भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 979, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 979

९५४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे

उस समय अपने उन पुत्रोंकी यह बात सुनकर लोकस्रष्टा कश्यपजीने ब्रह्मलोकमें जानेका विचार किया ॥ १५ ॥

कश्यप उवाच

गच्छाम ब्रह्मसदनं ब्रह्मघोषनिनादितम्।
यथाश्रुतं च तत्रैव ब्रह्मणो वदतानघाः॥ १६॥

कश्यपजी बोले—निष्पाप देवताओ ! हमलोग वेद-मन्त्रोंके घोषसे प्रतिध्वनित होनेवाले ब्रह्मलोकको चलें । वहीं वह बात, जैसे तुमने सुनी हैं वैसी ही ब्रह्माजीके समक्ष कहो ॥

वैशम्पायन उवाच

ततोऽदित्या सह सुरा यान्तं कश्यपमन्वयुः।
प्रस्थितं ब्रह्मसदनं देवर्षिगणसेवितम् ॥ १७॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तब अदिति-सहित समस्त देवता देवर्षियोंद्वारा सेवित ब्रह्मलोककी ओर प्रस्थित हुए कश्यपजीके साथ-साथ गये ॥ १७ ॥

ते मुहूर्तेन सम्प्राप्ता ब्रह्मलोकं दिवौकसः।
दिव्यैः कामगमैर्यानैर्महार्हैः सुमनोहरैः ॥ १८ ॥

वे सब देवता इच्छानुसार चलनेवाले परम मनोहर बहुमूल्य दिव्य विमानोंद्वारा दो ही घड़ीमें ब्रह्मलोकमें जा पहुँचे ॥ १८ ॥

दिदृक्षवस्ते ब्रह्माणं तपसो राशिवमव्ययम्।
अभ्यगच्छन्त विस्तीर्णां ब्रह्मणः परमां सभाम्॥ १९ ॥

वे तपस्याकी अक्षय राशि ब्रह्माजीको देखनेके लिये उनकी अत्यन्त विस्तृत उत्तम सभामें गये ॥ १९ ॥

षट्पदोद्गीतनिनादां सामगीतविमिश्रिताम्।
श्रेयस्करीममित्रघ्नीं दृष्ट्वा संजहृषुर्मुदा ॥ २०॥

वहाँ भ्रमरोंका गुञ्जारव गूँज रहा था। उसमें सामगान-की ध्वनि भी मिश्रित थी । वह सभा सबके लिये कल्याण-कारिणी और शत्रुओंका नाश करनेवाली थी । उसे देखकर उन सब लोगोंको बड़ा हर्ष हुआ ॥ २० ॥

ब्राह्मणैश्च महाभागैर्वेदवेदाङ्गपारगैः।
ऋचो बह्वृचमुख्यैश्च शिक्षाविद्भिरस्तथा द्विजैः॥ २१॥

वेद-वेदाङ्गोंके पारंगत विद्वान् महाभाग ब्राह्मण, ऋग्वेद-वेत्ताओंमें श्रेष्ठ तथा शिक्षाके ज्ञाता द्विज ऋचाओंका पाठ करते थे ॥ २१ ॥

शब्दनिर्वचनार्थं च प्रेर्यमाणपदाक्षराः।
शुश्रुवुस्तेऽमरव्याघ्रा विततेषु च कर्मसु ॥ २२ ॥

उन अमरश्रेष्ठ देवताओंने आयोजित हुए यज्ञकर्मोंमें शब्दकी व्युत्पत्तिके लिये ब्राह्मणोंद्वारा जिनके एक-एक पद और अक्षरोंका उच्चारण हो रहा था, उन ऋचाओंको सुना ॥

यज्ञवेदाङ्गविदुषां पदक्रमविदां तथा।
घोषेण परमर्षीणां सा बभूव निनादिता ॥ २३ ॥

यज्ञ, वेद और वेदाङ्गोंके विद्वान् तथा पदपाठ और क्रमपाठके ज्ञाता महर्षियोंके वैदिक घोषसे वह ब्रह्माजीकी सभा प्रतिध्वनित हो रही थी ॥ २३ ॥

