भारतकोश
संग्रह पर लौटें

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

भविष्यपर्व ] षष्टितमोऽध्यायः ९४१

जोरसे सिंहनाद करने लगे। उस समय वे मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके समान घोष उत्पन्न करने और पर्वतोंको भी ताप सा देने लगे ॥ ५१-५२ ॥

तमवध्यं तु विज्ञाय निहन्तुं पुनरुत्थितम् ।
प्रेक्ष्य पिङ्गाक्षमायान्तं दानवा विप्रदुद्रुवुः ॥ ५३ ॥

पिङ्गल नेत्रवाले कुबेर अवध्य हैं और पुनः दानवोंका संहार करनेके लिये उठ गये हैं। यह जानकर उन्हें आते देख समस्त दानव सहसा भाग खड़े हुए ॥ ५३ ॥

तांस्तु विद्रवतो दृष्ट्वासुह्लादो ह्यसुरोऽब्रवीत् ।
कालनेमिं दानवं च वीर्यदर्पसमन्वितम् ॥ ५४ ॥
आत्मानं चैव वीर्यं च विस्मृत्याभिजर्न तथा ।
क्व गच्छथ भयत्रस्ताः प्राकृता इव दानवाः ॥ ५५ ॥
निवर्तध्वं महावीर्याः किं प्राणान् परिरक्षथ ।
नालं युद्धाय यक्षोऽयं महतीयं विभीषिका ॥ ५६ ॥

उन सबको भागते देख असुर अनुह्लादने कहा—‘महापराक्रमी दानवो ! तुमलोग बल और दर्पसे भरे हुए दानव कालनेमिको, अपनेको तथा अपने पराक्रम और कुलको भूलकर निम्नश्रेणीके मनुष्योंकी भाँति भयभीत होकर कहाँ भागे जा रहे हो। लौट आओ ! क्यों अपने प्राण बचानेकी चेष्टामें लगे हो। यह यक्ष युद्ध करनेमें समर्थ नहीं है, यह गर्जना इसकी महती विभीषिकामान्न है ॥ ५४-५६ ॥

एतां विभीषिकामद्य दानवानां समुत्थिताम् ।
विक्रम्य विधमिष्यामि निवर्तध्वं महासुराः ॥ ५७ ॥

‘महान् असुरो ! तुमलोग लौट आओ। मैं यक्षराजकी इस विभीषिकाको, जो दानवोंके लिये उठी हुई है, पराक्रमपूर्वक नष्ट कर दूँगा' ॥ ५७ ॥

तेऽसुराः संनिवृत्ताश्च समदा इव कुञ्जराः ।
निजघ्नुः परमक्रुद्धा देवसैन्यं महासुराः ॥ ५८ ॥

यह सुनकर मतवाले हाथियोंके समान वे असुर लौट आये और अत्यन्त क्रोधमें भरकर वे महान् असुर देवसेनाका संहार करने लगे ॥ ५८ ॥

क्षीणप्रहरणाः केचिन्महामेघनिभस्वनाः ।
दर्पोत्कटा भुजैरेव सम्प्रहारं प्रचक्रिरे ॥ ५९ ॥

कितने ही दैत्य आयुधोंके नष्ट हो जानेसे महान् मेघके समान केवल गर्जना कर रहे थे। कितने ही उत्कट दर्पसे युक्त हो भुजाओंसे ही प्रहार करते थे ॥ ५९ ॥

प्रांशुभिश्चैव काष्ठैश्च शिलाभिश्च महाबलाः ।
बाहुभिश्च तथान्योन्यमाक्षिपन्ति स्म वेगिताः ॥ ६० ॥

वे महान् बलशाली वेगवान् योद्धा ऊँचे-ऊँचे काष्ठों, शिलाओं तथा भुजाओं द्वारा एक दूसरेपर प्रहार करते थे ॥

मुष्टिभिश्च तलैश्चैव नखघातैर्महाबलाः ।
पादपैश्च महाशाखैर्युध्यन्त रणाजिरे ॥ ६१ ॥

महाबली सैनिक उस समराङ्गणमें मुक्कों, थप्पड़ों, नख-प्रहारों तथा बड़ी-बड़ी शाखाओंवाले वृक्षोंद्वारा युद्ध करते थे ॥

अनुह्लादस्त संक्रुद्धो देवतानां महाचमूम् ।
ममन्थ परमायत्तो वनान्यग्निरिवोत्थितः ॥ ६२ ॥

क्रोधमें भरा हुआ अनुह्लाद विजयके लिये परम प्रयत्नशील हो देवताओंकी उस विशाल वाहिनीको उसी प्रकार मथने लगा, जैसे प्रज्वलित हुआ दावानल जंगलोंको जलाकर भस्म कर डालता है ॥ ६२ ॥

रुधिराद्रांस्तु बहवः शेरते योधसत्तमाः ।
विकृताः पतिता भूमौ ताम्रपुष्पा इव द्रुमाः ॥ ६३ ॥

बहुत-से श्रेष्ठ योद्धा रक्तसे भी भीगकर विकृत अवस्थामें भूमिपर पड़े हुए सो रहे थे, जो लाल फूलवाले वृक्षोंके समान शोभा पाते थे ॥ ६३ ॥

