विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 976, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ९५१
नैष शक्यस्त्वया जेतुं त्रिदशैर्वा सुरेश्वर ।
यो हास्य जेता भृगुवांस्तं शृणुष्व समाहितः ॥ २५ ॥
'सुरेश्वर ! तुम अथवा दूसरे देवता भी इसे नहीं जीत सकते। जो भगवान् इसपर विजय पानेवाले हैं, उन्हें बताता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ २५ ॥
ब्रह्मणः स हि सर्वस्वं देवानां चैव सा गतिः ।
परं रहस्यं धर्मस्य परस्य च परा गतिः ॥ २६ ॥
'वे ब्रह्माजीके सर्वस्व हैं, देवताओंकी भी गति हैं, धर्मके परम रहस्य हैं तथा उत्कृष्ट पुरुषकी भी परम गति हैं ॥ २६ ॥
परात्परतरः श्रीमान् परावरगतिः प्रभुः ।
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ २७ ॥
'वे भगवान् परसे भी परतर (उत्तमसे भी परमोत्तम) हैं, लक्ष्मीसे सम्पन्न हैं तथा वे ही कारण और कार्य अथवा भूत और भविष्यकी भी गति हैं। वे सबके अन्तर्यामी आत्मा हैं। उनके सहस्रों सिर, सहस्रों नेत्र और सहस्रों पैर हैं ॥ २७ ॥
शङ्खचक्रगदापाणिः पीतवासाः सुरारिहा ।
जेताजेयो जयः श्रीमान् सोऽस्य जेता भविष्यति ॥ २८ ॥
'उनके हाथमे शङ्ख, चक्र और गदा आदि आयुध शोभा पाते हैं। वे पीताम्बरधारी तथा देवद्रोहियोंका दलन करनेवाले हैं। वे श्रीमान् भगवान् सबपर विजय पाते हैं, किंतु उन्हें कोई नहीं जीत सकता। वे विजयस्वरूप हैं। वे ही इस बलिपर विजय प्राप्त करेंगे' ॥ २८ ॥
श्रुत्वा दिव्यां तु मधुरां वाणीं तामशरीरिणीम् ।
अपयातो रणाच्छक्रः सार्धं सर्वैः सुरोत्तमैः ॥ २९ ॥
वह दिव्य मधुर आकाशवाणी सुनकर समस्त श्रेष्ठ देवताओंके साथ इन्द्र रणभूमिसे हट गये ॥ २९ ॥
अपयाते तु देवेन्द्रे कौशिके हरिवाहने ।
सिंहनादो महानासीद् दानवानां महामृधे ॥ ३० ॥
हरिवाहन देवराज इन्द्रके पलायन कर जानेपर उस महासमरमे दानवोंका महान् सिंहनाद होने लगा ॥ ३० ॥
ततः किलकिलाशब्दः क्ष्वेडितास्फोटितस्वनः ।
शङ्खानां निनदश्चात्र योधानां वल्गितस्वनः ॥ ३१ ॥
तदनन्तर किलकारियोंकी आवाज आने लगी, गर्जने और ताल ठोंकनेका शब्द सुनायी देने लगा, शङ्खोंकी ध्वनि होने लगी और योद्धाओंके उछलने-कूदनेकी आवाज भी वहाँ सब ओर होने लगी ॥ ३१ ॥
वादित्राणां च निर्घोषस्तुमुलश्चाभवत्तदा ।
जयशब्दरवाश्चैव देवानां तु पराजये ॥ ३२ ॥
उस समय देवताओंकी पराजय होनेपर दैत्योंके दलमें नाना प्रकारके वाद्योंका तुमुल घोष होने लगा और जयजय कारके शब्द सुनायी देने लगे ॥ ३२ ॥
ससैन्यो दैत्यराजस्तु स्तूयमानः सुहृद्गणैः ।
बलीन्द्रो विबभौ दैत्यो हिरण्यकशिपुर्यथा ॥ ३३ ॥
सुहृदोंके समुदाय सेनासहित दैत्यराज बलिकी स्तुति करने लगे। उस समय इन्द्रपदपर प्रतिष्ठित हुए राज बलि दैत्यप्रवर हिरण्यकशिपुके समान शोभा पाने लगे ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामने देवासुरसंग्रामे शक्रपलाने चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें देवासुरसंग्राममें इन्द्रका पलायनविषयक चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६४ ॥
पञ्चषष्टितमोऽध्यायः
विजयी बलिके पास राजलक्ष्मी आदिका शुभागमन
वैशम्पायन उवाच
निष्प्रयत्नेषु देवेषु त्रैलोक्ये दैत्यपालिते ।
जये बलेर्बलवतो मयशम्बरयोस्तथा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! तदनन्तर देवता विजयके लिये प्रयत्न छोड़ बैठे और त्रिलोकीके राज्यका दैत्यराज बलिके द्वारा पालन होने लगा। बलवान् बलि, मयासुर और शम्बरासुरकी विजय हुई ॥ १ ॥
सुधासु दिक्षु सर्वासु प्रवृत्ते धर्मकर्मणि ।
अपावृत्ते धर्मपथे अयनस्थे दिवाकरे ॥ २ ॥
सम्पूर्ण दिशाएँ अमृतमयी हो गयीं, धर्म-कर्मका पालन होने लगा। धर्मका मार्ग खुल गया और सूर्यदेव अपने अयनमे स्थित हो गये ॥ २ ॥
प्रह्लादशम्बरमयैरनुह्लादेन चैव हि ।
दिक्षु सर्वासु गुप्तासु गगने दैत्यपालिते ॥ ३ ॥
दैत्येषु मखशोभाश्च स्वर्गार्थे दर्शयत्सु च ।
प्रकृतिस्थे तदा लोके वर्तमाने च सत्पथे ॥ ४ ॥
अभावे सर्वपापानां भावे चैव तथा स्थिते ।
भावे तपसि सिद्धानां सर्वत्राश्रमरक्षिषु ॥ ५ ॥