भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 963, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 963

भविष्यपर्व ] षष्टितमोऽध्यायः [ ९३९

वे बाण कुबेरके पास पहुँचकर उनके शरीरको विदीर्ण करते हुए पीठकी ओरसे निकल गये और युद्धमें लगे हुए दूसरे-दूसरे यक्षों तथा राक्षसोंको एकाग्रतापूर्वक घायल करने लगे ॥ १६ ॥
देवः शरैरभिहतो निशितैर्ज्वलनोपमैः।
अनुह्लादं प्रत्युदियात् संक्रुद्धः पर माहवे ॥ १७ ॥
अग्निके समान तेजस्वी तथा पैने बाणोंसे घायल हुए धनाध्यक्ष कुबेर उस महासमरमें बहुत कुपित हुए और अनुह्लादका सामना करनेके लिये आगे बढ़े ॥ १७ ॥
ततो वैश्रवणो राजा क्रुद्धो यक्षगणैः सह।
ववर्ष शरवर्षाणि दानवं प्रति वीर्यवान् ॥ १८ ॥
क्रोधमें भरे हुए पराक्रमी राजा कुबेरने यक्षोंके साथ रहकर उस दानवपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ १८ ॥
तद्यथा शारदं वर्षं गोवृषः शीघ्रमागतम्।
अपारयन् वारयितुं प्रतिगृह्णन् निमीलितः ॥ १९ ॥
एवमेव कुबेरस्य शरवर्षं महासुरः।
निमीलिताक्षः सहसा दैत्यः सहति दारुणम् ॥ २० ॥
जैसे साँड़ शीघ्र आयी हुई शरद्-ऋतुकी वृष्टिको रोकनेमें असमर्थ हो आँख बंद करके उसके आघातको चुपचाप ग्रहण करता है, उसी प्रकार वह महान् असुर दैत्य कुबेर-द्वारा सहसा की गयी भयंकर बाणवर्षाको नेत्र मूंदकर चुपचाप सहन करने लगा ॥ १९-२० ॥
रोषितः शरवर्षेण धनदेन महासुरः।
इन्द्रकेतुप्रतीकाशमभीतोऽपश्यत द्रुमम् ॥ २१ ॥
प्रवृद्धशाखाविटपं तरुणाङ्कुरपल्लवम्।
उत्पाट्य कुपितो दैत्यस्तरुं फलसमन्वितम् ॥ २२ ॥
निजघान हयाञ्छ्रेष्ठान् कुबेरस्य महात्मनः।
कुबेरकी बाणवर्षासे रोषमे भरे हुए उस महान् असुरने तनिक भी भयभीत न होकर इन्द्रध्वजके समान एक विशाल वृक्षको देखा, जिसकी शाखाएँ और टहनियाँ विशेषरूपसे बढ़ी हुई थीं। उसमे नये-नये अङ्कुर और पल्लव निकले हुए थे तथा वह फलसे भी सम्पन्न था। उस कुपित हुए दैत्यने उस वृक्षको उखाड़कर उसके द्वारा महात्मा कुबेरके श्रेष्ठ घोड़ोंको मार डाला ॥ २१-२२ १/२ ॥
तस्य कर्म महाघोरं दृष्ट्वा सर्वे महासुराः ॥ २३ ॥
सिंहनादं नदन्ति स्म अनुह्लादप्रहर्षिताः।
उसके उस महाघोर-कर्मको देखकर सभी बड़े-बड़े असुर अनुह्लादसे प्रसन्न हो जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे ॥ २३ १/२ ॥
तयोस्तु तुमुलं युद्धं संजज्ञे देवदैत्ययोः ॥ २४ ॥
ततस्तौ क्रोधरक्ताक्षावन्योन्यवधकाङ्क्षिणौ।
अन्योन्यं विविधैः शस्त्रैर्घोरैर्जघ्नतुराहवे ॥ २५ ॥