अनुह्लादस्य विक्रान्तो देवस्त्वाशीविषोपमान् ।
युध्यमानस्य समरे व्यसृजन्निशिताञ्छरान् ॥ ६४ ॥

पराक्रमी देवता कुबेर समरभूमिमें जूझते हुए अनुह्लादपर विषधर सर्पोंके समान भयंकर और पैने बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ६४ ॥

धनाधिपेन विद्धस्य अनुह्लादस्य संयुगे ।
अङ्गारमिश्राः क्रुद्धस्य मुखान्निष्चेरुरर्चिषः ॥ ६५ ॥

युद्धमें धनाध्यक्ष कुबेरद्वारा घायल किये गये अनुह्लादके मुखसे क्रोधवश अङ्गारयुक्त आगकी लपटें निकलने लगीं ॥

अथ. वाणसहस्रेण वित्तेशं दानवोत्तमः ।
विव्याध स शरैः क्रुद्धो दण्डपाणिरिवान्तकः ॥ ६६ ॥

तब कुपित हुए दण्डधारी यमराजके समान दानवशिरोमणि अनुह्लादने धनेश्वर कुबेरको अपने सहस्रों बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ६६ ॥

कुबेरस्तु शरैर्भिन्नः समन्तात् क्षतजोक्षितः ।
रुधिरं परिसुस्राव गिरिः प्रस्रवणैरिव ॥ ६७ ॥

सब ओरसे बाणोंद्वारा विदीर्ण हुए कुबेर रक्तसे नहा गये। जैसे झरनोंसे युक्त पर्वत पानीकी धारा बहाता है, उसी प्रकार कुबेर अपने अङ्गोंसे रक्त बहाने लगे (और बेहोश हो गये) ॥ ६७ ॥

लब्ध्वा स तु पुनः संज्ञां रोषरक्तेक्षणः सुरः ।
गदामथ समासाद्य भीमां भीमपराक्रमः ।
चिक्षेप दैत्यमुद्दिश्य वलात् क्रोधेन मूर्च्छितः ॥ ६८ ॥

पुनः होशमें आनेपर रोषसे लाल आँखें किये भयानक पराक्रमी देवता कुबेरने भयंकर गदा हाथमें ले क्रोधसे अचेत-से होकर उस दैत्यको लक्ष्य करके उसे बलपूर्वक दे मारा ॥

अप्राप्तामन्तरे सोऽथ तां गदां गदयाऽसुरः ।
बभञ्ज विनदन् क्रुद्धस्तदाश्चर्यमभूत् तदा ॥ ६९ ॥

किंतु सिंहनाद करते हुए उस दैत्यने निकट आनेसे पहले ही अपनी गदासे उस गदाको क्रोधपूर्वक बीचमें ही तोड़ डाला। उस समय वह एक आश्चर्यकी-सी बात हुई ॥

९४२श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

प्रगृह्य तु गदां भूयो ह्यभिदुद्राव दानवम्।
तमापतन्तं दृष्ट्वैव अनुह्लादो महाबलः ॥ ७० ॥
गिरिशृङ्गमिवोत्पाट्य कैलासाचलसंनिभम्।
धनाधिपं प्रदुद्राव व्यादितास्य इवान्तकः ॥ ७१ ॥

कुबेर पुनः गदा लेकर उस दानवकी ओर दौड़े। महाबली अनुह्लाद उन्हें आक्रमण करते देख कैलास पर्वतके सदृश विशाल शैलशिखर-सा उखाड़कर मुँह बाये हुए कालके समान धनाध्यक्षकी ओर दौड़ा ॥ ७०-७१ ॥

तमन्तकमिवायान्तमजेयं सकलैः सुरैः।
ग्रसन्तमिव तं दैत्यं त्रैलोक्यमखिलं रुषा ॥ ७२ ॥
तमालोक्य तथा भूतं धनाध्यक्षो रणं भयात्।
अपहाय ययौ तत्र यत्र शक्रः सुराधिपः ॥ ७३ ॥

वह दैत्य समस्त देवताओंके लिये अजेय था और यमराजके समान रोषवश सम्पूर्ण त्रिलोकीको ग्रस लेनेके लिये उद्यत जान पड़ता था। उसे उस रूपमें आते देख धनाध्यक्ष कुबेर भयके कारण रणभूमिको त्यागकर उस स्थानपर चले गये, जहाँ देवराज इन्द्र युद्ध करते थे ७२-७३

तस्य चापि महत् कर्म दृष्ट्वा वित्तपतिस्तदा।
जगाम भयसंत्रस्तो यत्र देवः शचीपतिः ॥ ७४ ॥

उसका महान् पराक्रम देखकर धनपति कुबेर भयसे थर्रा उठे और जहाँ शचीपति इन्द्र थे, वहीं चले गये ॥७४॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे देवासुरयुद्धे अनुह्लादकुबेरयुद्धवर्णने षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें देवासुरसंग्राममें अनुह्लाद और कुबेरके युद्धका वर्णनविषयक साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६० ॥


