भारतकोश
संग्रह पर लौटें

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

भविष्यपर्व ] चतुःषष्टितमोऽध्यायः ९४९


समुच्छ्रितान्युग्रतराणि तत्र वै
समुद्रवेगानिव पर्वसंधिषु ॥ १४ ॥

तदनन्तर उन्होंने देखा कि शत्रुओंकी सेनाएँ रणभूमिमें अग्निके द्वारा सब ओरसे सुरक्षित हैं। वे निरन्तर उत्कर्षके पथपर बढ़ती हुई उन्नत होती चली जा रही हैं। जैसे पर्वसंधि (पूर्णिमा) की वेलामें समुद्रोंके वेग बढ़ जाते हैं, उसी प्रकार शत्रुसेनाकी प्रगति उत्तरोत्तर बढ़ रही है ॥ १४ ॥

सतूलशक्त्यृष्टिगदासिस सायकान्
क्षिपन् रिपूणां समरे महात्मनाम् ।
ननाद सिंहर्षभमत्तनागव-
ज्जलागमे तोयदवच्च वीर्यवान् ॥ १५ ॥

तब वे पराक्रमी राजा बलि समरभूमिमें महामनस्वी शत्रुओंपर शूल, शक्ति, ऋष्टि, गदा, खड्ग और सायकोंकी वर्षा करते हुए सिंह, साँड, मतवाले हाथी और वर्षाकालके मेघकी भाँति जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ १५ ॥

दिव्यास्त्रधूमः सुभुजोग्रवायु-
र्महाबलः पौरुषविक्रमेन्धनः ।
प्रजा दिधक्षन्निव कालवह्निः
सुघोररूपो विबभौ रणे बलिः ॥ १६ ॥

उस रणभूमिमें महाबलवान् राजा बलि समस्त प्रजाओंको दग्ध कर डालनेकी इच्छावाले प्रलयंकर अग्निके समान अत्यन्त घोर रूपमें प्रकाशित होने लगे। दिव्यास्त्र ही उन अग्निस্বরূপ बलिके धूम थे। उत्तम भुजा ही उन्हें उत्तेजित करनेवाली भयंकर वायु थी और पुरुषार्थ एवं पराक्रम ही उस अग्निको उद्दीप्त करनेवाले ईंधन थे ॥ १६ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे त्रिषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारविषयक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६३ ॥


चतुःषष्टितमोऽध्यायः

बलि और इन्द्रका युद्ध तथा इन्द्रका रणभूमिसे पलायन

वैशम्पायन उवाच

बलिना तु सुराः सर्वे वर्जयित्वा सुराधिपम् ।
रणे शरशतैर्भिन्नाः ससैन्या वै पराजिताः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! राजा बलिने देवराज इन्द्रको छोड़कर शेष सभी देवताओंको सेनासहित पराजित कर दिया। वे रणभूमिमें उनके सैकड़ों बाणोंसे क्षत-विक्षत हो गये थे ॥ १ ॥

विमुखा याति दैत्येन्द्रैर्वध्यमाना महाचमूः ।
जितास्तु बलिना देवाः शक्रमाहुर्महाबलम् ॥ २ ॥

दैत्येन्द्रोंकी मार खाती हुई देवताओंकी विशाल सेना रणभूमिसे विमुख होकर भाग चली। बलिसे पराजित हुए देवता महाबली इन्द्रके पास गये और इस प्रकार बोले ॥ २ ॥

देवा ऊचुः

भवानिन्द्रश्च धाता च लोकानां प्रभुरव्ययः ।
त्वमप्रतिमकर्मा च तथैवानुपमद्युतिः ॥ ३ ॥

देवताओंने कहा— देवराज ! आप ही इन्द्र (महान् ऐश्वर्यशाली) हैं, आप ही सम्पूर्ण लोकोंके धारण-पोषण करनेवाले अविनाशी प्रभु हैं। आपके वीरोचित कर्मोंकी कहीं उपमा नहीं है। आप अनुपम तेजसे सम्पन्न हैं ॥ ३ ॥

विद्रुतानीह सैन्यानि सहास्माभिः सुरेश्वर ।
रथचक्रध्वजाक्षाणि विभिन्नानि महासुरैः ॥ ४ ॥

सुरेश्वर ! बड़े-बड़े असुरोंने हमारे साथ ही समस्त देव-सैनिकोंको यहाँ मार भगाया है और हमारे रथोंके पहिये, ध्वज तथा धुरे तोड़ डाले हैं ॥ ४ ॥

रथहस्त्यश्वयोधाश्च पदाताश्च सहस्रशः ।
भिन्नच्छिन्नाश्च शतशो गदामुशलपट्टिशैः ॥ ५ ॥

सैकड़ों रथी, हाथीसवार, घुड़सवार तथा सहस्रों पैदल सैनिक गदा, मुसल और पट्टिशोंकी मारसे छिन्न-भिन्न होकर रणभूमिमें पड़े हैं ॥ ५ ॥

महाभैरवरूपं हि दैत्येन्द्रेण कृतं रणे ।
किमुपेक्षसि दैत्येन्द्रैर्हन्यमानां महाचमूम् ॥ ६ ॥
त्रायस्व त्रिदशश्रेष्ठ शरण्यः शरणागतान् ।

दैत्यराज बलिने रणभूमिमें महाभयंकर रूप धारण किया है। दैत्येन्द्रोंद्वारा मारी जाती हुई विशाल देवसेनाकी आप उपेक्षा क्यों कर रहे हैं? देवश्रेष्ठ ! आप शरणागतवत्सल हैं; अतः शरणमें आये हुए हम देवताओंकी रक्षा कीजिये ॥ ६॥

श्रुत्वा तु वचनं तेषां देवानाममराधिपः ॥ ७ ॥
संवर्त्ताग्निसमक्रुद्धः सर्वान् दहति दानवान् ।

उन देवताओंका यह वचन सुनकर अमरेश्वर इन्द्र संवर्तक अग्निके समान कुपित हो समस्त दानवोंको दग्ध करने लगे ॥ ७३॥

दिवाकरकराकारं किरीटं धारयन् प्रभुः ॥ ८ ॥
वैदूर्यवर्णसंकाशो नानारत्नचिताङ्गदः ।
मयूररोमा रक्ताक्षः शतबाहुः सहस्रदृक् ॥ ९ ॥

९५० श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


वे प्रभावशाली देवराज सूर्यदेवकी किरणोंके समान कान्तिमान् किरीट धारण किये हुए थे। उनका वर्ण वैदूर्य-मणिके समान था। उनके बाजू-बंदोंमें नाना प्रकारके रत्न जड़े गये थे। उनकी रोमावलि मोरोंके समान और आँखें लाल थीं। वे सौ बाहों तथा सहस्र नेत्रोंसे सुशोभित थे॥८-९॥

हरिरेको हरिश्मश्रुर्नानाकेतुर्महाबलः ।
वज्रप्रहरणः श्रीमान् योगी शतशिरोधरः ॥ १० ॥

वे इन्द्र अद्वितीय वीर थे। उनकी मूँछें हरे रंगकी थीं। उनके रथपर नाना प्रकारकी ध्वजा-पताकाएँ फहरा रही थीं। वे महान् बलशाली थे। वज्र ही उनका आयुध था। वे सौ सिर धारण करनेवाले तेजस्वी योगी थे ॥ १० ॥

सधनुर्बद्धसन्नाहः शतादित्यसमप्रभः ।
देवगन्धर्वयक्षौघैरनुयातः सहस्रशः ॥११॥

कवच बाँधकर हाथमें धनुष लिये देवराज इन्द्र सौ सूर्योंके समान दिव्य प्रभासे प्रकाशित हो रहे थे। सहस्रों देवता, गन्धर्व और यक्षोंके समुदाय उनके पीछे-पीछे चलते थे ॥ ११ ॥

सामगैश्च जयैश्चापि स्तूयमानो महर्षिभिः।
शतपर्व महारौद्रं स्फोटनं सर्वतोमुखम् ॥ १२ ॥
प्रगृह्य रुचिरं वज्रं दीप्तं रौद्राट्टहासनम् ।
दैत्यानयोधयत् सर्वान् महेन्द्रः पाकशासनः ॥ १३ ॥
अधृष्यः सर्वभूतानामादित्यः दयितः सुतः।

सामगान करनेवाले महर्षि जय-जयकार करते हुए उनकी स्तुति करते थे। वे पाकशासन महेन्द्र तोड़-फोड़ करनेवाले, महाभयंकर, सब ओर मुखवाले तथा रौद्र अट्टहास (गड़गड़ाहट) करनेवाले, सौ पर्वोंसे युक्त, दीप्तिमान् एवं मनोहर वज्र हाथमें लेकर समस्त दैत्योंके साथ युद्ध करने लगे। अदितिके प्रिय पुत्र वे देवराज इन्द्र समस्त प्राणियोंके लिये अजेय थे ॥ १२-१३॥

ततः प्रवृत्तः संग्रामो बलिवासवयोस्र्तदा ॥ १४ ॥
उभाभ्यां देवदैत्याभ्यामचिरान्महदद्भुतः ।
अतिवीर्यबलोदग्रस्तुमुलो लोमहर्षणः ॥ १५॥

तदनन्तर शीघ्र ही राजा बलि और इन्द्रमें महान् अद्भुत संग्राम होने लगा। उनमेंसे एक देवता था और दूसरा दैत्य। उन दोनोंका वह संग्राम अत्यन्त बल-पराक्रमसे बढ़ा-चढ़ा, भयंकर और रोमाञ्चकारी था ॥ १४-१५ ॥

प्रह्लादेन स्तुतिशतैः कर्मभिर्जयसम्मतैः ।
प्रबोधितो दैत्यपतिरग्निरिद्ध इवाबभौ ॥ १६ ॥

प्रह्लादने सैकड़ों स्तुतियों और विजयके लिये अनुमोदित कर्मोंका वर्णन करके दैत्यराज बलिके शौर्य और उत्साहको जगाया, जिससे वे प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित होने लगे ॥ १६ ॥

सुरासुरेन्द्रयोर्दृष्ट्वा संग्रामं लोमहर्षणम् ।
देवानां दानवानां च भूयो युद्धमभूत् तदा ॥ १७ ॥

देवेन्द्र और असुरेन्द्रके उस रोमाञ्चकारी संग्रामको देखकर उस समय दूसरे-दूसरे देवताओं और दानवोंमें भी फिर युद्ध होने लगा ॥ १७ ॥

ततोऽविध्यन्महेन्द्रस्तं बलिमस्त्रैर्महाबलम् ।
तान्यस्त्राणि महाबाहुश्चिच्छेद शतधा रणे ॥ १८ ॥

महेन्द्रने महाबलवान् बलिको अपने अस्त्रोंद्वारा घायल कर दिया। तब महाबाहु बलिने रणभूमिमें इन्द्रके चलाये हुए उन सभी अस्त्रोंके सौ-सौ टुकड़े कर डाले ॥ १८ ॥

ततः क्रुद्धः पुनस्तत्र निजघ्ने दानवं महत् ।
आग्नेयमथ शत्रुघ्नं चिक्षेपेन्द्रो महाबलः ॥ १९ ॥

तब महाबली इन्द्रने कुपित होकर पुनः वहाँ महान् दानवदलका संहार आरम्भ किया। उन्होंने शत्रुनाशक आग्नेयास्त्रका प्रयोग किया ॥ १९ ॥

तद्दृष्ट्वा खे समागच्छत् प्रलयानलसंनिभम् ।
पातयामास तच्चैन्द्रं वारुणास्त्रेण दानवः ॥ २० ॥

प्रलयाग्निके समान तेजस्वी उस आग्नेयास्त्रको आकाशमें आता देख दानव बलिने वारुणास्त्रके द्वारा इन्द्रके छोड़े हुए उस अस्त्रको काट गिराया ॥ २० ॥

संक्रुद्धो मघवा वज्रमगृह्णात् पर्वतोपमम् ।
हन्तुकामो रणश्लाघी बलिं दैत्याधिपं रणे ॥ २१ ॥

तब क्रोधमें भरे हुए रणश्लाघी इन्द्रने रणभूमिमें दैत्यराज बलिका वध करनेके लिये पर्वताकार वज्र हाथमें लिया ॥ २१ ॥

ततः शुश्राव देवेन्द्रः कौशिको हरिवाहनः ।
अशरीरां शुभां वाणीं तस्मिन् महति वैशसे ॥ २२ ॥

इतनेहीमें हरे रंगके वाहनवाले कौशिक देवेन्द्रने उस महासंग्रामके भीतर यह शुभ आकाशवाणी सुनी ॥ २२ ॥

निवर्तस्व महाबाहो सुराणां नन्दिवर्धन ।
पुरंदर सुरश्रेष्ठ न जेष्यसि रणे बलिम् ॥ २३ ॥

'महाबाहो ! युद्धसे निवृत्त हो जाओ ! देवताओंका आनन्द बढ़ानेवाले सुरश्रेष्ठ पुरन्दर ! तुम बलिको रणभूमिमें नहीं जीत सकोगे ॥ २३ ॥

तपसात्युत्तमो दैत्यो वरदानेन चाधिकः ।
स्वयंभूपरितोषाच्च सत्यधर्माच्च वासव ॥ २४ ॥

'वासव ! दितिनन्दन बलि तपस्यासे तो अत्यन्त उत्तम है ही, वरदानके द्वारा भी तुमसे अधिक शक्तिशाली हो गया है; ब्रह्माजीके संतोषसे तथा सत्यधर्मके पालनसे भी इसकी शक्ति बढ़ गयी है ॥ २४ ॥

दानवराज बलिपर लक्ष्मीकी कृपा (पृष्ठ-संख्या १५०)

भविष्यपर्व ] पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ९५१


नैष शक्यस्त्वया जेतुं त्रिदशैर्वा सुरेश्वर ।
यो हास्य जेता भृगुवांस्तं शृणुष्व समाहितः ॥ २५ ॥

'सुरेश्वर ! तुम अथवा दूसरे देवता भी इसे नहीं जीत सकते। जो भगवान् इसपर विजय पानेवाले हैं, उन्हें बताता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ २५ ॥

ब्रह्मणः स हि सर्वस्वं देवानां चैव सा गतिः ।
परं रहस्यं धर्मस्य परस्य च परा गतिः ॥ २६ ॥

'वे ब्रह्माजीके सर्वस्व हैं, देवताओंकी भी गति हैं, धर्मके परम रहस्य हैं तथा उत्कृष्ट पुरुषकी भी परम गति हैं ॥ २६ ॥

परात्परतरः श्रीमान् परावरगतिः प्रभुः ।
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ २७ ॥

'वे भगवान् परसे भी परतर (उत्तमसे भी परमोत्तम) हैं, लक्ष्मीसे सम्पन्न हैं तथा वे ही कारण और कार्य अथवा भूत और भविष्यकी भी गति हैं। वे सबके अन्तर्यामी आत्मा हैं। उनके सहस्रों सिर, सहस्रों नेत्र और सहस्रों पैर हैं ॥ २७ ॥

शङ्खचक्रगदापाणिः पीतवासाः सुरारिहा ।
जेताजेयो जयः श्रीमान् सोऽस्य जेता भविष्यति ॥ २८ ॥

'उनके हाथमे शङ्ख, चक्र और गदा आदि आयुध शोभा पाते हैं। वे पीताम्बरधारी तथा देवद्रोहियोंका दलन करनेवाले हैं। वे श्रीमान् भगवान् सबपर विजय पाते हैं, किंतु उन्हें कोई नहीं जीत सकता। वे विजयस्वरूप हैं। वे ही इस बलिपर विजय प्राप्त करेंगे' ॥ २८ ॥

श्रुत्वा दिव्यां तु मधुरां वाणीं तामशरीरिणीम् ।
अपयातो रणाच्छक्रः सार्धं सर्वैः सुरोत्तमैः ॥ २९ ॥

वह दिव्य मधुर आकाशवाणी सुनकर समस्त श्रेष्ठ देवताओंके साथ इन्द्र रणभूमिसे हट गये ॥ २९ ॥

अपयाते तु देवेन्द्रे कौशिके हरिवाहने ।
सिंहनादो महानासीद् दानवानां महामृधे ॥ ३० ॥

हरिवाहन देवराज इन्द्रके पलायन कर जानेपर उस महासमरमे दानवोंका महान् सिंहनाद होने लगा ॥ ३० ॥

ततः किलकिलाशब्दः क्ष्वेडितास्फोटितस्वनः ।
शङ्खानां निनदश्चात्र योधानां वल्गितस्वनः ॥ ३१ ॥

