भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 974

९५० श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


वे प्रभावशाली देवराज सूर्यदेवकी किरणोंके समान कान्तिमान् किरीट धारण किये हुए थे। उनका वर्ण वैदूर्य-मणिके समान था। उनके बाजू-बंदोंमें नाना प्रकारके रत्न जड़े गये थे। उनकी रोमावलि मोरोंके समान और आँखें लाल थीं। वे सौ बाहों तथा सहस्र नेत्रोंसे सुशोभित थे॥८-९॥

हरिरेको हरिश्मश्रुर्नानाकेतुर्महाबलः ।
वज्रप्रहरणः श्रीमान् योगी शतशिरोधरः ॥ १० ॥

वे इन्द्र अद्वितीय वीर थे। उनकी मूँछें हरे रंगकी थीं। उनके रथपर नाना प्रकारकी ध्वजा-पताकाएँ फहरा रही थीं। वे महान् बलशाली थे। वज्र ही उनका आयुध था। वे सौ सिर धारण करनेवाले तेजस्वी योगी थे ॥ १० ॥

सधनुर्बद्धसन्नाहः शतादित्यसमप्रभः ।
देवगन्धर्वयक्षौघैरनुयातः सहस्रशः ॥११॥

कवच बाँधकर हाथमें धनुष लिये देवराज इन्द्र सौ सूर्योंके समान दिव्य प्रभासे प्रकाशित हो रहे थे। सहस्रों देवता, गन्धर्व और यक्षोंके समुदाय उनके पीछे-पीछे चलते थे ॥ ११ ॥

सामगैश्च जयैश्चापि स्तूयमानो महर्षिभिः।
शतपर्व महारौद्रं स्फोटनं सर्वतोमुखम् ॥ १२ ॥
प्रगृह्य रुचिरं वज्रं दीप्तं रौद्राट्टहासनम् ।
दैत्यानयोधयत् सर्वान् महेन्द्रः पाकशासनः ॥ १३ ॥
अधृष्यः सर्वभूतानामादित्यः दयितः सुतः।

सामगान करनेवाले महर्षि जय-जयकार करते हुए उनकी स्तुति करते थे। वे पाकशासन महेन्द्र तोड़-फोड़ करनेवाले, महाभयंकर, सब ओर मुखवाले तथा रौद्र अट्टहास (गड़गड़ाहट) करनेवाले, सौ पर्वोंसे युक्त, दीप्तिमान् एवं मनोहर वज्र हाथमें लेकर समस्त दैत्योंके साथ युद्ध करने लगे। अदितिके प्रिय पुत्र वे देवराज इन्द्र समस्त प्राणियोंके लिये अजेय थे ॥ १२-१३॥

ततः प्रवृत्तः संग्रामो बलिवासवयोस्र्तदा ॥ १४ ॥
उभाभ्यां देवदैत्याभ्यामचिरान्महदद्भुतः ।
अतिवीर्यबलोदग्रस्तुमुलो लोमहर्षणः ॥ १५॥

तदनन्तर शीघ्र ही राजा बलि और इन्द्रमें महान् अद्भुत संग्राम होने लगा। उनमेंसे एक देवता था और दूसरा दैत्य। उन दोनोंका वह संग्राम अत्यन्त बल-पराक्रमसे बढ़ा-चढ़ा, भयंकर और रोमाञ्चकारी था ॥ १४-१५ ॥

प्रह्लादेन स्तुतिशतैः कर्मभिर्जयसम्मतैः ।
प्रबोधितो दैत्यपतिरग्निरिद्ध इवाबभौ ॥ १६ ॥

प्रह्लादने सैकड़ों स्तुतियों और विजयके लिये अनुमोदित कर्मोंका वर्णन करके दैत्यराज बलिके शौर्य और उत्साहको जगाया, जिससे वे प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित होने लगे ॥ १६ ॥

सुरासुरेन्द्रयोर्दृष्ट्वा संग्रामं लोमहर्षणम् ।
देवानां दानवानां च भूयो युद्धमभूत् तदा ॥ १७ ॥

देवेन्द्र और असुरेन्द्रके उस रोमाञ्चकारी संग्रामको देखकर उस समय दूसरे-दूसरे देवताओं और दानवोंमें भी फिर युद्ध होने लगा ॥ १७ ॥

ततोऽविध्यन्महेन्द्रस्तं बलिमस्त्रैर्महाबलम् ।
तान्यस्त्राणि महाबाहुश्चिच्छेद शतधा रणे ॥ १८ ॥

महेन्द्रने महाबलवान् बलिको अपने अस्त्रोंद्वारा घायल कर दिया। तब महाबाहु बलिने रणभूमिमें इन्द्रके चलाये हुए उन सभी अस्त्रोंके सौ-सौ टुकड़े कर डाले ॥ १८ ॥

ततः क्रुद्धः पुनस्तत्र निजघ्ने दानवं महत् ।
आग्नेयमथ शत्रुघ्नं चिक्षेपेन्द्रो महाबलः ॥ १९ ॥

तब महाबली इन्द्रने कुपित होकर पुनः वहाँ महान् दानवदलका संहार आरम्भ किया। उन्होंने शत्रुनाशक आग्नेयास्त्रका प्रयोग किया ॥ १९ ॥

तद्दृष्ट्वा खे समागच्छत् प्रलयानलसंनिभम् ।
पातयामास तच्चैन्द्रं वारुणास्त्रेण दानवः ॥ २० ॥

प्रलयाग्निके समान तेजस्वी उस आग्नेयास्त्रको आकाशमें आता देख दानव बलिने वारुणास्त्रके द्वारा इन्द्रके छोड़े हुए उस अस्त्रको काट गिराया ॥ २० ॥

संक्रुद्धो मघवा वज्रमगृह्णात् पर्वतोपमम् ।
हन्तुकामो रणश्लाघी बलिं दैत्याधिपं रणे ॥ २१ ॥

तब क्रोधमें भरे हुए रणश्लाघी इन्द्रने रणभूमिमें दैत्यराज बलिका वध करनेके लिये पर्वताकार वज्र हाथमें लिया ॥ २१ ॥

ततः शुश्राव देवेन्द्रः कौशिको हरिवाहनः ।
अशरीरां शुभां वाणीं तस्मिन् महति वैशसे ॥ २२ ॥

इतनेहीमें हरे रंगके वाहनवाले कौशिक देवेन्द्रने उस महासंग्रामके भीतर यह शुभ आकाशवाणी सुनी ॥ २२ ॥

निवर्तस्व महाबाहो सुराणां नन्दिवर्धन ।
पुरंदर सुरश्रेष्ठ न जेष्यसि रणे बलिम् ॥ २३ ॥

'महाबाहो ! युद्धसे निवृत्त हो जाओ ! देवताओंका आनन्द बढ़ानेवाले सुरश्रेष्ठ पुरन्दर ! तुम बलिको रणभूमिमें नहीं जीत सकोगे ॥ २३ ॥

तपसात्युत्तमो दैत्यो वरदानेन चाधिकः ।
स्वयंभूपरितोषाच्च सत्यधर्माच्च वासव ॥ २४ ॥

'वासव ! दितिनन्दन बलि तपस्यासे तो अत्यन्त उत्तम है ही, वरदानके द्वारा भी तुमसे अधिक शक्तिशाली हो गया है; ब्रह्माजीके संतोषसे तथा सत्यधर्मके पालनसे भी इसकी शक्ति बढ़ गयी है ॥ २४ ॥