भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 965

भविष्यपर्व ] षष्टितमोऽध्यायः ९४१

जोरसे सिंहनाद करने लगे। उस समय वे मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके समान घोष उत्पन्न करने और पर्वतोंको भी ताप सा देने लगे ॥ ५१-५२ ॥

तमवध्यं तु विज्ञाय निहन्तुं पुनरुत्थितम् ।
प्रेक्ष्य पिङ्गाक्षमायान्तं दानवा विप्रदुद्रुवुः ॥ ५३ ॥

पिङ्गल नेत्रवाले कुबेर अवध्य हैं और पुनः दानवोंका संहार करनेके लिये उठ गये हैं। यह जानकर उन्हें आते देख समस्त दानव सहसा भाग खड़े हुए ॥ ५३ ॥

तांस्तु विद्रवतो दृष्ट्वासुह्लादो ह्यसुरोऽब्रवीत् ।
कालनेमिं दानवं च वीर्यदर्पसमन्वितम् ॥ ५४ ॥
आत्मानं चैव वीर्यं च विस्मृत्याभिजर्न तथा ।
क्व गच्छथ भयत्रस्ताः प्राकृता इव दानवाः ॥ ५५ ॥
निवर्तध्वं महावीर्याः किं प्राणान् परिरक्षथ ।
नालं युद्धाय यक्षोऽयं महतीयं विभीषिका ॥ ५६ ॥

उन सबको भागते देख असुर अनुह्लादने कहा—‘महापराक्रमी दानवो ! तुमलोग बल और दर्पसे भरे हुए दानव कालनेमिको, अपनेको तथा अपने पराक्रम और कुलको भूलकर निम्नश्रेणीके मनुष्योंकी भाँति भयभीत होकर कहाँ भागे जा रहे हो। लौट आओ ! क्यों अपने प्राण बचानेकी चेष्टामें लगे हो। यह यक्ष युद्ध करनेमें समर्थ नहीं है, यह गर्जना इसकी महती विभीषिकामान्न है ॥ ५४-५६ ॥

एतां विभीषिकामद्य दानवानां समुत्थिताम् ।
विक्रम्य विधमिष्यामि निवर्तध्वं महासुराः ॥ ५७ ॥

‘महान् असुरो ! तुमलोग लौट आओ। मैं यक्षराजकी इस विभीषिकाको, जो दानवोंके लिये उठी हुई है, पराक्रमपूर्वक नष्ट कर दूँगा' ॥ ५७ ॥

तेऽसुराः संनिवृत्ताश्च समदा इव कुञ्जराः ।
निजघ्नुः परमक्रुद्धा देवसैन्यं महासुराः ॥ ५८ ॥

यह सुनकर मतवाले हाथियोंके समान वे असुर लौट आये और अत्यन्त क्रोधमें भरकर वे महान् असुर देवसेनाका संहार करने लगे ॥ ५८ ॥

क्षीणप्रहरणाः केचिन्महामेघनिभस्वनाः ।
दर्पोत्कटा भुजैरेव सम्प्रहारं प्रचक्रिरे ॥ ५९ ॥

कितने ही दैत्य आयुधोंके नष्ट हो जानेसे महान् मेघके समान केवल गर्जना कर रहे थे। कितने ही उत्कट दर्पसे युक्त हो भुजाओंसे ही प्रहार करते थे ॥ ५९ ॥

प्रांशुभिश्चैव काष्ठैश्च शिलाभिश्च महाबलाः ।
बाहुभिश्च तथान्योन्यमाक्षिपन्ति स्म वेगिताः ॥ ६० ॥

वे महान् बलशाली वेगवान् योद्धा ऊँचे-ऊँचे काष्ठों, शिलाओं तथा भुजाओं द्वारा एक दूसरेपर प्रहार करते थे ॥

मुष्टिभिश्च तलैश्चैव नखघातैर्महाबलाः ।
पादपैश्च महाशाखैर्युध्यन्त रणाजिरे ॥ ६१ ॥

महाबली सैनिक उस समराङ्गणमें मुक्कों, थप्पड़ों, नख-प्रहारों तथा बड़ी-बड़ी शाखाओंवाले वृक्षोंद्वारा युद्ध करते थे ॥

अनुह्लादस्त संक्रुद्धो देवतानां महाचमूम् ।
ममन्थ परमायत्तो वनान्यग्निरिवोत्थितः ॥ ६२ ॥

क्रोधमें भरा हुआ अनुह्लाद विजयके लिये परम प्रयत्नशील हो देवताओंकी उस विशाल वाहिनीको उसी प्रकार मथने लगा, जैसे प्रज्वलित हुआ दावानल जंगलोंको जलाकर भस्म कर डालता है ॥ ६२ ॥

रुधिराद्रांस्तु बहवः शेरते योधसत्तमाः ।
विकृताः पतिता भूमौ ताम्रपुष्पा इव द्रुमाः ॥ ६३ ॥

बहुत-से श्रेष्ठ योद्धा रक्तसे भी भीगकर विकृत अवस्थामें भूमिपर पड़े हुए सो रहे थे, जो लाल फूलवाले वृक्षोंके समान शोभा पाते थे ॥ ६३ ॥

अनुह्लादस्य विक्रान्तो देवस्त्वाशीविषोपमान् ।
युध्यमानस्य समरे व्यसृजन्निशिताञ्छरान् ॥ ६४ ॥

पराक्रमी देवता कुबेर समरभूमिमें जूझते हुए अनुह्लादपर विषधर सर्पोंके समान भयंकर और पैने बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ६४ ॥

धनाधिपेन विद्धस्य अनुह्लादस्य संयुगे ।
अङ्गारमिश्राः क्रुद्धस्य मुखान्निष्चेरुरर्चिषः ॥ ६५ ॥

युद्धमें धनाध्यक्ष कुबेरद्वारा घायल किये गये अनुह्लादके मुखसे क्रोधवश अङ्गारयुक्त आगकी लपटें निकलने लगीं ॥

अथ. वाणसहस्रेण वित्तेशं दानवोत्तमः ।
विव्याध स शरैः क्रुद्धो दण्डपाणिरिवान्तकः ॥ ६६ ॥

तब कुपित हुए दण्डधारी यमराजके समान दानवशिरोमणि अनुह्लादने धनेश्वर कुबेरको अपने सहस्रों बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ६६ ॥

कुबेरस्तु शरैर्भिन्नः समन्तात् क्षतजोक्षितः ।
रुधिरं परिसुस्राव गिरिः प्रस्रवणैरिव ॥ ६७ ॥

सब ओरसे बाणोंद्वारा विदीर्ण हुए कुबेर रक्तसे नहा गये। जैसे झरनोंसे युक्त पर्वत पानीकी धारा बहाता है, उसी प्रकार कुबेर अपने अङ्गोंसे रक्त बहाने लगे (और बेहोश हो गये) ॥ ६७ ॥

लब्ध्वा स तु पुनः संज्ञां रोषरक्तेक्षणः सुरः ।
गदामथ समासाद्य भीमां भीमपराक्रमः ।
चिक्षेप दैत्यमुद्दिश्य वलात् क्रोधेन मूर्च्छितः ॥ ६८ ॥

पुनः होशमें आनेपर रोषसे लाल आँखें किये भयानक पराक्रमी देवता कुबेरने भयंकर गदा हाथमें ले क्रोधसे अचेत-से होकर उस दैत्यको लक्ष्य करके उसे बलपूर्वक दे मारा ॥

अप्राप्तामन्तरे सोऽथ तां गदां गदयाऽसुरः ।
बभञ्ज विनदन् क्रुद्धस्तदाश्चर्यमभूत् तदा ॥ ६९ ॥

किंतु सिंहनाद करते हुए उस दैत्यने निकट आनेसे पहले ही अपनी गदासे उस गदाको क्रोधपूर्वक बीचमें ही तोड़ डाला। उस समय वह एक आश्चर्यकी-सी बात हुई ॥

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