एकषष्टितमोऽध्यायः

वरुणका विप्रचित्तिके साथ युद्ध और पराजय

वैशम्पायन उवाच

विप्रचित्तिस्तु वरुणं दैत्यानामादिरव्ययम्।
जघानेषुगणैः क्रुद्धो दीप्तैरिव महोरगैः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! दैत्योंके आदि पुरुष विप्रचित्तिने अविनाशी देवता वरुणको क्रोधपूर्वक अपने बाणसमूहोंसे घायल कर दिया। उसके वे बाण तेजस्वी सर्पोंके समान जान पड़ते थे ॥ १ ॥

स दह्यमानो दैत्येन दीप्तैः शरगभस्तिभिः।
नाभ्यजानत कर्तव्यं संग्रामे स जलेश्वरः ॥ २ ॥

वह दैत्य जब बाणरूपी दीप्तिमान् किरणोंसे वरुणको दग्ध करने लगा, उस समय संग्राममें खड़े हुए जलेश्वर वरुण यह भी न समझ सके कि अब मुझे क्या करना चाहिये ॥ २ ॥

सर्वलोकेश्वरस्येव परमेष्ठी प्रजापतिः।
न शक्तोत्यग्रतः स्थातुं विप्रचित्तेर्जलाधिपः ॥ ३ ॥

जैसे सर्वलोकेश्वर परमात्माके समक्ष प्रजापति परमेष्ठी नहीं ठहर सकते, इसी प्रकार दानवराज विप्रचित्तिके आगे जलके स्वामी वरुण नहीं ठहर सके ॥ ३ ॥

वज्रो नाम महान्व्यूहो निर्भयः सर्वतोमुखः।
तं व्यूह्य प्रत्ययुध्यन्त दानवा देववाहिनीम् ॥ ४ ॥

वज्रनामक महान् व्यूहका मुख सब ओर होता है, वह सर्वथा निर्भय हुआ करता है। उसी व्यूहका आश्रय लेकर दानव-योद्धा देवसेनाके साथ युद्ध करने लगे ॥ ४ ॥

वह्निज्वालासमं तत्र रविमण्डलसंनिभम्।
मुखमाभाति दैत्यस्य विप्रचित्तेर्महात्मनः ॥ ५ ॥

महामनस्वी विप्रचित्ति नामक दैत्यका मुख वहाँ अग्निज्वाला तथा सूर्यमण्डलके समान प्रकाशित होता था ॥ ५ ॥

वरुणस्तु महातेजा विप्रचित्तिं महासुरम्।
प्रदहन्निव तेजोभिर्जिगीषुः प्रत्यवैक्षत ॥ ६ ॥

महातेजस्वी वरुणने विजयकी इच्छा मनमें लेकर विप्रचित्ति नामक महान् असुरकी ओर इस प्रकार देखा, मानो वे अपने तेजसे उसको दग्ध कर डालेंगे ॥ ६ ॥

स्रग्दाममालाभरणः केयूराङ्गदभूषणः।
जग्राह परिघं दैत्यः कैलासशिखरोपमम् ॥ ७ ॥

दैत्य विप्रचित्ति फूलोंके हार तथा सुवर्ण आदिकी मालाओंसे अलंकृत था। उसकी भुजाओंमें केयूर तथा अङ्गद नामक आभूषण शोभा दे रहे थे। उसने कैलासशिखरके समान एक परिघ हाथमें लिया ॥ ७ ॥

पिनद्धं काञ्चनैः पट्टैर्हेममालिनमायसम्।
यमदण्डोपमं घोरं दैत्यानां भयनाशनम् ॥ ८ ॥

उसपर सोनेके पत्र जड़े हुए थे। वह परिघ लोहेका बना हुआ था और सोनेकी मालासे अलंकृत था। देखनेमें यमदण्डके समान भयंकर था, किंतु दैत्योंके भयका नाश करनेवाला था ॥ ८ ॥

भ्रामयामास संक्रुद्धो महाशक्रध्वजोपमम्।
विननाद विवृत्ताक्ष्यो विप्रचित्तिर्महासुरः ॥ ९ ॥

महान् असुर विप्रचित्तिने अत्यन्त कुपित होकर इन्द्र

[भविष्यपर्व] एकषष्टितमोऽध्यायः ९४३

ध्वजके समान उस विशाल परिघको घुमाया और मुँह फैलाकर बड़ी जोर-जोरसे गर्जना की॥ ९॥

स कण्ठस्थेन निष्केण भुजस्थैरपि चाङ्गदैः।
कुण्डलाभ्यां विचित्राभ्यां भ्राजते काञ्चनस्रजा॥ १०॥
उसके कण्ठमें सुवर्णमय पदक, भुजाओंमें बाजूबंद, कानोंमें विचित्र कुण्डल तथा वक्षःस्थलपर सोनेके हार सुशोभित थे, जिनसे वह दानव प्रकाशित हो रहा था ॥१०॥

दानवो भूषणैर्भाति परिघेणायसेन च।
यथेन्द्रधनुषा मेघः सविद्युत्स्तनयित्नुमान्॥ ११॥
लोहेके परिघ और सोनेके आभूषणोंसे युक्त वह दानव इन्द्रधनुष, विद्युत् और गर्जनासे युक्त मेघके समान शोभा पा रहा था॥ ११॥

