विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 961, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] एकोनषष्टितमोऽध्यायः ९३७
स्वधनुःशक्रधनुषौ काञ्चनाङ्गदविद्युतौ ॥ ९० ॥
तौ दैत्यकालजलदौ शरधारां व्यमुञ्चताम् ।
दैत्य प्रह्लाद और कालदेवता दोनों मेघके समान होकर बाणरूपी जलकी धारा गिरा रहे थे । दोनोंके अपने धनुष ही इन्द्रधनुषकी प्रतीति कराते थे और उनकी बाँहोंमें जो सोनेके बाजूबंद थे, वे विद्युतके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ९० १/२ ॥
तौ महामेघसंकाशौ रथनागगतौ तदा ॥ ९१ ॥
बभूवतुरभिक्रुद्धौ साम्बुगर्भाविवाम्बुदौ ।
क्रमशः रथ और हाथीपर बैठे हुए वे दोनों योद्धा महान् मेघके समान जान पड़ते थे । दोनों ही एक दूसरेके प्रति क्रोधसे भरे हुए थे और सजल जलधरोंके समान शोभा पाते थे ॥ ९१ १/२ ॥
तप्तकाञ्चनसंन्नाहौ दिव्यहारविभूषितौ ॥ ९२ ॥
तौ विरेजतुरायस्तौ सूर्यवैश्वानरोपमौ ।
तपाये हुए सुवर्णमय कवच तथा दिव्य हारोंसे विभूषित वे दोनों विजयके लिये प्रयत्नशील योद्धा सूर्य और अग्निके समान शोभा पाते थे ॥ ९२ १/२ ॥
तौ महाचलसंकाशावन्योन्यस्य चमूमुखे ॥ ९३ ॥
शक्राशनिसमस्पर्शैर्बाणैर्जघ्नतुराहवे ।
महान् पर्वतके समान विशाल शरीरवाले वे दोनों वीर सेनाके मुहानेपर युद्धस्थलमें एक-दूसरेको इन्द्रके वज्रकी भाँति दुःसह बाणोंद्वारा चोट पहुँचाते थे ॥ ९३ १/२ ॥
परस्परं समासाद्य तयोर्युद्धे दुरासदे ॥ ९४ ॥
नाशंसन्त तदा योधा जीवितान्यपि संयुगे ।
उन दोनोंके दुर्जय युद्धमें परस्पर भिड़े हुए योद्धा समर-भूमिमें अपने जीवनकी भी आशा छोड़ बैठे थे ॥ ९४ १/२ ॥
शरैर्विभिन्नसर्वाङ्गा युधि प्रक्षीणबान्धवाः ।
निपेतुर्योधमुख्यास्तु रुधिरोक्षितवक्षसः ॥ ९५ ॥
उनके सारे अङ्ग बाणोंसे क्षत-विक्षत हो गये थे । उनके बन्धु-बान्धव भी युद्धमें काम आ गये थे और उन प्रमुख योद्धाओंकी छाती खूनसे रँगी हुई थी । इस अवस्थामें वे धराशायी हो गये ॥ ९५ ॥
पतितैर्निष्पतद्द्भिश्च पात्यमानैश्च संयुगे ।
बभूव भूः समाकीर्णा योधैरुद्गतजीवितैः ॥ ९६ ॥
युद्धस्थलमें गिरे हुए, गिरते हुए और गिराये जाते हुए निष्प्राण योद्धाओंकी लाशोंसे भूमि पट गयी थी ॥ ९६ ॥
संगृह्णतोः शरान् घोरान्न च संदधतोस्तयोः ।
अन्तरं ददृशे कश्चित् प्रयत्नादपि संयुगे ॥ ९७ ॥
उस युद्धस्थलमें घोर बाणोंको हाथमें लेते और धनुषपर रखते हुए उन दोनों वीरोंमें कितना अन्तर है, इस बातको कोई प्रयत्न करके भी न देख सका ॥ ९७ ॥
लघुत्वाच्च महाबाहू युद्धशौण्डौ महाबलौ ।
मण्डलीभूतधनुषौ सकृदेव बभूवतुः ॥ ९८ ॥
वे दोनों महाबली, महाबाहु युद्धमें कुशल थे । उन दोनोंने फुर्तीके कारण एक साथ ही अपने धनुषोंको खींचकर मण्डलाकार बना लिया ॥ ९८ ॥
प्रह्लादस्य च बाणौघैर्दुद्रावान्तकवाहिनी ।
उह्यमानं बलवता वायुनेवाभ्रमण्डलम् ॥ ९९ ॥
प्रह्लादके बाणसमूहोंसे घायल होकर कालकी सेना भाग चली । ठीक उसी तरह जैसे बलवान् वायुके द्वारा ढोये जाते हुए मेघोंका समूह छिन्न-भिन्न हो जाता है ॥ ९९ ॥
हतदर्पं तु विज्ञाय प्रह्लादः कालमाहवे ।
अपयातं च समरे द्विपन्तं सम्प्रतर्क्य-तम् ॥ १००॥
मत्वा वशगतं चैव प्रह्लादो युद्धदुर्मदः ।
तत्रैवान्यां चमूं भूयः सम्ममर्द महासुरः ॥ १०१॥
उस समराङ्गणमें कालका घमंड चूर हुआ जान तथा अपने उस शत्रुको युद्धसे भागा हुआ समझकर रणदुर्मद महान् असुर प्रह्लाद उन्हें पराजित मानकर पुनः दूसरी देव-सेनाका मर्दन करने लगे ॥ १००-१०१ ॥
कालप्रह्लादयोर्युद्धमभवद् यादृशं पुरा ।
तादृशं सर्वलोकेषु न भूतं न भविष्यति ॥ १०२॥
पूर्वकालमें प्रह्लाद और कालका जैसा युद्ध हुआ था, वैसा युद्ध सम्पूर्ण लोकोंमें न तो कभी हुआ है और न होगा ही ॥ १०२ ॥
एवमद्भुतवीर्यौजा महार णकृतव्रणः ।
प्रह्लादस्त्वथ वृद्धोऽत्र कालस्त्वपसृतो रणात् ॥ १०३॥
इस प्रकार अद्भुत बल पराक्रम और ओजसे सम्पन्न तथा उस महासमरमें घायल हुए प्रह्लाद उस युद्धमें बढ़ गये—विजयी हुए और कालदेवता रणक्षेत्रसे भाग गये ॥ १०३ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामने देवासुरयुद्धे कालप्रह्लादयुद्धे
एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५९ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें देवासुरसंग्राममें काल और प्रह्लादका युद्धविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५९ ॥