तदनन्तर किलकारियोंकी आवाज आने लगी, गर्जने और ताल ठोंकनेका शब्द सुनायी देने लगा, शङ्खोंकी ध्वनि होने लगी और योद्धाओंके उछलने-कूदनेकी आवाज भी वहाँ सब ओर होने लगी ॥ ३१ ॥

वादित्राणां च निर्घोषस्तुमुलश्चाभवत्तदा ।
जयशब्दरवाश्चैव देवानां तु पराजये ॥ ३२ ॥

उस समय देवताओंकी पराजय होनेपर दैत्योंके दलमें नाना प्रकारके वाद्योंका तुमुल घोष होने लगा और जयजय कारके शब्द सुनायी देने लगे ॥ ३२ ॥

ससैन्यो दैत्यराजस्तु स्तूयमानः सुहृद्गणैः ।
बलीन्द्रो विबभौ दैत्यो हिरण्यकशिपुर्यथा ॥ ३३ ॥

सुहृदोंके समुदाय सेनासहित दैत्यराज बलिकी स्तुति करने लगे। उस समय इन्द्रपदपर प्रतिष्ठित हुए राज बलि दैत्यप्रवर हिरण्यकशिपुके समान शोभा पाने लगे ॥ ३३ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामने देवासुरसंग्रामे शक्रपलाने चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें देवासुरसंग्राममें इन्द्रका पलायनविषयक चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६४ ॥


पञ्चषष्टितमोऽध्यायः

विजयी बलिके पास राजलक्ष्मी आदिका शुभागमन

वैशम्पायन उवाच

निष्प्रयत्नेषु देवेषु त्रैलोक्ये दैत्यपालिते ।
जये बलेर्बलवतो मयशम्बरयोस्तथा ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! तदनन्तर देवता विजयके लिये प्रयत्न छोड़ बैठे और त्रिलोकीके राज्यका दैत्यराज बलिके द्वारा पालन होने लगा। बलवान् बलि, मयासुर और शम्बरासुरकी विजय हुई ॥ १ ॥

सुधासु दिक्षु सर्वासु प्रवृत्ते धर्मकर्मणि ।
अपावृत्ते धर्मपथे अयनस्थे दिवाकरे ॥ २ ॥

सम्पूर्ण दिशाएँ अमृतमयी हो गयीं, धर्म-कर्मका पालन होने लगा। धर्मका मार्ग खुल गया और सूर्यदेव अपने अयनमे स्थित हो गये ॥ २ ॥

प्रह्लादशम्बरमयैरनुह्लादेन चैव हि ।
दिक्षु सर्वासु गुप्तासु गगने दैत्यपालिते ॥ ३ ॥

दैत्येषु मखशोभाश्च स्वर्गार्थे दर्शयत्सु च ।
प्रकृतिस्थे तदा लोके वर्तमाने च सत्पथे ॥ ४ ॥

अभावे सर्वपापानां भावे चैव तथा स्थिते ।
भावे तपसि सिद्धानां सर्वत्राश्रमरक्षिषु ॥ ५ ॥

९५२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे

चतुष्पादे स्थिते धर्मे अधर्मे पादविग्रहे।
प्रजापालनयुक्तेषु भ्राजमानेषु राजसु ॥ ६ ॥
स्वधर्मसम्प्रयुक्तेषु सर्वाश्रमनिवासिषु ।
अभिषिक्तोऽसुरैः सर्वैर्दैत्यराजो बलिस्तदा ॥ ७ ॥

प्रह्लाद, शम्बरासुर, मयासुर और अनुह्लादके द्वारा सम्पूर्ण दिशाएँ सुरक्षित हो गयीं। आकाशका दैत्योंद्वारा पालन होने लगा। दैत्यलोग स्वर्गकी प्राप्तिके लिये यज्ञशोभाका दर्शन कराने लगे। उस समय सारा जनसमुदाय प्रकृतिस्थ होकर सन्मार्गपर चलने लगा। सब प्रकारके पापोंका अभाव हो गया। पुण्यकर्मकी व्यापक सत्ता दिखायी देने लगी। सिद्ध पुरुषोंकी तपस्यामें स्थिति हुई। सर्वत्र आश्रमोंकी रक्षा होने लगी। धर्म अपने चारों चरणोंसे युक्त होकर रहने लगा। अधर्मका चतुर्थांशमात्र ही शेष रह गया। तेजस्वी राजा प्रजापालनमें तत्पर रहने लगे और सभी आश्रमोंके निवासी अपने-अपने धर्ममें स्थित हो गये। ऐसे समयमें समस्त असुरोंने दैत्यराज बलिको इन्द्रके पदपर अभिषेक किया ॥ ३-७ ॥

हृष्टेष्वसुरसंघेषु नदत्सु मुदितेषु च ।
अथाभ्युपगता लक्ष्मीर्बलिं पद्मासने स्थिता ॥ ८ ॥
पद्मोद्यतकरा देवी वरदा सुरमोहिनी ।

उस समय असुरोंके समुदाय हर्षमें भर गये और आनन्दमग्न होकर जोर-जोरसे गर्जना करने लगे। इसी समय कमलके आसनपर विराजमान राजलक्ष्मी राजा बलिके पास आयीं। देवताओंको मोहनेवाली उन वरदायिनी देवीने अपने हाथमें एक कमलका फूल ले रखा था ॥ ८ ॥

श्रीरुवाच
बले बलवतां श्रेष्ठ महाराज महाद्युते ॥ ९ ॥
प्रीतास्मि तव भद्रं ते देवतानां पराजये ।

लक्ष्मी बोली—बलवानोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी महाराज बलि ! तुम्हारा भला हो। तुमने जो देवताओंको पराजित किया है, इससे मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हुई हूँ ॥ ९ ॥

यस्त्वया युधि विक्रम्य देवराजः पराजितः ॥ १० ॥
दृष्ट्वा ते परमं सत्त्वं ततोऽहं स्वयमागता ।

तुमने युद्धमें पराक्रम करके जो देवराज इन्द्रपर विजय पायी है, तुम्हारे उस उत्तम सत्त्व (धैर्य और बल) को देखकर मैं स्वयं तुम्हारे पास चली आयी हूँ ॥ १० ॥

नाश्चर्यं दानवश्रेष्ठ हिरण्यकशिपोः कुले ॥ ११ ॥
प्रसूतस्यासुरेन्द्रस्य तव कर्मेदमीदृशम्।

दानवशिरोमणे ! तुम असुरराज हिरण्यकशिपुके कुलमें उत्पन्न हुए हो; अतः तुम्हारा ऐसा पराक्रम करना आश्चर्यकी बात नहीं है ॥ ११ ॥

विशेषितस्त्वया राजन् दैत्येन्द्रः प्रपितामहः ॥ १२ ॥
येन भुक्तं हि निखिलं त्रैलोक्यमिदमव्ययम् ।

राजन् ! तुमने अपने प्रपितामह उस दैत्यराज हिरण्यकशिपुका महत्त्व बढ़ा दिया, जिसने प्रवाहरूपसे सदा बने रहनेवाले इस समस्त त्रिभुवनके राज्यका उपभोग किया है ॥ १२ ॥

विशेषतस्तव विभो सर्वे धर्मपथे स्थिताः ॥ १३ ॥
तेन त्रैलोक्यमुदयेन भोक्ष्यस्यमितविक्रम ।

प्रभो ! सबसे विशेष बात यह है कि तुम्हारे राज्यमें सब लोग धर्मके मार्गपर स्थित हैं। अमितपराक्रमी दैत्यराज ! उस त्रिलोकीकी श्रेष्ठ वस्तु धर्मके साथ रहकर तुम राज्यका उपभोग करोगे ॥ १३ ॥

एवमुक्त्वा हि सा देवी लक्ष्मीर्दैत्यपतिं बलिम् ॥ १४ ॥
प्रविष्टा वरदा सौम्या सर्वभूतमनोरमा ।

ऐसा कहकर सम्पूर्ण प्राणियोंके मनको प्रिय लगनेवाली सौम्यररूपा वरदायिनी लक्ष्मीदेवी दैत्यराज बलिके भीतर प्रविष्ट हो गयीं ॥ १४ ॥

शिष्टाश्च देव्यः प्रवरा ह्रीः कीर्तिर्द्युतिरेव च ॥ १५ ॥
प्रभा धृतिः क्षमा भूतिर्नीतिर्विद्या दया स्मृतिः ।
कृतिर्लज्जा तथा मेधा लक्ष्मीरीहा गतिस्तथा ॥ १६ ॥
श्रुतिः प्रीतिर्गिला कीर्तिः शान्तिः पुष्टिः क्रियास्तथा ।
सर्वाश्चाप्सरसो दिव्या नृत्यगीतविशारदाः ॥ १७ ॥
पतिं प्राप्ताः सुदैतेयं त्रैलोक्ये सचराचरे ।
प्राप्तमैश्वर्यममितं बलिना ब्रह्मवादिना ॥ १८ ॥

शेष जो श्रेष्ठ देवियाँ थीं, उन कीर्ति, द्युति, प्रभा, धृति, क्षमा, भूति, नीति, विद्या, दया, स्मृति, कृति, लज्जा, मेधा, लक्ष्मी, ईहा, गति, श्रुति, प्रीति, इला (श्रौतक्रिया), कीर्ति, शान्ति, पुष्टि तथा क्रिया आदिने एवं नृत्यगीतविशारद सम्पूर्ण दिव्य अप्सराओंने उत्तम दैत्यकुमार राजा बलिको पति (पालक) रूपमें प्राप्त किया। ब्रह्मवादी बलिने चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकीमें असीम ऐश्वर्य प्राप्त कर लिया ॥ १५—१८ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतार-विषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६५ ॥

भविष्यपर्व ]षट्षष्टितमोऽध्यायः९५३

षट्षष्टितमोऽध्यायः

अदिति और कश्यपजीके साथ देवताओंका ब्रह्मलोकमें जाना

जनमेजय उवाच
पराजिताः सुरा दैत्यैः किमकुर्वत वै मुने।
कथं च त्रिदिवं लब्धं भूयो देवैर्द्विजोत्तम ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा— मुने! द्विजश्रेष्ठ! दैत्योंसे पराजित होकर देवताओंने क्या किया? फिर उन्हें स्वर्गका राज्य कैसे प्राप्त हुआ? ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा वाणीं तु तां दिव्यां सह देवैः सुराधिपः।
प्राग्दिशं प्रस्थितः श्रीमानदित्यालयमुत्तमम् ॥ २ ॥

वैशम्पायनजीने कहा— जनमेजय! देवताओंसहित श्रीमान् देवराज इन्द्र उस दिव्य आकाशवाणीको सुनकर पूर्व दिशामें देवी अदितिके उत्तम भवनकी ओर चल दिये ॥ २ ॥

प्राप्यादित्यालयं शक्रः कथयामास तां गिरम्।
अदित्यां सा यथा युद्धे तेन वाणी पुरा श्रुता ॥ ३ ॥

अदितिके भवनमें पहुँचकर इन्द्रने युद्धस्थलमें पहले जो आकाशवाणी सुनी थी, उसे वहाँ माता अदितिके समीप कह सुनाया ॥ ३ ॥

अदितिरुवाच
यद्येवं पुत्र युष्माभिर्न शक्यो हन्तुमाहवे।
बलिर्वैरोचनसुतः सर्वैश्चैव मरुद्गणैः ॥ ४ ॥
सहस्रशिरसा हन्तुं केवलं शक्यतेऽसुरः।
तेनैकेन सहस्राक्ष न ह्यन्येन शतक्रतो ॥ ५ ॥
तद् वः पृच्छध्व पितरं कश्यपं सत्यवादिनम्।
पराजयार्थं दैत्यस्य वलेस्तस्य महात्मनः ॥ ६ ॥

अदिति बोलीं— बेटा! सहस्रलोचन! शतक्रतो! यदि ऐसी बात है, यदि तुमलोग और समस्त मरुद्गण भी रण-क्षेत्रमें विरोचनकुमार बलिको वध नहीं कर सकते, यदि वह असुर केवल उन एकमात्र सहस्र मस्तकवाले भगवान्‌के हाथसे ही मारा जा सकता है, दूसरे किसीके हाथसे नहीं तो तुम अपने सत्यवादी पिता कश्यपजीसे पूछो कि दिति-नन्दन महात्मा बलिकी पराजयके लिये क्या उपाय हो सकता है? ॥ ४-६ ॥

ततोऽदित्या सह सुराः सम्प्राप्ताः कश्यपान्तिकम्।
अपश्यन् कश्यपं तत्र मुनिं दिव्यतपोनिधिम् ॥ ७ ॥

तब सब देवता माता अदितिके साथ अपने पिता कश्यपजीके समीप गये। वहाँ उन्होंने दिव्य तपोनिधि मुनिवर कश्यपजीका दर्शन किया ॥ ७ ॥

आद्यं देवं गुरुं दिव्यं क्लिन्नं त्रिपवणार्वुभिः।
तेजसा भास्कराकारं गौरमग्निशिखाप्रभम् ॥ ८ ॥

वे आदिदेवता और दिव्य गुरु हैं। तीनों समय स्नान करनेके कारण उनका शरीर जलसे भीगा रहता है। वे सूर्यके समान तेजस्वी हैं। उनका गौरवर्ण अग्निशिखाके समान प्रकाशित होता है ॥ ८ ॥

न्यस्तदण्डं तपोयुक्तं बद्धकृष्णाजिनोत्तरम्।
वल्कलाजिनसंवीतं प्रदीप्तं ब्रह्मवर्चसा ॥ ९ ॥

उन्होंने दण्डका परित्याग कर दिया है। वे तपस्यामें संलग्न रहते हैं। उनके ऊपरके अङ्गोंमें उत्तरीयके रूपमें काला मृगचर्म बँधा होता है। वे वल्कल और मृगचर्मसे ही अपने शरीरको ढकते हैं। ब्रह्मतेजसे सदा ही उदीप्त रहते हैं ॥ ९ ॥

हुताशमिव दीप्तन्तमाज्यमन्त्रपुरस्कृतम्।
स्वाध्यायिनरतं शान्तं वपुष्मन्तमिवानलम् ॥ १० ॥

मन्त्रोच्चारणपूर्वक घीकी आहुति देनेसे प्रज्वलित हुए अग्निदेवके समान वे सदा देदीप्यमान होते रहते हैं। सदा स्वाध्यायमें तत्पर रहनेवाले और शान्त हैं, शरीरधारी अग्निके समान जान पड़ते हैं ॥ १० ॥

तं ब्रह्मवादिनां श्रेष्ठं सुरासुरगुरुं प्रभुम्।
प्रतपन्तमिवादित्यं मारीचं दीप्ततेजसम् ॥ ११ ॥

वे ब्रह्मवादियोंमें श्रेष्ठ, देवताओं और असुरोंके पिता तथा प्रभावशाली हैं। तपते हुए सूर्यके समान उनका तेज सदा ही उदीप्त रहता है। उन मरीचिनन्दन कश्यपको देवताओने देखा ॥ ११ ॥

यः स्रष्टा सर्वभूतानां प्रजानां पतिरुत्तमः।
आत्मभावविशेषेण तृतीयो यः प्रजापतिः ॥ १२ ॥

जो समस्त प्राणियोंके स्रष्टा उत्तम प्रजापति ब्रह्मा हैं, उनके आत्मभावकी विशेषरूपसे अभिव्यक्ति होनेके कारण कश्यपजी (ब्रह्मा और मरीचिकी अपेक्षा) तीसरे प्रजापति हैं ॥ १२ ॥

ततः प्रणम्य ते वीराः सहादित्या सुरर्षभाः।
ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे ब्रह्माणमिव मानसाः ॥ १३ ॥

अदितिसहित उन सभी वीर एवं श्रेष्ठ देवताओंने कश्यपजीको प्रणाम करके उनसे हाथ जोड़कर उसी प्रकार कहना आरम्भ किया, जैसे ब्रह्माजीके मानसपुत्र उनसे अपनी बात निवेदन करते हैं ॥ १३ ॥

यच्छ्रुतं युधि शक्रेण सरस्वत्या समीरितम्।
अजेयस्त्रिदशैः सर्वैर्वरदानवसत्तमः ॥ १४ ॥

युद्धस्थलमें इन्द्रने आकाशवाणीद्वारा कही गयी जो यह बात सुनी थी कि दानवशिरोमणि बलि समस्त देवताओंके लिये अजेय हैं, उसे कह सुनाया ॥ १४ ॥

श्रुत्वा तु वचनं तेषां पुत्राणां कश्यपस्तदा।
चकार गमने बुद्धिं ब्रह्मलोकाय लोककृत् ॥ १५ ॥

९५४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे

उस समय अपने उन पुत्रोंकी यह बात सुनकर लोकस्रष्टा कश्यपजीने ब्रह्मलोकमें जानेका विचार किया ॥ १५ ॥

