विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 973, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] चतुःषष्टितमोऽध्यायः ९४९
समुच्छ्रितान्युग्रतराणि तत्र वै
समुद्रवेगानिव पर्वसंधिषु ॥ १४ ॥
तदनन्तर उन्होंने देखा कि शत्रुओंकी सेनाएँ रणभूमिमें अग्निके द्वारा सब ओरसे सुरक्षित हैं। वे निरन्तर उत्कर्षके पथपर बढ़ती हुई उन्नत होती चली जा रही हैं। जैसे पर्वसंधि (पूर्णिमा) की वेलामें समुद्रोंके वेग बढ़ जाते हैं, उसी प्रकार शत्रुसेनाकी प्रगति उत्तरोत्तर बढ़ रही है ॥ १४ ॥
सतूलशक्त्यृष्टिगदासिस सायकान्
क्षिपन् रिपूणां समरे महात्मनाम् ।
ननाद सिंहर्षभमत्तनागव-
ज्जलागमे तोयदवच्च वीर्यवान् ॥ १५ ॥
तब वे पराक्रमी राजा बलि समरभूमिमें महामनस्वी शत्रुओंपर शूल, शक्ति, ऋष्टि, गदा, खड्ग और सायकोंकी वर्षा करते हुए सिंह, साँड, मतवाले हाथी और वर्षाकालके मेघकी भाँति जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ १५ ॥
दिव्यास्त्रधूमः सुभुजोग्रवायु-
र्महाबलः पौरुषविक्रमेन्धनः ।
प्रजा दिधक्षन्निव कालवह्निः
सुघोररूपो विबभौ रणे बलिः ॥ १६ ॥
उस रणभूमिमें महाबलवान् राजा बलि समस्त प्रजाओंको दग्ध कर डालनेकी इच्छावाले प्रलयंकर अग्निके समान अत्यन्त घोर रूपमें प्रकाशित होने लगे। दिव्यास्त्र ही उन अग्निस্বরূপ बलिके धूम थे। उत्तम भुजा ही उन्हें उत्तेजित करनेवाली भयंकर वायु थी और पुरुषार्थ एवं पराक्रम ही उस अग्निको उद्दीप्त करनेवाले ईंधन थे ॥ १६ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे त्रिषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारविषयक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६३ ॥
चतुःषष्टितमोऽध्यायः
बलि और इन्द्रका युद्ध तथा इन्द्रका रणभूमिसे पलायन
वैशम्पायन उवाच
बलिना तु सुराः सर्वे वर्जयित्वा सुराधिपम् ।
रणे शरशतैर्भिन्नाः ससैन्या वै पराजिताः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! राजा बलिने देवराज इन्द्रको छोड़कर शेष सभी देवताओंको सेनासहित पराजित कर दिया। वे रणभूमिमें उनके सैकड़ों बाणोंसे क्षत-विक्षत हो गये थे ॥ १ ॥
विमुखा याति दैत्येन्द्रैर्वध्यमाना महाचमूः ।
जितास्तु बलिना देवाः शक्रमाहुर्महाबलम् ॥ २ ॥
दैत्येन्द्रोंकी मार खाती हुई देवताओंकी विशाल सेना रणभूमिसे विमुख होकर भाग चली। बलिसे पराजित हुए देवता महाबली इन्द्रके पास गये और इस प्रकार बोले ॥ २ ॥
देवा ऊचुः
भवानिन्द्रश्च धाता च लोकानां प्रभुरव्ययः ।
त्वमप्रतिमकर्मा च तथैवानुपमद्युतिः ॥ ३ ॥
देवताओंने कहा— देवराज ! आप ही इन्द्र (महान् ऐश्वर्यशाली) हैं, आप ही सम्पूर्ण लोकोंके धारण-पोषण करनेवाले अविनाशी प्रभु हैं। आपके वीरोचित कर्मोंकी कहीं उपमा नहीं है। आप अनुपम तेजसे सम्पन्न हैं ॥ ३ ॥
विद्रुतानीह सैन्यानि सहास्माभिः सुरेश्वर ।
रथचक्रध्वजाक्षाणि विभिन्नानि महासुरैः ॥ ४ ॥
सुरेश्वर ! बड़े-बड़े असुरोंने हमारे साथ ही समस्त देव-सैनिकोंको यहाँ मार भगाया है और हमारे रथोंके पहिये, ध्वज तथा धुरे तोड़ डाले हैं ॥ ४ ॥
रथहस्त्यश्वयोधाश्च पदाताश्च सहस्रशः ।
भिन्नच्छिन्नाश्च शतशो गदामुशलपट्टिशैः ॥ ५ ॥
सैकड़ों रथी, हाथीसवार, घुड़सवार तथा सहस्रों पैदल सैनिक गदा, मुसल और पट्टिशोंकी मारसे छिन्न-भिन्न होकर रणभूमिमें पड़े हैं ॥ ५ ॥
महाभैरवरूपं हि दैत्येन्द्रेण कृतं रणे ।
किमुपेक्षसि दैत्येन्द्रैर्हन्यमानां महाचमूम् ॥ ६ ॥
त्रायस्व त्रिदशश्रेष्ठ शरण्यः शरणागतान् ।
दैत्यराज बलिने रणभूमिमें महाभयंकर रूप धारण किया है। दैत्येन्द्रोंद्वारा मारी जाती हुई विशाल देवसेनाकी आप उपेक्षा क्यों कर रहे हैं? देवश्रेष्ठ ! आप शरणागतवत्सल हैं; अतः शरणमें आये हुए हम देवताओंकी रक्षा कीजिये ॥ ६॥
श्रुत्वा तु वचनं तेषां देवानाममराधिपः ॥ ७ ॥
संवर्त्ताग्निसमक्रुद्धः सर्वान् दहति दानवान् ।
उन देवताओंका यह वचन सुनकर अमरेश्वर इन्द्र संवर्तक अग्निके समान कुपित हो समस्त दानवोंको दग्ध करने लगे ॥ ७३॥
दिवाकरकराकारं किरीटं धारयन् प्रभुः ॥ ८ ॥
वैदूर्यवर्णसंकाशो नानारत्नचिताङ्गदः ।
मयूररोमा रक्ताक्षः शतबाहुः सहस्रदृक् ॥ ९ ॥