प्रस्फुरन् परिघाग्रेण वातस्कन्धान्महास्वनः।
जज्वाल च सधूमार्चिः साङ्घर्पण इवानलः॥ १२॥
परिघनामक अस्त्रसे वायुसमूहोंको संचालित करते हुए जोर-जोरसे सिंहनाद करनेवाला वह दैत्य धूम और ज्वालाओं-सहित प्रलयकालीन अग्निके समान प्रज्वलित हो उठा॥

विद्याधरगणैः सार्धं गन्धर्वनगरैरपि।
सह चैवामरावत्या सिद्धलोकैस्तथा सह॥ १३॥
ग्रहनक्षत्रसहितं सार्कचन्द्रविभूषितम्।
दैत्येन्द्रपरिघोद्धूतं भ्रमतीव नभस्तलम्॥ १४॥
विद्याधरगण, गन्धर्वनगर, अमरावती पुरी तथा सिद्ध-लोकोंके साथ ग्रह-नक्षत्रोंसहित एवं सूर्य और चन्द्रमासे विभूषित आकाश उस दैत्यराजके परिघसे उद्ध्रान्त होकर चक्कर-सा काटने लगा॥ १३-१४॥

दुरासदः सुसंज्ञे परिघाभरणक्षमः।
सुरेन्धनोऽसुरेन्द्राग्निर्यंगान्ताग्निरिवोत्थितः॥ १५॥
परिघको धारण करने और सब ओर घुमानेमें समर्थ वह दैत्य दुर्जय हो गया था। अग्निके समान तेजस्वी वह असुरराज विप्रचित्ति प्रलयकालकी आगके समान उठ खड़ा हुआ था, देवता उसकी आँचसे ईन्धनकी भाँति जल रहे थे॥ १५॥

त्रिदशा वरुणश्चैव न शेकुः स्पन्दितुं भयात्।
तत्रासीन्निर्भयस्त्वेकः कौशिको वासवः प्रभुः॥ १६॥
देवता और वरुण उसके भयके मारे हिल-डुल भी न सके। वहाँ एकमात्र सामर्थ्यशाली कौशिक इन्द्र ही निर्भय खड़े रहे॥ १६॥

भास्करप्रतिमं घोरं परिघं रौद्रदर्शनम्।
पातयामास सेनायां जलेशस्य स दानवः॥ १७॥
उस दानवने उस सूर्यतुल्य तेजस्वी घोर परिघको, जो देखनेमें बड़ा ही भयंकर था, जलेश्वर वरुणकी सेनामें गिराया॥ १७॥

पतता तेन संग्रामे जलेशस्य महात्मनः।
भूतानां शतसाहस्रं परिघेण समाहतम्।
तेषां गात्राणि चासाद्य व्यशीर्यन्त सहस्रशः॥ १८॥
संग्रामभूमिमें वहाँ गिरते हुए उस परिघने महात्मा वरुण-के एक लाख भूतोंको हताहत कर दिया। उस परिघसे टकरा-कर उनके शरीरोंके सहस्रों टुकड़े हो गये॥ १८॥

विशीर्यमाणं विचभावुल्काशतमिवाम्बरे।
भूयश्चैनं तदाऽऽभ्राम्य वरुणाय न्यपातयत्॥ १९॥
जीर्ण-शीर्ण होते हुए वरुणके सैनिक आकाशमें सैकड़ों उल्काओंके समान प्रतीत हो रहे थे। तदनन्तर विप्रचित्तिने पुनः उस परिघको घुमाकर वरुणपर दे मारा॥ १९॥

पात्यमाने तदा तस्मिञ्छरीरे वारुणे तदा।
स भिन्नः परिघो घोरो देवगात्रे व्यशीर्यत॥ २०॥
वरुणके शरीरपर पड़ते ही उस परिघके टुकड़े-टुकड़े हो गये। वह भयंकर परिघ वरुणदेवके शरीरसे टकराकर टूक-टूक हो गया॥ २०॥

शीर्यमाणस्य चूर्णानि खद्योता इव चाम्बरे।
स तु तेन प्रहारेण न चचाल जलाधिपः॥ २१॥
परिघेण हतः संख्ये यथा वज्रहतोऽचलः।
जीर्ण-शीर्ण होकर गिरते हुए उस परिघके चूर्ण आकाश-में खद्योतोंके समान प्रकाशित होते थे। उस प्रहारसे जलेश्वर वरुण विचलित नहीं हुए। परिघकी मार खाकर भी वे युद्धमें वज्रसे आहत हुए पर्वतकी भाँति स्थिरभावसे खड़े रहे॥ २१॥

खसैन्येष्वपि भग्नेषु भिन्नदेहेषु चाहवे॥ २२॥
मुहूर्तमगमत् क्षोभमपाम्पतिरमर्षणः।
सोऽमर्षं च समापन्नो वरुणोऽमितविक्रमः॥ २३॥
युद्धस्थलमें अपने सैनिकोंके भग्न एवं घायल होनेपर अमर्षशील जलेश्वर वरुणको दो घड़ीतक बड़ा क्षोभ रहा। वे अमित पराक्रमी वरुण अमर्षमें भर गये॥ २२-२३॥