उन देवता (कुबेर) और दैत्य (अनुह्लाद) में तुमुल युद्ध होने लगा। दोनोंके नेत्र क्रोधसे लाल हो रहे थे। दोनों ही उस युद्धमें एक-दूसरेके वधकी इच्छासे भाँति-भाँतिके घोर शस्त्रोंद्वारा परस्पर आघात कर रहे थे ॥ २४-२५ ॥
त्रिदशा दानवान् सर्वे मथित्वा प्राणदंस्तदा।
दानवैस्त्रिदशाश्चापि क्रुद्धैर्भुवि निपातिताः ॥ २६ ॥
समस्त देवता दानव-योद्धाओंको रौंदकर जोर-जोरसे गर्जना करते थे। इसी प्रकार कुपित हुए दानवोंने भी देवताओंको पृथ्वीपर मार गिराया था ॥ २६ ॥
दानवास्त्वथ संक्रुद्धास्त्रिदशान् निशितैः शरैः।
विध्युर्वज्रसंकाशैः कङ्कपत्रैरजिह्मगैः ॥ २७ ॥
दानव अत्यन्त कुपित हो वज्रके तुल्य तेजस्वी तथा कङ्कपत्र लगे हुए सीधे जानेवाले तीखे बाणोंसे देवताओंको घायल करने लगे ॥ २७ ॥
विदार्यमाणा दैत्यौघैस्त्रिदशास्तु महाबलाः।
अमर्षिततराश्चक्रुर्युद्धकर्माण्यभीतवत् ॥ २८ ॥
दैत्यसमूहोंद्वारा घायल किये जाते हुए महाबली देवता अत्यन्त अमर्षमें भरकर निर्भयकी भाँति युद्धकर्म करने लगे ॥
तैर्गदाभिः सुभीमाभिः पट्टिशैः शूलमुद्गरैः।
परिघैश्च सुतीक्ष्णाग्रैर्दानवाः पीडिताः शरैः ॥ २९ ॥
उन्होंने भयंकर गदा, पट्टिश, शूल, मुद्गर, परिघ तथा तेज धारवाले बाणोंद्वारा दानवोंको बड़ी पीड़ा दी ॥ २९ ॥
शरनिर्भिन्नगात्राश्च खड्गविच्छिन्नवक्षसः।
जगृहुस्ते शिलाश्चैव द्रुमांश्चासुरसत्तमाः ॥ ३० ॥
उन असुरशिरोमणि योद्धाओंके अङ्ग बाणोंसे क्षत-विक्षत हो रहे थे। उनकी छाती खड्गसे छिन्न-भिन्न हो गयी थी; अतः उन्होंने भी बड़ी-बड़ी शिलाएँ और वृक्ष हाथमें ले लिये॥
ते भीमवेगा दितिजा नर्दमानाः पुनः पुनः।
ममन्थुस्त्रिदशान् वीर्याच्छतशोऽथ सहस्रशः ॥ ३१ ॥
उन भयंकर वेगवाले सैकड़ों और हजारों दैत्योंने वारंवार गर्जना करके अपने बल-पराक्रमसे देवताओंको मथ डाला ॥ ३१ ॥
ततस्तु तुमुलं युद्धं तेषां समभिवर्तत।
शिलाभिर्विपुलाभिश्च शतशश्चैव पादपैः ॥ ३२ ॥
परिघैः पट्टिशैर्भल्लैर्भिन्दिपालैः परश्वधैः।
तदनन्तर उनमें घमासान युद्ध आरम्भ हो गया। वे बड़ी-बड़ी शिलाओं, सैकड़ों वृक्षों तथा परिघ, पट्टिश, भल्ल, भिन्दिपाल और फरसोंद्वारा एक-दूसरेको मारने लगे ॥ ३२ १/२ ॥
केचिन्निवृत्तशिरसः केचिच्च विडलीकृताः ॥ ३३ ॥
केचिद् विनिहता भूमौ रुधिराद्रीः सुरासुराः।
किसीके सिर उड़ गये, कोई विदीर्ण हो गये, कोई भूमिपर गिराकर मार डाले गये। इस प्रकार सभी देवता और असुर खूनसे लथपथ हो रहे थे ॥ ३३ १/२ ॥
केचिद् रणाजिराग्रण्णाः परस्परवधार्दिताः ॥ ३४ ॥
विभिन्नहृदयाः केचिच्छिन्नपादाश्च शेरते।

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