पर्वतोंको भी ताप सा देने लगे ॥ ५१-५२ ॥

तमवध्यं तु विज्ञाय निहन्तुं पुनरुत्थितम् ।
प्रेक्ष्य पिङ्गाक्षमायान्तं दानवा विप्रदुद्रुवुः ॥ ५३ ॥

पिङ्गल नेत्रवाले कुबेर अवध्य हैं और पुनः दानवोंका संहार करनेके लिये उठ गये हैं। यह जानकर उन्हें आते देख समस्त दानव सहसा भाग खड़े हुए ॥ ५३ ॥

तांस्तु विद्रवतो दृष्ट्वासुह्लादो ह्यसुरोऽब्रवीत् ।
कालनेमिं दानवं च वीर्यदर्पसमन्वितम् ॥ ५४ ॥
आत्मानं चैव वीर्यं च विस्मृत्याभिजर्न तथा ।
क्व गच्छथ भयत्रस्ताः प्राकृता इव दानवाः ॥ ५५ ॥
निवर्तध्वं महावीर्याः किं प्राणान् परिरक्षथ ।
नालं युद्धाय यक्षोऽयं महतीयं विभीषिका ॥ ५६ ॥

उन सबको भागते देख असुर अनुह्लादने कहा—‘महापराक्रमी दानवो ! तुमलोग बल और दर्पसे भरे हुए दानव कालनेमिको, अपनेको तथा अपने पराक्रम और कुलको भूलकर निम्नश्रेणीके मनुष्योंकी भाँति भयभीत होकर कहाँ भागे जा रहे हो। लौट आओ ! क्यों अपने प्राण बचानेकी चेष्टामें लगे हो। यह यक्ष युद्ध करनेमें समर्थ नहीं है, यह गर्जना इसकी महती विभीषिकामान्न है ॥ ५४-५६ ॥

एतां विभीषिकामद्य दानवानां समुत्थिताम् ।
विक्रम्य विधमिष्यामि निवर्तध्वं महासुराः ॥ ५७ ॥

‘महान् असुरो ! तुमलोग लौट आओ। मैं यक्षराजकी इस विभीषिकाको, जो दानवोंके लिये उठी हुई है, पराक्रमपूर्वक नष्ट कर दूँगा' ॥ ५७ ॥

तेऽसुराः संनिवृत्ताश्च समदा इव कुञ्जराः ।
निजघ्नुः परमक्रुद्धा देवसैन्यं महासुराः ॥ ५८ ॥

यह सुनकर मतवाले हाथियोंके समान वे असुर लौट आये और अत्यन्त क्रोधमें भरकर वे महान् असुर देवसेनाका संहार करने लगे ॥ ५८ ॥

क्षीणप्रहरणाः केचिन्महामेघनिभस्वनाः ।
दर्पोत्कटा भुजैरेव सम्प्रहारं प्रचक्रिरे ॥ ५९ ॥

कितने ही दैत्य आयुधोंके नष्ट हो जानेसे महान् मेघके समान केवल गर्जना कर रहे थे। कितने ही उत्कट दर्पसे युक्त हो भुजाओंसे ही प्रहार करते थे ॥ ५९ ॥

प्रांशुभिश्चैव काष्ठैश्च शिलाभिश्च महाबलाः ।
बाहुभिश्च तथान्योन्यमाक्षिपन्ति स्म वेगिताः ॥ ६० ॥

वे महान् बलशाली वेगवान् योद्धा ऊँचे-ऊँचे काष्ठों, शिलाओं तथा भुजाओं द्वारा एक दूसरेपर प्रहार करते थे ॥

मुष्टिभिश्च तलैश्चैव नखघातैर्महाबलाः ।
पादपैश्च महाशाखैर्युध्यन्त रणाजिरे ॥ ६१ ॥

महाबली सैनिक उस समराङ्गणमें मुक्कों, थप्पड़ों, नख-प्रहारों तथा बड़ी-बड़ी शाखाओंवाले वृक्षोंद्वारा युद्ध करते थे ॥

अनुह्लादस्त संक्रुद्धो देवतानां महाचमूम् ।
ममन्थ परमायत्तो वनान्यग्निरिवोत्थितः ॥ ६२ ॥

क्रोधमें भरा हुआ अनुह्लाद विजयके लिये परम प्रयत्नशील हो देवताओंकी उस विशाल वाहिनीको उसी प्रकार मथने लगा, जैसे प्रज्वलित हुआ दावानल जंगलोंको जलाकर भस्म कर डालता है ॥ ६२ ॥

रुधिराद्रांस्तु बहवः शेरते योधसत्तमाः ।
विकृताः पतिता भूमौ ताम्रपुष्पा इव द्रुमाः ॥ ६३ ॥

बहुत-से श्रेष्ठ योद्धा रक्तसे भी भीगकर विकृत अवस्थामें भूमिपर पड़े हुए सो रहे थे, जो लाल फूलवाले वृक्षोंके समान शोभा पाते थे ॥ ६३ ॥

अनुह्लादस्य विक्रान्तो देवस्त्वाशीविषोपमान् ।
युध्यमानस्य समरे व्यसृजन्निशिताञ्छरान् ॥ ६४ ॥

पराक्रमी देवता कुबेर समरभूमिमें जूझते हुए अनुह्लादपर विषधर सर्पोंके समान भयंकर और पैने बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ६४ ॥

धनाधिपेन विद्धस्य अनुह्लादस्य संयुगे ।
अङ्गारमिश्राः क्रुद्धस्य मुखान्निष्चेरुरर्चिषः ॥ ६५ ॥

युद्धमें धनाध्यक्ष कुबेरद्वारा घायल किये गये अनुह्लादके मुखसे क्रोधवश अङ्गारयुक्त आगकी लपटें निकलने लगीं ॥

अथ. वाणसहस्रेण वित्तेशं दानवोत्तमः ।
विव्याध स शरैः क्रुद्धो दण्डपाणिरिवान्तकः ॥ ६६ ॥

तब कुपित हुए दण्डधारी यमराजके समान दानवशिरोमणि अनुह्लादने धनेश्वर कुबेरको अपने सहस्रों बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ६६ ॥

कुबेरस्तु शरैर्भिन्नः समन्तात् क्षतजोक्षितः ।
रुधिरं परिसुस्राव गिरिः प्रस्रवणैरिव ॥ ६७ ॥

सब ओरसे बाणोंद्वारा विदीर्ण हुए कुबेर रक्तसे नहा गये। जैसे झरनोंसे युक्त पर्वत पानीकी धारा बहाता है, उसी प्रकार कुबेर अपने अङ्गोंसे रक्त बहाने लगे (और बेहोश हो गये) ॥ ६७ ॥

लब्ध्वा स तु पुनः संज्ञां रोषरक्तेक्षणः सुरः ।
गदामथ समासाद्य भीमां भीमपराक्रमः ।
चिक्षेप दैत्यमुद्दिश्य वलात् क्रोधेन मूर्च्छितः ॥ ६८ ॥

पुनः होशमें आनेपर रोषसे लाल आँखें किये भयानक पराक्रमी देवता कुबेरने भयंकर गदा हाथमें ले क्रोधसे अचेत-से होकर उस दैत्यको लक्ष्य करके उसे बलपूर्वक दे मारा ॥

अप्राप्तामन्तरे सोऽथ तां गदां गदयाऽसुरः ।
बभञ्ज विनदन् क्रुद्धस्तदाश्चर्यमभूत् तदा ॥ ६९ ॥

किंतु सिंहनाद करते हुए उस दैत्यने निकट आनेसे पहले ही अपनी गदासे उस गदाको क्रोधपूर्वक बीचमें ही तोड़ डाला। उस समय वह एक आश्चर्यकी-सी बात हुई ॥

९४२श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

प्रगृह्य तु गदां भूयो ह्यभिदुद्राव दानवम्।
तमापतन्तं दृष्ट्वैव अनुह्लादो महाबलः ॥ ७० ॥
गिरिशृङ्गमिवोत्पाट्य कैलासाचलसंनिभम्।
धनाधिपं प्रदुद्राव व्यादितास्य इवान्तकः ॥ ७१ ॥

कुबेर पुनः गदा लेकर उस दानवकी ओर दौड़े। महाबली अनुह्लाद उन्हें आक्रमण करते देख कैलास पर्वतके सदृश विशाल शैलशिखर-सा उखाड़कर मुँह बाये हुए कालके समान धनाध्यक्षकी ओर दौड़ा ॥ ७०-७१ ॥

तमन्तकमिवायान्तमजेयं सकलैः सुरैः।
ग्रसन्तमिव तं दैत्यं त्रैलोक्यमखिलं रुषा ॥ ७२ ॥
तमालोक्य तथा भूतं धनाध्यक्षो रणं भयात्।
अपहाय ययौ तत्र यत्र शक्रः सुराधिपः ॥ ७३ ॥

वह दैत्य समस्त देवताओंके लिये अजेय था और यमराजके समान रोषवश सम्पूर्ण त्रिलोकीको ग्रस लेनेके लिये उद्यत जान पड़ता था। उसे उस रूपमें आते देख धनाध्यक्ष कुबेर भयके कारण रणभूमिको त्यागकर उस स्थानपर चले गये, जहाँ देवराज इन्द्र युद्ध करते थे ७२-७३

तस्य चापि महत् कर्म दृष्ट्वा वित्तपतिस्तदा।
जगाम भयसंत्रस्तो यत्र देवः शचीपतिः ॥ ७४ ॥

उसका महान् पराक्रम देखकर धनपति कुबेर भयसे थर्रा उठे और जहाँ शचीपति इन्द्र थे, वहीं चले गये ॥७४॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे देवासुरयुद्धे अनुह्लादकुबेरयुद्धवर्णने षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें देवासुरसंग्राममें अनुह्लाद और कुबेरके युद्धका वर्णनविषयक साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६० ॥


एकषष्टितमोऽध्यायः

वरुणका विप्रचित्तिके साथ युद्ध और पराजय

वैशम्पायन उवाच

विप्रचित्तिस्तु वरुणं दैत्यानामादिरव्ययम्।
जघानेषुगणैः क्रुद्धो दीप्तैरिव महोरगैः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! दैत्योंके आदि पुरुष विप्रचित्तिने अविनाशी देवता वरुणको क्रोधपूर्वक अपने बाणसमूहोंसे घायल कर दिया। उसके वे बाण तेजस्वी सर्पोंके समान जान पड़ते थे ॥ १ ॥

स दह्यमानो दैत्येन दीप्तैः शरगभस्तिभिः।
नाभ्यजानत कर्तव्यं संग्रामे स जलेश्वरः ॥ २ ॥

वह दैत्य जब बाणरूपी दीप्तिमान् किरणोंसे वरुणको दग्ध करने लगा, उस समय संग्राममें खड़े हुए जलेश्वर वरुण यह भी न समझ सके कि अब मुझे क्या करना चाहिये ॥ २ ॥

सर्वलोकेश्वरस्येव परमेष्ठी प्रजापतिः।
न शक्तोत्यग्रतः स्थातुं विप्रचित्तेर्जलाधिपः ॥ ३ ॥

जैसे सर्वलोकेश्वर परमात्माके समक्ष प्रजापति परमेष्ठी नहीं ठहर सकते, इसी प्रकार दानवराज विप्रचित्तिके आगे जलके स्वामी वरुण नहीं ठहर सके ॥ ३ ॥

वज्रो नाम महान्व्यूहो निर्भयः सर्वतोमुखः।
तं व्यूह्य प्रत्ययुध्यन्त दानवा देववाहिनीम् ॥ ४ ॥

वज्रनामक महान् व्यूहका मुख सब ओर होता है, वह सर्वथा निर्भय हुआ करता है। उसी व्यूहका आश्रय लेकर दानव-योद्धा देवसेनाके साथ युद्ध करने लगे ॥ ४ ॥

वह्निज्वालासमं तत्र रविमण्डलसंनिभम्।
मुखमाभाति दैत्यस्य विप्रचित्तेर्महात्मनः ॥ ५ ॥

महामनस्वी विप्रचित्ति नामक दैत्यका मुख वहाँ अग्निज्वाला तथा सूर्यमण्डलके समान प्रकाशित होता था ॥ ५ ॥

वरुणस्तु महातेजा विप्रचित्तिं महासुरम्।
प्रदहन्निव तेजोभिर्जिगीषुः प्रत्यवैक्षत ॥ ६ ॥

महातेजस्वी वरुणने विजयकी इच्छा मनमें लेकर विप्रचित्ति नामक महान् असुरकी ओर इस प्रकार देखा, मानो वे अपने तेजसे उसको दग्ध कर डालेंगे ॥ ६ ॥

स्रग्दाममालाभरणः केयूराङ्गदभूषणः।
जग्राह परिघं दैत्यः कैलासशिखरोपमम् ॥ ७ ॥

दैत्य विप्रचित्ति फूलोंके हार तथा सुवर्ण आदिकी मालाओंसे अलंकृत था। उसकी भुजाओंमें केयूर तथा अङ्गद नामक आभूषण शोभा दे रहे थे। उसने कैलासशिखरके समान एक परिघ हाथमें लिया ॥ ७ ॥

पिनद्धं काञ्चनैः पट्टैर्हेममालिनमायसम्।
यमदण्डोपमं घोरं दैत्यानां भयनाशनम् ॥ ८ ॥

उसपर सोनेके पत्र जड़े हुए थे। वह परिघ लोहेका बना हुआ था और सोनेकी मालासे अलंकृत था। देखनेमें यमदण्डके समान भयंकर था, किंतु दैत्योंके भयका नाश करनेवाला था ॥ ८ ॥

भ्रामयामास संक्रुद्धो महाशक्रध्वजोपमम्।
विननाद विवृत्ताक्ष्यो विप्रचित्तिर्महासुरः ॥ ९ ॥

महान् असुर विप्रचित्तिने अत्यन्त कुपित होकर इन्द्र

[भविष्यपर्व] एकषष्टितमोऽध्यायः ९४३

ध्वजके समान उस विशाल परिघको घुमाया और मुँह फैलाकर बड़ी जोर-जोरसे गर्जना की॥ ९॥

स कण्ठस्थेन निष्केण भुजस्थैरपि चाङ्गदैः।
कुण्डलाभ्यां विचित्राभ्यां भ्राजते काञ्चनस्रजा॥ १०॥
उसके कण्ठमें सुवर्णमय पदक, भुजाओंमें बाजूबंद, कानोंमें विचित्र कुण्डल तथा वक्षःस्थलपर सोनेके हार सुशोभित थे, जिनसे वह दानव प्रकाशित हो रहा था ॥१०॥

दानवो भूषणैर्भाति परिघेणायसेन च।
यथेन्द्रधनुषा मेघः सविद्युत्स्तनयित्नुमान्॥ ११॥
लोहेके परिघ और सोनेके आभूषणोंसे युक्त वह दानव इन्द्रधनुष, विद्युत् और गर्जनासे युक्त मेघके समान शोभा पा रहा था॥ ११॥

प्रस्फुरन् परिघाग्रेण वातस्कन्धान्महास्वनः।
जज्वाल च सधूमार्चिः साङ्घर्पण इवानलः॥ १२॥
परिघनामक अस्त्रसे वायुसमूहोंको संचालित करते हुए जोर-जोरसे सिंहनाद करनेवाला वह दैत्य धूम और ज्वालाओं-सहित प्रलयकालीन अग्निके समान प्रज्वलित हो उठा॥

विद्याधरगणैः सार्धं गन्धर्वनगरैरपि।
सह चैवामरावत्या सिद्धलोकैस्तथा सह॥ १३॥
ग्रहनक्षत्रसहितं सार्कचन्द्रविभूषितम्।
दैत्येन्द्रपरिघोद्धूतं भ्रमतीव नभस्तलम्॥ १४॥
विद्याधरगण, गन्धर्वनगर, अमरावती पुरी तथा सिद्ध-लोकोंके साथ ग्रह-नक्षत्रोंसहित एवं सूर्य और चन्द्रमासे विभूषित आकाश उस दैत्यराजके परिघसे उद्ध्रान्त होकर चक्कर-सा काटने लगा॥ १३-१४॥

दुरासदः सुसंज्ञे परिघाभरणक्षमः।
सुरेन्धनोऽसुरेन्द्राग्निर्यंगान्ताग्निरिवोत्थितः॥ १५॥
परिघको धारण करने और सब ओर घुमानेमें समर्थ वह दैत्य दुर्जय हो गया था। अग्निके समान तेजस्वी वह असुरराज विप्रचित्ति प्रलयकालकी आगके समान उठ खड़ा हुआ था, देवता उसकी आँचसे ईन्धनकी भाँति जल रहे थे॥ १५॥

त्रिदशा वरुणश्चैव न शेकुः स्पन्दितुं भयात्।
तत्रासीन्निर्भयस्त्वेकः कौशिको वासवः प्रभुः॥ १६॥
देवता और वरुण उसके भयके मारे हिल-डुल भी न सके। वहाँ एकमात्र सामर्थ्यशाली कौशिक इन्द्र ही निर्भय खड़े रहे॥ १६॥

भास्करप्रतिमं घोरं परिघं रौद्रदर्शनम्।
पातयामास सेनायां जलेशस्य स दानवः॥ १७॥
उस दानवने उस सूर्यतुल्य तेजस्वी घोर परिघको, जो देखनेमें बड़ा ही भयंकर था, जलेश्वर वरुणकी सेनामें गिराया॥ १७॥

पतता तेन संग्रामे जलेशस्य महात्मनः।
भूतानां शतसाहस्रं परिघेण समाहतम्।
तेषां गात्राणि चासाद्य व्यशीर्यन्त सहस्रशः॥ १८॥
संग्रामभूमिमें वहाँ गिरते हुए उस परिघने महात्मा वरुण-के एक लाख भूतोंको हताहत कर दिया। उस परिघसे टकरा-कर उनके शरीरोंके सहस्रों टुकड़े हो गये॥ १८॥

विशीर्यमाणं विचभावुल्काशतमिवाम्बरे।
भूयश्चैनं तदाऽऽभ्राम्य वरुणाय न्यपातयत्॥ १९॥
जीर्ण-शीर्ण होते हुए वरुणके सैनिक आकाशमें सैकड़ों उल्काओंके समान प्रतीत हो रहे थे। तदनन्तर विप्रचित्तिने पुनः उस परिघको घुमाकर वरुणपर दे मारा॥ १९॥

पात्यमाने तदा तस्मिञ्छरीरे वारुणे तदा।
स भिन्नः परिघो घोरो देवगात्रे व्यशीर्यत॥ २०॥
वरुणके शरीरपर पड़ते ही उस परिघके टुकड़े-टुकड़े हो गये। वह भयंकर परिघ वरुणदेवके शरीरसे टकराकर टूक-टूक हो गया॥ २०॥

शीर्यमाणस्य चूर्णानि खद्योता इव चाम्बरे।
स तु तेन प्रहारेण न चचाल जलाधिपः॥ २१॥
परिघेण हतः संख्ये यथा वज्रहतोऽचलः।
जीर्ण-शीर्ण होकर गिरते हुए उस परिघके चूर्ण आकाश-में खद्योतोंके समान प्रकाशित होते थे। उस प्रहारसे जलेश्वर वरुण विचलित नहीं हुए। परिघकी मार खाकर भी वे युद्धमें वज्रसे आहत हुए पर्वतकी भाँति स्थिरभावसे खड़े रहे॥ २१॥

खसैन्येष्वपि भग्नेषु भिन्नदेहेषु चाहवे॥ २२॥
मुहूर्तमगमत् क्षोभमपाम्पतिरमर्षणः।
सोऽमर्षं च समापन्नो वरुणोऽमितविक्रमः॥ २३॥
युद्धस्थलमें अपने सैनिकोंके भग्न एवं घायल होनेपर अमर्षशील जलेश्वर वरुणको दो घड़ीतक बड़ा क्षोभ रहा। वे अमित पराक्रमी वरुण अमर्षमें भर गये॥ २२-२३॥

सर्वसंहारमकरोत् स्वपक्षस्यारिमर्दनः।
स सागरैश्चतुर्भिंश्च वृतो दीप्तैश्च पन्नगैः॥ २४॥
शङ्खमुक्तामणिश्चितो विभ्रत्तोयमयं वपुः।
पाण्डुरोद्धूतवसनो नानारत्नविभूषितः॥ २५॥
तत्पश्चात् शत्रुमर्दैन वरुणने अपने पक्षके सभी लोगोंको पूर्णतः संगठित किया। वे जलमय शरीर धारण करके शङ्खों और मुक्तामणियोँसे विभूषित हुए। उस समय चारों समुद्र उन्हें घेरकर खड़े हो गये। तेजस्वी सर्पोंने भी उनका साथ दिया। उनके श्वेत वस्त्र हवासे हिल रहे थे तथा वे नाना प्रकारके रत्नोंसे अलंकृत थे॥ २४-२५॥

वरुणः पाशधृक्श्रीमान् कूर्ममीनसमाकुलः।
वरुणस्तु तदा क्रुद्धस्तान् निरीक्ष्य स्वसैनिकान्॥ २६॥

९४४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


उवाच दृष्ट्वा युध्यध्वं दानवानां जिघांसया ।
अहमेनं हनिष्यामि भयं मुक्त्वा तु युध्यत ॥ २७ ॥
कछुओं और मत्स्योंसे व्याप्त हुए पाशधारी श्रीमान् वरुणदेवने कुपित हो अपने सैनिकोंकी ओर देखकर कहा— 'वीरो ! तुमलोग दानवोंके वधकी इच्छासे युद्ध करो। मैं इस दानवका वध करूँगा। तुमलोग भय छोड़कर युद्धमें डटे रहो' ॥ २६-२७ ॥

ततस्ते पन्नगाः सर्वे महार्णवजलाश्रयाः ।
जघ्नुर्दैत्यान् रणमुखे नदन्तो जयगृद्धिनः ॥ २८ ॥
तब महासागरके जलमें निवास करनेवाले समस्त सर्प विजयकी अभिलाषासे सिंहनाद करते हुए युद्धके मुहानेपर दैत्योंका संहार करने लगे ॥ २८ ॥

ते तु नालीकनाराचैर्गदाभिर्मुसलैस्तथा ।
अभ्यघ्नन् दानवान् दृष्ट्वा मुदिता वरुणानुगाः ॥ २९ ॥
हर्ष और उल्लासमें भरे हुए वरुणके उन सैनिकोंने नालीक, नाराच, गदा और मुसलोंद्वारा दानवोंको मारना आरम्भ किया ॥ २९ ॥