सर्वसंहारमकरोत् स्वपक्षस्यारिमर्दनः।
स सागरैश्चतुर्भिंश्च वृतो दीप्तैश्च पन्नगैः॥ २४॥
शङ्खमुक्तामणिश्चितो विभ्रत्तोयमयं वपुः।
पाण्डुरोद्धूतवसनो नानारत्नविभूषितः॥ २५॥
तत्पश्चात् शत्रुमर्दैन वरुणने अपने पक्षके सभी लोगोंको पूर्णतः संगठित किया। वे जलमय शरीर धारण करके शङ्खों और मुक्तामणियोँसे विभूषित हुए। उस समय चारों समुद्र उन्हें घेरकर खड़े हो गये। तेजस्वी सर्पोंने भी उनका साथ दिया। उनके श्वेत वस्त्र हवासे हिल रहे थे तथा वे नाना प्रकारके रत्नोंसे अलंकृत थे॥ २४-२५॥

वरुणः पाशधृक्श्रीमान् कूर्ममीनसमाकुलः।
वरुणस्तु तदा क्रुद्धस्तान् निरीक्ष्य स्वसैनिकान्॥ २६॥

९४४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


उवाच दृष्ट्वा युध्यध्वं दानवानां जिघांसया ।
अहमेनं हनिष्यामि भयं मुक्त्वा तु युध्यत ॥ २७ ॥
कछुओं और मत्स्योंसे व्याप्त हुए पाशधारी श्रीमान् वरुणदेवने कुपित हो अपने सैनिकोंकी ओर देखकर कहा— 'वीरो ! तुमलोग दानवोंके वधकी इच्छासे युद्ध करो। मैं इस दानवका वध करूँगा। तुमलोग भय छोड़कर युद्धमें डटे रहो' ॥ २६-२७ ॥

ततस्ते पन्नगाः सर्वे महार्णवजलाश्रयाः ।
जघ्नुर्दैत्यान् रणमुखे नदन्तो जयगृद्धिनः ॥ २८ ॥
तब महासागरके जलमें निवास करनेवाले समस्त सर्प विजयकी अभिलाषासे सिंहनाद करते हुए युद्धके मुहानेपर दैत्योंका संहार करने लगे ॥ २८ ॥

ते तु नालीकनाराचैर्गदाभिर्मुसलैस्तथा ।
अभ्यघ्नन् दानवान् दृष्ट्वा मुदिता वरुणानुगाः ॥ २९ ॥
हर्ष और उल्लासमें भरे हुए वरुणके उन सैनिकोंने नालीक, नाराच, गदा और मुसलोंद्वारा दानवोंको मारना आरम्भ किया ॥ २९ ॥

विप्रचित्तिस्तु संक्रुद्धो महाबलपराक्रमः ।
पन्नगानां शरीराणि व्यधमद् युद्धदुर्मदः ॥ ३० ॥
तब महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न रणदुर्मद विप्रचित्ति अत्यन्त कुपित हो सर्पोंके शरीरोंका विनाश करने लगा ॥ ३० ॥

गरुडेनापि चास्त्रेण पन्नगान् दानवोत्तमः ।
समरे घातयामास गरुडैः पन्नगाशनैः ॥ ३१ ॥
उस दानव-शिरोमणिने गरुडास्त्रका प्रयोग करके सर्प-भोजी गरुड़ोंद्वारा समराङ्गणमें सर्पोंका संहार करा दिया ॥

स शरैः सूर्यसंकाशैः शातकुम्भविभूषितैः ।
पन्नगान् समरे वीरः प्रममाथ सुदुर्जयन् ॥ ३२ ॥
संग्रामभूमिमें वीर विप्रचित्तिने सूर्यतुल्य तेजस्वी सुवर्ण-भूषित बाणोंद्वारा अत्यन्त दुर्जय सर्पोंको मथ डाला ॥ ३२ ॥

समरे भिन्नगात्रास्ते पन्नगाः शरपीडिताः ।
पेतुरन्मथितसर्वाङ्गा गजा इव महागजैः ॥ ३३ ॥
रणभूमिमें बाणोंसे पीड़ित हुए सभी सर्प घायल हो धराशायी हो गये। उस समय वे जिनके सारे अङ्ग महान् गजराजोंने मथ डाले हों उन हाथियोंके समान पृथ्वीपर पड़े थे ॥ ३३ ॥

तपन्तं तमिवादित्यं दीप्तैर्बाणगभस्तिभिः ।
अभ्यधावत संक्रुद्धः समरे वरुणः प्रभुः ॥ ३४ ॥
उस समय समराङ्गणमें बाणरूपी दीप्तिमान् किरणोंद्वारा सूर्यके समान तपनेवाले उस दैत्यपर भगवान् वरुणने अत्यन्त क्रोधपूर्वक धावा किया ॥ ३४ ॥

ततस्तु दानवास्तत्र भिन्नदेहाः सहस्रशः ।
व्यथिता विद्रवन्ति स्म दिशो दश विचेतसः ॥ ३५ ॥
फिर तो उनके द्वारा शरीर छिन्न-भिन्न हो जानेके कारण वहाँ पीड़ित हुए सहस्रों दानव अचेत-से होकर दसों दिशाओंमें भागने लगे ॥ ३५ ॥

