भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 978
भविष्यपर्व ]षट्षष्टितमोऽध्यायः९५३

षट्षष्टितमोऽध्यायः

अदिति और कश्यपजीके साथ देवताओंका ब्रह्मलोकमें जाना

जनमेजय उवाच
पराजिताः सुरा दैत्यैः किमकुर्वत वै मुने।
कथं च त्रिदिवं लब्धं भूयो देवैर्द्विजोत्तम ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा— मुने! द्विजश्रेष्ठ! दैत्योंसे पराजित होकर देवताओंने क्या किया? फिर उन्हें स्वर्गका राज्य कैसे प्राप्त हुआ? ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा वाणीं तु तां दिव्यां सह देवैः सुराधिपः।
प्राग्दिशं प्रस्थितः श्रीमानदित्यालयमुत्तमम् ॥ २ ॥

वैशम्पायनजीने कहा— जनमेजय! देवताओंसहित श्रीमान् देवराज इन्द्र उस दिव्य आकाशवाणीको सुनकर पूर्व दिशामें देवी अदितिके उत्तम भवनकी ओर चल दिये ॥ २ ॥

प्राप्यादित्यालयं शक्रः कथयामास तां गिरम्।
अदित्यां सा यथा युद्धे तेन वाणी पुरा श्रुता ॥ ३ ॥

अदितिके भवनमें पहुँचकर इन्द्रने युद्धस्थलमें पहले जो आकाशवाणी सुनी थी, उसे वहाँ माता अदितिके समीप कह सुनाया ॥ ३ ॥

अदितिरुवाच
यद्येवं पुत्र युष्माभिर्न शक्यो हन्तुमाहवे।
बलिर्वैरोचनसुतः सर्वैश्चैव मरुद्गणैः ॥ ४ ॥
सहस्रशिरसा हन्तुं केवलं शक्यतेऽसुरः।
तेनैकेन सहस्राक्ष न ह्यन्येन शतक्रतो ॥ ५ ॥
तद् वः पृच्छध्व पितरं कश्यपं सत्यवादिनम्।
पराजयार्थं दैत्यस्य वलेस्तस्य महात्मनः ॥ ६ ॥

अदिति बोलीं— बेटा! सहस्रलोचन! शतक्रतो! यदि ऐसी बात है, यदि तुमलोग और समस्त मरुद्गण भी रण-क्षेत्रमें विरोचनकुमार बलिको वध नहीं कर सकते, यदि वह असुर केवल उन एकमात्र सहस्र मस्तकवाले भगवान्‌के हाथसे ही मारा जा सकता है, दूसरे किसीके हाथसे नहीं तो तुम अपने सत्यवादी पिता कश्यपजीसे पूछो कि दिति-नन्दन महात्मा बलिकी पराजयके लिये क्या उपाय हो सकता है? ॥ ४-६ ॥

ततोऽदित्या सह सुराः सम्प्राप्ताः कश्यपान्तिकम्।
अपश्यन् कश्यपं तत्र मुनिं दिव्यतपोनिधिम् ॥ ७ ॥

तब सब देवता माता अदितिके साथ अपने पिता कश्यपजीके समीप गये। वहाँ उन्होंने दिव्य तपोनिधि मुनिवर कश्यपजीका दर्शन किया ॥ ७ ॥

आद्यं देवं गुरुं दिव्यं क्लिन्नं त्रिपवणार्वुभिः।
तेजसा भास्कराकारं गौरमग्निशिखाप्रभम् ॥ ८ ॥

वे आदिदेवता और दिव्य गुरु हैं। तीनों समय स्नान करनेके कारण उनका शरीर जलसे भीगा रहता है। वे सूर्यके समान तेजस्वी हैं। उनका गौरवर्ण अग्निशिखाके समान प्रकाशित होता है ॥ ८ ॥

न्यस्तदण्डं तपोयुक्तं बद्धकृष्णाजिनोत्तरम्।
वल्कलाजिनसंवीतं प्रदीप्तं ब्रह्मवर्चसा ॥ ९ ॥

उन्होंने दण्डका परित्याग कर दिया है। वे तपस्यामें संलग्न रहते हैं। उनके ऊपरके अङ्गोंमें उत्तरीयके रूपमें काला मृगचर्म बँधा होता है। वे वल्कल और मृगचर्मसे ही अपने शरीरको ढकते हैं। ब्रह्मतेजसे सदा ही उदीप्त रहते हैं ॥ ९ ॥

हुताशमिव दीप्तन्तमाज्यमन्त्रपुरस्कृतम्।
स्वाध्यायिनरतं शान्तं वपुष्मन्तमिवानलम् ॥ १० ॥

मन्त्रोच्चारणपूर्वक घीकी आहुति देनेसे प्रज्वलित हुए अग्निदेवके समान वे सदा देदीप्यमान होते रहते हैं। सदा स्वाध्यायमें तत्पर रहनेवाले और शान्त हैं, शरीरधारी अग्निके समान जान पड़ते हैं ॥ १० ॥

तं ब्रह्मवादिनां श्रेष्ठं सुरासुरगुरुं प्रभुम्।
प्रतपन्तमिवादित्यं मारीचं दीप्ततेजसम् ॥ ११ ॥

वे ब्रह्मवादियोंमें श्रेष्ठ, देवताओं और असुरोंके पिता तथा प्रभावशाली हैं। तपते हुए सूर्यके समान उनका तेज सदा ही उदीप्त रहता है। उन मरीचिनन्दन कश्यपको देवताओने देखा ॥ ११ ॥

यः स्रष्टा सर्वभूतानां प्रजानां पतिरुत्तमः।
आत्मभावविशेषेण तृतीयो यः प्रजापतिः ॥ १२ ॥

जो समस्त प्राणियोंके स्रष्टा उत्तम प्रजापति ब्रह्मा हैं, उनके आत्मभावकी विशेषरूपसे अभिव्यक्ति होनेके कारण कश्यपजी (ब्रह्मा और मरीचिकी अपेक्षा) तीसरे प्रजापति हैं ॥ १२ ॥

ततः प्रणम्य ते वीराः सहादित्या सुरर्षभाः।
ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे ब्रह्माणमिव मानसाः ॥ १३ ॥

अदितिसहित उन सभी वीर एवं श्रेष्ठ देवताओंने कश्यपजीको प्रणाम करके उनसे हाथ जोड़कर उसी प्रकार कहना आरम्भ किया, जैसे ब्रह्माजीके मानसपुत्र उनसे अपनी बात निवेदन करते हैं ॥ १३ ॥

यच्छ्रुतं युधि शक्रेण सरस्वत्या समीरितम्।
अजेयस्त्रिदशैः सर्वैर्वरदानवसत्तमः ॥ १४ ॥

युद्धस्थलमें इन्द्रने आकाशवाणीद्वारा कही गयी जो यह बात सुनी थी कि दानवशिरोमणि बलि समस्त देवताओंके लिये अजेय हैं, उसे कह सुनाया ॥ १४ ॥

श्रुत्वा तु वचनं तेषां पुत्राणां कश्यपस्तदा।
चकार गमने बुद्धिं ब्रह्मलोकाय लोककृत् ॥ १५ ॥