विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 970, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें९४६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
सहस्रों, लाखों और अर्बुदों दानवोंको दग्ध करने लगे ॥ २-११३ ॥
प्राणो यः सर्वभूतानां देहे तिष्ठति पञ्चधा ॥ १२ ॥
यन्ता यश्च हुताशस्य सखा च प्रभुरीश्वरः ।
प्रभञ्जनो यो लोकानां युगान्ते सर्वनाशनः ॥ १३ ॥
सप्तस्वरगता यस्य योनिर्गीर्भरुदीर्यते ।
यो ह्याकाशमयो देवो दूरगः सर्वसम्भवः ॥ १४ ॥
यश्च कर्ता विकर्ता च गतिर्गतिमत् प्रभुः ।
वेदकर्ता समो लोके ब्रह्मणो यः सनातनः ॥ १५ ॥
अमूर्त्तिमन्तं यं प्राहुर्महाभूतं महत्तमम् ।
सोऽग्निं समीरयामास शमीगर्भं समीरणः ॥ १६ ॥
जो समस्त प्राणियोंके शरीरमें पाँच प्राणोंके रूपमें निवास करते हैं। जो अग्निदेवके सारथि और सखा हैं, जो प्रभावशाली तथा ईश्वर हैं। जो प्रलयकालमें समस्त लोकोंका भञ्जन करनेवाले और सर्वसंहारक हैं। जिनकी उत्पत्तिका कारणभूत आकाश श्रुतियोंद्वारा सप्तस्वरमय नाद-ब्रह्मको प्राप्त बताया जाता है। जो आकाशमय देवता हैं, दूरतक जानेकी शक्ति रखते हैं तथा सबकी उत्पत्तिके कारण हैं। जो कर्ता (स्रष्टा) और विकर्ता (संहारक) हैं, जङ्गम प्राणियोंकी गति और प्रभु हैं। जो परमात्माके निःश्वासरूपसे वेदमन्त्रोंको प्रकट करनेवाले हैं। लोकमें चतुर्मुख ब्रह्माके समान सनातन पुरुष हैं तथा जिन्हें सबसे महान् अमूर्त महाभूत कहा गया है, उन सर्वप्रेरक वायुदेवने शमीगर्भसे उत्पन्न अग्निदेवको प्रेरणा देकर सबल बनाया ॥ १२-१६ ॥
त्रिदिवारोहिभिर्ज्वालैर्जृम्भमाणो दिशो दश ।
दानवानामभावाय युगान्ताग्निरिवोत्थितः ॥ १७ ॥
वे स्वर्गलोकतक फैली हुई अपनी ज्वालाओं द्वारा दसों दिशाओंमें बढ़ने लगे और दानवोंका विनाश करनेके लिये प्रलयकालीन अग्निके समान उठ खड़े हुए ॥ १७ ॥
मेदोमज्जामहापङ्कां केशशैवालशालिनीम् ।
योधशीर्षोपलवहां मृतद्विपतटोत्कटाम् ॥ १८ ॥
शोणितोदां रणे दृष्ट्वा संग्रामसरितं विभुः ।
वह्निः प्रस्कन्दयामास दैत्यानां भयवर्धनः ॥ १९ ॥
मेदा और मज्जा जिसमें महान् पङ्क थे, जो केशरूपी सेवारोंसे सुशोभित होती थी, योद्धाओंके कटे हुए मस्तक जिसमें प्रस्तरखण्डोंके समान प्रतीत होते थे, मरे हुए हाथियोंकी लाशें जिसके ऊँचे तटोंकी भाँति जान पड़ती थीं तथा जिसमें रक्तरूपी जल बह रहा था, रणभूमिमें उस संग्राम-सरिताको देखकर दैत्योंका भय बढ़ानेवाले भगवान् अग्निदेवने उसे और भी तीव्र गतिसे प्रवाहित किया ॥ १८-१९ ॥
ततोऽग्निर्दितिजान् सर्वान् प्रह्लादप्रमुखांस्तथा ।
पराजयानः स विभुः क्रोशमानो महामृधे ॥ २० ॥
तदनन्तर उस महासमरमें गर्जना करते हुए व्यापक अग्निदेव प्रह्लाद आदि समस्त दैत्योंको पराजित करने लगे ॥ २० ॥
केचित् प्रदीप्तैर्मुकुटैः केचिद् दीप्तैः शिरोरुहैः ।
केचित् प्रदीप्तवसनैः केचिद् दीप्तैर्भुजाननैः ॥ २१ ॥
केचित् प्रदीप्तैरूरुभिः केचिच्छत्रैर्ध्वजै रथैः ।
असुरास्तत्र दृश्यन्ते प्रदीप्तेनाग्निना वृताः ॥ २२ ॥
किन्हींके मुकुट जलने लगे, किन्हींके सिरके बालोंमें आग लग गयी, किन्हींके कपड़े जलने लगे, किन्हींकी भुजाओं और मुखोंमें आग जल उठी, किन्हींकी जाँघें जल गयीं और किन्हींके छत्र, ध्वज तथा रथ जलकर भस्म हो गये। वहाँ समस्त असुर प्रज्वलित आगकी लपटोंसे घिरे दिखायी देने लगे ॥ २१-२२ ॥
त्यक्त्वाऽऽयुधानि सर्वाणि सध्वजांश्च रथोत्तमान् ।
प्रयान्ति समरे भीताः पावकेन पराजिताः ॥२३॥
उस पावकसे पराजित एवं भयभीत हो समस्त दैत्य-दानव समरभूमिमें अपने सारे आयुधों और ध्वजसहित उत्तम रथोंको त्यागकर भागने लगे ॥ २३ ॥
न च पश्यन्ति ते वह्निं प्रदीप्तं ध्वजिनीमुखे ।
दिशः खड्गांश्च मेघांश्च दीप्तान् पश्यन्ति दानवाः ॥२४॥
वे दानव सेनाके मुहानेपर प्रज्वलित हुई अग्निकी ओर नहीं देख पाते थे। उन्होंने सम्पूर्ण दिशाओं, खड्गों और मेघोंको भी जलता ही देखा ॥ २४ ॥
ध्रुवः स्वयम्भुवा सुप्तो युगान्तस्तोययोनिना ।
इत्येवं दानवाः सर्वे मेनिरे त्रस्तचेतसः ॥ २५ ॥
वे त्रस्तचित्त समस्त दानव ऐसा मानने लगे कि निश्चय ही जलमें शयन करनेवाले स्वयम्भू नारायणदेव अथवा जलके कारणभूत अग्निदेवने प्रलय आरम्भ कर दिया है॥२५॥
मयश्च शम्बरश्चैव महामायाधरौ तदा ।
पार्जन्यवारुणी माये सृजतां वारिविक्षरे ॥ २६ ॥
मय और शम्बरासुर—ये दो दानव उन दिनों बड़े भारी मायावी थे। इन दोनोंने वहाँ पार्जन्य और वारुणास्त्ररूपिणी मायाओंकी सृष्टि की, जो जलकी वर्षा करनेवाली थीं॥२६॥
ताभ्यां वह्निः स मायाभ्यां सिच्यमानः समन्ततः ।
तोयौघैः पर्वतनिभैर्मृद्वर्चिरभवद् रणे ॥२७॥
उन दोनों मायाओंने जब पर्वत-सदृश जल-प्रवाहोंसे अग्निदेवको सब ओरसे सींचना आरम्भ किया, तब उस रणभूमिमें उनकी ज्वाला कुछ मन्द हो गयी ॥ २७ ॥
शम्यमाने तु समरे पावके दैत्यनाशिनि ।
बृहत्कीर्तिर्बृहत्तेजा वह्निमाह बृहस्पतिः ॥ २८ ॥