विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 960, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें९३६ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
लिये उद्यत हुए वे सभी वीर अपने पक्षकी विजय चाहते थे॥
शुशुभे सा चमूर्दीप्ता पताकाध्वजमालिनी।
गजाश्वरथसंवाधा स्वर्गमार्गाभिकाङ्क्षिणी ॥ ७३॥
ध्वजा-पताकाओंसे अलंकृत हाथी, घोड़े और रथोंसे भरी हुई तथा स्वर्गलोकके मार्गपर जानेकी इच्छा रखनेवाली वह दीप्तिशालिनी दैत्यसेना बड़ी शोभा पा रही थी॥ ७३॥
ततः कालः सुनिर्यातो भीमो भीमपराक्रमः।
निनदन् सुमहाकायो व्याधिभिर्बहुभिर्वृतः ॥ ७४॥
तदनन्तर भीषण पराक्रमी भयंकर कालदेवता बहुत-सी व्याधियोंसे घिरे हुए युद्धके लिये निकले। उनकी काया विशाल थी और वे जोर-जोरसे सिंहनाद कर रहे थे ॥ ७४ ॥
ददर्श महतीं सेनां दानवानां बलीयसाम्।
अभिसंजातदर्पाणां कालं समभिगर्जताम् ॥ ७५ ॥
उन्होंने अपने सामने गर्जते और अभिमानमें भरे हुए महाबली दानवोंकी उस विशाल सेनाको देखा ॥ ७५ ॥
तदायान्तं तदानीकं दानवानां तरस्विनाम्।
प्रतिलोमं चकाराशु व्याधिभिः सहितोऽन्तकः ॥ ७६॥
वेगशाली दानवोंकी उस आती हुई सेनाको व्याधियों-सहित कालने तुरंत प्रतिकूल दिशामें ठेल दिया ॥ ७६ ॥
प्रविश्य ध्वजिनीं चैषां पातयामास दानवान्।
कालो रुधिररक्ताक्षः स्वेनानीकेन संवृतः ॥ ७७॥
तत्पश्चात् अपनी सेनासे घिरे हुए लाल नेत्रवाले कालदेव दानवोंकी सेनामें प्रवेश करके उन्हें धराशायी करने लगे ॥
प्रह्लादबलमत्युग्रं प्रह्लादं च महाबलम्।
आजघान रणे कालो दण्डमुद्गरपट्टिशैः ॥ ७८ ॥
उस युद्धमें कालदेव दण्ड, मुद्गर और पट्टिश आदि अस्त्रोंद्वारा महाबली प्रह्लाद तथा उनकी अत्यन्त भयंकर सेनापर घातक प्रहार करने लगे ॥ ७८ ॥
शरशक्त्यसिखड्गांश्च शूलानि मुसलानि च।
गदाश्च परिघांश्चैव विचित्रांश्च परश्वधाः ॥ ७९॥
धनूंषि च विचित्राणि शतघ्नीश्च स्थिरायसीः।
पात्यन्ते व्याधिभिर्युद्धे दानवानां चमूमुखे ॥ ८० ॥
कालके सैनिक व्याधियोंने रणक्षेत्रमें बाण, शक्ति, ऋष्टि, खड्ग, शूल, मुसल, गदा, परिघ, विचित्र फरसे, भाँति-भाँतिके धनुष तथा लोहेकी बनी हुई सुदृढ़ शतघ्नी आदि बहुत-से अस्त्र-शस्त्र दानव-सेनाके ऊपर गिराये ॥ ७९-८० ॥
बहवो व्याधयो युद्धे जघ्नुसुरपुङ्गवान्।
व्याधीनपि च दैत्यौघा निजघ्नुर्बहवो बहून् ॥ ८१॥
उस युद्धमें बहुसंख्यक व्याधियोंने बहुत-से असुरशिरो-मणियाेंका वध किया और बहुत से दैत्यों ने भी बहुसंख्यक व्याधियोंका विनाश कर डाला ॥ ८१ ॥
शूलैः प्रमथिताः केचित् केचिच्छिन्नाः परश्वधैः।
