विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 972, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५४८ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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त्रिपष्टितमोऽध्यायः
राजा बलिके प्रति प्रह्लादका वचन तथा बलिकी देवसेनापर आक्रमण
वैशम्पायन उवाच
बृहस्पतेस्तु वचनं श्रुत्वा सत्यं समीरितम्।
भूयः प्रजज्वाल रणे हविषेव महामखे ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! बृहस्पतिकी कही हुई यह सच्ची बात सुनकर अग्निदेव उस रणक्षेत्रमें पुनः प्रज्वलित हो उठे, मानो किसी महायज्ञमें घृतकी आहुति पाकर वे फिरसे धधक उठे हों ॥ १ ॥
हतास्तु माया दैत्यानां प्रदीप्तेनाग्निना रणे।
हतमाया हतबला बलिं ते समुपस्थिताः ॥ २ ॥
समरभूमिमें प्रदीप्त अग्निके द्वारा दैत्योंकी सारी मायाएँ नष्ट कर दी गयीं। माया तथा बलके नष्ट हो जानेपर वे बलिकी सेवामें उपस्थित हुए ॥ २ ॥
पराजितेषु दैत्येषु वह्निनाद्भुतकर्मणा।
प्रह्लादस्तूत्तरं वाक्यमाह दैत्यपतिं बलिम् ॥ ३ ॥
अद्भुत कर्म करनेवाले अग्निके द्वारा समस्त दैत्योंके परास्त कर दिये जानेपर प्रह्लादने दैत्यराज बलिसे यह उत्तम बात कही— ॥ ३ ॥
भवानग्निश्च वायुश्च भास्करः सलिलं शशी।
नक्षत्राणि दिशो व्योम भूश्च दानवसत्तम ॥ ४ ॥
भविष्यं चैव भूतं च भवद्यासुरसत्तम।
दत्तं चैतद् भागवता वरदेन स्वयंभुवा ॥ ५ ॥
इन्द्रत्वं चामरत्वं च युद्धे चाप्यपराजयः।
ईशित्वं च वशित्वं च बलं चैवामितं शुभम् ॥ ६ ॥
सर्वभूतेश्वरत्वं च दैत्यराज सदा तव।
महायोगीश्वरत्वं च शूरत्वं च महामृधे ॥ ७ ॥
अणिमा लघिमा चैव ये चान्ये सात्त्विका गुणाः।
तत्पराजित्य दैत्येन्द्र देवान् सर्वांश्च सानुगान् ॥ ८ ॥
यथोक्तं ब्रह्मणा राजंस्तत्तथा न तदन्यथा।
‘दानवशिरोमणे ! अग्नि, वायु, सूर्य, जल, चन्द्रमा, नक्षत्र, दिशाएँ, आकाश तथा पृथ्वी—सब कुछ तुम्हीं हो ॥ ४ ॥
'असुरप्रवर ! भूत, वर्तमान और भविष्य भी तुम्हीं हो। दैत्यराज ! वरदायक भगवान् स्वयम्भूने तुम्हें यह वर दिया है कि तुम इन्द्रत्व और अमरत्व प्राप्त करोगे, युद्धमें तुम्हारी पराजय नहीं होगी। ईशित्व, वशित्व, अपरिमित शुभ बल तथा सम्पूर्ण भूतोंका अधीश्वरत्व तुम्हें सदा प्राप्त होगा। तुम महायोगीश्वर होओगे और महासमरमें शौर्य प्राप्त करोगे। अणिमा, लघिमा तथा अन्य जो सात्विक गुण हैं, वे भी तुम्हें सुलभ होंगे, अतः दैत्यराज ! तुम देवोंसहित समस्त देवताओंको पराजित करके महान् ऐश्वर्य प्राप्त करो; राजन् ! ब्रह्माजीने जैसा कहा है; वह उसी रूपमें सत्य होगा। उसे कोई मिथ्या नहीं कर सकता ॥ ५–८॥
तस्यतद् वचनं श्रुत्वा प्रह्लादस्य महात्मनः।
बलिः परमसंहृष्टः प्रायाच्छक्ररथं प्रति ॥ ९ ॥
महात्मा प्रह्लादका वह वचन सुनकर राजा बलिको बड़ा हर्ष हुआ। वे उत्साहित होकर इन्द्रके रथकी ओर चले ॥ ९ ॥
ततः प्रयान्तं विबुधेन्द्रसंनिधौ
महासुरेन्द्रं बलिमुत्तमश्रियम्।
तमञ्जसा जग्मुरभिप्रदक्षिणं
द्विजाश्च पुण्याः पशवश्च सत्तमाः ॥ १० ॥
इन्द्रके समीप जाते हुए उत्तम शोभासे सम्पन्न महान् असुरेन्द्र बलिको उस समय पवित्र पक्षी और श्रेष्ठ पशु अनायास ही दाहिने करके गये ॥ १० ॥
महजटाभारधरास्तपस्विन-
स्तदा तमायुर्विधिमन्त्रमङ्गलैः।
अभिष्टुवन्तः कवयः स्वलंकृतं
बलिं प्रयान्तं रणमूर्धनि स्थिताः ॥ ११ ॥
उस समय युद्धके मुहानेपर स्थित हुए महान् जटाभारको धारण करनेवाले विद्वान् तपस्वी युद्धोपयोगी वेषभूषासे विभूषित होकर रणकी यात्रा करनेवाले राजा बलिकी विधि-पूर्वक मङ्गलमय मन्त्रोंद्वारा स्तुति करने लगे ॥ ११ ॥
प्रतप्तजाम्बूनदचित्रभूषणै-
र्दिव्यैश्च रत्नैर्विविधैरलंकृतः।
विराजमानः परमेण वर्चसा
रणे विभात्यग्निशिखेव दानवः ॥ १२ ॥
तपाये हुए सुवर्णके विचित्र आभूषणों तथा नाना प्रकारके दिव्य रत्नोंसे अलंकृत हो उत्तम तेजसे प्रकाशमान दानवराज बलि रणभूमिमें अग्निशिखाके समान उद्भासित हो रहे थे ॥ १२ ॥
स वै तदा शत्रुबलादितं बलं
बलिर्ददर्शोत्तमसत्त्ववीर्यवान् ।
जलागमे श्रीमदिवाभ्रमण्डलं
विशीर्यमाणं नभसीव वायुना ॥ १३ ॥
उस समय उत्तम सत्त्व और बल-पराक्रमसे सम्पन्न राजा बलिने देखा कि शत्रुओंकी सेनाने मेरी सेनाको भली-भाँति पीड़ित कर दिया है। जैसे वर्षा-ऋतुमें शोभासम्पन्न मेघ-मण्डल आकाशमें वायुके द्वारा छिन्न-भिन्न कर दिया जाता है, उसी प्रकार दैत्यसेना तितर-बितर हो गयी है ॥ १३ ॥
ततो ददर्शार्थ बलानि सर्वतो
रणे प्रगुप्तानि हुताशनेन वै।