कश्यप उवाच

गच्छाम ब्रह्मसदनं ब्रह्मघोषनिनादितम्।
यथाश्रुतं च तत्रैव ब्रह्मणो वदतानघाः॥ १६॥

कश्यपजी बोले—निष्पाप देवताओ ! हमलोग वेद-मन्त्रोंके घोषसे प्रतिध्वनित होनेवाले ब्रह्मलोकको चलें । वहीं वह बात, जैसे तुमने सुनी हैं वैसी ही ब्रह्माजीके समक्ष कहो ॥

वैशम्पायन उवाच

ततोऽदित्या सह सुरा यान्तं कश्यपमन्वयुः।
प्रस्थितं ब्रह्मसदनं देवर्षिगणसेवितम् ॥ १७॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तब अदिति-सहित समस्त देवता देवर्षियोंद्वारा सेवित ब्रह्मलोककी ओर प्रस्थित हुए कश्यपजीके साथ-साथ गये ॥ १७ ॥

ते मुहूर्तेन सम्प्राप्ता ब्रह्मलोकं दिवौकसः।
दिव्यैः कामगमैर्यानैर्महार्हैः सुमनोहरैः ॥ १८ ॥

वे सब देवता इच्छानुसार चलनेवाले परम मनोहर बहुमूल्य दिव्य विमानोंद्वारा दो ही घड़ीमें ब्रह्मलोकमें जा पहुँचे ॥ १८ ॥

दिदृक्षवस्ते ब्रह्माणं तपसो राशिवमव्ययम्।
अभ्यगच्छन्त विस्तीर्णां ब्रह्मणः परमां सभाम्॥ १९ ॥

वे तपस्याकी अक्षय राशि ब्रह्माजीको देखनेके लिये उनकी अत्यन्त विस्तृत उत्तम सभामें गये ॥ १९ ॥

षट्पदोद्गीतनिनादां सामगीतविमिश्रिताम्।
श्रेयस्करीममित्रघ्नीं दृष्ट्वा संजहृषुर्मुदा ॥ २०॥

वहाँ भ्रमरोंका गुञ्जारव गूँज रहा था। उसमें सामगान-की ध्वनि भी मिश्रित थी । वह सभा सबके लिये कल्याण-कारिणी और शत्रुओंका नाश करनेवाली थी । उसे देखकर उन सब लोगोंको बड़ा हर्ष हुआ ॥ २० ॥

ब्राह्मणैश्च महाभागैर्वेदवेदाङ्गपारगैः।
ऋचो बह्वृचमुख्यैश्च शिक्षाविद्भिरस्तथा द्विजैः॥ २१॥

वेद-वेदाङ्गोंके पारंगत विद्वान् महाभाग ब्राह्मण, ऋग्वेद-वेत्ताओंमें श्रेष्ठ तथा शिक्षाके ज्ञाता द्विज ऋचाओंका पाठ करते थे ॥ २१ ॥

शब्दनिर्वचनार्थं च प्रेर्यमाणपदाक्षराः।
शुश्रुवुस्तेऽमरव्याघ्रा विततेषु च कर्मसु ॥ २२ ॥

उन अमरश्रेष्ठ देवताओंने आयोजित हुए यज्ञकर्मोंमें शब्दकी व्युत्पत्तिके लिये ब्राह्मणोंद्वारा जिनके एक-एक पद और अक्षरोंका उच्चारण हो रहा था, उन ऋचाओंको सुना ॥

यज्ञवेदाङ्गविदुषां पदक्रमविदां तथा।
घोषेण परमर्षीणां सा बभूव निनादिता ॥ २३ ॥

यज्ञ, वेद और वेदाङ्गोंके विद्वान् तथा पदपाठ और क्रमपाठके ज्ञाता महर्षियोंके वैदिक घोषसे वह ब्रह्माजीकी सभा प्रतिध्वनित हो रही थी ॥ २३ ॥

यज्ञसंस्तवविद्भिश्च शिक्षाविद्भिरस्तथा द्विजैः।
शब्दनिर्वचनार्थज्ञैः सर्वविद्याविशारदैः॥ २४॥
मीमांसाहितवाक्यज्ञैः सर्ववादविशारदैः।
हृष्टपुष्टस्वरैस्तत्र द्विजेन्द्रैर्लघुवादिभिः।
नादितं ब्रह्मसदनं प्रवरं देवसद्मवत् ॥ २५॥

जो यज्ञोंमें की जानेवाली स्तुतियोंके ज्ञाता, शिक्षाके विद्वान्, शब्दकी व्युत्पत्ति और अर्थके जानकार, सम्पूर्ण विद्याओंमें प्रवीण, मीमांसाके अनुकूल वेदवाक्योंके तात्पर्यको जाननेवाले, सर्ववादविशारद, हृष्ट-पुष्ट स्वरसे युक्त तथा मधुरभाषी थे, उन्हीं द्विजेन्द्रोंद्वारा किये गये वेदघोषसे प्रति-ध्वनित वह श्रेष्ठ ब्रह्मसदन देवसभाके समान सुशोभित होता था ॥ २४-२५ ॥

ते तत्र समुदुप्राप्य शृण्वन्तो वै ध्वनिं सुराः।
पूतान्यात्मशरीराणि मेनिरे तु न संशयः॥ २६ ॥

वहाँ पहुँचकर उस ध्वनिको सुनते हुए वे देवता निःसंदेह अपने शरीरोंको पवित्र मानने लगे ॥ २६ ॥

तूष्णींभूता एकचित्ता ब्रह्मण्योगतमानसाः।
विस्मयोत्फुल्लनयना निरीक्षन्तः परस्परम् ॥ २७॥
नमस्कुर्वन्ति च पुनर्गरुहं लोकगुरुं प्रभुम्।
मनसैव सुरश्रेष्ठाः पुरस्कृत्य तु कश्यपम् ॥ २८ ॥

वे श्रेष्ठ देवता मौन और एकचित्त हो ब्रह्माजीमें मन लगाये आश्चर्यचकित नेत्रोंसे एक-दूसरेको देखते हुए कश्यपजी-को आगे करके मन-ही-मन लोकगुरु भगवान् ब्रह्माको बारं-बार प्रणाम करने लगे ॥ २७-२८ ॥

पुनः सम्पूज्य परमं वेदोच्चारणनिःस्वनम्।
गम्भीरोदारमधुरं सुस्वरं हंसगद्गदम् ॥ २९॥
ऐक्यनानात्वसंयोगसमवायविशारदैः ।
लोकायतिकमुख्यैश्च शुश्रुवुः स्वनमीरितम् ॥ ३० ॥

गम्भीर, उदार, मधुर, उत्तम स्वरसे युक्त और हंसके समान गद्गद वाणीमें उच्चारित वेदपाठकी उस उत्तम ध्वनि-की बार-बार प्रशंसा करके एकत्ववाद ( जीव और ईश्वरकी एकताका प्रतिपादन ), नानात्ववाद ( जीव, ईश्वर और प्रकृति—इन तीन अनादि तत्त्वोंका प्रतिपादन ), संयोगवाद ( प्रकृति-पुरुषके संयोगसे सृष्टिका प्रतिपादन ) तथा समवाय-वादमें प्रवीण पुरुषों एवं लोकायतिकशास्त्रके ज्ञाता मुख्य-मुख्य विद्वानोंद्वारा उच्चारित शब्दको भी उन देवताओं-ने सुना ॥ २९-३० ॥

तत्र तत्र च विप्रेन्द्रान् नियतान् संशितव्रतान्।
जपहोमपरान् मुख्यान् ददृशुः कश्यपात्मजाः॥ ३१ ॥

कश्यपके उन पुत्रोंने वहाँ भिन्न-भिन्न स्थानोंमें बहुत-से

भविष्यपर्व ] षट्षष्टितमोऽध्यायः [ ९५५


ब्राह्मणशिरोमणियोंको, जो कठोर व्रतका पालन करनेवाले थे, नियमपूर्वक जप और होममें तत्पर देखा ॥ ३१ ॥

तस्यां सभायामास्ते स्म ब्रह्मा लोकपितामहः ।
सुरासुरगुरुः श्रीमान् विधिवद् देवमायया ॥ ३२ ॥

उस सभामें देवताओं और असुरोंके गुरु श्रीमान् लोकपितामह ब्रह्मा देवमायाके साथ विधिपूर्वक निवास करते थे ॥

उपासते च तत्रैनं प्रजानां पतयः प्रभुम् ।
दक्षः प्रचेताः पुलहो मरीचिश्च द्विजोत्तमः ॥ ३३ ॥
भृगुरत्रिवसिष्ठश्च गौतमो नारदस्तथा ।
मनुर्द्यौरन्तरिक्षं च वायुस्तेजो जलं मही ॥ ३४ ॥
शब्दस्पर्शौ च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च ।
प्रकृतिश्च विकाराश्च यच्चान्यत् कारणं महत् ॥ ३५ ॥
साङ्गोपाङ्गाश्चतुर्वेदाः सरहस्यपदक्रमाः ।
क्रियाश्च क्रतवश्चैव संकल्पः प्राण एव च ॥ ३६ ॥
एते चान्ये च बहवः स्वयम्भुवमुपस्थिताः ।
अर्थो धर्मश्च कामश्च द्वेषो दर्पश्च नित्यदा ॥ ३७ ॥

वहाँ इन भगवान् ब्रह्माकी समस्त प्रजापतिगण उपासना करते थे। दक्ष, प्रचेता (वरुण), पुलह, द्विजश्रेष्ठ मरीचि, भृगु, अत्रि, वसिष्ठ, गौतम, नारद, मनु, द्यौ, अन्तरिक्ष, वायु, तेज, जल, पृथ्वी, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, प्रकृति और उसके विकार, अन्यान्य महान् कारण, अङ्ग और उपाङ्गोंसहित चारों वेद, रहस्य, पद, क्रम, क्रिया, क्रतु, संकल्प तथा प्राण—ये और दूसरे भी बहुत-से भाव पदार्थ वहाँ ब्रह्माजीकी सेवामें (शरीर धारण करके) उपस्थित थे । अर्थ, धर्म, काम, द्वेष और दर्प आदि भाव भी वहाँ नित्य निवास करते थे ॥ ३३—३७ ॥

शक्रो वृहस्पतिश्चैव संवर्तो बुध एव च ।
शनैश्चरोऽथ राहुश्च ग्रहाः सर्वे ह्यशेषतः ॥ ३८ ॥

इन्द्र, वृहस्पति, संवर्त, बुध, शनैश्चर तथा राहु आदि सभी ग्रह वहाँ विद्यमान थे ॥ ३८ ॥

मरुतो विश्वकर्मा च नक्षत्राणि च भारत ।
दिवाकरश्च सोमश्च ग्रहाणं समुपासते ॥ ३९ ॥

भारत ! मरुद्गण, विश्वकर्मा, नक्षत्र, सूर्य और चन्द्रमा भी वहाँ ब्रह्माजीकी उपासना करते थे ॥ ३८ ॥

सावित्री दुर्गतारणी वाणी सप्तविधा तथा ।
सर्वाणि श्रुतिशास्त्राणि गाथाश्च नियमास्तथा ॥ ४० ॥
भाष्याणि सर्वशास्त्राणि देहवन्ति विशाम्पते ।

प्रजानाथ ! सावित्री, दुर्गम संकटसे तारनेवाली दुर्गा, (सात स्वरोंके भेदसे) सात प्रकारकी वाणी, समस्त श्रुति-शास्त्र (वैदिक साहित्य), गाथा, नियम, भाष्य तथा सम्पूर्ण शास्त्र—ये देह धारण करके ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित थे ॥

क्षणा लवा मुहूर्ताश्च दिवा रात्रिश्च भारत ॥ ४१ ॥
अर्धमासाश्च मासाश्च ऋतवः षट् तथैव च ।
संवत्सराश्चतुर्युगं मासा रात्रिश्चतुर्विधा ॥ ४२ ॥
कालचक्रं च यद् दिव्यमनित्यं ध्रुवमव्ययम् ।
एते चान्ये च बहवः स्वयम्भुवमुपस्थिताः ॥ ४३ ॥

भारत ! क्षण, लव, मुहूर्त, दिन, रात, पक्ष, मास, छः ऋतुएँ, संवत्सर, चारों युग, दिव्य मास, चार प्रकारकी रात्रि, दिव्य, अनित्य, ध्रुव एवं अव्यय कालचक्र—ये तथा अन्य बहुत-से पदार्थ (शरीर धारण करके) स्वयम्भू ब्रह्माकी सेवामें उपस्थित थे ॥ ४१-४३ ॥

ते प्रविष्टाः सभां दिव्यां ब्रह्मणः सर्वकामदाम् ।
कश्यपस्त्रिदशैः सार्धं पुत्रैर्धर्मविशारदैः ॥ ४४ ॥

वे सब आगन्तुक देवता ब्रह्माजीकी दिव्य सभामें, जो सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली थी, प्रविष्ट हुए । अपने धर्मविशारद देवजातीय पुत्रोंके साथ कश्यपजीने उस सभामें प्रवेश किया ॥ ४४ ॥

सर्वतेजोमयीं दिव्यां ब्रह्मर्षिगणसेविताम् ।
ब्राह्म्या श्रिया दीप्यमानमचिन्त्यं विगतक्लमम् ॥ ४५ ॥
ब्रह्माणं वीक्ष्य ते सर्वे आसीनं परमासने ।
जग्मुर्मूर्ध्ना शुभौ पादौ ब्रह्मणस्ते दिवौकसः ॥ ४६ ॥

सम्पूर्ण तेजसे सम्पन्न वह दिव्य सभा ब्रह्मर्षिगणोंसे सेवित थी । उसके भीतर एक उत्तम आसनपर अचिन्त्य, क्लेशहीन तथा ब्राह्मी शोभासे देदीप्यमान ब्रह्माजी विराजमान थे । उन्हें देखकर सभी देवताओंने उन ब्रह्माजीके शुभ चरणोंमें मस्तक रखकर उन्हें प्रणाम किया ॥ ४५-४६ ॥

शिरोभिः स्पृश्य चरणौ तस्य ते परमेष्ठिनः ।
विमुक्ताः सर्वपापेभ्यः शान्ता विगतकल्मषाः ॥ ४७ ॥

उन परमेष्ठी ब्रह्माजीके चरणोंका अपने मस्तकोंसे स्पर्श करके वे सब देवता समस्त पापोंसे मुक्त, शान्त और कल्मषरहित हो गये ॥ ४७ ॥

दृष्ट्वा तुतान् सुरान् सर्वान् कश्यपेन सहागतान् ।
आह ब्रह्मा महातेजा देवानां प्रभुरीश्वरः ॥ ४८ ॥

कश्यपजीके साथ आये हुए उन समस्त देवताओंको देखकर महातेजस्वी देवेश्वर भगवान् ब्रह्मा उनसे इस प्रकार बोले ॥ ४८ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे ब्रह्मलोकगमने षट्षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें देवताओंका ब्रह्मलोकमें गमनविषयक छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६६ ॥

९५६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

सप्तषष्टितमोऽध्यायः

ब्रह्माजीकी आज्ञासे कश्यप और अदितिसहित देवताओंका क्षीरसागरके उत्तर तटपर जाकर तपस्यामें संलग्न होना

ब्रह्मोवाच
यदर्थमिह सम्प्राप्ता भवन्तः सर्व एव हि।
विजानाम्यहमव्यग्र एतत् सर्वं महाबलाः ॥ १ ॥
**ब्रह्माजीने कहा—**महाबली देवताओ ! तुम सब लोग जिस उद्देश्यसे यहाँ आये हो, यह सब मैं व्यग्रतारहित होकर जानता हूँ ॥ १ ॥

भविष्यति च वः सोऽर्थः काङ्क्षितो यः सुरोत्तमाः।
बलेर्दानवमुख्यस्य यो विजेता भविष्यति ॥ २ ॥
सुरश्रेष्ठगण ! तुमलोग जिसकी इच्छा रखते हो, तुम्हारा वह मनोरथ अवश्य पूर्ण होगा। दानवराज बलिपर विजय पानेवाले जो परम पुरुष हैं, वे शीघ्र ही प्रकट होंगे ॥ २ ॥

न खल्वासुरसंघानामेको जेता स विश्वकृत्।
त्रैलोक्यस्यापि जेताऽसौ देवानापि चोत्तमः ॥ ३ ॥
वे विश्वस्रष्टा परमात्मा केवल असुरसमुदायोंको ही नहीं जीतेंगे, त्रिलोकीके राज्यको भी जीत लेंगे। वे देवताओंमें भी सबसे उत्तम हैं ॥ ३ ॥

धाता चैव हि लोकानां विश्वयोनिः सनातनः।
पूर्वं देवं सदा प्राहुर्हेमगर्भनिदर्शनम् ॥ ४ ॥
वे ही लोकोंके धाता (धारण-पोषण करनेवाले), सम्पूर्ण विश्वकी योनि एवं सनातन पुरुष हैं। विद्वान् पुरुष उन्हींको सदा आदि देवता कहते हैं। मैं हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) उन्हींका निदर्शन (प्रतिबिम्ब अथवा पुत्र) हूँ ॥ ४ ॥

आत्मा देवेन विभुना कृतोऽजेयो महात्मनः।
बलेरसुरमुख्यस्य विश्वस्य जगतस्तथा ॥ ५ ॥
प्रभवः स हि सर्वेषामस्माकमपि पूर्वजः।
अचिन्त्यः स हि विश्वात्मा योगयुक्तः परंतपः ॥ ६ ॥
उन सर्वव्यापी परमात्मदेवने ही असुरशिरोमणि महात्मा बलिके स्वरूपको अजेय बनाया है। वे ही सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्तिके कारण तथा हम सब देवताओंके भी पूर्वज हैं। शत्रुओंको संताप देनेवाले वे योगयुक्त विश्वात्मा अचिन्त्य (मन और बुद्धिके अविषय) हैं ॥ ५-६ ॥

तं देवापि महात्मानं न विदुः कोऽप्यसाविति।
वेद्यात्मानं च विश्वं च स देवः पुरुषोत्तमः ॥ ७ ॥
देवता भी उन परमात्माके विषयमें यह नहीं जानते कि वे कौन हैं ? किंतु वे पुरुषोत्तमदेव अपनेको तथा सम्पूर्ण विश्वको भी जानते हैं ॥ ७ ॥

तस्यैव तु प्रसादेन प्रवक्ष्येऽहं परां गतिम्।
यत्र योगं समास्थाय तपश्चरति दुष्करम् ॥ ८ ॥
उन्हींकी कृपा-प्रसादसे मैं उनकी परा गति (उत्कृष्ट आश्रय) का पता बता रहा हूँ, जहाँ योगका आश्रय लेकर वे दुष्कर तपस्या करते हैं ॥ ८ ॥

क्षीरोदस्योत्तरे कूले उदीच्यां दिशि देवताः।
अमृतं नाम परमं स्थानमाहुर्मनीषिणः ॥ ९ ॥
देवताओ ! मनीषी पुरुष कहते हैं कि उत्तर दिशामें क्षीरसागरके उत्तर तटपर 'अमृत' नामक उत्कृष्ट स्थान (परम पद) है ॥ ९ ॥

भवन्तस्तत्र वै गत्वा तपसा संशितव्रताः।
अमृतं स्थानमासाद्य तपश्चरंत दुष्करम् ॥ १० ॥
तुमलोग वहीं जाकर तपस्यापूर्वक कठोर व्रतका पालन करो। उस 'अमृत' स्थानमें पहुँचकर दुष्कर तपस्यामें लग जाओ ॥ १० ॥

तत्र श्रोष्यथ विस्पष्टां स्निग्धगम्भीरनिःस्वनाम्।
उष्णेगे तोयपूर्णस्य तोयदस्य समस्वनाम् ॥ ११ ॥
युक्ताक्षरपदस्निग्धां रम्यामभयदां शिवाम्।
वाणीं परमसंस्कारां वरदां ब्रह्मवादिनीम् ॥ १२ ॥
दिव्यां सरस्वतीं सत्यां सर्वकल्मषनाशिनीम्।
सर्वदेवाधिदेवस्य भाषितां भावितात्मनः ॥ १३ ॥
तस्य व्रतसमाप्तौ तु यावद् व्रतविसर्जनम्।
अमोघस्य तु देवस्य विश्वेदेवा महात्मनः ॥ १४ ॥
स्वागतं वः सुरश्रेष्ठा मत्संकाशे व्यवस्थिताः।
कस्य किं वा वरं देवा ददामि वरदः स्थितः ॥ १५ ॥
तं कश्यपोऽदितिश्चैव वरं गृह्णीत वै ततः।
प्रणम्य शिरसा पादौ तस्मै योगात्मने तदा ॥ १६ ॥
भवानेव च नः पुत्रो भवत्विति न संशयः।
सर्वदेवगण ! वहाँ व्रतकी समाप्ति होनेपर उस व्रतके विसर्जनसे पूर्व तुम्हें वर्षाकालके सजल जलधरकी भाँति स्निग्ध एवं गम्भीर स्वरमें उन अमोघ परमात्माकी सुस्पष्ट वाणी सुनायी देगी, जो उपयुक्त अक्षरों और पदोंसे युक्त, स्नेहपूर्ण, रमणीय, अभयदायिनी, मङ्गलकारिणी, उत्तम संस्कारसे सम्पन्न, वरदायक तथा ब्रह्मवादिनी होगी। उन शुद्ध अन्तःकरणवाले सर्वदेवाधिदेव भगवान्की कही हुई वह दिव्य सत्य वाणी सम्पूर्ण कल्मषोंका नाश करनेवाली होगी। वे कहेंगे—'मेरे पास खड़े हुए सुरश्रेष्ठगण ! तुम्हारा स्वागत है ! मैं वर देनेके लिये खड़ा हूँ, बोलो किसको कौन-सा वर दूँ ?'

भविष्यपर्व ]अष्टषष्टितमोऽध्यायः९५७
उस समय कश्यप, अदिति और तुम सब लोग उनसे वर ग्रहण करना। कश्यप और अदिति उन योगात्मा श्रीहरिके चरणोंमें मस्तक झुकाकर प्रणाम करनेके पश्चात् निस्संदेह यही बात कहे कि 'आप ही मेरे पुत्र होकर प्रकट हों' ॥११—१६३॥<br><br>उक्तश्च परया भक्त्या तथास्त्विति स वक्ष्यति ॥ १७ ॥<br>देवा ब्रुवन्तु तं सर्वे भ्राता नस्त्वं भवेति ह।<br>तथास्त्विति च संश्रीमान् वक्ष्यते सर्वलोककृत् ॥ १८ ॥<br>परम भक्तिभावसे ऐसी बात कहनेपर वे भगवान् 'तथास्तु-ऐसा ही होगा' यह कहेंगे, सब देवता भी उनसे यही कहें कि आप हमारे भाई हो जायँ। तब वे सम्पूर्ण लोकोंके स्रष्टा श्रीमान् भगवान् 'तथास्तु' कहकर तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार कर लेंगे ॥ १७-१८ ॥<br><br>तस्मादेवं गृहीत्वा तु वरं त्रिदशसत्तमाः।<br>कृतकृत्याः पुनः सर्वे गच्छध्वं स्वं स्वमालयम् ॥ १९ ॥<br>श्रेष्ठ देवताओ ! इस प्रकार उनसे वर लेकर कृतकृत्य हो पुनः तुम सब लोग अपने-अपने स्थानको चले जाना ॥ १९ ॥<br><br>तथास्त्विति सुराः सर्वे कश्यपोऽदितिरेव च।<br>वन्दित्वा ब्रह्मचरणौ गताः सौम्यां दिशं प्रति ॥ २० ॥<br>तब सब देवता, कश्यप और अदितिने 'ऐसा ही होगा' यह कहकर ब्रह्माजीके चरणोंमें प्रणाम किया और सब-के-सब उत्तर दिशाकी ओर चल लिये ॥ २० ॥<br><br>तेऽचिरेणैव सम्प्राप्ताः क्षीरोदस्योत्तरं तटम्।<br>यथोद्दिष्टं भगवता ब्रह्मणा ब्रह्मवादिना ॥ २१ ॥<br>ब्रह्मवादी भगवान् ब्रह्माने जैसा बताया था, उसके अनुसार वे शीघ्र ही क्षीरसागरके उत्तर तटपर चले गये ॥तेऽतीत्य सागरान् सर्वान् पर्वतांश्च बहून् क्षणात्।<br>नद्यश्च विविधा दिव्याः पृथिव्यां सुरसत्तमाः ॥ २२ ॥<br>पश्यन्ति च सुघोरां वै सर्वसत्त्वविवर्जिताम्।<br>अभास्कराममर्यादां तमसा संवृतां दिशम् ॥ २३ ॥<br>वे श्रेष्ठतम देवता क्षणभरमे समस्त सागरों, बहुसंख्यक पर्वतों तथा नाना प्रकारकी दिव्य नदियोंको लाँघकर जब भूतलपर स्थित हुए, तब उन्हें अत्यन्त भयंकर, समस्त प्राणियों-से रहित, सूर्यके प्रकाशसे शून्य, सीमाहीन एवं अन्धकारसे आच्छन्न दिशा दृष्टिगोचर हुई ॥ २२-२३ ॥<br><br>अमृतं स्थानमासाद्य कश्यपेन सुराः सह।<br>दीक्षिताः कामदं दिव्यं व्रतं वर्षसहस्रकम् ॥ २४ ॥<br>प्रसादार्थं सुरेशाय तस्मै योगाय धीमते।<br>नारायणाय देवाय सहस्राक्षाय धीमते ॥ २५ ॥<br>कश्यपके साथ अमृतस्थानमें पहुँचकर समस्त देवताओंग्ने उन योगस्वरूप बुद्धिमान् देवेश्वर सहस्रलोचनधारी नारायण-देवकी प्रसन्नताके उद्देश्यसे एक सहस्र वर्षोंके लिये दिव्य कामद-व्रतकी दीक्षा ली ॥ २४-२५ ॥<br><br>ब्रह्मचर्येण मौनेन स्थानवीरासनेन च।<br>दमेन च सुराः सर्वे तपो दुश्चरमास्थिताः ॥ २६ ॥<br>वे सब देवता ब्रह्मचर्य-पालन, मौनधारण, वीरासनग्रहण तथा मन और इन्द्रियोंके संयमद्वारा दुष्कर तपस्यामें संलग्न हो गये ॥ २६ ॥<br><br>कश्यपस्तत्र भगवान् प्रसादार्थं महात्मनः।<br>उदीरयति वेदोक्तं यमाहुः परमं स्तवम् ॥ २७ ॥<br>वहाँ उन परमात्माकी प्रसन्नताके लिये भगवान् कश्यप एक वेदोक्त स्तोत्रका पाठ करने लगे, जिसे 'परमस्तव' कहते हैं ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे सप्तषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारविषयक सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६७ ॥


अष्टषष्टितमोऽध्यायः

कश्यपद्वारा परमपुरुष परमात्माका स्तवन

कश्यप उवाच

नमोऽस्तु देवदेवेश एकशृङ्ग वराह वृषाकपि वृषसिन्धो वृषाकपे सुरवृषभ सुरनिर्मित अनि-र्मित भद्रकपिल विष्वक्सेन ध्रुव धर्म धर्मराज वैकुण्ठ त्रेतावर्त अनादिमध्यनिधन धनंजय शुचिश्रवः अग्निहृज वृष्णिज अज अजयामृते-शय सनातन विधातस्त्रिकाम त्रिधाम त्रिककृत् ककुद्मिन् दुन्दुभे महानाभ लोकनाभ पद्मनाभ विरिञ्चे वरिष्ठ बहुरूप विरूप विश्वरूपाक्षया-क्षर सत्याक्षर हंसाक्षर हव्यभुक् खण्डपरशोशुक मुञ्जकेश हंस महाहंस महदक्षर हृषीकेश सूक्ष्म परसूक्ष्म तुराषाड् विश्वमूर्ते सुराग्रज नील निस्तमो विरजस्तमोरजःसत्त्वधाम सर्व-लोकप्रतिष्ठ शिपिविष्ट सुतपस्तपोऽग्र अग्र अग्रज धर्मनाभ गभस्तिनाभ धर्मनेमे सत्य-धाम सत्याक्षर गभस्तिनेमे विपाप्मन् चन्द्ररथ त्वमेव समुद्रावासाः अजैकपात् सहस्रशीर्ष सहस्रसम्मित महाशीर्ष सहस्रदृक् सहस्रपात् अधोमुख महामुख महापुरुष पुरुषोत्तम सहस्र-बाहो सहस्रमूर्ते सहस्रास्य सहस्राक्ष सहस्र-
९५८श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

...भुज सहस्रभव सहस्रशस्त्वामाहुर्वेदाः ॥ १ ॥

सहस्रलोचन, सहस्रभुज तथा सहस्रों रूपोंमें प्रकट होनेवाले हैं, वेद आपका सहस्रों प्रकारसे वर्णन करते हैं ॥ १ ॥

कश्यपने कहा— देवदेवेश्वर ! आपको नमस्कार है। आप एक सींग धारण करनेवाले मत्स्य एवं वराहरूप हैं। धर्ममयी किरणोंसे प्रकाशित होते हैं। धर्मके सागर हैं। जलका वर्षण और शोषण करनेवाले सूर्य हैं। देवताओंमें श्रेष्ठ हैं। देवताओंके स्रष्टा हैं। आपका किसी अन्यसे निर्माण नहीं हुआ है—आप नित्यसिद्ध हैं। कल्याणमय कपिलस्वरूप हैं। युद्धके लिये की हुई तैयारी मात्रसे ही आप दैत्यसेनाको तितर-बितर कर डालते हैं। आप ध्रुव, धर्म, धर्मराज एवं वैकुण्ठधामके अधिपति हैं। गार्हपत्यादि त्रिविध अग्निके आवर्तक, आदि, मध्य और अन्तसे रहित, धनंजय (अग्नि), पवित्र कीर्तिवाले, अग्निह (कार्तिकेयस्वरूप), वृष्णिज (श्रीकृष्ण), अजन्मा, अजय (अपराजित), अमृतेशय (जलमें शयन करनेवाले) और सनातन पुरुष हैं। आप ही विधाता, त्रिकाम (तीनों लोकोंकी कामनाके विषय अथवा तीनों वेदोंकी श्रुतियोंके लिये कमनीय), त्रिधाम (त्रिलोकी-के आश्रय), त्रिककुद् (धर्म, ज्ञान और वैराग्यरूप तीन कंधोंवाले), ककुद्मी (मोटे कंधेवाले), दुन्दुभे (विजय-घोष करनेवाले वाद्यरूप), महानाभ (बड़ी नाभिवाले), लोकनाभ (अपने नाभिकमलसे सम्पूर्ण लोकको प्रकट करने-वाले), पद्मनाभ (अपनी नाभिसे कमलको प्रकट करनेवाले), विरिञ्चि (ब्रह्मस्वरूप), वरिष्ठ (सर्वश्रेष्ठ), बहुरूपधारी, विरूप (विविध रूप धारण करनेवाले), विश्वरूप, अक्षय, अक्षर (अविनाशी), सत्याक्षर (सत्य एवं अविनाशी अथवा सत्य अक्षरवाले वेदरूप), हंसाक्षर (अजपा मन्त्ररूप), हव्यभोक्ता (अग्नि), खण्डपरशु (शिव), शुक्र (बल-वीर्यरूप), मुञ्जकेश (मूँजके समान केशवाले), हंस और महाहंस हैं। महान् अक्षर प्रणव, इन्द्रियोंके प्रेरक, सूक्ष्म, परमसूक्ष्म, इन्द्र, विश्वरूप, देवताओंके अग्रज, नीलवर्ण, तमोगुण और रजोगुणसे रहित, तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुणके आश्रय, सम्पूर्ण लोकोंमें प्रतिष्ठित, शिपिविष्ट (सूर्य-किरणोंमें स्थित रहनेवाले), उत्तम तपस्यावाले, श्रेष्ठ तपोरूप, अग्र (सबके आदि), अग्रज (सबसे प्रथम प्रकट), धर्मनाभ (धर्मस्वरूप नाभिवाले), गभस्तिनाभ (किरणमयी नाभिवाले), धर्मनेमि (धर्मचक्रके प्रवर्तक), सत्यधाम (वैकुण्ठस्वरूप), सत्याक्षर (वेदरूप), गभस्तिनेमि (रश्मिमण्डलसे प्रकाशित), पापरहित तथा चन्द्र (समष्टि मन) रूपी रथपर आरूढ परमेश्वर ! आप ही समुद्रवासा (समुद्ररूपी वस्त्र धारण करनेवाले) हैं। आप ही अजैकपात् (ग्यारह रुद्रोंमेंसे एक अथवा पूर्वभाद्रपदानक्षत्र), सहस्रों मस्तकवाले, सहस्रसंख्यक, महान् मस्तक धारण करनेवाले, सहस्रनेत्र, सहस्रचरण, अधोमुख, महामुख, महापुरुष, पुरुषोत्तम, सहस्रबाहु, सहस्रमूर्ति, सहस्रमुख,