यज्ञसंस्तवविद्भिश्च शिक्षाविद्भिरस्तथा द्विजैः।
शब्दनिर्वचनार्थज्ञैः सर्वविद्याविशारदैः॥ २४॥
मीमांसाहितवाक्यज्ञैः सर्ववादविशारदैः।
हृष्टपुष्टस्वरैस्तत्र द्विजेन्द्रैर्लघुवादिभिः।
नादितं ब्रह्मसदनं प्रवरं देवसद्मवत् ॥ २५॥

जो यज्ञोंमें की जानेवाली स्तुतियोंके ज्ञाता, शिक्षाके विद्वान्, शब्दकी व्युत्पत्ति और अर्थके जानकार, सम्पूर्ण विद्याओंमें प्रवीण, मीमांसाके अनुकूल वेदवाक्योंके तात्पर्यको जाननेवाले, सर्ववादविशारद, हृष्ट-पुष्ट स्वरसे युक्त तथा मधुरभाषी थे, उन्हीं द्विजेन्द्रोंद्वारा किये गये वेदघोषसे प्रति-ध्वनित वह श्रेष्ठ ब्रह्मसदन देवसभाके समान सुशोभित होता था ॥ २४-२५ ॥

ते तत्र समुदुप्राप्य शृण्वन्तो वै ध्वनिं सुराः।
पूतान्यात्मशरीराणि मेनिरे तु न संशयः॥ २६ ॥

वहाँ पहुँचकर उस ध्वनिको सुनते हुए वे देवता निःसंदेह अपने शरीरोंको पवित्र मानने लगे ॥ २६ ॥

तूष्णींभूता एकचित्ता ब्रह्मण्योगतमानसाः।
विस्मयोत्फुल्लनयना निरीक्षन्तः परस्परम् ॥ २७॥
नमस्कुर्वन्ति च पुनर्गरुहं लोकगुरुं प्रभुम्।
मनसैव सुरश्रेष्ठाः पुरस्कृत्य तु कश्यपम् ॥ २८ ॥

वे श्रेष्ठ देवता मौन और एकचित्त हो ब्रह्माजीमें मन लगाये आश्चर्यचकित नेत्रोंसे एक-दूसरेको देखते हुए कश्यपजी-को आगे करके मन-ही-मन लोकगुरु भगवान् ब्रह्माको बारं-बार प्रणाम करने लगे ॥ २७-२८ ॥

पुनः सम्पूज्य परमं वेदोच्चारणनिःस्वनम्।
गम्भीरोदारमधुरं सुस्वरं हंसगद्गदम् ॥ २९॥
ऐक्यनानात्वसंयोगसमवायविशारदैः ।
लोकायतिकमुख्यैश्च शुश्रुवुः स्वनमीरितम् ॥ ३० ॥

गम्भीर, उदार, मधुर, उत्तम स्वरसे युक्त और हंसके समान गद्गद वाणीमें उच्चारित वेदपाठकी उस उत्तम ध्वनि-की बार-बार प्रशंसा करके एकत्ववाद ( जीव और ईश्वरकी एकताका प्रतिपादन ), नानात्ववाद ( जीव, ईश्वर और प्रकृति—इन तीन अनादि तत्त्वोंका प्रतिपादन ), संयोगवाद ( प्रकृति-पुरुषके संयोगसे सृष्टिका प्रतिपादन ) तथा समवाय-वादमें प्रवीण पुरुषों एवं लोकायतिकशास्त्रके ज्ञाता मुख्य-मुख्य विद्वानोंद्वारा उच्चारित शब्दको भी उन देवताओं-ने सुना ॥ २९-३० ॥

तत्र तत्र च विप्रेन्द्रान् नियतान् संशितव्रतान्।
जपहोमपरान् मुख्यान् ददृशुः कश्यपात्मजाः॥ ३१ ॥

कश्यपके उन पुत्रोंने वहाँ भिन्न-भिन्न स्थानोंमें बहुत-से