भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 977

९५२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे

चतुष्पादे स्थिते धर्मे अधर्मे पादविग्रहे।
प्रजापालनयुक्तेषु भ्राजमानेषु राजसु ॥ ६ ॥
स्वधर्मसम्प्रयुक्तेषु सर्वाश्रमनिवासिषु ।
अभिषिक्तोऽसुरैः सर्वैर्दैत्यराजो बलिस्तदा ॥ ७ ॥

प्रह्लाद, शम्बरासुर, मयासुर और अनुह्लादके द्वारा सम्पूर्ण दिशाएँ सुरक्षित हो गयीं। आकाशका दैत्योंद्वारा पालन होने लगा। दैत्यलोग स्वर्गकी प्राप्तिके लिये यज्ञशोभाका दर्शन कराने लगे। उस समय सारा जनसमुदाय प्रकृतिस्थ होकर सन्मार्गपर चलने लगा। सब प्रकारके पापोंका अभाव हो गया। पुण्यकर्मकी व्यापक सत्ता दिखायी देने लगी। सिद्ध पुरुषोंकी तपस्यामें स्थिति हुई। सर्वत्र आश्रमोंकी रक्षा होने लगी। धर्म अपने चारों चरणोंसे युक्त होकर रहने लगा। अधर्मका चतुर्थांशमात्र ही शेष रह गया। तेजस्वी राजा प्रजापालनमें तत्पर रहने लगे और सभी आश्रमोंके निवासी अपने-अपने धर्ममें स्थित हो गये। ऐसे समयमें समस्त असुरोंने दैत्यराज बलिको इन्द्रके पदपर अभिषेक किया ॥ ३-७ ॥

हृष्टेष्वसुरसंघेषु नदत्सु मुदितेषु च ।
अथाभ्युपगता लक्ष्मीर्बलिं पद्मासने स्थिता ॥ ८ ॥
पद्मोद्यतकरा देवी वरदा सुरमोहिनी ।

उस समय असुरोंके समुदाय हर्षमें भर गये और आनन्दमग्न होकर जोर-जोरसे गर्जना करने लगे। इसी समय कमलके आसनपर विराजमान राजलक्ष्मी राजा बलिके पास आयीं। देवताओंको मोहनेवाली उन वरदायिनी देवीने अपने हाथमें एक कमलका फूल ले रखा था ॥ ८ ॥

श्रीरुवाच
बले बलवतां श्रेष्ठ महाराज महाद्युते ॥ ९ ॥
प्रीतास्मि तव भद्रं ते देवतानां पराजये ।

लक्ष्मी बोली—बलवानोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी महाराज बलि ! तुम्हारा भला हो। तुमने जो देवताओंको पराजित किया है, इससे मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हुई हूँ ॥ ९ ॥

यस्त्वया युधि विक्रम्य देवराजः पराजितः ॥ १० ॥
दृष्ट्वा ते परमं सत्त्वं ततोऽहं स्वयमागता ।

तुमने युद्धमें पराक्रम करके जो देवराज इन्द्रपर विजय पायी है, तुम्हारे उस उत्तम सत्त्व (धैर्य और बल) को देखकर मैं स्वयं तुम्हारे पास चली आयी हूँ ॥ १० ॥

नाश्चर्यं दानवश्रेष्ठ हिरण्यकशिपोः कुले ॥ ११ ॥
प्रसूतस्यासुरेन्द्रस्य तव कर्मेदमीदृशम्।

दानवशिरोमणे ! तुम असुरराज हिरण्यकशिपुके कुलमें उत्पन्न हुए हो; अतः तुम्हारा ऐसा पराक्रम करना आश्चर्यकी बात नहीं है ॥ ११ ॥

विशेषितस्त्वया राजन् दैत्येन्द्रः प्रपितामहः ॥ १२ ॥
येन भुक्तं हि निखिलं त्रैलोक्यमिदमव्ययम् ।

राजन् ! तुमने अपने प्रपितामह उस दैत्यराज हिरण्यकशिपुका महत्त्व बढ़ा दिया, जिसने प्रवाहरूपसे सदा बने रहनेवाले इस समस्त त्रिभुवनके राज्यका उपभोग किया है ॥ १२ ॥

विशेषतस्तव विभो सर्वे धर्मपथे स्थिताः ॥ १३ ॥
तेन त्रैलोक्यमुदयेन भोक्ष्यस्यमितविक्रम ।

प्रभो ! सबसे विशेष बात यह है कि तुम्हारे राज्यमें सब लोग धर्मके मार्गपर स्थित हैं। अमितपराक्रमी दैत्यराज ! उस त्रिलोकीकी श्रेष्ठ वस्तु धर्मके साथ रहकर तुम राज्यका उपभोग करोगे ॥ १३ ॥

एवमुक्त्वा हि सा देवी लक्ष्मीर्दैत्यपतिं बलिम् ॥ १४ ॥
प्रविष्टा वरदा सौम्या सर्वभूतमनोरमा ।

ऐसा कहकर सम्पूर्ण प्राणियोंके मनको प्रिय लगनेवाली सौम्यररूपा वरदायिनी लक्ष्मीदेवी दैत्यराज बलिके भीतर प्रविष्ट हो गयीं ॥ १४ ॥

शिष्टाश्च देव्यः प्रवरा ह्रीः कीर्तिर्द्युतिरेव च ॥ १५ ॥
प्रभा धृतिः क्षमा भूतिर्नीतिर्विद्या दया स्मृतिः ।
कृतिर्लज्जा तथा मेधा लक्ष्मीरीहा गतिस्तथा ॥ १६ ॥
श्रुतिः प्रीतिर्गिला कीर्तिः शान्तिः पुष्टिः क्रियास्तथा ।
सर्वाश्चाप्सरसो दिव्या नृत्यगीतविशारदाः ॥ १७ ॥
पतिं प्राप्ताः सुदैतेयं त्रैलोक्ये सचराचरे ।
प्राप्तमैश्वर्यममितं बलिना ब्रह्मवादिना ॥ १८ ॥

शेष जो श्रेष्ठ देवियाँ थीं, उन कीर्ति, द्युति, प्रभा, धृति, क्षमा, भूति, नीति, विद्या, दया, स्मृति, कृति, लज्जा, मेधा, लक्ष्मी, ईहा, गति, श्रुति, प्रीति, इला (श्रौतक्रिया), कीर्ति, शान्ति, पुष्टि तथा क्रिया आदिने एवं नृत्यगीतविशारद सम्पूर्ण दिव्य अप्सराओंने उत्तम दैत्यकुमार राजा बलिको पति (पालक) रूपमें प्राप्त किया। ब्रह्मवादी बलिने चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकीमें असीम ऐश्वर्य प्राप्त कर लिया ॥ १५—१८ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतार-विषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६५ ॥