विश्वेदेव विश्वसम्भव सर्वेषामेव देवानां
सौभग आदौ गतिः विश्वं त्वामाप्यायनः
विश्वं त्वामाहुः पुष्पहासः परमवरदस्त्वमेव
वौषट् ओंकार वषट्कार त्वामेकमाहुरग्र्यं मखभागप्राशिनम् ॥ २ ॥

आप ही विश्वेदेवस्वरूप, विश्वको उत्पन्न करनेवाले, सम्पूर्ण देवताओंके सौभाग्यस्वरूप एवं धर्मरूप हैं। आप ही सम्पूर्ण विश्वको पुष्ट एवं तृप्त करनेवाले हैं। विद्वान् पुरुष आपको ही विश्वरूप बताते हैं। आपका हास पुष्पोंके विकास-की भाँति सुशोभित होता है। आप ही सर्वोत्तम वरदायक देवता हैं। आप ही वौषट्, ओङ्कार और वषट्कार हैं। एक-मात्र आपको ही सर्वश्रेष्ठ यज्ञभागका भोक्ता बताया गया है ॥

शतधार सहस्रधार भूर्दं भुवर्दे स्वर्दे भूर्भुवः-
स्वर्दे त्वमेव भूतं भुवनं त्वं स्वधा त्वमेव ब्रह्मसख
ब्रह्ममय ब्रह्मादिस्त्वमेव ॥ ३ ॥

आप ही शतधार और सहस्रधार (सैकड़ों, हजारों धाराओंमें अमृतकी वर्षा करनेवाले) सोम हैं। आप ही भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोकको देनेवाले हैं। आप उक्त तीनों लोकोंका एक साथ ही दान करनेके कारण भूर्भुवःस्वर्दे (त्रिलोकप्रद) कहे गये हैं। आप ही भूत एवं भुवन हैं। आप ही स्वधा हैं। आप ही ब्रह्मसख (ब्रह्माजीके सखा) और ब्रह्ममय हैं तथा ब्रह्माजीके आदि कारण भी आप ही हैं ॥

द्यौरसि पृथिव्यसि पूषासि मातरिश्वासि घर्मोऽसि
मघवासि होता पोता नेता हन्ता मन्ता होम्यहोता
परात्परस्त्वं होम्यस्त्वमेव ॥ ४ ॥

आप ही द्युलोक हैं, पृथ्वी हैं, पूषा नामक आदित्य हैं, मातरिश्वा (वायु) हैं, धर्म हैं, इन्द्र हैं, होता (हवनकर्ता), पोता (एक ऋत्विज्), नेता (नायक अथवा अगुवा), हन्ता (दुष्टोंका वध करनेवाले), मन्ता (सम्मान देनेवाले), हवनीय पदार्थका होम करनेवाले, परात्पर परमात्मा तथा हवनीय पदार्थरूप हैं ॥ ४ ॥

आपोऽसि विश्ववाग् धात्रा परमेण धास्रः त्वमेव
दिग्ध्व्यः स्रुक् स्रुग्भाण्डस्त्वं गण इष्टोऽसि इज्योऽसि
ईड्योऽसि त्वष्टा त्वमसि समिद्धस्त्वमेव गतिर्गति-
मतामसि मोक्षोऽसि योगोऽसि गुह्योऽसि सिद्धोऽसि
धन्योऽसि धातासि परमोऽसि यशोऽसि सोमोऽसि
यूपोऽसि दक्षिणासि दीक्षासि विश्वमसि ॥ ५ ॥

आप ही जल हैं। सम्पूर्ण विश्वकी वाणी हैं। विधाताने उत्तम यज्ञके निमित्त अग्निकी तृप्तिके लिये दिशाओंसे जिस

भविष्यपर्व ]एकोनसप्ततितमोऽध्यायः९५९

स्रुक् का संग्रह किया, वह आपका ही स्वरूप है। स्रुग्भाण्ड (स्रुक् आदि यज्ञीयसामग्री) भी आप ही हैं। आप ही गण (ऋत्विजोंका समुदाय) हैं। आपका ही यज्ञोंद्वारा यजन किया गया है। आप ही इज्य (यज्ञोंद्वारा पूजनीय) हैं। ईड्य (स्तवनीय!) हैं। आप ही त्वष्टा (विश्वकर्मा) हैं। आप ही प्रज्वलित अग्नि हैं। आप ही जङ्गम प्राणियोंकी गति हैं तथा आप ही मोक्ष हैं, योग हैं, गुह्य हैं, सिद्ध हैं, धन्य हैं, धाता हैं, परम (उत्कृष्ट) हैं, यज्ञ हैं, सोम हैं, यूप हैं, दक्षिणा हैं, दीक्षा हैं और सब कुछ हैं ॥ ५ ॥

स्थविष्ठ स्थविर विश्व तुराषाड् हिरण्यगर्भ हिरण्यनाभ हिरण्यनारायण नारायणान्तर नृणामयन आदित्यवर्ण आदित्यतेजः महापुरुष सुरोत्तम आदिदेव पद्मनाभ पद्मशय पद्माक्ष पद्मगर्भ हिरण्याग्रकेश शुक्ल विश्वदेव विश्वतोमुख विश्वाक्ष विश्वसम्भव विश्वभुक्त्वमेव ॥ ६ ॥

आप अत्यन्त स्थूल और वृद्ध हैं, जाग्रत्-अवस्थाके अभिमानी विश्वसंज्ञक पुरुष हैं, इन्द्र हैं, हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) हैं। आपकी नाभि में हिरण्य है—इसी लिये आप हिरण्यनारायण कहलाते हैं और आप अन्तर्यामी नारायण हैं, नरों (मनुष्यों) के अयन (आश्रय) हैं। आपका वर्ण आदित्यके समान कान्तिमान् है। आप सूर्यके समान तेजस्वी हैं, आप ही महापुरुष, सुरश्रेष्ठ, आदिदेव, पद्मनाभ (नाभिसे कमल उत्पन्न करनेवाले), कमलपर शयन करनेवाले और कमललोचन हैं। पद्मको गर्भसे प्रकट करनेके कारण पद्मगर्भ कहलाते हैं। आपके सुन्दर केश सुनहरे हैं। आपकी अङ्गकान्ति भास्वरशुक्ल है। आप सम्पूर्ण देवस्वरूप हैं। आपके सब ओर मुख और सब ओर नेत्र हैं। आप ही इस विश्वके उत्पादक तथा जगत्के भोक्ता (रक्षक और संहारक) हैं ॥ ६ ॥

भूरिविक्रमं चक्रक्रम त्रिभुवनं सुविक्रम खविक्रम खर्विक्रम बभ्रुः सुविभुः प्रभाकरः शम्भुः स्वयम्भूश्च भूतादिर्भूतात्मन् महाभूत विश्वभुक् त्वमेव विश्वगोप्तासि विश्वम्भर पवित्रमसि हविर्विशारद हविःकर्मा अमृतेन्धन सुरासुरगुरो महादेव नरदेव ऊर्ध्वकर्मन् पूतात्मन् अमृतेश दिवःस्पृग् विश्वस्य पते घृताच्यसि अनन्तकर्मन् द्रुहिणवंश स्ववंश विश्वपास्त्वं त्वमेव विश्वं बिभर्षि वरार्थिनो नस्त्रायस्वेति ॥ ७ ॥

आपका पराक्रम बहुत है। आप चक्रका संचालन करनेवाले हैं। तीनों लोक आपके ही स्वरूप हैं। आपका विक्रम उत्तम है। विक्रम आपका स्वरूप है। आप स्वर्लोकको लाँघ जानेवाले हैं। आप बभ्रु (अग्नि एवं विष्णुरूप), सुविभु (व्यापक), प्रभाकर (सूर्यरूप), शम्भु (कल्याणमय शिव), स्वयम्भू (ब्रह्मा), भूतादि (महत्तत्त्व अथवा सम्पूर्ण भूतोंके आदि कारण), भूतात्मा (समस्त प्राणियोंके आत्मा), महाभूत (परमात्मा अथवा पञ्च महाभूतस्वरूप), विश्वभोक्ता और विश्वपालक हैं। विश्वम्भर ! आप पवित्र हैं। सात हविर्यज्ञ-संस्थाओंके विशेषज्ञ हैं। हविष्यके होममें तत्पर रहनेवाले हैं। अमृत (घी) रूपी ईंधनसे प्रज्वलित होनेवाले अग्नि हैं। सुरासुरगुरो ! महादेव ! नरदेव ! आपके कर्म ऊर्ध्वगति प्रदान करनेवाले हैं। पूतात्मन् ! आप अमृतपदके स्वामी हैं। द्युलोकका स्पर्श करनेवाले हैं। विश्वपते ! आप घृताची (घीकी आहुति डालनेवाली स्रुवा) हैं। आपके कर्म अनन्त हैं। ब्रह्मा आपके वंशज हैं। आप स्ववंश (स्वयम्भू) हैं। आप ही विश्वके पालक हैं तथा आप ही विश्वका धारण-पोषण करते हैं। हम वरकी अभिलाषा रखने वाले सेवकोंकी आप रक्षा करें ॥ ७ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे महापुरुषस्तवे अष्टषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६८ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें महापुरुषकी स्तुतिविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६८ ॥


एकोनसप्ततितमोऽध्यायः

कश्यप, अदिति और देवताओंको भगवान् विष्णुका वरदान देना और अदितिके गर्भसे प्रकट होना

वैशम्पायन उवाच
नारायणस्तु भगवान्छ्रुत्वैतत् परमं स्तवम् ।
ब्रह्मज्ञेन द्विजेन्द्रेण कश्यपेन समीरितम् ॥ १ ॥
स्निग्धगम्भीरनिर्घोषजीमूतस्वननिःस्वनम् ।
मनसा प्रीतियुक्तेन विबुधानां महात्मनाम् ॥ २ ॥
उवाच वचनं सम्यग् हृष्टपुष्टपदाक्षरम् ।
आकाशाच्छुश्रुवे शब्दो दर्शनं नोपलभ्यते ।
श्रीमान् प्रीतमना देवः प्रोवाच प्रभुरीश्वरः ॥ ३ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! ब्रह्मवेत्ता विप्रवर कश्यपद्वारा किये गये इस परमस्तवको सुनकर भगवान् नारायणके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई; वे उन महात्मा देवताओंसे मेघगर्जनाके समान स्निग्ध-गम्भीर घोष करते हुए हृष्ट-पुष्ट पद और अक्षरवाली उत्तम वाणीमें बोले; उस समय आकाशसे केवल उनका शब्दमात्र सुनायी देता

९६०श्रीमद्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

था, दर्शन नहीं हो रहा था। करने, न करने और अन्यथा करनेमें भी समर्थ वे श्रीमान् भगवान् नारायण देव इस प्रकार कहने लगे ॥ १–३ ॥

विष्णुरुवाच

प्रीतोऽस्मि वः सुरश्रेष्ठाः सर्वे मत्तो विनिश्चयम्।
वरं वृणुत भद्रं वो वरदोऽस्मि सुरोत्तमाः ॥ ४ ॥

भगवान् विष्णु बोले—सुरश्रेष्ठगण ! तुम्हारा भला हो ! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ; तुम सब लोग मुझसे सुनिश्चित वर माँगो। श्रेष्ठ देवताओ! मैं तुम्हें वर देनेके लिये उद्यत हूँ ॥ ४ ॥

कश्यप उवाच

यदैव भगवान् प्रीतः सर्वेषाममरोत्तमः।
तदैव कृतकृत्याः स्म त्वं हि नः परमा गतिः ॥ ५ ॥

कश्यपने कहा—प्रभो ! आप देवताओंमें उत्तम हैं; आप जभी हम सबपर प्रसन्न हुए तभी हम कृतकृत्य हो गये, क्योंकि आप ही हमारी परम गति हैं ॥ ५ ॥

यदि प्रसन्नो भगवान् दातव्यो वा वरो यदि।
वासवस्यानुजो भ्राता ज्ञातीनां नन्दिवर्धनः।
अदित्यां वामनः श्रीमान् भगवानस्तु वै सुतः ॥ ६ ॥

यदि भगवान् हमपर प्रसन्न हैं अथवा यदि हमें वर देना उचित समझते हैं तो अदितिके गर्भसे पुत्ररूपमें उत्पन्न हो श्रीमान् भगवान् वामनके नामसे विख्यात हों और इन्द्रके छोटे भाई होकर बन्धु-बान्धवोंका आनन्दवर्धन करें ॥ ६॥

वैशम्पायन उवाच

अदितिर्देवमाता च एतमेवार्थमुत्तमम्।
पुत्रार्थे वरदं प्राह भगवन्तं वरार्थिनी ॥ ७ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वरकी इच्छा रखनेवाली देवमाता अदिति भी वरदायक भगवान्‌से पुत्रके लिये यही उत्तम मनोरथ प्रकट करती हुई बोली ॥ ७ ॥

अदितिरुवाच

याचे त्वां पुत्रकामा वै भवान् पुत्रो भवत्विति।
निःश्रेयसाय सर्वेषां देवानां हि महात्मनाम् ॥ ८ ॥

अदितिने कहा—भगवन् ! मेरे मनमें पुत्रकी कामना है। मैं आपसे यही प्रार्थना करती हूँ कि आप समस्त महात्मा देवताओंके कल्याणके लिये मेरे पुत्र हो जायें ॥ ८ ॥

देवा ऊचुः

भ्राता भर्ता च दाता च शरणं च भवस्व नः।
अदित्याः पुत्रतां याते त्वयि देवाः सवासवाः।
देवशब्दं वहिष्यन्ति कश्यपस्यात्मजो भव ॥ ९ ॥

देवता बोले—भगवन् ! आप हमारे भ्राता, भर्ता (भरण-पोषण करनेवाले), दाता और आश्रय हों। आप जब अदितिके पुत्र होंगे, तभी इन्द्रसहित समस्त देवता देवशब्द (देवतापदवी) का भार वहन कर सकेंगे, अतः आप कश्यपके पुत्र हो जाइये ॥ ९ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततस्तानब्रवीद् विष्णुर्देवान् कश्यपमेव च।
एवं भवतु भद्रं वो यथेष्टं काममाप्नुत ॥ १० ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तब भगवान् विष्णुने देवताओं तथा कश्यपजीसे कहा—'ऐसा ही होगा, तुम्हारा कल्याण हो। तुम अपना अभीष्ट मनोरथ प्राप्त करो ॥ १० ॥

सर्वेषामेव युष्माकं ये भविष्यन्ति शत्रवः।
मुहूर्तमपि ते सर्वे न स्थास्यन्ति ममाग्रतः ॥ ११ ॥

'तुम सब लोगोंके जो शत्रु होंगे, वे सब-के-सब दो घड़ी भी मेरे सामने नहीं ठहर सकेंगे ॥ ११ ॥

हत्वासुरगणान् सर्वान् ये चान्ये देवशत्रवः।
करिष्ये देवताः सर्वा यज्ञभागाग्रभोजिनः ॥ १२ ॥

'समस्त असुरों तथा अन्यान्य देव-द्रोहियोंका वध करके मैं समस्त देवताओंको यज्ञ-भागका अग्रभोजी बना दूँगा ॥

हव्यांदांश्च सुरान् सर्वान् कव्यादांश्च पितॄनपि।
करिष्ये विबुधश्रेष्ठाः पारमेष्ठ्येन कर्मणा ॥ १३ ॥

'श्रेष्ठ देवताओ ! मैं अपने परमेश्वरोचित कर्मके द्वारा सब देवताओंको हविष्यभोक्ता और पितरोंको भी कव्यभोजी (श्राद्धभोक्ता) बना दूँगा ॥ १३ ॥

यथागतेन मार्गेण निवर्तध्वं सुरोत्तमाः।
देवमातुस्तथादित्याः कश्यपस्यामितात्मनः।
यथामनीषितं कर्ता गच्छध्वं स्वं स्वमालयम् ॥ १४ ॥

'सुरश्रेष्ठगण ! तुम जिस मार्गसे आये हो, उसीसे लौट जाओ ! मैं देवमाता अदिति तथा महात्मा कश्यपजीकी इच्छाके अनुसार कार्य करूँगा ! तुम सब लोग अपने-अपने स्थानको जाओ' ॥ १४ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्ते तु वचने विष्णुना प्रभविष्णुना।
देवाः प्रहृष्टमनसः पूजयन्ति स्म सर्वशः ॥ १५ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! प्रभावशाली विष्णुके ऐसी बात कहनेपर देवताओंका मन हर्षसे खिल उठा। वे सब प्रकारसे भगवान्‌की पूजा—भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ १५ ॥

विश्वेदेवा महात्मानः कश्यपोऽदितिरेव च।
साध्या मरुद्गणाश्चैव शक्रश्चैव महाबलः ॥ १६ ॥
नमस्कृत्य सुरेशाय तस्मै देवाय रंहसे।
प्रयाताः प्राग्दिशं दिव्यं विपुलं कश्यपाश्रमम् ॥ १७ ॥

महात्मा विश्वेदेवगण, कश्यप, अदिति, साध्य, मरुद्गण तथा महाबली इन्द्र—ये सब उन वेगशाली दिव्यस्वरूप

भविष्यपर्व ] सप्ततितमोऽध्यायः [ ९६१


देवेश्वरको नमस्कार करके पूर्वदिशामें स्थित कश्यपजीके दिव्य एवं विशाल आश्रमकी ओर चल दिये ॥ १६-१७॥

गत्वा ते आश्रमं तत्र ब्रह्मर्षिगणसेवितम्।
चेरुः स्वाध्यायनियता अदित्या गर्भमीप्सवः ॥ १८ ॥

ब्रह्मर्षियोंद्वारा सेवित उस आश्रममें पहुँचकर वे देवता वहाँ नियमपूर्वक स्वाध्यायमें तत्पर रहकर अदितिके गर्भकी प्रतीक्षा करते हुए विचरने लगे ॥ १८ ॥

अदितिर्देवमाता च गर्भं दध्रेऽतितेजसम्।
भूतात्मानं महात्मानं दिव्यं वर्षसहस्रकम् ॥ १९ ॥

देवमाता अदितिने अत्यन्त तेजस्वी गर्भ धारण किया, जिसमें समस्त प्राणियोंके आत्मा परमात्मा श्रीहरिका निवास था। एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक वे उस गर्भको धारण किये रहीं ॥ १९ ॥

पूर्णे वर्षसहस्रे तु प्रसूता गर्भमुत्तमम्।
सुराणां शरणं देवमसुराणां विनाशनम् ॥ २० ॥

सहस्र वर्ष पूर्ण होनेपर देवी अदितिने देवताओंके शरणदाता और असुरोंके विनाशक नारायणदेवको अपने उत्तम गर्भ (शिशु) के रूपमें जन्म दिया ॥ २० ॥

गर्भस्थेन तु देवेन परित्राताः सुरास्तदा।
आददानेन तेजांसि त्रैलोक्यस्य महात्मना ॥ २१ ॥

गर्भमें रहते समय ही तीनों लोकोंके तेजको छीन लेनेवाले महात्मा नारायणदेवने तत्काल सब देवताओंकी रक्षा आरम्भ कर दी ॥ २१ ॥

तस्मिञ्जाते तु देवेशे त्रैलोक्यस्य सुखावहे।
भयदे दैत्यसंधानां सुराणां नन्दिवर्धने ॥ २२ ॥

त्रिभुवनको सुख देनेवाले, दैत्यसमूहोंको भयभीत करनेवाले और देवताओंका आनन्द बढ़ानेवाले देवेश्वर श्रीहरिके अदितिके गर्भसे प्रकट होते ही सर्वत्र आनन्द छा गया ॥ २२ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ६९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारविषयक उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६९ ॥


सप्ततितमोऽध्यायः

ऋषियों और विविध देवताओंका वामनजीको नमस्कार करना, गन्धर्वों तथा अप्सराओंका नाचना-गाना, भगवान्‌के वैशिष्ट्यका वर्णन, भगवान्‌का देवताओंसे उनका मनोरथ पूछकर बृहस्पतिजीके साथ बलिके यज्ञमें जाना, वहाँ अपनी वाक्पटुतासे सत्रको चकित कर देना और राजा बलिका उनसे परिचय तथा आगमनका प्रयोजन पूछना

वैशम्पायन उवाच
प्रजानां पतयः सप्त सप्त चैव महर्षयः।
तस्य देवस्य जातस्य नमस्कारं प्रचक्रिरे ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वहाँ प्रकट हुए भगवान् विष्णुको मरीचि आदि सात प्रजापतियों तथा सात महर्षियोंने नमस्कार किया ॥ १ ॥

भरद्वाजः कश्यपो गौतमश्च
विश्वामित्रो जमदग्निर्वसिष्ठः।
यश्चोदितो भास्करे सम्प्रणष्टे
सोऽप्यत्रात्रिर्भगवान्याजगाम ॥ २ ॥

भरद्वाज, कश्यप, गौतम, विश्वामित्र, जमदग्नि, वसिष्ठ तथा सूर्यदेवके नष्ट (अपने स्थानसे भ्रष्ट) होनेपर जो उदित हुए थे, वे भगवान् अत्रि भी श्रीहरिको प्रणाम करनेके लिये वहाँ पधारे थे ॥ २ ॥

मरीचिरङ्गिराश्चैव पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः।
दक्षप्रजापतिश्चैव नमस्कारं प्रचक्रिरे ॥ ३ ॥

मरीचि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और दक्ष प्रजापति—इन प्रजापतियोंने भी वहाँ आकर भगवान्‌को प्रणाम किया ॥ ३ ॥

और्वो वसिष्ठपुत्रश्च स्तम्बः काश्यप एव च।
कपीवानकपीवांश्च दत्तो निश्च्यवनस्तथा ॥ ४ ॥
वसिष्ठपुत्राः सप्तासन्वासिष्ठा इति विश्रुताः।
हिरण्यगर्भस्य सुताः पूर्वजाताः सुतेजसः ॥ ५ ॥

और्व, वसिष्ठपुत्र शक्ति, स्तम्भ, काश्यप, कपीवान्, अकपीवान्, दत्तात्रेय, निश्च्यवन तथा वासिष्ठ नामसे विख्यात वसिष्ठके वे सात पुत्र, जो पहले हिरण्यगर्भके परमतेजस्वी पुत्रोंके रूपमें उत्पन्न हुए थे (भगवान्‌को नमस्कार करनेके लिये वहाँ पधारे थे) ॥ ४-५ ॥

गार्ग्यः पृथुस्तथैवान्यो जन्यो वामन एव च।
देववाहुर्युधुश्च पर्जन्यश्चैव सोमजः ॥ ६ ॥
हिरण्यरोमा वेदशिराः सप्तनेत्रस्तथैव च।
विश्वोऽतिविश्वश्च्यवनः सुधामा विरजास्तथा ॥ ७ ॥
अतिनामा सहिष्णुश्च नमस्कारमकुर्वत।

गार्ग्य, पृथु, जन्य, वामन, देवबाहु, युधुम्न, सोमवंशी

९६२श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

पर्जन्य, हिरण्योमा, वेदशिरा, सप्तनेत्र, विश्व, अतिविश्व, च्यवन, सुधामा, विरजा, अतिनामा और सहिष्णु—इन सबने वहाँ आकर भगवान्‌को नमस्कार किया ॥ ६-७१/२ ॥

उद्द्योतमाना वपुषा सर्वाभरणभूषिताः ॥ ८ ॥
उपनृत्यन्ति देवेशं विष्णुमप्सरसां वराः।

अपने शरीरसे प्रकाशित होनेवाली समस्त आभूषणोंसे विभूषित श्रेष्ठ अप्सराएँ देवेश्वर भगवान् विष्णुके समीप आकर नृत्य करने लगीं ॥ ८१/२ ॥

ततो गन्धर्वतूर्येषु प्रणदत्सु विहायसि ॥ ९ ॥
बहुभिः सह गन्धर्वैः प्रागायत च तुम्बुरुः।

तदनन्तर आकाशमें गन्धर्वोंके बाजे बजने लगे। उस समय बहुसंख्यक गन्धर्वोंके साथ तुम्बुरुने गीत गाया ॥ ९१/२ ॥

महाश्रुतिश्चित्रशिरा ऊर्णायुरनघस्तथा ॥ १० ॥
गोमायुः सूर्यवर्चाश्च सोमवर्चाश्च सप्तमः।
युगपस्तृणपः कार्णिर्नन्दिश्च त्रिशिरास्तथा ॥ ११ ॥
त्रयोदशः शालिशिराः पर्जन्यश्च चतुर्दशः।
कलिः पञ्चदशश्चात्र तत्रैव तु महीपते ॥ १२ ॥

पृथ्वीनाथ ! इनके सिवा महाश्रुति, चित्रशिरा, ऊर्णायु, अनघ, गोमायु, सूर्यवर्चा, सातवें सोमवर्चा, युगप, तृणप, कार्णि, नन्दि, त्रिशिरा, तेरहवें शालिशिरा, चौदहवें पर्जन्य और पंद्रहवें कलि—ये सब वहीं गीत गाने लगे ॥ १०-१२ ॥

दश पञ्च त्विमे प्रोक्ता नारदश्चैव षोडशः।
हाहा हूहूश्च गन्धर्वौ हंसश्चैव महाद्युतिः ॥ १३ ॥

ये पंद्रह गन्धर्व बताये गये हैं। इनके साथ सोलहवें नारद थे तथा हाहा, हूहू नामक दो गन्धर्व और महातेजस्वी हंस भी थे ॥ १३ ॥

सर्वे ते देवगन्धर्वा उपगायन्ति केशवम्।
तथैवाप्सरसो हृष्टाः सर्वालंकारभूषिताः ॥ १४ ॥
वपुष्मन्तः सुजघनाः सर्वाङ्गशुभदर्शनाः।
ननृतुश्च महाभागा जगुश्चायतलोचनाः ॥ १५ ॥
सुमध्याश्चारुमध्‍याश्च प्रियमुख्यो वराननाः।

वे समस्त देवगन्धर्व भगवान् केशवके समीप गान करने लगे। उसी प्रकार हर्षमें भरी हुई महाभागा अप्सराएँ सब प्रकारके अलंकारोंसे विभूषित हो वहाँ नृत्य और गान करने लगीं। उनके शरीर सुन्दर थे। जघनप्रदेश मनोहर जान पड़ते थे। वे सब-की-सब सर्वाङ्गसुन्दरी दिखायी देती थीं। उनके नेत्र बड़े-बड़े थे। शरीरका मध्यभाग सुन्दर एवं मनोहर था। उन सुमुखी अप्सराओंके मुख सबको प्रिय लगते थे ॥ १४-१५१/२ ॥

अनूक्ताथ तथा जामी मिश्रकेशी त्वलम्बुषा ॥ १६ ॥
मरीचिः शुचिकाचैव विद्युत्पूर्णा तिलोत्तमा।
अद्रिका लक्षणा चैव रम्भा तद्वन्मनोरमा ॥ १७ ॥
असिता च सुबाहुश्च सुप्रिया सुभगा तथा।
उर्वशी चित्रलेखा च सुग्रीवा च सुलोचना ॥ १८ ॥
पुण्डरीका सुगन्धा च सुरथा च प्रमाथिनी।
नन्दा शारद्वती चैव तथान्यास्तत्र संघशः ॥ १९ ॥
मेनका सहजन्या च पर्णिका पुञ्जिकस्थला।
एताश्चाप्सरसोऽन्याश्च प्रनृत्यन्ति सहस्रशः ॥ २० ॥

उनके नाम इस प्रकार हैं—अनूक्ता, जामी, मिश्रकेशी, अलम्बुषा, मरीचि, शुचिका, विद्युत्पूर्णा, तिलोत्तमा, अद्रिका, लक्षणा, रम्भा, मनोरमा, असिता, सुबाहु, सुप्रिया, सुभगा, उर्वशी, चित्रलेखा, सुग्रीवा, सुलोचना, पुण्डरीका, सुगन्धा, सुरथा, प्रमाथिनी, नन्दा, शारद्वती, मेनका, सहजन्या, पर्णिका, पुञ्जिकस्थला—ये तथा दूसरी झुंड-की-झुंड अप्सराएँ सहस्रोंकी संख्यामें वहाँ आकर नृत्य करने लगीं ॥ १६—२० ॥

धातार्यमा च मित्रश्च वरुणोऽशो भगस्तथा।
इन्द्रो विवस्वान् पूषा च त्वष्टा च सविता तथा ॥ २१ ॥
कथितो विष्णुरित्येवं काश्यपेयो गणस्तथा।
इत्येते द्वादशादित्या ज्वलन्तः सूर्यवर्चसः ॥ २२ ॥
चक्रुस्तस्य सुरेशस्य नमस्कारं महात्मनः।

धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, अंश, भग, इन्द्र, विवस्वान्, पूषा, त्वष्टा, सविता तथा विष्णु—यह कश्यप-पुत्रोंका समुदाय है। ये सूर्यतुल्य तेजस्वी और अग्निके समान प्रकाशमान बारह आदित्य कहे गये हैं। इन सबने आकर उन देवेश्वर महात्मा वामनको नमस्कार किया ॥ २१-२२१/२ ॥

मृगव्याधश्च सर्पश्च निर्ऋतिश्च महाबलः ॥ २३ ॥
अजैकपादहिर्बुध्न्यः पिनाकी चापराजितः।
दहनोऽथेश्वरश्चैव कपाली च विशाम्पते ॥ २४ ॥
स्थाणुर्भर्गश्च भगवान् रुद्रास्तत्रावतस्थिरे।

प्रजानाथ ! मृगव्याध, सर्प, महाबली निर्ऋति, अजैकपात्, अहिर्बुध्न्य, पिनाकी, अपराजित, दहन, ईश्वर, कपाली तथा भगवान् स्थाणु या भर्ग—ये ग्यारह रुद्र भी वहाँ उपस्थित थे ॥ २३-२४१/२ ॥

अश्विनौ वसवश्चाष्टौ मरुतश्च महाबलाः ॥ २५ ॥
विश्वेदेवाश्च साध्याश्च तस्य प्राञ्जलयः स्थिताः।

दोनों अश्विनीकुमार, आठ वसु, महाबली मरुद्गण, विश्वेदेव तथा साध्य देवता उन भगवान्‌के सामने हाथ जोड़कर खड़े थे ॥ २५१/२ ॥

शेषानुजा महाभागा वासुकिप्रमुखास्तथा ॥ २६ ॥
कच्छपश्वापहर्ता च तक्षकश्च महाबलः।
अधृष्टास्तेजसा युक्ता महाक्रोधा महाबलाः ॥ २७ ॥
एते नागा महात्मानस्तस्मै प्राञ्जलयः स्थिताः।

शेषके छोटे भाई महाभाग वासुकि आदि, कच्छप, अपहर्ता और महाबली तक्षक—ये महाकाय नाग किसीसे पराजित होनेवाले नहीं थे। ये तेजस्वी, महाक्रोधी और महाबलवान् थे। ये सब-के-सब वहाँ भगवान्‌के लिये हाथ जोड़े हुए खड़े थे ॥ २६-२७१/२ ॥

भविष्यपर्व ] सप्ततितमोऽध्यायः ९६३


तार्क्ष्यारिष्टनेमिश्च गरुडश्च महाबलः ॥ २८ ॥
अरुणश्चारुणिंश्चैव वैनतेया ह्युपस्थिताः ।
ताक्ष्यं, अरिष्टनेमि, महाबली गरुड़, अरुण और आरुणि—ये विनताके पुत्र भी वहाँ उपस्थित थे ॥ २८॥

पितामहश्च भगवान् स्वयमागम्य लोककृत् ।
प्राह चैवं गुरुः श्रीमान् सह सर्वैर्महात्मभिः ॥ २९ ॥
इन सब महात्माओंके साथ लोकस्रष्टा जगद्गुरु श्रीमान् भगवान् पितामह स्वयं आकर इस प्रकार बोले ॥ २९ ॥

ब्रह्मोवाच
यस्मात् प्रसूयते लोकः प्रविष्णुः सनातनः ।
तस्माल्लोकेश्वरः श्रीमान् विष्णुरेव भवत्वयम् ॥ ३० ॥
ब्रह्माजीने कहा—इनसे ही इस सम्पूर्ण जगत्‌की उत्पत्ति होती है, इसलिये ये प्रभावशाली सनातन पुरुष श्रीमान् विष्णु ही लोकेश्वर हों (इन्हींको लोकेश्वरके पद-पर प्रतिष्ठित किया जाय) ॥ ३० ॥

एवमुक्त्वा तु भगवान् सार्धं देवर्षिभिः प्रभुः ।
नमस्कृत्या सुरेशाय जगाम त्रिदिवं पुनः ॥ ३१ ॥
ऐसा कहकर देवर्षियोंसहित भगवान् ब्रह्मा उन देवेश्वर-को नमस्कार करके पुनः अपने धामको चले गये ॥ ३१ ॥

स तु जातः सुरेशानः कश्यपस्यात्मजः प्रभुः ।
नवदुर्दिनमेघाभो रक्ताक्षो वामनाकृतिः ॥ ३२ ॥
वहाँ प्रकट हुए कश्यपकुमार देवेश्वर भगवान् विष्णुका स्वरूप बौना था। वे वर्षाकालके नूतन मेघकी भाँति श्याम कान्तिसे सुशोभित हो रहे थे। उनके नेत्र कुछ-कुछ लाल थे ॥ ३२ ॥