इन्द्रस्यार्थे पराक्रम्य वरुणस्त्यक्तजीवितः ।
विनर्दमानो युयुधे समरे पाशभृद्वरः ॥ ३६ ॥
पाशधारियोंमें श्रेष्ठ वरुणदेव जीवनका मोह छोड़कर पराक्रमपूर्वक गर्जना करते हुए समरभूमिमें इन्द्रके लिये युद्ध करने लगे ॥ ३६ ॥

वरुणः पन्नगाश्चैव मुष्टिभिः समरोत्कटाः ।
अभ्यवर्तन्त समरे विप्रचित्तिं महासुरम् ॥ ३७ ॥
वरुण और सर्प युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले थे; वे शत्रुओंपर मुक्कोंका प्रहार करते हुए संग्रामभूमिमें महान् असुर विप्रचित्तिका सामना करने लगे ॥ ३७ ॥

ततोऽस्त्रैश्च शिलाभिश्च प्रहरन् स बलोत्कटः ।
व्यपोहत महातेजा विप्रचित्तिर्महासुरः ॥ ३८ ॥
तत्पश्चात् उत्कट बलशाली, महातेजस्वी महान् असुर विप्रचित्तिने अस्त्रों और शिलाओंद्वारा प्रहार किया और शत्रुओंको मार भगाया ॥ ३८ ॥

ततः पावकसंकाशैः स मुक्तैः शीघ्रगामिभिः ।
वरुणस्य महावेगान् विभेद समरे हयान् ॥ ३९ ॥
उसने अपने धनुषसे छूटे हुए अग्नितुल्य तेजस्वी एवं शीघ्रगामी बाणोंद्वारा वरुणके महान् वेगशाली घोड़ोंको समराङ्गणमें क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ३९ ॥

कर्मणा तेन महता विप्रचित्तेर्महात्मनः ।
अग्नेराज्याहुतस्येव तेजः समभिवर्धत ॥ ४० ॥
जैसे घीकी आहुति देनेसे अग्निका तेज बढ़ता है, उसी प्रकार उस महान् कर्मसे महामनस्वी विप्रचित्तिका तेज एवं प्रताप बढ़ने लगा ॥ ४० ॥

स शरैः सूर्यसंकाशैः सुमुक्तैः शीघ्रगामिभिः ।
वारुणीं तां महासेनां निर्ममन्थ महाबलः ॥ ४१ ॥
उस महाबली दानवने भलीभाँति छोड़े गये शीघ्रगामी एवं सूर्यतुल्य तेजस्वी बाणोंद्वारा वरुणदेवकी उस विशाल सेनाको मथ डाला ॥ ४१ ॥

क्षीणास्त्रां सायकाक्रान्तां शरजालेन मोहिताम् ।
शूलशक्त्यृष्टिभिन्नां च चकार रुधिरोक्षिताम् ॥ ४२ ॥
उसने वरुणके सैनिकोंके अस्त्र-शस्त्र काट डाले, उन्हें सायकोंसे आक्रान्त कर दिया; वे सब-के-सब उसके बाणजालसे आच्छादित होकर मोहके वशीभूत हो गये, विप्रचित्तिने उन सबको शूल, शक्ति और ऋष्टि आदि शस्त्रोंसे घायल करके खूनसे लथपथ कर दिया ॥ ४२ ॥

भविष्यपर्व ] द्विषष्टितमोऽध्यायः ९४५


स शरैर्वह्निसंकाशैः सुमुक्तैर्नतपर्वभिः ।
वरुणस्य महावेगान् बिभेद समरे हयान् ॥ ४३ ॥

अभिद्रुतोऽथ दैत्येन ससैन्यः सलिलाधिपः ।
महेन्द्रं शरणं प्राप्तो विप्रचित्तेर्भयार्दितः ॥ ४४ ॥

उस दानवने उत्तम रीतिसे छोड़े गये झुकी हुई गाँठवाले अग्नितुल्य तेजस्वी बाणोंद्वारा समरभूमिमें वरुण देवताके महान् वेगशाली घोड़ोंको घायल कर दिया ॥ ४३ ॥

उस दैत्यने जलके स्वामी वरुणको सेनासहित वहाँसे भाग जानेको विवश कर दिया । वे विप्रचित्तिके भयसे पीड़ित हो देवराज इन्द्रकी शरणमें चले गये ॥ ४४ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामने वरुणविप्रचित्तियुद्धे एकषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें वरुण और विप्रचित्तिका युद्धविषयक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६१ ॥


द्विषष्टितमोऽध्यायः

अग्निद्वारा दैत्योंकी पराजय तथा बृहस्पतिके द्वारा अग्निदेवका स्तवन

वैशम्पायन उवाच
पराजयं तु देवानां दृष्ट्वाग्निर्देवसत्तमः ।
चकार बुद्धिं दैत्यानां वधे ब्रह्मर्षिभिः स्तुतः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! देवताओंकी यह पराजय देखकर ब्रह्मर्षियोंद्वारा प्रशंसित देवशिरोमणि अग्निने दैत्योंके वधका विचार किया ॥ १ ॥

स्वयं प्रभायाः शाण्डिल्या यः पुत्रो हव्यवाहनः ।
हिरण्यरेताः पिङ्गाक्षो देवहूतो हुताशनः ॥ २ ॥
रोहितो लोहितग्रीवो हर्ता दाता हविः कविः ।
पावको विश्वभुग् देवः सर्वदेवाननः प्रभुः ॥ ३ ॥
सुब्रह्मात्मा सुवर्चस्कः सहस्रार्चिर्विभावसुः ।
कृष्णवर्त्मा चित्रभानुर्देवानाम्पि देवराट् ॥ ४ ॥
लोकसाक्षी द्विजहुतः सदर्चिष्मान् वषट्कृतः ।
हव्यभक्षः शमीगर्भस्वयोनिः सर्वकर्मकृत् ॥ ५ ॥
पावनः सर्वभूतानां त्रिदशानां तपोनिधिः ।
शमनः सर्वपापानां लेलिहानस्तपोमयः ॥ ६ ॥
प्रदक्षिणावर्तशिखः शुचिरोमा महाकृतिः ।
हव्यभुग् भूतभव्येशो यज्ञभागहरो हरिः ॥ ७ ॥
सोमपः सुमहातेजा भूतेशः सुमहातपाः ।
अधृष्यः पावको भूतिर्भूतात्मा वै स्वधाधिपः ॥ ८ ॥
स्वाहापतिः सामगीतः सोमपूताशनोऽद्रिधृक् ।
देवदेवो महाक्रोधो रुद्रात्मा ब्रह्मसम्भवः ॥ ९ ॥
लोहिताश्वं वायुचक्रं रथमास्थाय भूतधृक् ।
धूमकेतुर्धूमशिखो नीलवासाः सुरोत्तमः ॥ १० ॥
उद्यम्य दिव्यमाग्नेयं शस्त्रं देवो रणे महान् ।
दानवानां सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च ॥ ११ ॥
ददाह भगवान् वह्निः संक्रुद्धः प्रलये यथा ।

जो स्वयंप्रभा शाण्डिलीके पुत्र हैं, हविष्यका वहन करते हैं। सुवर्ण जिनका रेतस् (वीर्य) है। जिनके नेत्र पिङ्गल वर्णके हैं। देवता जिनका आवाहन करते हैं। जो आहुतिमें प्राप्त हुए हविष्यका भक्षण करते हैं। जिनका वर्ण लाल है। जिनकी ग्रीवा भी लाल रंगकी बतायी गयी है। जो दोषोंका हरण करनेवाले, दाता, हव्य-कव्यस्वरूप, पवित्र करनेवाले, विश्वभोक्ता, देव, सम्पूर्ण देवताओंके मुख तथा सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। सुन्दर वेद जिनके स्वरूप हैं। जो उत्तम तेजसे सम्पन्न हैं। जिनसे सहस्रों ज्वालाएँ उठती रहती हैं। विभा (उत्कृष्ट प्रभा) ही जिनका वसु (धन) है। जिनका मार्ग कृष्ण है। जो विचित्र किरणोंसे प्रकाशित होते हैं तथा देवताओंके भी देवराज हैं। जिन्हें सम्पूर्ण जगत्का साक्षी माना गया है। द्विजगण जिन्हें आहुति देकर तृप्त करते हैं। जो उत्तम ज्वालाओंसे सम्पन्न और वषट्कारस्वरूप हैं। शमीगर्भ—अश्वत्थ ही जिनके लिये अपने प्राकट्यका कारण है। जो हविष्यभोक्ता तथा सम्पूर्ण वैदिक कर्मोंको सम्पन्न करनेवाले हैं। जो सम्पूर्ण भूतोंको पवित्र करनेवाले, देवताओंमें तपोनिधि, पापोंको शान्त करनेमें समर्थ, अपनी ज्वालारूपी जिह्वाओंको लपलपानेवाले और तपोमय हैं। जिनकी शिखा (ज्वाला) दक्षिणावर्त होती है। जिनका धूम पवित्र है। यज्ञ जिनका स्वरूप है। जो हविष्यके भोक्ता, भूत और वर्तमानके स्वामी, यज्ञभागको पहुँचानेवाले तथा श्रीहरिस्वरूप हैं। जो सोमपान करनेवाले, महान् तेजसे सम्पन्न, भूतनाथ, महातपस्वी, अजेय, पावक, ऐश्वर्यस्वरूप, सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा और स्वधाके स्वामी हैं। साममन्त्रोंद्वारा जिनकी महिमा गायी गयी है। जो स्वाहा-देवीके पति हैं, सोमयागके द्वारा पवित्र सोमरसका पान करते हैं। जिनके लिये सोमरस निकालनेके निमित्त लोढ़े धारण किये जाते हैं। जो देवताओंके भी देवता, महाक्रोधी, रुद्रस्वरूप तथा ब्रह्माजीसे उत्पन्न हुए हैं। वे सम्पूर्ण भूतोंको धारण करनेवाले, धूमरूपी ध्वजा एवं शिखासे युक्त, नील-वस्त्रधारी, सुरश्रेष्ठ महान् देवता भगवान् अग्निदेव लाल घोड़ों और वायुरूपी पहियोंवाले रथपर आरूढ़ हो रणभूमिमें दिव्य आग्नेयास्त्र उठाकर प्रलयकालकी भाँति कुपित हो

९४६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


सहस्रों, लाखों और अर्बुदों दानवोंको दग्ध करने लगे ॥ २-११३ ॥

प्राणो यः सर्वभूतानां देहे तिष्ठति पञ्चधा ॥ १२ ॥
यन्ता यश्च हुताशस्य सखा च प्रभुरीश्वरः ।
प्रभञ्जनो यो लोकानां युगान्ते सर्वनाशनः ॥ १३ ॥
सप्तस्वरगता यस्य योनिर्गीर्भरुदीर्यते ।
यो ह्याकाशमयो देवो दूरगः सर्वसम्भवः ॥ १४ ॥
यश्च कर्ता विकर्ता च गतिर्गतिमत् प्रभुः ।
वेदकर्ता समो लोके ब्रह्मणो यः सनातनः ॥ १५ ॥
अमूर्त्तिमन्तं यं प्राहुर्महाभूतं महत्तमम् ।
सोऽग्निं समीरयामास शमीगर्भं समीरणः ॥ १६ ॥

जो समस्त प्राणियोंके शरीरमें पाँच प्राणोंके रूपमें निवास करते हैं। जो अग्निदेवके सारथि और सखा हैं, जो प्रभावशाली तथा ईश्वर हैं। जो प्रलयकालमें समस्त लोकोंका भञ्जन करनेवाले और सर्वसंहारक हैं। जिनकी उत्पत्तिका कारणभूत आकाश श्रुतियोंद्वारा सप्तस्वरमय नाद-ब्रह्मको प्राप्त बताया जाता है। जो आकाशमय देवता हैं, दूरतक जानेकी शक्ति रखते हैं तथा सबकी उत्पत्तिके कारण हैं। जो कर्ता (स्रष्टा) और विकर्ता (संहारक) हैं, जङ्गम प्राणियोंकी गति और प्रभु हैं। जो परमात्माके निःश्वासरूपसे वेदमन्त्रोंको प्रकट करनेवाले हैं। लोकमें चतुर्मुख ब्रह्माके समान सनातन पुरुष हैं तथा जिन्हें सबसे महान् अमूर्त महाभूत कहा गया है, उन सर्वप्रेरक वायुदेवने शमीगर्भसे उत्पन्न अग्निदेवको प्रेरणा देकर सबल बनाया ॥ १२-१६ ॥

त्रिदिवारोहिभिर्ज्वालैर्जृम्भमाणो दिशो दश ।
दानवानामभावाय युगान्ताग्निरिवोत्थितः ॥ १७ ॥

वे स्वर्गलोकतक फैली हुई अपनी ज्वालाओं द्वारा दसों दिशाओंमें बढ़ने लगे और दानवोंका विनाश करनेके लिये प्रलयकालीन अग्निके समान उठ खड़े हुए ॥ १७ ॥

मेदोमज्जामहापङ्कां केशशैवालशालिनीम् ।
योधशीर्षोपलवहां मृतद्विपतटोत्कटाम् ॥ १८ ॥
शोणितोदां रणे दृष्ट्वा संग्रामसरितं विभुः ।
वह्निः प्रस्कन्दयामास दैत्यानां भयवर्धनः ॥ १९ ॥

मेदा और मज्जा जिसमें महान् पङ्क थे, जो केशरूपी सेवारोंसे सुशोभित होती थी, योद्धाओंके कटे हुए मस्तक जिसमें प्रस्तरखण्डोंके समान प्रतीत होते थे, मरे हुए हाथियोंकी लाशें जिसके ऊँचे तटोंकी भाँति जान पड़ती थीं तथा जिसमें रक्तरूपी जल बह रहा था, रणभूमिमें उस संग्राम-सरिताको देखकर दैत्योंका भय बढ़ानेवाले भगवान् अग्निदेवने उसे और भी तीव्र गतिसे प्रवाहित किया ॥ १८-१९ ॥


ततोऽग्निर्दितिजान् सर्वान् प्रह्लादप्रमुखांस्तथा ।
पराजयानः स विभुः क्रोशमानो महामृधे ॥ २० ॥

तदनन्तर उस महासमरमें गर्जना करते हुए व्यापक अग्निदेव प्रह्लाद आदि समस्त दैत्योंको पराजित करने लगे ॥ २० ॥

केचित् प्रदीप्तैर्मुकुटैः केचिद् दीप्तैः शिरोरुहैः ।
केचित् प्रदीप्तवसनैः केचिद् दीप्तैर्भुजाननैः ॥ २१ ॥
केचित् प्रदीप्तैरूरुभिः केचिच्छत्रैर्ध्वजै रथैः ।
असुरास्तत्र दृश्यन्ते प्रदीप्तेनाग्निना वृताः ॥ २२ ॥

किन्हींके मुकुट जलने लगे, किन्हींके सिरके बालोंमें आग लग गयी, किन्हींके कपड़े जलने लगे, किन्हींकी भुजाओं और मुखोंमें आग जल उठी, किन्हींकी जाँघें जल गयीं और किन्हींके छत्र, ध्वज तथा रथ जलकर भस्म हो गये। वहाँ समस्त असुर प्रज्वलित आगकी लपटोंसे घिरे दिखायी देने लगे ॥ २१-२२ ