भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 969

भविष्यपर्व ] द्विषष्टितमोऽध्यायः ९४५


स शरैर्वह्निसंकाशैः सुमुक्तैर्नतपर्वभिः ।
वरुणस्य महावेगान् बिभेद समरे हयान् ॥ ४३ ॥

अभिद्रुतोऽथ दैत्येन ससैन्यः सलिलाधिपः ।
महेन्द्रं शरणं प्राप्तो विप्रचित्तेर्भयार्दितः ॥ ४४ ॥

उस दानवने उत्तम रीतिसे छोड़े गये झुकी हुई गाँठवाले अग्नितुल्य तेजस्वी बाणोंद्वारा समरभूमिमें वरुण देवताके महान् वेगशाली घोड़ोंको घायल कर दिया ॥ ४३ ॥

उस दैत्यने जलके स्वामी वरुणको सेनासहित वहाँसे भाग जानेको विवश कर दिया । वे विप्रचित्तिके भयसे पीड़ित हो देवराज इन्द्रकी शरणमें चले गये ॥ ४४ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामने वरुणविप्रचित्तियुद्धे एकषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें वरुण और विप्रचित्तिका युद्धविषयक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६१ ॥


द्विषष्टितमोऽध्यायः

अग्निद्वारा दैत्योंकी पराजय तथा बृहस्पतिके द्वारा अग्निदेवका स्तवन

वैशम्पायन उवाच
पराजयं तु देवानां दृष्ट्वाग्निर्देवसत्तमः ।
चकार बुद्धिं दैत्यानां वधे ब्रह्मर्षिभिः स्तुतः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! देवताओंकी यह पराजय देखकर ब्रह्मर्षियोंद्वारा प्रशंसित देवशिरोमणि अग्निने दैत्योंके वधका विचार किया ॥ १ ॥

स्वयं प्रभायाः शाण्डिल्या यः पुत्रो हव्यवाहनः ।
हिरण्यरेताः पिङ्गाक्षो देवहूतो हुताशनः ॥ २ ॥
रोहितो लोहितग्रीवो हर्ता दाता हविः कविः ।
पावको विश्वभुग् देवः सर्वदेवाननः प्रभुः ॥ ३ ॥
सुब्रह्मात्मा सुवर्चस्कः सहस्रार्चिर्विभावसुः ।
कृष्णवर्त्मा चित्रभानुर्देवानाम्पि देवराट् ॥ ४ ॥
लोकसाक्षी द्विजहुतः सदर्चिष्मान् वषट्कृतः ।
हव्यभक्षः शमीगर्भस्वयोनिः सर्वकर्मकृत् ॥ ५ ॥
पावनः सर्वभूतानां त्रिदशानां तपोनिधिः ।
शमनः सर्वपापानां लेलिहानस्तपोमयः ॥ ६ ॥
प्रदक्षिणावर्तशिखः शुचिरोमा महाकृतिः ।
हव्यभुग् भूतभव्येशो यज्ञभागहरो हरिः ॥ ७ ॥
सोमपः सुमहातेजा भूतेशः सुमहातपाः ।
अधृष्यः पावको भूतिर्भूतात्मा वै स्वधाधिपः ॥ ८ ॥
स्वाहापतिः सामगीतः सोमपूताशनोऽद्रिधृक् ।
देवदेवो महाक्रोधो रुद्रात्मा ब्रह्मसम्भवः ॥ ९ ॥
लोहिताश्वं वायुचक्रं रथमास्थाय भूतधृक् ।
धूमकेतुर्धूमशिखो नीलवासाः सुरोत्तमः ॥ १० ॥
उद्यम्य दिव्यमाग्नेयं शस्त्रं देवो रणे महान् ।
दानवानां सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च ॥ ११ ॥
ददाह भगवान् वह्निः संक्रुद्धः प्रलये यथा ।

जो स्वयंप्रभा शाण्डिलीके पुत्र हैं, हविष्यका वहन करते हैं। सुवर्ण जिनका रेतस् (वीर्य) है। जिनके नेत्र पिङ्गल वर्णके हैं। देवता जिनका आवाहन करते हैं। जो आहुतिमें प्राप्त हुए हविष्यका भक्षण करते हैं। जिनका वर्ण लाल है। जिनकी ग्रीवा भी लाल रंगकी बतायी गयी है। जो दोषोंका हरण करनेवाले, दाता, हव्य-कव्यस्वरूप, पवित्र करनेवाले, विश्वभोक्ता, देव, सम्पूर्ण देवताओंके मुख तथा सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। सुन्दर वेद जिनके स्वरूप हैं। जो उत्तम तेजसे सम्पन्न हैं। जिनसे सहस्रों ज्वालाएँ उठती रहती हैं। विभा (उत्कृष्ट प्रभा) ही जिनका वसु (धन) है। जिनका मार्ग कृष्ण है। जो विचित्र किरणोंसे प्रकाशित होते हैं तथा देवताओंके भी देवराज हैं। जिन्हें सम्पूर्ण जगत्का साक्षी माना गया है। द्विजगण जिन्हें आहुति देकर तृप्त करते हैं। जो उत्तम ज्वालाओंसे सम्पन्न और वषट्कारस्वरूप हैं। शमीगर्भ—अश्वत्थ ही जिनके लिये अपने प्राकट्यका कारण है। जो हविष्यभोक्ता तथा सम्पूर्ण वैदिक कर्मोंको सम्पन्न करनेवाले हैं। जो सम्पूर्ण भूतोंको पवित्र करनेवाले, देवताओंमें तपोनिधि, पापोंको शान्त करनेमें समर्थ, अपनी ज्वालारूपी जिह्वाओंको लपलपानेवाले और तपोमय हैं। जिनकी शिखा (ज्वाला) दक्षिणावर्त होती है। जिनका धूम पवित्र है। यज्ञ जिनका स्वरूप है। जो हविष्यके भोक्ता, भूत और वर्तमानके स्वामी, यज्ञभागको पहुँचानेवाले तथा श्रीहरिस्वरूप हैं। जो सोमपान करनेवाले, महान् तेजसे सम्पन्न, भूतनाथ, महातपस्वी, अजेय, पावक, ऐश्वर्यस्वरूप, सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा और स्वधाके स्वामी हैं। साममन्त्रोंद्वारा जिनकी महिमा गायी गयी है। जो स्वाहा-देवीके पति हैं, सोमयागके द्वारा पवित्र सोमरसका पान करते हैं। जिनके लिये सोमरस निकालनेके निमित्त लोढ़े धारण किये जाते हैं। जो देवताओंके भी देवता, महाक्रोधी, रुद्रस्वरूप तथा ब्रह्माजीसे उत्पन्न हुए हैं। वे सम्पूर्ण भूतोंको धारण करनेवाले, धूमरूपी ध्वजा एवं शिखासे युक्त, नील-वस्त्रधारी, सुरश्रेष्ठ महान् देवता भगवान् अग्निदेव लाल घोड़ों और वायुरूपी पहियोंवाले रथपर आरूढ़ हो रणभूमिमें दिव्य आग्नेयास्त्र उठाकर प्रलयकालकी भाँति कुपित हो