विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 962, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें९३८ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
षष्टितमोऽध्यायः
कुबेर और अनुह्लादका भयंकर युद्ध
वैशम्पायन उवाच
धनाध्यक्षमनुह्लादः प्रह्लादस्यानुजो बली।
ससैन्यं योधयामास क्षोभयन् यक्षवाहिनीम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! प्रह्लादका बलवान् भाई अनुह्लाद यक्षसेनाको क्षोभमें डालता हुआ सेनासहित धनाध्यक्ष कुबेरके साथ युद्ध करने लगा ॥ १ ॥
महता च बलौघेन त्वनुह्लादोऽसुरोत्तमः।
अर्दयामास संक्रुद्धो धनाध्यक्षं प्रतापवान् ॥ २ ॥
असुरोंमें श्रेष्ठ प्रतापी अनुह्लाद कुपित हो अपने विशाल सैन्यसमूहद्वारा कुबेरको पीड़ा देने लगा ॥ २ ॥
अमृष्यमाणस्त्रिदशानावस्थानुदायुधान् ।
चकार कदनं घोरं धनुष्पाणिर्महासुरः ॥ ३ ॥
वह महान् असुर युद्धस्थलमें खड़े हुए देवताओंको शस्त्र उठाये देख उन्हें सहन न कर सका। उसने हाथमें धनुष लेकर उनका घोर संहार मचाया ॥ ३ ॥
आवर्त इव संजज्ञे बलस्य महतो महान् ।
क्षुभितस्याप्रमेयस्य सागरस्येव सम्प्लवे ॥ ४ ॥
जैसे प्रलयकालमें क्षुब्ध हुए अपार महासागरमें भँवरें उठने लगती हैं, उसी प्रकार उस क्षुब्ध हुई विशाल सेनामें आवर्त ( मन्थन)-सा होने लगा ॥ ४ ॥
त्रिदशानां शरीरैस्तु दानवानां च मेदिनी।
बभूव निचिता घोरैः पर्वतैरिव सम्प्लवे ॥ ५ ॥
देवताओं और दानवोंकी लाशोंसे वहाँकी धरती पट गयी, मानो प्रलयकालमें ढहे हुए भयंकर पर्वतोंसे आच्छादित हो गयी हो ॥ ५ ॥
मेरुपृष्ठं तु रक्तेन रञ्जितं सम्प्रकाशते ।
सर्वतो माधवे मासि पुष्पितैरिव किंशुकैः ॥ ६ ॥
मेरुपर्वतकी वह घाटी रक्तसे रञ्जित होकर वैशाख मासमें सब ओरसे लाल फूलोंसे युक्त पलाशवृक्षकी भाँति प्रकाशित हो रही थी ॥ ६ ॥
हतैर्वीरैर्गजैरश्वैः प्रावर्तत महानदी।
शोणितौघा महाघोरा यमराष्ट्रविवर्धिनी ॥ ७ ॥
मारे गये वीरों, हाथियों और घोड़ोंसे वहाँ खूनकी एक महानदी बह चली, जिसमें जलके स्थानमें रक्तका स्रोत बह रहा था। वह महाघोर नदी यमराजके राज्यकी वृद्धि करने-वाली थी ॥ ७ ॥
शकृन्मेदोमहापङ्का सम्प्रकीर्णान्त्रशैवला।
छिन्नकायशिरोमीना अङ्गावयवशाद्वला ॥ ८ ॥
उसमें विष्ठा और चरबी बड़ी भारी कीचड़के समान प्रतीत होती थी। सब ओर बिखरी हुई आँतें सेवार-सी जान पड़ती थीं। कटे हुए सिर और धड़ ही उस नदीके मत्स्य थे। अङ्गोंके अवयव ही घास थे ॥ ८ ॥
गृध्रहंससमाकीर्णा केकिसारसनादिता।
वसाफेनसमाकीर्णा प्रोत्कृष्टस्तनितस्वरा ॥ ९ ॥
गीधरूपी हंस वहाँ छा रहे थे। मोरों और सारसोंके कलरवोंसे वह मुखरित हो रही थी। वसारूपी फेन उसमें व्याप्त थे। चारों ओर मची हुई चीख-पुकार ही उसका कलकलनाद थी ॥ ९ ॥
तां कापुरुषदुस्तारां युद्धभूमौ महानदीम्।
नदीमिवातपापाये हंससंघोपशोभिताम् ॥ १० ॥
युद्धभूमिमें बहनेवाली वह महानदी कायरोंके लिये दुस्तर थी। ठीक वैसे ही जैसे वर्षा-ऋतुमें बढ़ी हुई नदीको पार करना किसीको भी कठिन हो जाता है। हंस आदि पक्षियोंके समुदाय उसकी शोभा बढ़ाते थे ॥ १० ॥
त्रिदशा दानवाश्चैव तेरुस्ते दुस्तरां नदीम् ।
यथा पद्मरजोध्वस्तां नलिनीं गजयूथपाः ॥ ११ ॥
देवता और दानव उस दुस्तर नदीको उसी प्रकार पार कर गये जैसे कमलोंके परागसे धूसर वर्णवाली पुष्करिणीको गजयूथपति लाँघ जाते हैं ॥ ११ ॥
ततः सृजन्तं वाणौघाननुह्लादं रथे स्थितम् ।
ददर्श तरसा देवो निघ्नन्तं यक्षवाहिनीम् ॥ १२ ॥
रथपर बैठा हुआ अनुह्लाद बाणसमूहोंकी वर्षा करके यक्षसेनाका वेगपूर्वक विनाश कर रहा था। यह बात स्वयं कुबेरने देखी ॥ १२ ॥
क्रुद्धस्ततो दैत्यबलं सूदयामास वित्तपः।
विक्षिप्तन्निव खे वायुर्महाभ्रपटलं बलात् ॥ १३ ॥
फिर तो जैसे वायु आकाशमें फैली हुई मेघोंकी भारी घटाको बलपूर्वक छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार क्रोधमें भरे हुए धनाध्यक्ष कुबेरने दैत्योंकी सेनाका संहार कर डाला॥
समीक्ष्य तुमुलं युद्धमनुह्लादश्च वीर्यवान् ।
रथेनादित्यवर्णेन कुबेरमभिदुद्रुवे ॥ १४ ॥
वह भयंकर युद्ध देखकर पराक्रमी अनुह्लादने सूर्यके समान तेजस्वी रथके द्वारा कुबेरपर धावा किया ॥ १४ ॥
स धनुर्धन्विनां श्रेष्ठो विकृष्य रणमूर्धनि ।
उत्ससर्ज शितान् बाणान् वित्तेशस्य महात्मनः ॥ १५ ॥
धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ उस दैत्यवीरने युद्धके मुहानेपर अपने धनुषको खींचकर महामनस्वी धनाध्यक्ष कुबेरपर पैने बाणोंका प्रहार किया ॥ १५ ॥
कुबेरं प्राप्य ते बाणा निर्भिद्य सुसमाहिताः।
अपरान् पृष्ठतोजघ्नुर्ध्यासकान् यक्षराक्षसान् ॥ १६ ॥