विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 967, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें[भविष्यपर्व] एकषष्टितमोऽध्यायः ९४३
ध्वजके समान उस विशाल परिघको घुमाया और मुँह फैलाकर बड़ी जोर-जोरसे गर्जना की॥ ९॥
स कण्ठस्थेन निष्केण भुजस्थैरपि चाङ्गदैः।
कुण्डलाभ्यां विचित्राभ्यां भ्राजते काञ्चनस्रजा॥ १०॥
उसके कण्ठमें सुवर्णमय पदक, भुजाओंमें बाजूबंद, कानोंमें विचित्र कुण्डल तथा वक्षःस्थलपर सोनेके हार सुशोभित थे, जिनसे वह दानव प्रकाशित हो रहा था ॥१०॥
दानवो भूषणैर्भाति परिघेणायसेन च।
यथेन्द्रधनुषा मेघः सविद्युत्स्तनयित्नुमान्॥ ११॥
लोहेके परिघ और सोनेके आभूषणोंसे युक्त वह दानव इन्द्रधनुष, विद्युत् और गर्जनासे युक्त मेघके समान शोभा पा रहा था॥ ११॥
प्रस्फुरन् परिघाग्रेण वातस्कन्धान्महास्वनः।
जज्वाल च सधूमार्चिः साङ्घर्पण इवानलः॥ १२॥
परिघनामक अस्त्रसे वायुसमूहोंको संचालित करते हुए जोर-जोरसे सिंहनाद करनेवाला वह दैत्य धूम और ज्वालाओं-सहित प्रलयकालीन अग्निके समान प्रज्वलित हो उठा॥
विद्याधरगणैः सार्धं गन्धर्वनगरैरपि।
सह चैवामरावत्या सिद्धलोकैस्तथा सह॥ १३॥
ग्रहनक्षत्रसहितं सार्कचन्द्रविभूषितम्।
दैत्येन्द्रपरिघोद्धूतं भ्रमतीव नभस्तलम्॥ १४॥
विद्याधरगण, गन्धर्वनगर, अमरावती पुरी तथा सिद्ध-लोकोंके साथ ग्रह-नक्षत्रोंसहित एवं सूर्य और चन्द्रमासे विभूषित आकाश उस दैत्यराजके परिघसे उद्ध्रान्त होकर चक्कर-सा काटने लगा॥ १३-१४॥
दुरासदः सुसंज्ञे परिघाभरणक्षमः।
सुरेन्धनोऽसुरेन्द्राग्निर्यंगान्ताग्निरिवोत्थितः॥ १५॥
परिघको धारण करने और सब ओर घुमानेमें समर्थ वह दैत्य दुर्जय हो गया था। अग्निके समान तेजस्वी वह असुरराज विप्रचित्ति प्रलयकालकी आगके समान उठ खड़ा हुआ था, देवता उसकी आँचसे ईन्धनकी भाँति जल रहे थे॥ १५॥
त्रिदशा वरुणश्चैव न शेकुः स्पन्दितुं भयात्।
तत्रासीन्निर्भयस्त्वेकः कौशिको वासवः प्रभुः॥ १६॥
देवता और वरुण उसके भयके मारे हिल-डुल भी न सके। वहाँ एकमात्र सामर्थ्यशाली कौशिक इन्द्र ही निर्भय खड़े रहे॥ १६॥
भास्करप्रतिमं घोरं परिघं रौद्रदर्शनम्।
पातयामास सेनायां जलेशस्य स दानवः॥ १७॥
उस दानवने उस सूर्यतुल्य तेजस्वी घोर परिघको, जो देखनेमें बड़ा ही भयंकर था, जलेश्वर वरुणकी सेनामें गिराया॥ १७॥
पतता तेन संग्रामे जलेशस्य महात्मनः।
भूतानां शतसाहस्रं परिघेण समाहतम्।
तेषां गात्राणि चासाद्य व्यशीर्यन्त सहस्रशः॥ १८॥
संग्रामभूमिमें वहाँ गिरते हुए उस परिघने महात्मा वरुण-के एक लाख भूतोंको हताहत कर दिया। उस परिघसे टकरा-कर उनके शरीरोंके सहस्रों टुकड़े हो गये॥ १८॥
विशीर्यमाणं विचभावुल्काशतमिवाम्बरे।
भूयश्चैनं तदाऽऽभ्राम्य वरुणाय न्यपातयत्॥ १९॥
जीर्ण-शीर्ण होते हुए वरुणके सैनिक आकाशमें सैकड़ों उल्काओंके समान प्रतीत हो रहे थे। तदनन्तर विप्रचित्तिने पुनः उस परिघको घुमाकर वरुणपर दे मारा॥ १९॥
पात्यमाने तदा तस्मिञ्छरीरे वारुणे तदा।
स भिन्नः परिघो घोरो देवगात्रे व्यशीर्यत॥ २०॥
वरुणके शरीरपर पड़ते ही उस परिघके टुकड़े-टुकड़े हो गये। वह भयंकर परिघ वरुणदेवके शरीरसे टकराकर टूक-टूक हो गया॥ २०॥
शीर्यमाणस्य चूर्णानि खद्योता इव चाम्बरे।
स तु तेन प्रहारेण न चचाल जलाधिपः॥ २१॥
परिघेण हतः संख्ये यथा वज्रहतोऽचलः।
जीर्ण-शीर्ण होकर गिरते हुए उस परिघके चूर्ण आकाश-में खद्योतोंके समान प्रकाशित होते थे। उस प्रहारसे जलेश्वर वरुण विचलित नहीं हुए। परिघकी मार खाकर भी वे युद्धमें वज्रसे आहत हुए पर्वतकी भाँति स्थिरभावसे खड़े रहे॥ २१॥
खसैन्येष्वपि भग्नेषु भिन्नदेहेषु चाहवे॥ २२॥
मुहूर्तमगमत् क्षोभमपाम्पतिरमर्षणः।
सोऽमर्षं च समापन्नो वरुणोऽमितविक्रमः॥ २३॥
युद्धस्थलमें अपने सैनिकोंके भग्न एवं घायल होनेपर अमर्षशील जलेश्वर वरुणको दो घड़ीतक बड़ा क्षोभ रहा। वे अमित पराक्रमी वरुण अमर्षमें भर गये॥ २२-२३॥
सर्वसंहारमकरोत् स्वपक्षस्यारिमर्दनः।
स सागरैश्चतुर्भिंश्च वृतो दीप्तैश्च पन्नगैः॥ २४॥
शङ्खमुक्तामणिश्चितो विभ्रत्तोयमयं वपुः।
पाण्डुरोद्धूतवसनो नानारत्नविभूषितः॥ २५॥
तत्पश्चात् शत्रुमर्दैन वरुणने अपने पक्षके सभी लोगोंको पूर्णतः संगठित किया। वे जलमय शरीर धारण करके शङ्खों और मुक्तामणियोँसे विभूषित हुए। उस समय चारों समुद्र उन्हें घेरकर खड़े हो गये। तेजस्वी सर्पोंने भी उनका साथ दिया। उनके श्वेत वस्त्र हवासे हिल रहे थे तथा वे नाना प्रकारके रत्नोंसे अलंकृत थे॥ २४-२५॥
वरुणः पाशधृक्श्रीमान् कूर्ममीनसमाकुलः।
वरुणस्तु तदा क्रुद्धस्तान् निरीक्ष्य स्वसैनिकान्॥ २६॥