भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 968, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 968

९४४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


उवाच दृष्ट्वा युध्यध्वं दानवानां जिघांसया ।
अहमेनं हनिष्यामि भयं मुक्त्वा तु युध्यत ॥ २७ ॥
कछुओं और मत्स्योंसे व्याप्त हुए पाशधारी श्रीमान् वरुणदेवने कुपित हो अपने सैनिकोंकी ओर देखकर कहा— 'वीरो ! तुमलोग दानवोंके वधकी इच्छासे युद्ध करो। मैं इस दानवका वध करूँगा। तुमलोग भय छोड़कर युद्धमें डटे रहो' ॥ २६-२७ ॥

ततस्ते पन्नगाः सर्वे महार्णवजलाश्रयाः ।
जघ्नुर्दैत्यान् रणमुखे नदन्तो जयगृद्धिनः ॥ २८ ॥
तब महासागरके जलमें निवास करनेवाले समस्त सर्प विजयकी अभिलाषासे सिंहनाद करते हुए युद्धके मुहानेपर दैत्योंका संहार करने लगे ॥ २८ ॥

ते तु नालीकनाराचैर्गदाभिर्मुसलैस्तथा ।
अभ्यघ्नन् दानवान् दृष्ट्वा मुदिता वरुणानुगाः ॥ २९ ॥
हर्ष और उल्लासमें भरे हुए वरुणके उन सैनिकोंने नालीक, नाराच, गदा और मुसलोंद्वारा दानवोंको मारना आरम्भ किया ॥ २९ ॥

विप्रचित्तिस्तु संक्रुद्धो महाबलपराक्रमः ।
पन्नगानां शरीराणि व्यधमद् युद्धदुर्मदः ॥ ३० ॥
तब महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न रणदुर्मद विप्रचित्ति अत्यन्त कुपित हो सर्पोंके शरीरोंका विनाश करने लगा ॥ ३० ॥

गरुडेनापि चास्त्रेण पन्नगान् दानवोत्तमः ।
समरे घातयामास गरुडैः पन्नगाशनैः ॥ ३१ ॥
उस दानव-शिरोमणिने गरुडास्त्रका प्रयोग करके सर्प-भोजी गरुड़ोंद्वारा समराङ्गणमें सर्पोंका संहार करा दिया ॥

स शरैः सूर्यसंकाशैः शातकुम्भविभूषितैः ।
पन्नगान् समरे वीरः प्रममाथ सुदुर्जयन् ॥ ३२ ॥
संग्रामभूमिमें वीर विप्रचित्तिने सूर्यतुल्य तेजस्वी सुवर्ण-भूषित बाणोंद्वारा अत्यन्त दुर्जय सर्पोंको मथ डाला ॥ ३२ ॥

समरे भिन्नगात्रास्ते पन्नगाः शरपीडिताः ।
पेतुरन्मथितसर्वाङ्गा गजा इव महागजैः ॥ ३३ ॥
रणभूमिमें बाणोंसे पीड़ित हुए सभी सर्प घायल हो धराशायी हो गये। उस समय वे जिनके सारे अङ्ग महान् गजराजोंने मथ डाले हों उन हाथियोंके समान पृथ्वीपर पड़े थे ॥ ३३ ॥

तपन्तं तमिवादित्यं दीप्तैर्बाणगभस्तिभिः ।
अभ्यधावत संक्रुद्धः समरे वरुणः प्रभुः ॥ ३४ ॥
उस समय समराङ्गणमें बाणरूपी दीप्तिमान् किरणोंद्वारा सूर्यके समान तपनेवाले उस दैत्यपर भगवान् वरुणने अत्यन्त क्रोधपूर्वक धावा किया ॥ ३४ ॥

ततस्तु दानवास्तत्र भिन्नदेहाः सहस्रशः ।
व्यथिता विद्रवन्ति स्म दिशो दश विचेतसः ॥ ३५ ॥
फिर तो उनके द्वारा शरीर छिन्न-भिन्न हो जानेके कारण वहाँ पीड़ित हुए सहस्रों दानव अचेत-से होकर दसों दिशाओंमें भागने लगे ॥ ३५ ॥

इन्द्रस्यार्थे पराक्रम्य वरुणस्त्यक्तजीवितः ।
विनर्दमानो युयुधे समरे पाशभृद्वरः ॥ ३६ ॥
पाशधारियोंमें श्रेष्ठ वरुणदेव जीवनका मोह छोड़कर पराक्रमपूर्वक गर्जना करते हुए समरभूमिमें इन्द्रके लिये युद्ध करने लगे ॥ ३६ ॥

वरुणः पन्नगाश्चैव मुष्टिभिः समरोत्कटाः ।
अभ्यवर्तन्त समरे विप्रचित्तिं महासुरम् ॥ ३७ ॥
वरुण और सर्प युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले थे; वे शत्रुओंपर मुक्कोंका प्रहार करते हुए संग्रामभूमिमें महान् असुर विप्रचित्तिका सामना करने लगे ॥ ३७ ॥

ततोऽस्त्रैश्च शिलाभिश्च प्रहरन् स बलोत्कटः ।
व्यपोहत महातेजा विप्रचित्तिर्महासुरः ॥ ३८ ॥
तत्पश्चात् उत्कट बलशाली, महातेजस्वी महान् असुर विप्रचित्तिने अस्त्रों और शिलाओंद्वारा प्रहार किया और शत्रुओंको मार भगाया ॥ ३८ ॥

ततः पावकसंकाशैः स मुक्तैः शीघ्रगामिभिः ।
वरुणस्य महावेगान् विभेद समरे हयान् ॥ ३९ ॥
उसने अपने धनुषसे छूटे हुए अग्नितुल्य तेजस्वी एवं शीघ्रगामी बाणोंद्वारा वरुणके महान् वेगशाली घोड़ोंको समराङ्गणमें क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ३९ ॥

कर्मणा तेन महता विप्रचित्तेर्महात्मनः ।
अग्नेराज्याहुतस्येव तेजः समभिवर्धत ॥ ४० ॥
जैसे घीकी आहुति देनेसे अग्निका तेज बढ़ता है, उसी प्रकार उस महान् कर्मसे महामनस्वी विप्रचित्तिका तेज एवं प्रताप बढ़ने लगा ॥ ४० ॥

स शरैः सूर्यसंकाशैः सुमुक्तैः शीघ्रगामिभिः ।
वारुणीं तां महासेनां निर्ममन्थ महाबलः ॥ ४१ ॥
उस महाबली दानवने भलीभाँति छोड़े गये शीघ्रगामी एवं सूर्यतुल्य तेजस्वी बाणोंद्वारा वरुणदेवकी उस विशाल सेनाको मथ डाला ॥ ४१ ॥

क्षीणास्त्रां सायकाक्रान्तां शरजालेन मोहिताम् ।
शूलशक्त्यृष्टिभिन्नां च चकार रुधिरोक्षिताम् ॥ ४२ ॥
उसने वरुणके सैनिकोंके अस्त्र-शस्त्र काट डाले, उन्हें सायकोंसे आक्रान्त कर दिया; वे सब-के-सब उसके बाणजालसे आच्छादित होकर मोहके वशीभूत हो गये, विप्रचित्तिने उन सबको शूल, शक्ति और ऋष्टि आदि शस्त्रोंसे घायल करके खूनसे लथपथ कर दिया ॥ ४२ ॥

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