श्रीवत्सेनेोरसि श्रीमान् रोमजातेन राजता ।
उत्फुल्लोचनाः सर्वाः पश्यन्त्यप्सरसस्तदा ॥ ३३ ॥
उनके वक्षःस्थलमें श्रीवत्स नामवाली रोमराजि सुशोभित थी, जिससे वे भगवान् बड़े शोभासम्पन्न दिखायी देते थे। उस समय सारी अप्सराएँ प्रफुल्ल नेत्रोंसे उनकी छवि निहार रही थीं ॥ ३३ ॥

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद् युगपदुत्थिता ।
यदि भाः सदृशी सा स्याद् भासा तस्य महात्मनः ॥ ३४ ॥
यदि आकाशमें एक सहस्र सूर्योंकी प्रभा एक साथ ही उदित हो जाती तो वही उन महात्मा श्रीहरिकी प्रभाके समान हो सकती थी ॥ ३४ ॥

सुरर्षिप्रतिमः श्रीमान् भूर्भुवर्भूतभावनः ।
शुचिरोमा महास्कन्धः सर्वतेजोमयः प्रभुः ॥ ३५ ॥
वे देवर्षियोंके तुल्य तेजस्वी श्रीमान् भगवान् वामन भूर्लोक और भुवर्लोक आदिके समस्त प्राणियोंके उत्पादक और संरक्षक थे। उनकी रोमावली पवित्र और कंधे बड़े-बड़े थे। वे प्रभु सम्पूर्ण तेजके पुञ्ज थे ॥ ३५ ॥


या गतिः पुण्यकीर्तीनामगतिः पापकर्मणाम् ।
योगसिद्धा महात्मानो यं विदुर्यौगमुत्तमम् ॥ ३६ ॥
यस्याष्टगुणमैश्वर्यं यमाहुर्देवसत्तमम् ।
यं प्राप्य शाश्वतं विप्रा नियता मोक्षकाङ्क्षिणः ॥ ३७ ॥
जन्मनो मरणाच्चैव मुच्यन्ते भवभीरवः ।
यदेतत्तप इत्याहुः सर्वाश्रमनिवासिनः ॥ ३८ ॥
सेवन्ते यं यताहारा दुष्करं व्रतमास्थिताः ।
योऽनन्त इति नागेषु सेव्यते सर्वभोगिभिः ॥ ३९ ॥
सहस्रमूर्धा रक्ताक्षः शेषादिभिरनुत्तमैः ।
यो यज्ञ इति विप्रेन्द्रैरिज्यते स्वर्गलिप्सुभिः ॥ ४० ॥
नानास्थानगतः श्रीमानेकः कविरनुत्तमः ।
यं देवा यान्ति वेत्तारं यज्ञभागप्रदायिनम् ॥ ४१ ॥
वृषार्चिश्चन्द्रसूर्याक्षं देवमाकाशविग्रहम् ।
स प्राह त्रिदशान् सर्वान् वाचा वै परया विभुः ॥ ४२ ॥
जो पुण्यकीर्ति पुरुषोंकी गति हैं, पापकर्मियोंकी जिनके पास पहुँच नहीं होती, योगसिद्ध महात्मा पुरुष जिन्हें उत्तम योगके रूपमें जानते हैं, जिनमें अणिमा आदि अष्टगुण ऐश्वर्य सदा विराजमान हैं, जिन्हें देवशिरोमणि कहा गया है, जिन सनातन देवको पाकर नियमपरायण, मोक्षाभिलाषी तथा भवबन्धनसे भयभीत रहनेवाले ब्राह्मण जन्म-मरणके चक्रसे छूट जाते हैं, जिन्हें सभी आश्रमोंके निवासी तप कहते हैं, आहारका संयम करके दुष्कर व्रतका आश्रय लेनेवाले साधक जिनकी उपासना करते हैं, शेष आदि सर्वोत्तम एवं समस्त सर्पगण नागोंमें अनन्त नामसे जिनकी आराधना करते हैं, जिनके सहस्रों मस्तक और लाल-लाल नेत्र हैं, स्वर्गकी अभिलाषा रखनेवाले श्रेष्ठ ब्राह्मण यज्ञ-पुरुषरूपसे जिनका यजन करते हैं, जो श्रीसम्पन्न, अद्वितीय तथा सर्वोत्तम ज्ञानी हैं और अकेले ही नाना स्थानोंमें व्याप्त हैं, जिन्हें ज्ञानी, यज्ञभागप्रदाता, धर्ममय तेजसे युक्त, चन्द्रमा और सूर्यरूपी नेत्रोंसे सुशोभित तथा अनन्त आकाश-मय शरीरसे सम्पन्न मानकर देवता उनकी शरणमें जाते हैं, उन्हीं सर्वव्यापी परमात्माने अपनी उत्तम वाणीद्वारा समस्त देवताओंसे कहा—॥ ३६–४२ ॥

जानन्नपि महातेजा गतो योगेन बालताम् ।
किं करोमि सुरश्रेष्ठाः कं वरं च ददामि वः ॥ ४३ ॥
यत्काङ्क्षितं वै सर्वेषां तद्वै ब्रूत मुदा युताः ।
योगशक्तिसे बालभावको प्राप्त हुए उन महातेजस्वी श्रीहरिने जानते हुए भी पूछा—‘सुरश्रेष्ठगण ! बताओ, मैं तुम्हारा कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ ? तुम्हें क्या वर दूँ। तुम सब लोगोंकी जो इच्छा हो, उसे प्रसन्नतापूर्वक बताओ’ ॥ ४३½ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा वामनस्य महात्मनः ॥ ४४ ॥
सर्वे ते हृष्टमनसो देवाः कश्यपनन्दनम् ।

५६४श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

ऊचुः प्राञ्जलयो विष्णुं सुराः शक्रपुरोगमाः ॥४५'॥
महात्मा वामनकी यह बात सुनकर इन्द्र आदि समस्त देवता प्रसन्नचित्त हो उन कश्यपनन्दन भगवान् विष्णुसे हाथ जोड़कर इस प्रकार बोले—॥ ४४-४५ ॥
ब्रह्मणो वरदानेन हृतं नो निखिलं जगत् ।
तपसा महता चैव विक्रमेण दमेन च ॥४६॥
बलिना दैत्यमुख्येन सर्वज्ञेन महात्मना।
अवध्यः किल सोऽस्माकं सर्वेषां देवसत्तम ॥४७॥
भवान् प्रभवते तस्य नान्यः कश्चन सुव्रत ।
तत् प्रपद्यामहे सर्वे भवन्तं शरणार्थिनः ।
शरण्यं वरदं देवं सर्वदेवभयापहम् ॥४८॥
'देवप्रवर ! सर्वज्ञ महात्मा दैत्यराज बलिने महान् तप, अद्भुत विक्रम, इन्द्रिय-संयम तथा ब्रह्माजीके दिये हुए वरदानके प्रभावसे हमारा सारा जगत् हमसे छीन लिया है। कहा जाता है कि वे हम सब लोगोंके लिये अवध्य हैं। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले प्रभो ! केवल आप ही उन्हें जीतने-में समर्थ हैं, दूसरा कोई नहीं; इसलिये हम सब लोग शरणार्थी होकर आप सर्वदेव-भयहारी शरणागतवत्सल वर-दायक देवताकी शरणमें आये हैं॥४६–४८॥
ऋषीणां च हितार्थाय लोकानां च सुरेश्वर ।
प्रियार्थे च तथादित्याः कश्यपस्य तथैव च ॥४९॥
कव्यं पितॄणामुचितं सुराणां हव्यमुत्तमम् ।
प्रवर्तेत महाबाहो यथापूर्वं सुरोत्तम ॥५०॥
आनृण्यार्थे सुरेशस्य वासवस्य महात्मनः ।
प्रत्यानय महेन्द्रस्य त्रैलोक्यमिदमव्ययम् ॥५१॥
'महाबाहु सुरश्रेष्ठ सुरेश्वर ! आप ऋषियों और लोकों-के हितके लिये, माता अदिति और पिता कश्यपका प्रिय करनेके लिये, पितरोंके निमित्त उचित कव्य तथा देवताओंके लिये उत्तम हव्य जिस प्रकार पूर्ववत् प्राप्त हो सके, उसके लिये तथा अपने ज्येष्ठ भ्राता देवेश्वर महात्मा इन्द्रके ऋणसे उऋण होनेके लिये यह त्रिलोकीका अविनाशी राज्य बलिसे छीनकर आप पुनः महेन्द्रको लौटा दीजिये ४९–५१
ऋतुना वाजिमेधेन यजते स हि दानवः ।
यत् प्रत्यानयने युक्तं लोकानां तद् विचिन्त्य ॥५२॥
'इस समय दानवराज बलि अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान करते हैं, उनसे त्रिलोकीका राज्य लौटा लानेका जो उचित उपाय हो, उसका विचार कीजिये' ॥ ५२ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तदा देवैर्विष्णुर्वामनरूपधृक् ।
प्रहर्षयन्नुवाचाथ सर्वान् देवानिदं वचः ॥५३॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! देवताओंके ऐसा कहनेपर वामनरूपधारी भगवान् विष्णुने समस्त देवताओंका हर्ष बढ़ाते हुए उनसे यह बात कही ॥ ५३ ॥

विष्णुरुवाच
तस्य यज्ञसकाशं मां महर्षिर्वेदपारगः।
बृहस्पतिर्महातेजा नयत्वङ्गिरसः सुतः ॥५४॥
श्रीविष्णु बोले—देवताओ ! वेदोंके पारंगत विद्वान् अङ्गिराकुमार महातेजस्वी महर्षि बृहस्पति मुझे बलिके यज्ञके समीप ले चलें ॥ ५४ ॥
तस्याहं समुपाप्तो यज्ञवाटं सुरोत्तमाः ।
विचरिष्ये यथायुक्तं त्रैलोक्यहरणाय वै ॥५५॥
सुरश्रेष्ठगण ! उसके यज्ञमण्डपमें पहुँचकर मैं त्रिलोकीके राज्यका अपहरण करनेके लिये यथोचित उपायका विचार करूँगा ॥ ५५ ॥

वैशम्पायन उवाच
ततो बृहस्पतिर्धीमाननयद् वामनं प्रभुम् ।
यज्ञवाटं महातेजा दानवेन्द्रस्य धीमतः ॥५६॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! तब महातेजस्वी बुद्धिमान् बृहस्पतिने भगवान् वामनको उत्तम बुद्धिवाले दानवराज बलिकी यज्ञशालातक पहुँचा दिया ॥ ५६ ॥
मौञ्जी यज्ञोपवीती च छत्री दण्डी ध्वजी तथा ।
वामनो धूम्ररक्ताक्षो भगवान् बालरूपधृक् ॥५७॥
बालरूपधारी भगवान् वामनने मूंजकी मेखला, यज्ञोप-वीत, छत्र, दण्ड और ध्वज धारण कर रक्खे थे। उनके नेत्र धूम्र तथा रक्तवर्णके थे ॥ ५७ ॥
तं गत्वा यज्ञवाटं च ब्रह्मर्षिगणसंकुलम् ।
आत्मना चैव भगवान् वर्णयामास तं क्रतुम् ॥५८॥
ब्रह्मर्षियोंसे भरे हुए उस यज्ञमण्डपमें पहुँचकर भगवान्-ने स्वयं ही उस यज्ञका वर्णन किया ॥ ५८ ॥
लोकेश्वरेश्वरः श्रीमान् सुरैर्ब्रह्मपुरोगमैः।
अध्यास्यमानो भगवानवृद्धोऽप्यथ वृद्धवत् ॥५९॥
लोकेश्वरोंके भी ईश्वर श्रीमान् भगवान् वामन यद्यपि अवृद्ध (बालक) थे, तो भी ब्रह्मा आदि समस्त देवता वृद्धकी भाँति उनकी सेवामे उपस्थित थे ॥ ५९ ॥
दानवाधिपतेस्तस्य बलेर्वैरोचनस्य च ।
यज्ञवाटमचिन्त्यात्मा जगाम सुरसत्तमः ॥६०॥
जिनका स्वरूप अचिन्त्य है, वे सुरश्रेष्ठ भगवान् वामन दानवराज विरोचनकुमार बलिके यज्ञमण्डपमें गये ॥ ६० ॥
पालितोऽपि हि दैतेयैः सांग्रामिकपरिच्छदैः।
द्वारे दानवसम्बाधे सहसैव विवेश ह ॥६१॥
यद्यपि दैत्यराज बलि युद्धोपयोगी वेषभूषा धारण करने-वाले सेवकोंसे सुरक्षित थे (अतः उनके पास पहुँचना कठिन था), तथापि दानवोंसे भरे हुए उस मण्डपके द्वारके भीतर वे सहसा प्रविष्ट हो गये ॥ ६१ ॥

भविष्यपर्व ] एकसप्ततितमोऽध्यायः [ ९६५


ऋषिभिश्चैव मन्त्राद्यैः सर्वतः परिवारितम्।
दैत्यदानवराजेन्द्रमुपतस्थे बलिं बली ॥ ६२॥
ऋषियोंने मन्त्र आदिके द्वारा सब ओरसे उन्हें घेर रखा था, तथापि बलवान् भगवान् वामन दैत्य-दानवराज बलिके पास पहुँच ही गये ॥ ६२ ॥

वर्णयित्वा यथान्यायं यज्ञं यज्ञः सनातनः।
विस्तरेण नरश्रेष्ठ प्रयोगैर्विविधैस्तथा ॥ ६३॥
शुक्रादीनृत्विजश्चापि यज्ञकर्मविचक्षणान्।
सर्वानैव निजग्राह चकार च निरुत्तरान् ॥६४॥
नरश्रेष्ठ ! उन सनातन यज्ञपुरुषने उस यज्ञका नाना प्रकारके प्रयोगोंद्वारा विस्तारपूर्वक यथोचित वर्णन करके यज्ञकर्ममें कुशल शुक्राचार्य आदि समस्त ऋत्विजोंको निगृहीत करते हुए उन्हें निरुत्तर कर दिया ॥ ६३-६४ ॥

आरादथ वलेस्तस्य ऋत्विजामभितस्तथा।
यज्ञमात्मानमेवासौ हेतुभिः कारणं विभुः ॥६५॥
वैदिकैरप्रकाशैश्च पुनरप्यथ भारत।
प्रत्यक्षमृषिसंघानां वर्णयामास चित्रगुः ॥६६॥
भारत ! विचित्र वाणीवाले उन सर्वव्यापी भगवान्‌ने बलिके समीप, ऋत्विजोंके निकट तथा ऋषि समुदायोंके समक्ष अपने ही स्वरूपभूत कारणात्मा यज्ञका अप्रकाशित वैदिक युक्तियोंद्वारा बारंबार वर्णन किया ॥ ६५-६६ ॥

ततो निरुत्तरान् दृष्ट्वा सोपाध्यायानृषींश्च तान्।
अवृद्धेनापि वृद्धांस्तान् वामनेन महौजसा ॥६७॥
अद्भुतं चापि मेने स विरोचनसुतो बली।
मूर्ध्ना कृताञ्जलिश्श्चेदमब्रवीद् विस्मितो वचः ॥६८॥
महान् तेजस्वी बालक वामनके द्वारा उपाध्यायोंसहित उन वृद्ध महर्षियोंको भी निरुत्तर हुआ देख विरोचन-कुमार बलवान् बलिने उसे अद्भुत चमत्कार माना। फिर वे हाथ जोड़े मस्तक झुका विस्मित होकर इस प्रकार बोले—॥ ६७-६८ ॥

कुतस्त्वं कोऽसि कस्यासि किं तेहास्ति प्रयोजनम्।
नैवंविधः परिज्ञातो दृष्टपूर्वी मया द्विजः ॥६९॥
'विप्रवर ! आप कहाँसे आये हैं ? कौन हैं ? किसके पुत्र हैं ? यहाँ पधारनेमें आपका क्या प्रयोजन है ? मैंने आप-जैसे द्विजको न तो पहले कभी देखा था और न जाना ही था ॥ ६९ ॥

बालो मतिमतां श्रेष्ठो ज्ञानविज्ञानकोविदः।
शिष्टवाग्रूपसम्पन्नो मनोज्ञः प्रियदर्शनः ॥७०॥
'आप बाल होकर भी बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ हैं। ज्ञान-विज्ञानमें प्रवीण हैं। आपकी वाणी शिष्टतापूर्ण है। आप रूपवान् और मनोहर हैं। देखनेमें प्रिय लगते हैं ॥ ७० ॥

नेदृशाः सन्ति देवानासृषीणामपि सूनवः।
न नागानां न यक्षाणां नासुराणां न रक्षसाम् ॥७१॥
न- पितॄणां न सिद्धानां गन्धर्वाणां तथैव च।
योऽसि सोऽसि नमस्तेऽस्तु ब्रूहि किं करवाणि ते ॥
'देवताओं तथा ऋषियोंके पुत्र भी ऐसे नहीं हैं। न नागोंके, न यक्षोंके, न असुरोंके, न राक्षसोंके, न पितरोंके, न सिद्धोंके और न गन्धर्वोंके ही पुत्र ऐसे हैं। आप जो हों, सो हों, आपको नमस्कार है। बताइये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ ?' ॥ ७१-७२ ॥

वैशम्पायन उवाच
उक्त एवं ह्यचिन्त्यात्मा बलिना वामनस्तदा।
प्रोवाचोपायतत्त्वज्ञः स्मितपूर्वमिदं वचः ॥७३॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! बलिके ऐसा कहनेपर अचिन्त्यस्वरूप भगवान् वामन, जो कार्यसिद्धिके तात्त्विक उपायको जाननेवाले थे, मुसकराकर इस प्रकार बोले ॥ ७३ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७० ॥


एकसप्ततितमोऽध्यायः

वामनद्वारा बलिके यज्ञकी प्रशंसा, बलिसे माँगनेके लिये प्रेरित होनेपर वामनका उनसे तीन पग भूमि माँगना, शुक्राचार्य और प्रह्लादका बलिको दान देनेसे रोकना, बलिद्वारा दानका समर्थन तथा दान पाते ही वामनका अपने विराट्रूपको प्रकट करना

विष्णुरुवाच
अहो यज्ञोऽसुरेशस्य बहुभक्षः सुसंस्कृतः।
पितामहस्येव पुरा यजतः परमेष्ठिनः ॥ १॥
भगवान् विष्णु बोले—अहो ! असुरेश्वर बलिको यह यज्ञ अद्भुत है। इसमें भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंकी बहुलता है तथा यह यज्ञ सुन्दर संस्कारसे सम्पन्न है। पूर्वकालमें यज्ञपरायण परमेष्ठी ब्रह्माने जैसा यज्ञ किया था, वैसा ही यह भी है ॥१॥

सुरेशस्य च शक्रस्य यमस्य वरुणस्य च।
विशेषितस्त्वया यज्ञो दानवेन्द्र महाबल ॥ २ ॥
महाबली दानवराज ! पूर्वकालमें देवराज इन्द्र, यम और

९६६ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

वरुणका जो यज्ञ हुआ था, तुमने उससे भी बढ़कर यह यज्ञ किया है ॥ २ ॥
यजता वाजिमेधेन क्रतूनां प्रवरेण तु ।
सर्वपापविनाशाय त्वया स्वर्गप्रदर्शिना ॥ ३ ॥
स्वर्गलोकका दर्शन करानेवाला ऋतुश्रेष्ठ अश्वमेध यज्ञ समस्त पापोंके विनाशमें कारण है। तुमने इसके द्वारा यजन करके अपने इस यशका महत्त्व बढ़ा दिया है ॥ ३ ॥
सर्वकाममयो ह्येष सम्मतो ब्रह्मवादिनाम् ।
ऋतूनां प्रवरः श्रीमानश्वमेध इति श्रुतिः ॥ ४ ॥
ऋतुश्रेष्ठ श्रीमान् अश्वमेध सर्वकाममय है, यह ब्रह्मवादियोंको भी मान्य है, ऐसा श्रुतिका कथन है ॥ ४ ॥
सुवर्णशृङ्गो हि महानुभावो
लोहक्षुरो वायुजवो महात्मा ।
स्वर्गेक्षणः काञ्चनगर्भगौरः
स विश्वयोनिः परमो हि मेध्यः ॥ ५ ॥
विश्वका कारणभूत वह उत्तम यज्ञ परम पवित्र है, उस अश्वरूपधारी यज्ञका शृङ्ग (मस्तक) सुवर्णमय है, उसका प्रभाव महान् है, खुर लोहेके समान कठोर हैं, वेग वायुके समान तीव्र है, शरीर विशाल है, वह स्वर्गलोककी ओर दृष्टि रखनेवाला है और उसकी कान्ति सुवर्णमिश्रित गौरवर्णकी है ॥ ५ ॥
आस्थाय वै वाजिनमश्वमेध-
मिष्ट्वा नरा दुष्कृतमुत्तरन्ति ।
आहुश्च यं वेदविदो द्विजेन्द्रा
वैश्वानरं वाजिनमश्वमेधम् ॥ ६ ॥
उस अश्वमेधरूपी अश्वका आश्रय लेकर यज्ञ करनेके पश्चात् मनुष्य पापसे पार हो जाते हैं। वेदवेत्ता विप्रवर अश्वमेधयज्ञसम्बन्धी अश्वको वैश्वानर (अग्निरूप) कहते हैं ॥
यथाऽऽश्रमाणां प्रवरो गृहाश्रमो
यथा नराणां प्रवरा द्विजातयः ।
यथासुराणां प्रवरो भवानिह
तथा क्रतूनां प्रवरोऽश्वमेधः ॥ ७ ॥
जैसे गृहस्थ-आश्रम सब आश्रमोंमें श्रेष्ठ है, जैसे ब्राह्मण सब मनुष्योंमें श्रेष्ठ हैं और जैसे आप यहाँ असुरोंमें श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार अश्वमेध सब यज्ञोंमें श्रेष्ठ है ॥ ७ ॥

वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं वामनेन समीरितम् ।
मुदा परमया युक्तः प्राह दैत्यपतिर्बलिः ॥ ८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वामनके कहे हुए इस वचनको सुनकर दैत्यराज बलि बड़े प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले ॥ ८ ॥

बलिरुवाच
कस्यासि ब्राह्मणश्रेष्ठ किमिच्छसि ददामि ते ।
वरं वरय भद्रं ते यथेष्टं काममाप्नुहि ॥ ९ ॥
बलिने कहा—विप्रवर ! आप किसके पुत्र हैं और क्या चाहते हैं ? मैं आपको मुँहमाँगी वस्तु देता हूँ। आपका भला हो, कोई वर माँगिये और अपना अभीष्ट मनोरथ प्राप्त कीजिये ॥ ९ ॥

वामन उवाच
न राज्यं न च यानानि न रत्नानि न च स्त्रियः ।
कामये यदि तुष्टोऽसि धर्मे च यदि ते मतिः ॥ १० ॥
गुर्वर्थे मे प्रयच्छस्व पदानि त्रीणि दानव ।
त्वमग्निशरणार्थाय एष मे प्रवरो वरः ॥ ११ ॥
वामन बोले—दनुनन्दन ! मैं न तो राज्य चाहता हूँ, न वाहन। न रत्नकी इच्छा रखता हूँ, न स्त्रियोंकी। यदि आप प्रसन्न हैं और यदि आपका मन धर्ममें लगता है तो मुझे गुरुके लिये अग्निशाला बनवानेके निमित्त तीन पग भूमि दे दीजिये, यही मेरे लिये सर्वोत्तम वर है ॥ १०-११ ॥
वामनस्य वचः श्रुत्वा प्राह दैत्यपतिर्बलिः ।
वामनजीकी यह बात सुनकर दैत्यराज बलि बोले ॥ १११/२ ॥

बलिरुवाच
त्रिभिः किं तव विप्रेन्द्र पदैः प्रवदतां वर ।
शतं शतसहस्राणां पदानां मार्गतां भवान् ॥ १२ ॥
बलिने कहा—वक्ताओंमें श्रेष्ठ विप्रवर ! तीन पग भूमिसे आपका क्या होगा ? लाखों करोड़ों पग भूमि माँग लीजिये ॥ १२ ॥

शुक्र उवाच
मा ददस्व महाबाहो न त्वं वेत्सि महासुर ।
एष मायाप्रतिच्छन्नो भगवान् प्रवरो हरिः ॥ १३ ॥
यह देख शुक्राचार्यने कहा—महाबाहो ! महान् असुर ! तुम इन्हें कुछ न दो। तुम्हें पता नहीं कि ये कौन हैं ? ये देवशिरोमणि भगवान् विष्णु हैं, जो मायासे अपने स्वरूपको छिपाकर आये हैं ॥ १३ ॥
वामनं रूपमास्थाय शक्रप्रियहितेप्सया ।
त्वां वञ्चयितुमायातो बहुरूपधरो विभुः ॥ १४ ॥
अनेक रूप धारण करनेवाले भगवान् विष्णु इन्द्रका प्रिय और हित करनेकी इच्छासे वामनरूप धारण करके तुम्हें ठगनेके लिये यहाँ आये हैं ॥ १४ ॥
एवमुक्तः स शुक्लेन चिरं संचिन्त्य वै बलिः ।
प्रहर्षेण समायुक्तः 'किमतः पात्रमिष्यते ॥ १५ ॥
शुक्राचार्यके ऐसा कहनेपर बलिने चिरकालतक सोच-विचार करके बड़े हर्षके साथ कहा—'इनसे बढ़कर उत्तम पात्र और कौन हो सकता है ? ॥ १५ ॥
प्रगृह्य हस्ते सम्भ्रान्तो भृङ्गारं कनकोद्भवम् ।
ऐसा कहकर बलिने वेगपूर्वक हाथमें सोनेकी झारी उठा ली ॥ १५१/२ ॥

भविष्यपर्व ]एकसप्ततितमोऽध्यायः९६७

बलिरुवाच
विप्रेन्द्र प्राङ्मुखस्तिष्ठ स्थितोऽस्मि कमलेक्षण॥ १६ ॥
प्रतीच्छ देहि किं भूमिं किं मात्रा भोः पदत्रयम् ।
दत्तं च पातय जलं नैव मिथ्या भवेद् गुरुः ॥ १७ ॥
बलिने कहा—'विप्रवर ! पूर्वाभिमुख होकर खड़े हो जाइये !' (वामन बोले—) 'खड़ा हूँ !' (बलि बोले—) 'कमलनयन ! लीजिये !' (वामन बोले—) 'दीजिये !' (बलि बोले—) 'क्या दूँ ?' (वामन बोले—) 'भूमि !' (बलिबोले—) 'ब्रह्मन् ! उस भूमिकी मात्रा कितनी है ?' (वामन बोले—) 'तीन पग !' (बलि बोले—) 'दे दिया !' (वामन बोले—) 'संकल्पकर जल गिराइये, जिससे मेरे गुरुकी माँग व्यर्थ न हो जाय' ॥ १६-१७ ॥

शुक्र उवाच
भो न देयं कुतो दैत्य विज्ञातोऽयं मया ध्रुवम् ।
कोऽयं विष्णुरहो प्रीतिर्वञ्चितस्त्वं न वञ्चितः ॥ १८ ॥
शुक्र बोले--'अजी ! यह दान नहीं देना चाहिये।' (बलि० ) 'क्यों ?' (शुक्र० ) 'दैत्य ! मैंने निश्चय ही इन्हें पहचान लिया है।' (बलि० ) 'कौन हैं ये ?' (शुक्र० ) 'अहो ! यह विष्णु हैं।' (बलि० ) 'तब तो बड़ी प्रसन्नताकी बात है।' (शुक्र० ) 'फिर तो तुम ठगे गये।' (बलि० ) 'नहीं ! मैं ठगा नहीं गया' ॥ १८ ॥

बलिरुवाच
कथं सनाथोऽयं विष्णुर्यज्ञे स्वयमुपस्थितः ।
दास्यामि देवदेवाय यद् यदिच्छत्ययं विभुः ॥ १९ ॥
बलि बोले—अहो ! यह भगवान् विष्णु तो सर्वथा सनाथ (कृतकृत्य) हैं। फिर यह मेरे यज्ञमें याचनाके लिये स्वयं कैसे उपस्थित हो गये ? यदि आ ही गये तो यह भगवान् जो-जो चाहते हैं, वह सब मैं इन देवाधिदेवको समर्पित करूँगा ॥ १९ ॥
को वान्यः पात्रभूतोऽस्माद् विष्णोः परतरो भवेत् ।
एवमुक्त्वा बलिः शीघ्रं पातयामास वै जलम् ॥ २० ॥
'इन विष्णुसे बढ़कर दूसरा कौन श्रेष्ठतर पात्र हो सकता है'—ऐसा कहकर बलिने शीघ्र ही जल गिराया ॥ २० ॥

वामन उवाच
पदानि त्रीणि दैत्येन्द्र पर्याप्तानि ममानघ ।
यन्मया पूर्वमुक्तं हि तत् तथा न तदन्यथा ॥ २१ ॥
वामन बोले—निष्पाप दैत्यराज ! मेरे लिये तीन पग पर्याप्त हैं ! मैंने पहले जो कुछ कहा है, वह ठीक है। मिथ्या नहीं है ॥ २१ ॥

वैशम्पायन उवाच
इत्येतद् वचनं श्रुत्वा वामनस्य महौजसः ।
कृष्णाजिनोत्तरीयं स कृत्वा वैरोचनिस्तदा ॥ २२ ॥
एवमस्त्विति दैत्येशो वाक्यमुक्त्वाऽरिसूदनः ।
ततो वारिसमापूर्णं भृङ्गारं स परामृशत् ॥ २३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! महातेजस्वी वामनका यह वचन सुनकर शत्रुसूदन विरोचनकुमार दैत्यराज बलिने उस समय काले मृगचर्मको उत्तरीय बनाकर कहा—'एवमस्तु' ऐसा कहकर उन्होंने जलसे भरे हुए गडूएको हाथमें लिया ॥ २२-२३ ॥
वामनो ह्यसुरेन्द्रस्य चिकीर्षुः कदनं महत् ।
क्षिप्रं प्रसारयामास दैत्यक्षयकरं करम् ॥ २४ ॥
भगवान् वामन असुरराज बलिकी यही भारी हानि करना चाहते थे; अतः उन्होंने अपने दैत्यविनाशक हाथको शीघ्र उनके आगे फैला दिया ॥ २४ ॥
प्राङ्मुखश्चापि दैत्येशस्तस्मै सुमनसा जलम् ।
दातुकामः करे यावत् तावत् तं प्रत्यपेधयत् ॥ २५ ॥
दैत्येश्वर बलि पूर्वाभिमुख होकर शुद्ध हृदयसे वामनजीके हाथमें ज्यों ही जल देनेको उद्यत हुए त्यों ही प्रह्लादने उन्हें रोका ॥ २५ ॥
तस्य तद् रूपमालोक्य ह्यचिन्त्यं च महात्मनः ।
अभूतपूर्वं च हरेर्जिहीर्षोः श्रियमासुरीम् ॥ २६ ॥
इङ्गितज्ञोऽग्रतः स्थित्वा प्रह्रादस्त्वब्रवीद् वचः ।
असुरोंकी सम्पत्तिको हर लेनेकी इच्छावाले उन परमात्मा श्रीहरिके उस अभूतपूर्व एवं अचिन्त्य रूपको देखकर उनकी चेष्टाको समझनेवाले प्रह्लाद बलिके सामने खड़े हो गये और इस प्रकार बोले ॥ २६ १/२ ॥

प्रह्राद उवाच
मा ददस्व जलं हस्ते घटोर्वामनरूपिणः ॥ २७ ॥
स त्वसौ येन ते पूर्वं निहतः प्रपितामहः ।
विष्णुरेष महाप्राज्ञस्त्वां वञ्चयितुमागतः ॥ २८ ॥
प्रह्लादने कहा—दैत्यराज ! तुम इन वामनरूपधारी ब्रह्मचारीके हाथमें जल न दो। ये वे ही हैं, जिन्होंने पूर्वकालमें तुम्हारे प्रपितामहको मार डाला था। ये महाबुद्धिमान् विष्णु ही तुम्हें ठगनेके लिये आये हैं ॥ २७-२८ ॥

बलिरुवाच
हन्त तस्मै प्रदास्यामि देवायैमं प्रतिग्रहम् ।
अनुग्रहकरं देवमीदृशं जगतः प्रभुम् ॥ २९ ॥
ब्रह्मणोऽपि गरीयांसं पात्रं लप्स्यामहे वयम् ।
अवश्यं चासुरश्रेष्ठ दातव्यं दीक्षितेन वै ॥ ३० ॥
बलिने कहा—असुरश्रेष्ठ ! यदि ऐसी बात है तब तो बड़े हर्षका विषय है। मैं उन नारायणदेवको यह प्रतिग्रह अवश्य दूँगा। जो ब्रह्माजीसे भी अधिक गौरवशाली और अनुग्रह करनेवाले हैं, ऐसे जगदीश्वरदेवको हमलोग दानपात्रके रूपमें प्राप्त करेंगे ( इससे बढ़कर सौभाग्यकी बात और क्या हो सकती है)। अतः यज्ञमें दीक्षित हुए मुझ