विप्रचित्तिस्तु संक्रुद्धो महाबलपराक्रमः ।
पन्नगानां शरीराणि व्यधमद् युद्धदुर्मदः ॥ ३० ॥
तब महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न रणदुर्मद विप्रचित्ति अत्यन्त कुपित हो सर्पोंके शरीरोंका विनाश करने लगा ॥ ३० ॥

गरुडेनापि चास्त्रेण पन्नगान् दानवोत्तमः ।
समरे घातयामास गरुडैः पन्नगाशनैः ॥ ३१ ॥
उस दानव-शिरोमणिने गरुडास्त्रका प्रयोग करके सर्प-भोजी गरुड़ोंद्वारा समराङ्गणमें सर्पोंका संहार करा दिया ॥

स शरैः सूर्यसंकाशैः शातकुम्भविभूषितैः ।
पन्नगान् समरे वीरः प्रममाथ सुदुर्जयन् ॥ ३२ ॥
संग्रामभूमिमें वीर विप्रचित्तिने सूर्यतुल्य तेजस्वी सुवर्ण-भूषित बाणोंद्वारा अत्यन्त दुर्जय सर्पोंको मथ डाला ॥ ३२ ॥

समरे भिन्नगात्रास्ते पन्नगाः शरपीडिताः ।
पेतुरन्मथितसर्वाङ्गा गजा इव महागजैः ॥ ३३ ॥
रणभूमिमें बाणोंसे पीड़ित हुए सभी सर्प घायल हो धराशायी हो गये। उस समय वे जिनके सारे अङ्ग महान् गजराजोंने मथ डाले हों उन हाथियोंके समान पृथ्वीपर पड़े थे ॥ ३३ ॥

तपन्तं तमिवादित्यं दीप्तैर्बाणगभस्तिभिः ।
अभ्यधावत संक्रुद्धः समरे वरुणः प्रभुः ॥ ३४ ॥
उस समय समराङ्गणमें बाणरूपी दीप्तिमान् किरणोंद्वारा सूर्यके समान तपनेवाले उस दैत्यपर भगवान् वरुणने अत्यन्त क्रोधपूर्वक धावा किया ॥ ३४ ॥

ततस्तु दानवास्तत्र भिन्नदेहाः सहस्रशः ।
व्यथिता विद्रवन्ति स्म दिशो दश विचेतसः ॥ ३५ ॥
फिर तो उनके द्वारा शरीर छिन्न-भिन्न हो जानेके कारण वहाँ पीड़ित हुए सहस्रों दानव अचेत-से होकर दसों दिशाओंमें भागने लगे ॥ ३५ ॥

इन्द्रस्यार्थे पराक्रम्य वरुणस्त्यक्तजीवितः ।
विनर्दमानो युयुधे समरे पाशभृद्वरः ॥ ३६ ॥
पाशधारियोंमें श्रेष्ठ वरुणदेव जीवनका मोह छोड़कर पराक्रमपूर्वक गर्जना करते हुए समरभूमिमें इन्द्रके लिये युद्ध करने लगे ॥ ३६ ॥

वरुणः पन्नगाश्चैव मुष्टिभिः समरोत्कटाः ।
अभ्यवर्तन्त समरे विप्रचित्तिं महासुरम् ॥ ३७ ॥
वरुण और सर्प युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले थे; वे शत्रुओंपर मुक्कोंका प्रहार करते हुए संग्रामभूमिमें महान् असुर विप्रचित्तिका सामना करने लगे ॥ ३७ ॥

ततोऽस्त्रैश्च शिलाभिश्च प्रहरन् स बलोत्कटः ।
व्यपोहत महातेजा विप्रचित्तिर्महासुरः ॥ ३८ ॥
तत्पश्चात् उत्कट बलशाली, महातेजस्वी महान् असुर विप्रचित्तिने अस्त्रों और शिलाओंद्वारा प्रहार किया और शत्रुओंको मार भगाया ॥ ३८ ॥

ततः पावकसंकाशैः स मुक्तैः शीघ्रगामिभिः ।
वरुणस्य महावेगान् विभेद समरे हयान् ॥ ३९ ॥
उसने अपने धनुषसे छूटे हुए अग्नितुल्य तेजस्वी एवं शीघ्रगामी बाणोंद्वारा वरुणके महान् वेगशाली घोड़ोंको समराङ्गणमें क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ३९ ॥

कर्मणा तेन महता विप्रचित्तेर्महात्मनः ।
अग्नेराज्याहुतस्येव तेजः समभिवर्धत ॥ ४० ॥
जैसे घीकी आहुति देनेसे अग्निका तेज बढ़ता है, उसी प्रकार उस महान् कर्मसे महामनस्वी विप्रचित्तिका तेज एवं प्रताप बढ़ने लगा ॥ ४० ॥

स शरैः सूर्यसंकाशैः सुमुक्तैः शीघ्रगामिभिः ।
वारुणीं तां महासेनां निर्ममन्थ महाबलः ॥ ४१ ॥
उस महाबली दानवने भलीभाँति छोड़े गये शीघ्रगामी एवं सूर्यतुल्य तेजस्वी बाणोंद्वारा वरुणदेवकी उस विशाल सेनाको मथ डाला ॥ ४१ ॥

क्षीणास्त्रां सायकाक्रान्तां शरजालेन मोहिताम् ।
शूलशक्त्यृष्टिभिन्नां च चकार रुधिरोक्षिताम् ॥ ४२ ॥
उसने वरुणके सैनिकोंके अस्त्र-शस्त्र काट डाले, उन्हें सायकोंसे आक्रान्त कर दिया; वे सब-के-सब उसके बाणजालसे आच्छादित होकर मोहके वशीभूत हो गये, विप्रचित्तिने उन सबको शूल, शक्ति और ऋष्टि आदि शस्त्रोंसे घायल करके खूनसे लथपथ कर दिया ॥ ४२ ॥

भविष्यपर्व ] द्विषष्टितमोऽध्यायः ९४५


स शरैर्वह्निसंकाशैः सुमुक्तैर्नतपर्वभिः ।
वरुणस्य महावेगान् बिभेद समरे हयान् ॥ ४३ ॥

अभिद्रुतोऽथ दैत्येन ससैन्यः सलिलाधिपः ।
महेन्द्रं शरणं प्राप्तो विप्रचित्तेर्भयार्दितः ॥ ४४ ॥

उस दानवने उत्तम रीतिसे छोड़े गये झुकी हुई गाँठवाले अग्नितुल्य तेजस्वी बाणोंद्वारा समरभूमिमें वरुण देवताके महान् वेगशाली घोड़ोंको घायल कर दिया ॥ ४३ ॥

उस दैत्यने जलके स्वामी वरुणको सेनासहित वहाँसे भाग जानेको विवश कर दिया । वे विप्रचित्तिके भयसे पीड़ित हो देवराज इन्द्रकी शरणमें चले गये ॥ ४४ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामने वरुणविप्रचित्तियुद्धे एकषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें वरुण और विप्रचित्तिका युद्धविषयक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६१ ॥


द्विषष्टितमोऽध्यायः

अग्निद्वारा दैत्योंकी पराजय तथा बृहस्पतिके द्वारा अग्निदेवका स्तवन

वैशम्पायन उवाच
पराजयं तु देवानां दृष्ट्वाग्निर्देवसत्तमः ।
चकार बुद्धिं दैत्यानां वधे ब्रह्मर्षिभिः स्तुतः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! देवताओंकी यह पराजय देखकर ब्रह्मर्षियोंद्वारा प्रशंसित देवशिरोमणि अग्निने दैत्योंके वधका विचार किया ॥ १ ॥

स्वयं प्रभायाः शाण्डिल्या यः पुत्रो हव्यवाहनः ।
हिरण्यरेताः पिङ्गाक्षो देवहूतो हुताशनः ॥ २ ॥
रोहितो लोहितग्रीवो हर्ता दाता हविः कविः ।
पावको विश्वभुग् देवः सर्वदेवाननः प्रभुः ॥ ३ ॥
सुब्रह्मात्मा सुवर्चस्कः सहस्रार्चिर्विभावसुः ।
कृष्णवर्त्मा चित्रभानुर्देवानाम्पि देवराट् ॥ ४ ॥
लोकसाक्षी द्विजहुतः सदर्चिष्मान् वषट्कृतः ।
हव्यभक्षः शमीगर्भस्वयोनिः सर्वकर्मकृत् ॥ ५ ॥
पावनः सर्वभूतानां त्रिदशानां तपोनिधिः ।
शमनः सर्वपापानां लेलिहानस्तपोमयः ॥ ६ ॥
प्रदक्षिणावर्तशिखः शुचिरोमा महाकृतिः ।
हव्यभुग् भूतभव्येशो यज्ञभागहरो हरिः ॥ ७ ॥
सोमपः सुमहातेजा भूतेशः सुमहातपाः ।
अधृष्यः पावको भूतिर्भूतात्मा वै स्वधाधिपः ॥ ८ ॥
स्वाहापतिः सामगीतः सोमपूताशनोऽद्रिधृक् ।
देवदेवो महाक्रोधो रुद्रात्मा ब्रह्मसम्भवः ॥ ९ ॥
लोहिताश्वं वायुचक्रं रथमास्थाय भूतधृक् ।
धूमकेतुर्धूमशिखो नीलवासाः सुरोत्तमः ॥ १० ॥
उद्यम्य दिव्यमाग्नेयं शस्त्रं देवो रणे महान् ।
दानवानां सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च ॥ ११ ॥
ददाह भगवान् वह्निः संक्रुद्धः प्रलये यथा ।

जो स्वयंप्रभा शाण्डिलीके पुत्र हैं, हविष्यका वहन करते हैं। सुवर्ण जिनका रेतस् (वीर्य) है। जिनके नेत्र पिङ्गल वर्णके हैं। देवता जिनका आवाहन करते हैं। जो आहुतिमें प्राप्त हुए हविष्यका भक्षण करते हैं। जिनका वर्ण लाल है। जिनकी ग्रीवा भी लाल रंगकी बतायी गयी है। जो दोषोंका हरण करनेवाले, दाता, हव्य-कव्यस्वरूप, पवित्र करनेवाले, विश्वभोक्ता, देव, सम्पूर्ण देवताओंके मुख तथा सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। सुन्दर वेद जिनके स्वरूप हैं। जो उत्तम तेजसे सम्पन्न हैं। जिनसे सहस्रों ज्वालाएँ उठती रहती हैं। विभा (उत्कृष्ट प्रभा) ही जिनका वसु (धन) है। जिनका मार्ग कृष्ण है। जो विचित्र किरणोंसे प्रकाशित होते हैं तथा देवताओंके भी देवराज हैं। जिन्हें सम्पूर्ण जगत्का साक्षी माना गया है। द्विजगण जिन्हें आहुति देकर तृप्त करते हैं। जो उत्तम ज्वालाओंसे सम्पन्न और वषट्कारस्वरूप हैं। शमीगर्भ—अश्वत्थ ही जिनके लिये अपने प्राकट्यका कारण है। जो हविष्यभोक्ता तथा सम्पूर्ण वैदिक कर्मोंको सम्पन्न करनेवाले हैं। जो सम्पूर्ण भूतोंको पवित्र करनेवाले, देवताओंमें तपोनिधि, पापोंको शान्त करनेमें समर्थ, अपनी ज्वालारूपी जिह्वाओंको लपलपानेवाले और तपोमय हैं। जिनकी शिखा (ज्वाला) दक्षिणावर्त होती है। जिनका धूम पवित्र है। यज्ञ जिनका स्वरूप है। जो हविष्यके भोक्ता, भूत और वर्तमानके स्वामी, यज्ञभागको पहुँचानेवाले तथा श्रीहरिस्वरूप हैं। जो सोमपान करनेवाले, महान् तेजसे सम्पन्न, भूतनाथ, महातपस्वी, अजेय, पावक, ऐश्वर्यस्वरूप, सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा और स्वधाके स्वामी हैं। साममन्त्रोंद्वारा जिनकी महिमा गायी गयी है। जो स्वाहा-देवीके पति हैं, सोमयागके द्वारा पवित्र सोमरसका पान करते हैं। जिनके लिये सोमरस निकालनेके निमित्त लोढ़े धारण किये जाते हैं। जो देवताओंके भी देवता, महाक्रोधी, रुद्रस्वरूप तथा ब्रह्माजीसे उत्पन्न हुए हैं। वे सम्पूर्ण भूतोंको धारण करनेवाले, धूमरूपी ध्वजा एवं शिखासे युक्त, नील-वस्त्रधारी, सुरश्रेष्ठ महान् देवता भगवान् अग्निदेव लाल घोड़ों और वायुरूपी पहियोंवाले रथपर आरूढ़ हो रणभूमिमें दिव्य आग्नेयास्त्र उठाकर प्रलयकालकी भाँति कुपित हो

९४६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


सहस्रों, लाखों और अर्बुदों दानवोंको दग्ध करने लगे ॥ २-११३ ॥

प्राणो यः सर्वभूतानां देहे तिष्ठति पञ्चधा ॥ १२ ॥
यन्ता यश्च हुताशस्य सखा च प्रभुरीश्वरः ।
प्रभञ्जनो यो लोकानां युगान्ते सर्वनाशनः ॥ १३ ॥
सप्तस्वरगता यस्य योनिर्गीर्भरुदीर्यते ।
यो ह्याकाशमयो देवो दूरगः सर्वसम्भवः ॥ १४ ॥
यश्च कर्ता विकर्ता च गतिर्गतिमत् प्रभुः ।
वेदकर्ता समो लोके ब्रह्मणो यः सनातनः ॥ १५ ॥
अमूर्त्तिमन्तं यं प्राहुर्महाभूतं महत्तमम् ।
सोऽग्निं समीरयामास शमीगर्भं समीरणः ॥ १६ ॥

जो समस्त प्राणियोंके शरीरमें पाँच प्राणोंके रूपमें निवास करते हैं। जो अग्निदेवके सारथि और सखा हैं, जो प्रभावशाली तथा ईश्वर हैं। जो प्रलयकालमें समस्त लोकोंका भञ्जन करनेवाले और सर्वसंहारक हैं। जिनकी उत्पत्तिका कारणभूत आकाश श्रुतियोंद्वारा सप्तस्वरमय नाद-ब्रह्मको प्राप्त बताया जाता है। जो आकाशमय देवता हैं, दूरतक जानेकी शक्ति रखते हैं तथा सबकी उत्पत्तिके कारण हैं। जो कर्ता (स्रष्टा) और विकर्ता (संहारक) हैं, जङ्गम प्राणियोंकी गति और प्रभु हैं। जो परमात्माके निःश्वासरूपसे वेदमन्त्रोंको प्रकट करनेवाले हैं। लोकमें चतुर्मुख ब्रह्माके समान सनातन पुरुष हैं तथा जिन्हें सबसे महान् अमूर्त महाभूत कहा गया है, उन सर्वप्रेरक वायुदेवने शमीगर्भसे उत्पन्न अग्निदेवको प्रेरणा देकर सबल बनाया ॥ १२-१६ ॥

त्रिदिवारोहिभिर्ज्वालैर्जृम्भमाणो दिशो दश ।
दानवानामभावाय युगान्ताग्निरिवोत्थितः ॥ १७ ॥

वे स्वर्गलोकतक फैली हुई अपनी ज्वालाओं द्वारा दसों दिशाओंमें बढ़ने लगे और दानवोंका विनाश करनेके लिये प्रलयकालीन अग्निके समान उठ खड़े हुए ॥ १७ ॥

मेदोमज्जामहापङ्कां केशशैवालशालिनीम् ।
योधशीर्षोपलवहां मृतद्विपतटोत्कटाम् ॥ १८ ॥
शोणितोदां रणे दृष्ट्वा संग्रामसरितं विभुः ।
वह्निः प्रस्कन्दयामास दैत्यानां भयवर्धनः ॥ १९ ॥

मेदा और मज्जा जिसमें महान् पङ्क थे, जो केशरूपी सेवारोंसे सुशोभित होती थी, योद्धाओंके कटे हुए मस्तक जिसमें प्रस्तरखण्डोंके समान प्रतीत होते थे, मरे हुए हाथियोंकी लाशें जिसके ऊँचे तटोंकी भाँति जान पड़ती थीं तथा जिसमें रक्तरूपी जल बह रहा था, रणभूमिमें उस संग्राम-सरिताको देखकर दैत्योंका भय बढ़ानेवाले भगवान् अग्निदेवने उसे और भी तीव्र गतिसे प्रवाहित किया ॥ १८-१९ ॥


ततोऽग्निर्दितिजान् सर्वान् प्रह्लादप्रमुखांस्तथा ।
पराजयानः स विभुः क्रोशमानो महामृधे ॥ २० ॥

तदनन्तर उस महासमरमें गर्जना करते हुए व्यापक अग्निदेव प्रह्लाद आदि समस्त दैत्योंको पराजित करने लगे ॥ २० ॥

केचित् प्रदीप्तैर्मुकुटैः केचिद् दीप्तैः शिरोरुहैः ।
केचित् प्रदीप्तवसनैः केचिद् दीप्तैर्भुजाननैः ॥ २१ ॥
केचित् प्रदीप्तैरूरुभिः केचिच्छत्रैर्ध्वजै रथैः ।
असुरास्तत्र दृश्यन्ते प्रदीप्तेनाग्निना वृताः ॥ २२ ॥

किन्हींके मुकुट जलने लगे, किन्हींके सिरके बालोंमें आग लग गयी, किन्हींके कपड़े जलने लगे, किन्हींकी भुजाओं और मुखोंमें आग जल उठी, किन्हींकी जाँघें जल गयीं और किन्हींके छत्र, ध्वज तथा रथ जलकर भस्म हो गये। वहाँ समस्त असुर प्रज्वलित आगकी लपटोंसे घिरे दिखायी देने लगे ॥ २१-२२ ॥

त्यक्त्वाऽऽयुधानि सर्वाणि सध्वजांश्च रथोत्तमान् ।
प्रयान्ति समरे भीताः पावकेन पराजिताः ॥२३॥

उस पावकसे पराजित एवं भयभीत हो समस्त दैत्य-दानव समरभूमिमें अपने सारे आयुधों और ध्वजसहित उत्तम रथोंको त्यागकर भागने लगे ॥ २३ ॥

न च पश्यन्ति ते वह्निं प्रदीप्तं ध्वजिनीमुखे ।
दिशः खड्गांश्च मेघांश्च दीप्तान् पश्यन्ति दानवाः ॥२४॥

वे दानव सेनाके मुहानेपर प्रज्वलित हुई अग्निकी ओर नहीं देख पाते थे। उन्होंने सम्पूर्ण दिशाओं, खड्गों और मेघोंको भी जलता ही देखा ॥ २४ ॥

ध्रुवः स्वयम्भुवा सुप्तो युगान्तस्तोययोनिना ।
इत्येवं दानवाः सर्वे मेनिरे त्रस्तचेतसः ॥ २५ ॥

वे त्रस्तचित्त समस्त दानव ऐसा मानने लगे कि निश्चय ही जलमें शयन करनेवाले स्वयम्भू नारायणदेव अथवा जलके कारणभूत अग्निदेवने प्रलय आरम्भ कर दिया है॥२५॥

मयश्च शम्बरश्चैव महामायाधरौ तदा ।
पार्जन्यवारुणी माये सृजतां वारिविक्षरे ॥ २६ ॥

मय और शम्बरासुर—ये दो दानव उन दिनों बड़े भारी मायावी थे। इन दोनोंने वहाँ पार्जन्य और वारुणास्त्ररूपिणी मायाओंकी सृष्टि की, जो जलकी वर्षा करनेवाली थीं॥२६॥

ताभ्यां वह्निः स मायाभ्यां सिच्यमानः समन्ततः ।
तोयौघैः पर्वतनिभैर्मृद्वर्चिरभवद् रणे ॥२७॥

उन दोनों मायाओंने जब पर्वत-सदृश जल-प्रवाहोंसे अग्निदेवको सब ओरसे सींचना आरम्भ किया, तब उस रणभूमिमें उनकी ज्वाला कुछ मन्द हो गयी ॥ २७ ॥

शम्यमाने तु समरे पावके दैत्यनाशिनि ।
बृहत्कीर्तिर्बृहत्तेजा वह्निमाह बृहस्पतिः ॥ २८ ॥

भविष्यपर्व ] द्विषष्टितमोऽध्यायः [ १५७

समराङ्गणमें दैत्यनाशन अग्निदेवके शान्त होनेपर महायशस्वी एवं महातेजस्वी बृहस्पतिने उन्हें सम्बोधित करके कहा ॥ २८ ॥

गुरुरुवाच

हिरण्यरतः सुमुख ज्वलनाह्वय सर्वभुक्।
सप्तजिह्वानन क्षाम लेलिहान महाबल ॥ २९ ॥

बृहस्पति बोले—अग्निदेव ! सुवर्ण आपका वीर्य है, मुख सुन्दर है । आप ज्वलन नामसे विख्यात हैं, सर्व-भोक्ता हैं। आपके मुखमें सात जिह्वाएँ हैं। आप सबको क्षीण करनेवाले हैं। लपलपाती जिह्वाओंसे सबको चाट जाने-वाले महाबली पावक ! आपकी जय हो ॥ २९ ॥

आत्मा वायुस्तव विभो शरीरं सर्ववीरुधः।
योनिरापश्च ते प्रोक्ता योनिस्त्वमसि चाम्भसः॥ ३० ॥

विभो ! वायु आपकी आत्मा है । सब प्रकारके वृक्ष-वनस्पति आपके शरीर हैं। जलको आपकी योनि बताया गया है और आप भी जलकी योनि हैं ॥ ३० ॥

ऊर्ध्वं चाधश्च गच्छन्ति संचरन्ति च पार्श्वतः।
अर्चिषस्ते महाभाग सर्वतः प्रभवन्ति च ॥ ३१॥

महाभाग ! आपकी ज्वालाएँ ऊपर और नीचेको जाती हैं, पार्श्वभाग (अगल-बगल) में भी संचरण करती हैं तथा सब ओरसे उनका प्रादुर्भाव होता है ॥ ३१ ॥

त्वमेवाग्ने सर्वमसि त्वयि सर्वमिदं जगत्।
त्वं धारयसि भूतानि भुवनं त्वं बिभर्षि च ॥ ३२ ॥

अग्ने ! आप ही सब कुछ हैं । यह सम्पूर्ण जगत् आप-में ही प्रतिष्ठित है। आप समस्त भूतों और सम्पूर्ण भुवनोंका धारण-पोषण करते हैं ॥ ३२ ॥

त्वमग्ने हव्यवाडेकस्त्वमेव परं हविः।
यजन्ति च सदा सन्तस्त्वामेव परमाध्वरे ॥ ३३ ॥

अग्ने ! एकमात्र आप ही देवताओंके पास हविष्य पहुँचानेवाले हैं। आप ही उत्तम हविष्य हैं। साधु पुरुष श्रेष्ठ यज्ञमें सदा आपका ही यजन् करते हैं ॥ ३३ ॥

त्वमन्नं प्राणिनां भुङ्क्षे जगत्त्रातासि त्वं प्रभो।
त्वयि प्रवृत्तो विजयस्त्वयि लोकाः प्रतिष्ठिताः ॥ ३४ ॥

प्रभो ! आप समस्त प्राणियोंका अन्न खाते हैं और सारे जगत्की रक्षा करते हैं। आपमें ही विजयकी प्रवृत्ति होती है और आपमें ही सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित हैं ॥ ३४ ॥

सर्वान्ल्लोकांस्त्रीनिमान् हव्यवाह
प्राप्ते काले त्वं पचस्येव दीप्तः।
त्वमेवैकस्तपसे जातवेदो
नान्यस्त्वत्तो विद्यते गोषु देव ॥ ३५ ॥

हव्यवाहन ! आप प्रलयका समय आनेपर प्रज्वलित हो इस सम्पूर्ण त्रिलोकीको जला पचा डालते हैं । अग्निदेव ! एकमात्र आप ही सूर्यरूपसे तपते हैं । आपके सिवा दूसरा कोई उन किरणोंमें ताप देनेवाला नहीं है ॥ ३५ ॥

वृषाकपिः सिन्धुपतिस्त्वमग्ने
महामखेष्वग्रहरस्त्वमेव ।
विश्वस्य भूम्नस्त्वमसि प्रसूति-
स्त्वं च प्रतिष्ठा भगवन् प्रजानाम् ॥ ३६ ॥

अग्ने ! आप ही सूर्यरूपसे जलको बरसाते और सोखते हैं । आप ही सिन्धुपति हैं तथा आप ही बड़े-बड़े यज्ञोंमें अग्रभागके अधिकारी हैं । भगवन् ! इस विराट् विश्वके प्रसव-स्थान भी आप ही हैं तथा आप ही समस्त प्रजाओंके आधार हैं ॥ ३६ ॥

सृजस्यपो रश्मिभिर्जातवेद-
स्तथौषधीरोषधीनां रसांश्च ।
विश्वं त्वमादाय युगान्तकाले
स्रष्टा भवस्यानल सर्गकाले ॥ ३७ ॥

अग्निदेव ! आप अपनी किरणोंसे जलकी सृष्टि करते हैं । आप ही ओषधियों तथा उनके रसोंके उत्पादक हैं । अनल ! आप युगान्तकालमें सम्पूर्ण विश्वको लेकर अपने आपमेंविलीन कर लेते हैं तथा सृष्टिकालमें पुनः संसारके स्रष्टा होते हैं ॥ ३७ ॥

त्वमग्ने सर्वभूतानां योनिर्वेदेषु गीयसे।
त्वया देवहितार्थाय निहता दानवा रणे ॥ ३८ ॥

अग्निदेव ! सम्पूर्ण वेदोंमें आप ही समस्त प्राणियोंकी योनि बताये गये हैं । देव ! आपने ही देवताओंके हितके लिये रणभूमिमें दानवोंका वध किया है ॥ ३८ ॥

स्वयोनिस्ते महातेजस्तोयं मखशतार्चित।
तां स्वयोनिं समासाद्य किं विषीदसि पावक ॥ ३९ ॥

सैकड़ों यज्ञोंद्वारा पूजित महातेजस्वी पावक ! जल तो आपकी अपनी ही योनि है । उस अपनी ही योनिको पाकर आप विषाद क्यों करते हैं ? ॥ ३९ ॥

त्रायस्व समरे देवान् दैत्येभ्यः सुरसत्तम।
पिङ्गाक्ष लोहितग्रीव कृष्णवर्त्मन् हुताशन ॥ ४० ॥

सुरश्रेष्ठ ! कृष्णवर्त्मन् ! पिङ्गलनेत्र ! लोहितग्रीव ! हुताशन ! आप समराङ्गणमें देवताओंकी दैत्योंसे रक्षा करें ॥ ४० ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनेऽग्निस्रवे द्विषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें अग्निकी स्तुतिविषयक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६२ ॥

५४८श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

त्रिपष्टितमोऽध्यायः

राजा बलिके प्रति प्रह्लादका वचन तथा बलिकी देवसेनापर आक्रमण

वैशम्पायन उवाच

बृहस्पतेस्तु वचनं श्रुत्वा सत्यं समीरितम्।
भूयः प्रजज्वाल रणे हविषेव महामखे ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! बृहस्पतिकी कही हुई यह सच्ची बात सुनकर अग्निदेव उस रणक्षेत्रमें पुनः प्रज्वलित हो उठे, मानो किसी महायज्ञमें घृतकी आहुति पाकर वे फिरसे धधक उठे हों ॥ १ ॥

हतास्तु माया दैत्यानां प्रदीप्तेनाग्निना रणे।
हतमाया हतबला बलिं ते समुपस्थिताः ॥ २ ॥

समरभूमिमें प्रदीप्त अग्निके द्वारा दैत्योंकी सारी मायाएँ नष्ट कर दी गयीं। माया तथा बलके नष्ट हो जानेपर वे बलिकी सेवामें उपस्थित हुए ॥ २ ॥

पराजितेषु दैत्येषु वह्निनाद्भुतकर्मणा।
प्रह्लादस्तूत्तरं वाक्यमाह दैत्यपतिं बलिम् ॥ ३ ॥

अद्भुत कर्म करनेवाले अग्निके द्वारा समस्त दैत्योंके परास्त कर दिये जानेपर प्रह्लादने दैत्यराज बलिसे यह उत्तम बात कही— ॥ ३ ॥

भवानग्निश्च वायुश्च भास्करः सलिलं शशी।
नक्षत्राणि दिशो व्योम भूश्च दानवसत्तम ॥ ४ ॥
भविष्यं चैव भूतं च भवद्यासुरसत्तम।
दत्तं चैतद् भागवता वरदेन स्वयंभुवा ॥ ५ ॥
इन्द्रत्वं चामरत्वं च युद्धे चाप्यपराजयः।
ईशित्वं च वशित्वं च बलं चैवामितं शुभम् ॥ ६ ॥
सर्वभूतेश्वरत्वं च दैत्यराज सदा तव।
महायोगीश्वरत्वं च शूरत्वं च महामृधे ॥ ७ ॥
अणिमा लघिमा चैव ये चान्ये सात्त्विका गुणाः।
तत्पराजित्य दैत्येन्द्र देवान् सर्वांश्च सानुगान् ॥ ८ ॥
यथोक्तं ब्रह्मणा राजंस्तत्तथा न तदन्यथा।

‘दानवशिरोमणे ! अग्नि, वायु, सूर्य, जल, चन्द्रमा, नक्षत्र, दिशाएँ, आकाश तथा पृथ्वी—सब कुछ तुम्हीं हो ॥ ४ ॥

'असुरप्रवर ! भूत, वर्तमान और भविष्य भी तुम्हीं हो। दैत्यराज ! वरदायक भगवान् स्वयम्भूने तुम्हें यह वर दिया है कि तुम इन्द्रत्व और अमरत्व प्राप्त करोगे, युद्धमें तुम्हारी पराजय नहीं होगी। ईशित्व, वशित्व, अपरिमित शुभ बल तथा सम्पूर्ण भूतोंका अधीश्वरत्व तुम्हें सदा प्राप्त होगा। तुम महायोगीश्वर होओगे और महासमरमें शौर्य प्राप्त करोगे। अणिमा, लघिमा तथा अन्य जो सात्विक गुण हैं, वे भी तुम्हें सुलभ होंगे, अतः दैत्यराज ! तुम देवोंसहित समस्त देवताओंको पराजित करके महान् ऐश्वर्य प्राप्त करो; राजन् ! ब्रह्माजीने जैसा कहा है; वह उसी रूपमें सत्य होगा। उसे कोई मिथ्या नहीं कर सकता ॥ ५–८॥

तस्यतद् वचनं श्रुत्वा प्रह्लादस्य महात्मनः।
बलिः परमसंहृष्टः प्रायाच्छक्ररथं प्रति ॥ ९ ॥

महात्मा प्रह्लादका वह वचन सुनकर राजा बलिको बड़ा हर्ष हुआ। वे उत्साहित होकर इन्द्रके रथकी ओर चले ॥ ९ ॥

ततः प्रयान्तं विबुधेन्द्रसंनिधौ
महासुरेन्द्रं बलिमुत्तमश्रियम्।
तमञ्जसा जग्मुरभिप्रदक्षिणं
द्विजाश्च पुण्याः पशवश्च सत्तमाः ॥ १० ॥

इन्द्रके समीप जाते हुए उत्तम शोभासे सम्पन्न महान् असुरेन्द्र बलिको उस समय पवित्र पक्षी और श्रेष्ठ पशु अनायास ही दाहिने करके गये ॥ १० ॥

महजटाभारधरास्तपस्विन-
स्तदा तमायुर्विधिमन्त्रमङ्गलैः।
अभिष्टुवन्तः कवयः स्वलंकृतं
बलिं प्रयान्तं रणमूर्धनि स्थिताः ॥ ११ ॥

उस समय युद्धके मुहानेपर स्थित हुए महान् जटाभारको धारण करनेवाले विद्वान् तपस्वी युद्धोपयोगी वेषभूषासे विभूषित होकर रणकी यात्रा करनेवाले राजा बलिकी विधि-पूर्वक मङ्गलमय मन्त्रोंद्वारा स्तुति करने लगे ॥ ११ ॥

प्रतप्तजाम्बूनदचित्रभूषणै-
र्दिव्यैश्च रत्नैर्विविधैरलंकृतः।
विराजमानः परमेण वर्चसा
रणे विभात्यग्निशिखेव दानवः ॥ १२ ॥

तपाये हुए सुवर्णके विचित्र आभूषणों तथा नाना प्रकारके दिव्य रत्नोंसे अलंकृत हो उत्तम तेजसे प्रकाशमान दानवराज बलि रणभूमिमें अग्निशिखाके समान उद्भासित हो रहे थे ॥ १२ ॥

स वै तदा शत्रुबलादितं बलं
बलिर्ददर्शोत्तमसत्त्ववीर्यवान् ।
जलागमे श्रीमदिवाभ्रमण्डलं
विशीर्यमाणं नभसीव वायुना ॥ १३ ॥

उस समय उत्तम सत्त्व और बल-पराक्रमसे सम्पन्न राजा बलिने देखा कि शत्रुओंकी सेनाने मेरी सेनाको भली-भाँति पीड़ित कर दिया है। जैसे वर्षा-ऋतुमें शोभासम्पन्न मेघ-मण्डल आकाशमें वायुके द्वारा छिन्न-भिन्न कर दिया जाता है, उसी प्रकार दैत्यसेना तितर-बितर हो गयी है ॥ १३ ॥

ततो ददर्शार्थ बलानि सर्वतो
रणे प्रगुप्तानि हुताशनेन वै।

भविष्यपर्व ] चतुःषष्टितमोऽध्यायः ९४९


समुच्छ्रितान्युग्रतराणि तत्र वै
समुद्रवेगानिव पर्वसंधिषु ॥ १४ ॥

तदनन्तर उन्होंने देखा कि शत्रुओंकी सेनाएँ रणभूमिमें अग्निके द्वारा सब ओरसे सुरक्षित हैं। वे निरन्तर उत्कर्षके पथपर बढ़ती हुई उन्नत होती चली जा रही हैं। जैसे पर्वसंधि (पूर्णिमा) की वेलामें समुद्रोंके वेग बढ़ जाते हैं, उसी प्रकार शत्रुसेनाकी प्रगति उत्तरोत्तर बढ़ रही है ॥ १४ ॥

सतूलशक्त्यृष्टिगदासिस सायकान्
क्षिपन् रिपूणां समरे महात्मनाम् ।
ननाद सिंहर्षभमत्तनागव-
ज्जलागमे तोयदवच्च वीर्यवान् ॥ १५ ॥

तब वे पराक्रमी राजा बलि समरभूमिमें महामनस्वी शत्रुओंपर शूल, शक्ति, ऋष्टि, गदा, खड्ग और सायकोंकी वर्षा करते हुए सिंह, साँड, मतवाले हाथी और वर्षाकालके मेघकी भाँति जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ १५ ॥

दिव्यास्त्रधूमः सुभुजोग्रवायु-
र्महाबलः पौरुषविक्रमेन्धनः ।
प्रजा दिधक्षन्निव कालवह्निः
सुघोररूपो विबभौ रणे बलिः ॥ १६ ॥

उस रणभूमिमें महाबलवान् राजा बलि समस्त प्रजाओंको दग्ध कर डालनेकी इच्छावाले प्रलयंकर अग्निके समान अत्यन्त घोर रूपमें प्रकाशित होने लगे। दिव्यास्त्र ही उन अग्निस্বরূপ बलिके धूम थे। उत्तम भुजा ही उन्हें उत्तेजित करनेवाली भयंकर वायु थी और पुरुषार्थ एवं पराक्रम ही उस अग्निको उद्दीप्त करनेवाले ईंधन थे ॥ १६ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे त्रिषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारविषयक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६३ ॥


चतुःषष्टितमोऽध्यायः

बलि और इन्द्रका युद्ध तथा इन्द्रका रणभूमिसे पलायन

वैशम्पायन उवाच

बलिना तु सुराः सर्वे वर्जयित्वा सुराधिपम् ।
रणे शरशतैर्भिन्नाः ससैन्या वै पराजिताः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! राजा बलिने देवराज इन्द्रको छोड़कर शेष सभी देवताओंको सेनासहित पराजित कर दिया। वे रणभूमिमें उनके सैकड़ों बाणोंसे क्षत-विक्षत हो गये थे ॥ १ ॥

विमुखा याति दैत्येन्द्रैर्वध्यमाना महाचमूः ।
जितास्तु बलिना देवाः शक्रमाहुर्महाबलम् ॥ २ ॥

दैत्येन्द्रोंकी मार खाती हुई देवताओंकी विशाल सेना रणभूमिसे विमुख होकर भाग चली। बलिसे पराजित हुए देवता महाबली इन्द्रके पास गये और इस प्रकार बोले ॥ २ ॥

देवा ऊचुः

भवानिन्द्रश्च धाता च लोकानां प्रभुरव्ययः ।
त्वमप्रतिमकर्मा च तथैवानुपमद्युतिः ॥ ३ ॥

देवताओंने कहा— देवराज ! आप ही इन्द्र (महान् ऐश्वर्यशाली) हैं, आप ही सम्पूर्ण लोकोंके धारण-पोषण करनेवाले अविनाशी प्रभु हैं। आपके वीरोचित कर्मोंकी कहीं उपमा नहीं है। आप अनुपम तेजसे सम्पन्न हैं ॥ ३ ॥

विद्रुतानीह सैन्यानि सहास्माभिः सुरेश्वर ।
रथचक्रध्वजाक्षाणि विभिन्नानि महासुरैः ॥ ४ ॥

सुरेश्वर ! बड़े-बड़े असुरोंने हमारे साथ ही समस्त देव-सैनिकोंको यहाँ मार भगाया है और हमारे रथोंके पहिये, ध्वज तथा धुरे तोड़ डाले हैं ॥ ४ ॥

रथहस्त्यश्वयोधाश्च पदाताश्च सहस्रशः ।
भिन्नच्छिन्नाश्च शतशो गदामुशलपट्टिशैः ॥ ५ ॥

सैकड़ों रथी, हाथीसवार, घुड़सवार तथा सहस्रों पैदल सैनिक गदा, मुसल और पट्टिशोंकी मारसे छिन्न-भिन्न होकर रणभूमिमें पड़े हैं ॥ ५ ॥

महाभैरवरूपं हि दैत्येन्द्रेण कृतं रणे ।
किमुपेक्षसि दैत्येन्द्रैर्हन्यमानां महाचमूम् ॥ ६ ॥
त्रायस्व त्रिदशश्रेष्ठ शरण्यः शरणागतान् ।

दैत्यराज बलिने रणभूमिमें महाभयंकर रूप धारण किया है। दैत्येन्द्रोंद्वारा मारी जाती हुई विशाल देवसेनाकी आप उपेक्षा क्यों कर रहे हैं? देवश्रेष्ठ ! आप शरणागतवत्सल हैं; अतः शरणमें आये हुए हम देवताओंकी रक्षा कीजिये ॥ ६॥

श्रुत्वा तु वचनं तेषां देवानाममराधिपः ॥ ७ ॥
संवर्त्ताग्निसमक्रुद्धः सर्वान् दहति दानवान् ।

उन देवताओंका यह वचन सुनकर अमरेश्वर इन्द्र संवर्तक अग्निके समान कुपित हो समस्त दानवोंको दग्ध करने लगे ॥ ७३॥

दिवाकरकराकारं किरीटं धारयन् प्रभुः ॥ ८ ॥
वैदूर्यवर्णसंकाशो नानारत्नचिताङ्गदः ।
मयूररोमा रक्ताक्षः शतबाहुः सहस्रदृक् ॥ ९ ॥

९५० श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


वे प्रभावशाली देवराज सूर्यदेवकी किरणोंके समान कान्तिमान् किरीट धारण किये हुए थे। उनका वर्ण वैदूर्य-मणिके समान था। उनके बाजू-बंदोंमें नाना प्रकारके रत्न जड़े गये थे। उनकी रोमावलि मोरोंके समान और आँखें लाल थीं। वे सौ बाहों तथा सहस्र नेत्रोंसे सुशोभित थे॥८-९॥

हरिरेको हरिश्मश्रुर्नानाकेतुर्महाबलः ।
वज्रप्रहरणः श्रीमान् योगी शतशिरोधरः ॥ १० ॥

वे इन्द्र अद्वितीय वीर थे। उनकी मूँछें हरे रंगकी थीं। उनके रथपर नाना प्रकारकी ध्वजा-पताकाएँ फहरा रही थीं। वे महान् बलशाली थे। वज्र ही उनका आयुध था। वे सौ सिर धारण करनेवाले तेजस्वी योगी थे ॥ १० ॥

सधनुर्बद्धसन्नाहः शतादित्यसमप्रभः ।
देवगन्धर्वयक्षौघैरनुयातः सहस्रशः ॥११॥

कवच बाँधकर हाथमें धनुष लिये देवराज इन्द्र सौ सूर्योंके समान दिव्य प्रभासे प्रकाशित हो रहे थे। सहस्रों देवता, गन्धर्व और यक्षोंके समुदाय उनके पीछे-पीछे चलते थे ॥ ११ ॥

सामगैश्च जयैश्चापि स्तूयमानो महर्षिभिः।
शतपर्व महारौद्रं स्फोटनं सर्वतोमुखम् ॥ १२ ॥
प्रगृह्य रुचिरं वज्रं दीप्तं रौद्राट्टहासनम् ।
दैत्यानयोधयत् सर्वान् महेन्द्रः पाकशासनः ॥ १३ ॥
अधृष्यः सर्वभूतानामादित्यः दयितः सुतः।

सामगान करनेवाले महर्षि जय-जयकार करते हुए उनकी स्तुति करते थे। वे पाकशासन महेन्द्र तोड़-फोड़ करनेवाले, महाभयंकर, सब ओर मुखवाले तथा रौद्र अट्टहास (गड़गड़ाहट) करनेवाले, सौ पर्वोंसे युक्त, दीप्तिमान् एवं मनोहर वज्र हाथमें लेकर समस्त दैत्योंके साथ युद्ध करने लगे। अदितिके प्रिय पुत्र वे देवराज इन्द्र समस्त प्राणियोंके लिये अजेय थे ॥ १२-१३॥

ततः प्रवृत्तः संग्रामो बलिवासवयोस्र्तदा ॥ १४ ॥
उभाभ्यां देवदैत्याभ्यामचिरान्महदद्भुतः ।
अतिवीर्यबलोदग्रस्तुमुलो लोमहर्षणः ॥ १५॥

तदनन्तर शीघ्र ही राजा बलि और इन्द्रमें महान् अद्भुत संग्राम होने लगा। उनमेंसे एक देवता था और दूसरा दैत्य। उन दोनोंका वह संग्राम अत्यन्त बल-पराक्रमसे बढ़ा-चढ़ा, भयंकर और रोमाञ्चकारी था ॥ १४-१५ ॥

प्रह्लादेन स्तुतिशतैः कर्मभिर्जयसम्मतैः ।
प्रबोधितो दैत्यपतिरग्निरिद्ध इवाबभौ ॥ १६ ॥

प्रह्लादने सैकड़ों स्तुतियों और विजयके लिये अनुमोदित कर्मोंका वर्णन करके दैत्यराज बलिके शौर्य और उत्साहको जगाया, जिससे वे प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित होने लगे ॥ १६ ॥

सुरासुरेन्द्रयोर्दृष्ट्वा संग्रामं लोमहर्षणम् ।
देवानां दानवानां च भूयो युद्धमभूत् तदा ॥ १७ ॥

देवेन्द्र और असुरेन्द्रके उस रोमाञ्चकारी संग्रामको देखकर उस समय दूसरे-दूसरे देवताओं और दानवोंमें भी फिर युद्ध होने लगा ॥ १७ ॥

ततोऽविध्यन्महेन्द्रस्तं बलिमस्त्रैर्महाबलम् ।
तान्यस्त्राणि महाबाहुश्चिच्छेद शतधा रणे ॥ १८ ॥

महेन्द्रने महाबलवान् बलिको अपने अस्त्रोंद्वारा घायल कर दिया। तब महाबाहु बलिने रणभूमिमें इन्द्रके चलाये हुए उन सभी अस्त्रोंके सौ-सौ टुकड़े कर डाले ॥ १८ ॥

ततः क्रुद्धः पुनस्तत्र निजघ्ने दानवं महत् ।
आग्नेयमथ शत्रुघ्नं चिक्षेपेन्द्रो महाबलः ॥ १९ ॥

तब महाबली इन्द्रने कुपित होकर पुनः वहाँ महान् दानवदलका संहार आरम्भ किया। उन्होंने शत्रुनाशक आग्नेयास्त्रका प्रयोग किया ॥ १९ ॥

तद्दृष्ट्वा खे समागच्छत् प्रलयानलसंनिभम् ।
पातयामास तच्चैन्द्रं वारुणास्त्रेण दानवः ॥ २० ॥

प्रलयाग्निके समान तेजस्वी उस आग्नेयास्त्रको आकाशमें आता देख दानव बलिने वारुणास्त्रके द्वारा इन्द्रके छोड़े हुए उस अस्त्रको काट गिराया ॥ २० ॥

संक्रुद्धो मघवा वज्रमगृह्णात् पर्वतोपमम् ।
हन्तुकामो रणश्लाघी बलिं दैत्याधिपं रणे ॥ २१ ॥

तब क्रोधमें भरे हुए रणश्लाघी इन्द्रने रणभूमिमें दैत्यराज बलिका वध करनेके लिये पर्वताकार वज्र हाथमें लिया ॥ २१ ॥

ततः शुश्राव देवेन्द्रः कौशिको हरिवाहनः ।
अशरीरां शुभां वाणीं तस्मिन् महति वैशसे ॥ २२ ॥

इतनेहीमें हरे रंगके वाहनवाले कौशिक देवेन्द्रने उस महासंग्रामके भीतर यह शुभ आकाशवाणी सुनी ॥ २२ ॥

निवर्तस्व महाबाहो सुराणां नन्दिवर्धन ।
पुरंदर सुरश्रेष्ठ न जेष्यसि रणे बलिम् ॥ २३ ॥

'महाबाहो ! युद्धसे निवृत्त हो जाओ ! देवताओंका आनन्द बढ़ानेवाले सुरश्रेष्ठ पुरन्दर ! तुम बलिको रणभूमिमें नहीं जीत सकोगे ॥ २३ ॥

तपसात्युत्तमो दैत्यो वरदानेन चाधिकः ।
स्वयंभूपरितोषाच्च सत्यधर्माच्च वासव ॥ २४ ॥

'वासव ! दितिनन्दन बलि तपस्यासे तो अत्यन्त उत्तम है ही, वरदानके द्वारा भी तुमसे अधिक शक्तिशाली हो गया है; ब्रह्माजीके संतोषसे तथा सत्यधर्मके पालनसे भी इसकी शक्ति बढ़ गयी है ॥ २४ ॥

दानवराज बलिपर लक्ष्मीकी कृपा (पृष्ठ-संख्या १५०)

भविष्यपर्व ] पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ९५१


नैष शक्यस्त्वया जेतुं त्रिदशैर्वा सुरेश्वर ।
यो हास्य जेता भृगुवांस्तं शृणुष्व समाहितः ॥ २५ ॥

'सुरेश्वर ! तुम अथवा दूसरे देवता भी इसे नहीं जीत सकते। जो भगवान् इसपर विजय पानेवाले हैं, उन्हें बताता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ २५ ॥

ब्रह्मणः स हि सर्वस्वं देवानां चैव सा गतिः ।
परं रहस्यं धर्मस्य परस्य च परा गतिः ॥ २६ ॥

'वे ब्रह्माजीके सर्वस्व हैं, देवताओंकी भी गति हैं, धर्मके परम रहस्य हैं तथा उत्कृष्ट पुरुषकी भी परम गति हैं ॥ २६ ॥

परात्परतरः श्रीमान् परावरगतिः प्रभुः ।
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ २७ ॥

'वे भगवान् परसे भी परतर (उत्तमसे भी परमोत्तम) हैं, लक्ष्मीसे सम्पन्न हैं तथा वे ही कारण और कार्य अथवा भूत और भविष्यकी भी गति हैं। वे सबके अन्तर्यामी आत्मा हैं। उनके सहस्रों सिर, सहस्रों नेत्र और सहस्रों पैर हैं ॥ २७ ॥

शङ्खचक्रगदापाणिः पीतवासाः सुरारिहा ।
जेताजेयो जयः श्रीमान् सोऽस्य जेता भविष्यति ॥ २८ ॥

'उनके हाथमे शङ्ख, चक्र और गदा आदि आयुध शोभा पाते हैं। वे पीताम्बरधारी तथा देवद्रोहियोंका दलन करनेवाले हैं। वे श्रीमान् भगवान् सबपर विजय पाते हैं, किंतु उन्हें कोई नहीं जीत सकता। वे विजयस्वरूप हैं। वे ही इस बलिपर विजय प्राप्त करेंगे' ॥ २८ ॥

श्रुत्वा दिव्यां तु मधुरां वाणीं तामशरीरिणीम् ।
अपयातो रणाच्छक्रः सार्धं सर्वैः सुरोत्तमैः ॥ २९ ॥

वह दिव्य मधुर आकाशवाणी सुनकर समस्त श्रेष्ठ देवताओंके साथ इन्द्र रणभूमिसे हट गये ॥ २९ ॥

अपयाते तु देवेन्द्रे कौशिके हरिवाहने ।
सिंहनादो महानासीद् दानवानां महामृधे ॥ ३० ॥

हरिवाहन देवराज इन्द्रके पलायन कर जानेपर उस महासमरमे दानवोंका महान् सिंहनाद होने लगा ॥ ३० ॥

ततः किलकिलाशब्दः क्ष्वेडितास्फोटितस्वनः ।
शङ्खानां निनदश्चात्र योधानां वल्गितस्वनः ॥ ३१ ॥

तदनन्तर किलकारियोंकी आवाज आने लगी, गर्जने और ताल ठोंकनेका शब्द सुनायी देने लगा, शङ्खोंकी ध्वनि होने लगी और योद्धाओंके उछलने-कूदनेकी आवाज भी वहाँ सब ओर होने लगी ॥ ३१ ॥

वादित्राणां च निर्घोषस्तुमुलश्चाभवत्तदा ।
जयशब्दरवाश्चैव देवानां तु पराजये ॥ ३२ ॥

उस समय देवताओंकी पराजय होनेपर दैत्योंके दलमें नाना प्रकारके वाद्योंका तुमुल घोष होने लगा और जयजय कारके शब्द सुनायी देने लगे ॥ ३२ ॥

ससैन्यो दैत्यराजस्तु स्तूयमानः सुहृद्गणैः ।
बलीन्द्रो विबभौ दैत्यो हिरण्यकशिपुर्यथा ॥ ३३ ॥

सुहृदोंके समुदाय सेनासहित दैत्यराज बलिकी स्तुति करने लगे। उस समय इन्द्रपदपर प्रतिष्ठित हुए राज बलि दैत्यप्रवर हिरण्यकशिपुके समान शोभा पाने लगे ॥ ३३ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामने देवासुरसंग्रामे शक्रपलाने चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें देवासुरसंग्राममें इन्द्रका पलायनविषयक चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६४ ॥


पञ्चषष्टितमोऽध्यायः

विजयी बलिके पास राजलक्ष्मी आदिका शुभागमन

वैशम्पायन उवाच

निष्प्रयत्नेषु देवेषु त्रैलोक्ये दैत्यपालिते ।
जये बलेर्बलवतो मयशम्बरयोस्तथा ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! तदनन्तर देवता विजयके लिये प्रयत्न छोड़ बैठे और त्रिलोकीके राज्यका दैत्यराज बलिके द्वारा पालन होने लगा। बलवान् बलि, मयासुर और शम्बरासुरकी विजय हुई ॥ १ ॥

सुधासु दिक्षु सर्वासु प्रवृत्ते धर्मकर्मणि ।
अपावृत्ते धर्मपथे अयनस्थे दिवाकरे ॥ २ ॥

सम्पूर्ण दिशाएँ अमृतमयी हो गयीं, धर्म-कर्मका पालन होने लगा। धर्मका मार्ग खुल गया और सूर्यदेव अपने अयनमे स्थित हो गये ॥ २ ॥

प्रह्लादशम्बरमयैरनुह्लादेन चैव हि ।
दिक्षु सर्वासु गुप्तासु गगने दैत्यपालिते ॥ ३ ॥

दैत्येषु मखशोभाश्च स्वर्गार्थे दर्शयत्सु च ।
प्रकृतिस्थे तदा लोके वर्तमाने च सत्पथे ॥ ४ ॥

अभावे सर्वपापानां भावे चैव तथा स्थिते ।
भावे तपसि सिद्धानां सर्वत्राश्रमरक्षिषु ॥ ५ ॥

९५२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे

चतुष्पादे स्थिते धर्मे अधर्मे पादविग्रहे।
प्रजापालनयुक्तेषु भ्राजमानेषु राजसु ॥ ६ ॥
स्वधर्मसम्प्रयुक्तेषु सर्वाश्रमनिवासिषु ।
अभिषिक्तोऽसुरैः सर्वैर्दैत्यराजो बलिस्तदा ॥ ७ ॥

प्रह्लाद, शम्बरासुर, मयासुर और अनुह्लादके द्वारा सम्पूर्ण दिशाएँ सुरक्षित हो गयीं। आकाशका दैत्योंद्वारा पालन होने लगा। दैत्यलोग स्वर्गकी प्राप्तिके लिये यज्ञशोभाका दर्शन कराने लगे। उस समय सारा जनसमुदाय प्रकृतिस्थ होकर सन्मार्गपर चलने लगा। सब प्रकारके पापोंका अभाव हो गया। पुण्यकर्मकी व्यापक सत्ता दिखायी देने लगी। सिद्ध पुरुषोंकी तपस्यामें स्थिति हुई। सर्वत्र आश्रमोंकी रक्षा होने लगी। धर्म अपने चारों चरणोंसे युक्त होकर रहने लगा। अधर्मका चतुर्थांशमात्र ही शेष रह गया। तेजस्वी राजा प्रजापालनमें तत्पर रहने लगे और सभी आश्रमोंके निवासी अपने-अपने धर्ममें स्थित हो गये। ऐसे समयमें समस्त असुरोंने दैत्यराज बलिको इन्द्रके पदपर अभिषेक किया ॥ ३-७ ॥

हृष्टेष्वसुरसंघेषु नदत्सु मुदितेषु च ।
अथाभ्युपगता लक्ष्मीर्बलिं पद्मासने स्थिता ॥ ८ ॥
पद्मोद्यतकरा देवी वरदा सुरमोहिनी ।

उस समय असुरोंके समुदाय हर्षमें भर गये और आनन्दमग्न होकर जोर-जोरसे गर्जना करने लगे। इसी समय कमलके आसनपर विराजमान राजलक्ष्मी राजा बलिके पास आयीं। देवताओंको मोहनेवाली उन वरदायिनी देवीने अपने हाथमें एक कमलका फूल ले रखा था ॥ ८ ॥

श्रीरुवाच
बले बलवतां श्रेष्ठ महाराज महाद्युते ॥ ९ ॥
प्रीतास्मि तव भद्रं ते देवतानां पराजये ।

