भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 971, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 971

भविष्यपर्व ] द्विषष्टितमोऽध्यायः [ १५७

समराङ्गणमें दैत्यनाशन अग्निदेवके शान्त होनेपर महायशस्वी एवं महातेजस्वी बृहस्पतिने उन्हें सम्बोधित करके कहा ॥ २८ ॥

गुरुरुवाच

हिरण्यरतः सुमुख ज्वलनाह्वय सर्वभुक्।
सप्तजिह्वानन क्षाम लेलिहान महाबल ॥ २९ ॥

बृहस्पति बोले—अग्निदेव ! सुवर्ण आपका वीर्य है, मुख सुन्दर है । आप ज्वलन नामसे विख्यात हैं, सर्व-भोक्ता हैं। आपके मुखमें सात जिह्वाएँ हैं। आप सबको क्षीण करनेवाले हैं। लपलपाती जिह्वाओंसे सबको चाट जाने-वाले महाबली पावक ! आपकी जय हो ॥ २९ ॥

आत्मा वायुस्तव विभो शरीरं सर्ववीरुधः।
योनिरापश्च ते प्रोक्ता योनिस्त्वमसि चाम्भसः॥ ३० ॥

विभो ! वायु आपकी आत्मा है । सब प्रकारके वृक्ष-वनस्पति आपके शरीर हैं। जलको आपकी योनि बताया गया है और आप भी जलकी योनि हैं ॥ ३० ॥

ऊर्ध्वं चाधश्च गच्छन्ति संचरन्ति च पार्श्वतः।
अर्चिषस्ते महाभाग सर्वतः प्रभवन्ति च ॥ ३१॥

महाभाग ! आपकी ज्वालाएँ ऊपर और नीचेको जाती हैं, पार्श्वभाग (अगल-बगल) में भी संचरण करती हैं तथा सब ओरसे उनका प्रादुर्भाव होता है ॥ ३१ ॥

त्वमेवाग्ने सर्वमसि त्वयि सर्वमिदं जगत्।
त्वं धारयसि भूतानि भुवनं त्वं बिभर्षि च ॥ ३२ ॥

अग्ने ! आप ही सब कुछ हैं । यह सम्पूर्ण जगत् आप-में ही प्रतिष्ठित है। आप समस्त भूतों और सम्पूर्ण भुवनोंका धारण-पोषण करते हैं ॥ ३२ ॥

त्वमग्ने हव्यवाडेकस्त्वमेव परं हविः।
यजन्ति च सदा सन्तस्त्वामेव परमाध्वरे ॥ ३३ ॥

अग्ने ! एकमात्र आप ही देवताओंके पास हविष्य पहुँचानेवाले हैं। आप ही उत्तम हविष्य हैं। साधु पुरुष श्रेष्ठ यज्ञमें सदा आपका ही यजन् करते हैं ॥ ३३ ॥

त्वमन्नं प्राणिनां भुङ्क्षे जगत्त्रातासि त्वं प्रभो।
त्वयि प्रवृत्तो विजयस्त्वयि लोकाः प्रतिष्ठिताः ॥ ३४ ॥

प्रभो ! आप समस्त प्राणियोंका अन्न खाते हैं और सारे जगत्की रक्षा करते हैं। आपमें ही विजयकी प्रवृत्ति होती है और आपमें ही सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित हैं ॥ ३४ ॥

सर्वान्ल्लोकांस्त्रीनिमान् हव्यवाह
प्राप्ते काले त्वं पचस्येव दीप्तः।
त्वमेवैकस्तपसे जातवेदो
नान्यस्त्वत्तो विद्यते गोषु देव ॥ ३५ ॥

हव्यवाहन ! आप प्रलयका समय आनेपर प्रज्वलित हो इस सम्पूर्ण त्रिलोकीको जला पचा डालते हैं । अग्निदेव ! एकमात्र आप ही सूर्यरूपसे तपते हैं । आपके सिवा दूसरा कोई उन किरणोंमें ताप देनेवाला नहीं है ॥ ३५ ॥

वृषाकपिः सिन्धुपतिस्त्वमग्ने
महामखेष्वग्रहरस्त्वमेव ।
विश्वस्य भूम्नस्त्वमसि प्रसूति-
स्त्वं च प्रतिष्ठा भगवन् प्रजानाम् ॥ ३६ ॥

अग्ने ! आप ही सूर्यरूपसे जलको बरसाते और सोखते हैं । आप ही सिन्धुपति हैं तथा आप ही बड़े-बड़े यज्ञोंमें अग्रभागके अधिकारी हैं । भगवन् ! इस विराट् विश्वके प्रसव-स्थान भी आप ही हैं तथा आप ही समस्त प्रजाओंके आधार हैं ॥ ३६ ॥

सृजस्यपो रश्मिभिर्जातवेद-
स्तथौषधीरोषधीनां रसांश्च ।
विश्वं त्वमादाय युगान्तकाले
स्रष्टा भवस्यानल सर्गकाले ॥ ३७ ॥

अग्निदेव ! आप अपनी किरणोंसे जलकी सृष्टि करते हैं । आप ही ओषधियों तथा उनके रसोंके उत्पादक हैं । अनल ! आप युगान्तकालमें सम्पूर्ण विश्वको लेकर अपने आपमेंविलीन कर लेते हैं तथा सृष्टिकालमें पुनः संसारके स्रष्टा होते हैं ॥ ३७ ॥

त्वमग्ने सर्वभूतानां योनिर्वेदेषु गीयसे।
त्वया देवहितार्थाय निहता दानवा रणे ॥ ३८ ॥

अग्निदेव ! सम्पूर्ण वेदोंमें आप ही समस्त प्राणियोंकी योनि बताये गये हैं । देव ! आपने ही देवताओंके हितके लिये रणभूमिमें दानवोंका वध किया है ॥ ३८ ॥

स्वयोनिस्ते महातेजस्तोयं मखशतार्चित।
तां स्वयोनिं समासाद्य किं विषीदसि पावक ॥ ३९ ॥

सैकड़ों यज्ञोंद्वारा पूजित महातेजस्वी पावक ! जल तो आपकी अपनी ही योनि है । उस अपनी ही योनिको पाकर आप विषाद क्यों करते हैं ? ॥ ३९ ॥

त्रायस्व समरे देवान् दैत्येभ्यः सुरसत्तम।
पिङ्गाक्ष लोहितग्रीव कृष्णवर्त्मन् हुताशन ॥ ४० ॥

सुरश्रेष्ठ ! कृष्णवर्त्मन् ! पिङ्गलनेत्र ! लोहितग्रीव ! हुताशन ! आप समराङ्गणमें देवताओंकी दैत्योंसे रक्षा करें ॥ ४० ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनेऽग्निस्रवे द्विषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें अग्निकी स्तुतिविषयक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६२ ॥

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