परिघैराहताः केचित् केचिच्च परमायुधैः ॥ ८२ ॥
कितने ही योद्धा शूलोंसे मथ डाले गये। कितनोंके फरसोंसे टुकड़े-टुकड़े कर दिये गये। कोई परिघोंसे आहत हुए तो कोई दूसरे-दूसरे उत्तम आयुधोंसे ॥ ८२ ॥
केचिद् द्विधा कृताः खड्गैः स्फुरन्तः पतिता भुवि।
व्याधयो दानवैरेव नानाशास्त्रैर्विदारिताः ॥ ८३ ॥
किन्हींके खड्गोंद्वारा दो टुकड़े कर दिये गये और वे पृथ्वीपर गिरकर छटपटाने लगे। दानवोंने नाना प्रकारके शस्त्रोंद्वारा व्याधियोंको विदीर्ण कर डाला ॥ ८३ ॥
ते चापि व्याधिभिः सर्वे विविधैरायुधोत्तमैः।
खड्गैश्च मुसलैस्तीक्ष्णैः प्रासतोमरमुद्गरैः।
भिन्नाश्च दानवाः सर्वे निकृत्ताश्च परश्वधैः ॥ ८४ ॥
व्याधियोंने भी नाना प्रकारके उत्तम आयुधों, खड्गों, तीखी धारवाले मुसलों, प्रास, तोमर और मुद्गरों तथा फरसों-से समस्त दानवोंको छिन्न-भिन्न करके काट डाला ॥ ८४ ॥
मुद्गरैः पट्टिशैश्चैव व्याधिभिश्च महाबलैः।
कृत्वा शस्त्रैरनेकैश्च मुष्टिभिश्च हता भृशम् ॥ ८५ ॥
महाबली व्याधियोंने मुद्गरों, पट्टिशों तथा अनेक प्रकार-के शस्त्रोंद्वारा दैत्योंके टुकड़े-टुकड़े करके बहुतोंको मुक्कोंसे भी मार गिराया ॥ ८५ ॥
वेमुः शोणितमन्योन्यं विष्टब्धदशनेक्षणाः।
आर्तस्वरं च नदतां सिंहनादं च गर्जताम् ॥ ८६ ॥
बभूव तुमुलः शब्दः संग्रामे लोमहर्षणे।
एक-दूसरेके द्वारा दाँतोंके तोड़ दिये जानेपर और आँखोंके फोड़ दिये जानेपर वे सब योद्धा मुँहसे रक्त वमन करने लगे। उस रोमाञ्चकारी संग्राममें आर्तस्वरसे कराहते और सिंहोंके समान गर्जते हुए योद्धाओंका शब्द बड़ा भयंकर प्रतीत होता था ॥ ८६ १/२ ॥
मुष्टिभिश्चोत्तमाङ्गानि तल्लैर्गात्राणि चासकृत् ॥ ८७ ॥
सादितानि महीं जग्मुस्तिष्ठतामेव संयुगे।
युद्धस्थलमें खड़े हुए योद्धाओंके मस्तक तथा दूसरे-दूसरे अङ्ग बारंवार मुक्कों और तमाचोंकी मार पड़नेसे कटकर पृथ्वीपर गिर पड़ते थे ॥ ८७ १/२ ॥
अस्रफेना ध्वजावर्ता च्छिन्नबाहुमहोरगा ॥ ८८ ॥
शूलशक्तिमहामत्स्या चापग्राहसमाकुला।
रथेपोपलसम्बाधा ध्वजद्रुमलतावृता ॥ ८९ ॥
सशब्दघोषविस्तारा लोहितोदाभवन्नदी।
उस समय वहाँ भारी कोलाहलके साथ खूनकी विस्तृत नदी बह चली। आँसू ही उसमें फेन थे। ध्वजोंकी भँवर उठ रही थी। कटी हुई बाँहें बड़े-बड़े सर्पोंके समान जान पड़ती थीं। शूल और शक्तिनामक अस्त्र महान् मत्स्य से प्रतीत होते थे। धनुरूपी ग्राहोंसे वह भरी हुई थी। रथोंके ईपादण्ड-रूपी प्रस्तरखण्डोंसे वह नदी व्याप्त थी तथा ध्वजरूपी वृक्षों और लताओंसे आवृत्त दिखायी देती थी ॥ ८८-८९ १/२ ॥