लक्ष्मी बोली—बलवानोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी महाराज बलि ! तुम्हारा भला हो। तुमने जो देवताओंको पराजित किया है, इससे मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हुई हूँ ॥ ९ ॥

यस्त्वया युधि विक्रम्य देवराजः पराजितः ॥ १० ॥
दृष्ट्वा ते परमं सत्त्वं ततोऽहं स्वयमागता ।

तुमने युद्धमें पराक्रम करके जो देवराज इन्द्रपर विजय पायी है, तुम्हारे उस उत्तम सत्त्व (धैर्य और बल) को देखकर मैं स्वयं तुम्हारे पास चली आयी हूँ ॥ १० ॥

नाश्चर्यं दानवश्रेष्ठ हिरण्यकशिपोः कुले ॥ ११ ॥
प्रसूतस्यासुरेन्द्रस्य तव कर्मेदमीदृशम्।

दानवशिरोमणे ! तुम असुरराज हिरण्यकशिपुके कुलमें उत्पन्न हुए हो; अतः तुम्हारा ऐसा पराक्रम करना आश्चर्यकी बात नहीं है ॥ ११ ॥

विशेषितस्त्वया राजन् दैत्येन्द्रः प्रपितामहः ॥ १२ ॥
येन भुक्तं हि निखिलं त्रैलोक्यमिदमव्ययम् ।

राजन् ! तुमने अपने प्रपितामह उस दैत्यराज हिरण्यकशिपुका महत्त्व बढ़ा दिया, जिसने प्रवाहरूपसे सदा बने रहनेवाले इस समस्त त्रिभुवनके राज्यका उपभोग किया है ॥ १२ ॥

विशेषतस्तव विभो सर्वे धर्मपथे स्थिताः ॥ १३ ॥
तेन त्रैलोक्यमुदयेन भोक्ष्यस्यमितविक्रम ।

प्रभो ! सबसे विशेष बात यह है कि तुम्हारे राज्यमें सब लोग धर्मके मार्गपर स्थित हैं। अमितपराक्रमी दैत्यराज ! उस त्रिलोकीकी श्रेष्ठ वस्तु धर्मके साथ रहकर तुम राज्यका उपभोग करोगे ॥ १३ ॥

एवमुक्त्वा हि सा देवी लक्ष्मीर्दैत्यपतिं बलिम् ॥ १४ ॥
प्रविष्टा वरदा सौम्या सर्वभूतमनोरमा ।

ऐसा कहकर सम्पूर्ण प्राणियोंके मनको प्रिय लगनेवाली सौम्यररूपा वरदायिनी लक्ष्मीदेवी दैत्यराज बलिके भीतर प्रविष्ट हो गयीं ॥ १४ ॥

शिष्टाश्च देव्यः प्रवरा ह्रीः कीर्तिर्द्युतिरेव च ॥ १५ ॥
प्रभा धृतिः क्षमा भूतिर्नीतिर्विद्या दया स्मृतिः ।
कृतिर्लज्जा तथा मेधा लक्ष्मीरीहा गतिस्तथा ॥ १६ ॥
श्रुतिः प्रीतिर्गिला कीर्तिः शान्तिः पुष्टिः क्रियास्तथा ।
सर्वाश्चाप्सरसो दिव्या नृत्यगीतविशारदाः ॥ १७ ॥
पतिं प्राप्ताः सुदैतेयं त्रैलोक्ये सचराचरे ।
प्राप्तमैश्वर्यममितं बलिना ब्रह्मवादिना ॥ १८ ॥

शेष जो श्रेष्ठ देवियाँ थीं, उन कीर्ति, द्युति, प्रभा, धृति, क्षमा, भूति, नीति, विद्या, दया, स्मृति, कृति, लज्जा, मेधा, लक्ष्मी, ईहा, गति, श्रुति, प्रीति, इला (श्रौतक्रिया), कीर्ति, शान्ति, पुष्टि तथा क्रिया आदिने एवं नृत्यगीतविशारद सम्पूर्ण दिव्य अप्सराओंने उत्तम दैत्यकुमार राजा बलिको पति (पालक) रूपमें प्राप्त किया। ब्रह्मवादी बलिने चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकीमें असीम ऐश्वर्य प्राप्त कर लिया ॥ १५—१८ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतार-विषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६५ ॥

भविष्यपर्व ]षट्षष्टितमोऽध्यायः९५३

षट्षष्टितमोऽध्यायः

अदिति और कश्यपजीके साथ देवताओंका ब्रह्मलोकमें जाना

जनमेजय उवाच
पराजिताः सुरा दैत्यैः किमकुर्वत वै मुने।
कथं च त्रिदिवं लब्धं भूयो देवैर्द्विजोत्तम ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा— मुने! द्विजश्रेष्ठ! दैत्योंसे पराजित होकर देवताओंने क्या किया? फिर उन्हें स्वर्गका राज्य कैसे प्राप्त हुआ? ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा वाणीं तु तां दिव्यां सह देवैः सुराधिपः।
प्राग्दिशं प्रस्थितः श्रीमानदित्यालयमुत्तमम् ॥ २ ॥

वैशम्पायनजीने कहा— जनमेजय! देवताओंसहित श्रीमान् देवराज इन्द्र उस दिव्य आकाशवाणीको सुनकर पूर्व दिशामें देवी अदितिके उत्तम भवनकी ओर चल दिये ॥ २ ॥

प्राप्यादित्यालयं शक्रः कथयामास तां गिरम्।
अदित्यां सा यथा युद्धे तेन वाणी पुरा श्रुता ॥ ३ ॥

अदितिके भवनमें पहुँचकर इन्द्रने युद्धस्थलमें पहले जो आकाशवाणी सुनी थी, उसे वहाँ माता अदितिके समीप कह सुनाया ॥ ३ ॥

अदितिरुवाच
यद्येवं पुत्र युष्माभिर्न शक्यो हन्तुमाहवे।
बलिर्वैरोचनसुतः सर्वैश्चैव मरुद्गणैः ॥ ४ ॥
सहस्रशिरसा हन्तुं केवलं शक्यतेऽसुरः।
तेनैकेन सहस्राक्ष न ह्यन्येन शतक्रतो ॥ ५ ॥
तद् वः पृच्छध्व पितरं कश्यपं सत्यवादिनम्।
पराजयार्थं दैत्यस्य वलेस्तस्य महात्मनः ॥ ६ ॥

अदिति बोलीं— बेटा! सहस्रलोचन! शतक्रतो! यदि ऐसी बात है, यदि तुमलोग और समस्त मरुद्गण भी रण-क्षेत्रमें विरोचनकुमार बलिको वध नहीं कर सकते, यदि वह असुर केवल उन एकमात्र सहस्र मस्तकवाले भगवान्‌के हाथसे ही मारा जा सकता है, दूसरे किसीके हाथसे नहीं तो तुम अपने सत्यवादी पिता कश्यपजीसे पूछो कि दिति-नन्दन महात्मा बलिकी पराजयके लिये क्या उपाय हो सकता है? ॥ ४-६ ॥

ततोऽदित्या सह सुराः सम्प्राप्ताः कश्यपान्तिकम्।
अपश्यन् कश्यपं तत्र मुनिं दिव्यतपोनिधिम् ॥ ७ ॥

तब सब देवता माता अदितिके साथ अपने पिता कश्यपजीके समीप गये। वहाँ उन्होंने दिव्य तपोनिधि मुनिवर कश्यपजीका दर्शन किया ॥ ७ ॥

आद्यं देवं गुरुं दिव्यं क्लिन्नं त्रिपवणार्वुभिः।
तेजसा भास्कराकारं गौरमग्निशिखाप्रभम् ॥ ८ ॥

वे आदिदेवता और दिव्य गुरु हैं। तीनों समय स्नान करनेके कारण उनका शरीर जलसे भीगा रहता है। वे सूर्यके समान तेजस्वी हैं। उनका गौरवर्ण अग्निशिखाके समान प्रकाशित होता है ॥ ८ ॥

न्यस्तदण्डं तपोयुक्तं बद्धकृष्णाजिनोत्तरम्।
वल्कलाजिनसंवीतं प्रदीप्तं ब्रह्मवर्चसा ॥ ९ ॥

उन्होंने दण्डका परित्याग कर दिया है। वे तपस्यामें संलग्न रहते हैं। उनके ऊपरके अङ्गोंमें उत्तरीयके रूपमें काला मृगचर्म बँधा होता है। वे वल्कल और मृगचर्मसे ही अपने शरीरको ढकते हैं। ब्रह्मतेजसे सदा ही उदीप्त रहते हैं ॥ ९ ॥

हुताशमिव दीप्तन्तमाज्यमन्त्रपुरस्कृतम्।
स्वाध्यायिनरतं शान्तं वपुष्मन्तमिवानलम् ॥ १० ॥

मन्त्रोच्चारणपूर्वक घीकी आहुति देनेसे प्रज्वलित हुए अग्निदेवके समान वे सदा देदीप्यमान होते रहते हैं। सदा स्वाध्यायमें तत्पर रहनेवाले और शान्त हैं, शरीरधारी अग्निके समान जान पड़ते हैं ॥ १० ॥

तं ब्रह्मवादिनां श्रेष्ठं सुरासुरगुरुं प्रभुम्।
प्रतपन्तमिवादित्यं मारीचं दीप्ततेजसम् ॥ ११ ॥

वे ब्रह्मवादियोंमें श्रेष्ठ, देवताओं और असुरोंके पिता तथा प्रभावशाली हैं। तपते हुए सूर्यके समान उनका तेज सदा ही उदीप्त रहता है। उन मरीचिनन्दन कश्यपको देवताओने देखा ॥ ११ ॥

यः स्रष्टा सर्वभूतानां प्रजानां पतिरुत्तमः।
आत्मभावविशेषेण तृतीयो यः प्रजापतिः ॥ १२ ॥

जो समस्त प्राणियोंके स्रष्टा उत्तम प्रजापति ब्रह्मा हैं, उनके आत्मभावकी विशेषरूपसे अभिव्यक्ति होनेके कारण कश्यपजी (ब्रह्मा और मरीचिकी अपेक्षा) तीसरे प्रजापति हैं ॥ १२ ॥

ततः प्रणम्य ते वीराः सहादित्या सुरर्षभाः।
ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे ब्रह्माणमिव मानसाः ॥ १३ ॥

अदितिसहित उन सभी वीर एवं श्रेष्ठ देवताओंने कश्यपजीको प्रणाम करके उनसे हाथ जोड़कर उसी प्रकार कहना आरम्भ किया, जैसे ब्रह्माजीके मानसपुत्र उनसे अपनी बात निवेदन करते हैं ॥ १३ ॥

यच्छ्रुतं युधि शक्रेण सरस्वत्या समीरितम्।
अजेयस्त्रिदशैः सर्वैर्वरदानवसत्तमः ॥ १४ ॥

युद्धस्थलमें इन्द्रने आकाशवाणीद्वारा कही गयी जो यह बात सुनी थी कि दानवशिरोमणि बलि समस्त देवताओंके लिये अजेय हैं, उसे कह सुनाया ॥ १४ ॥

श्रुत्वा तु वचनं तेषां पुत्राणां कश्यपस्तदा।
चकार गमने बुद्धिं ब्रह्मलोकाय लोककृत् ॥ १५ ॥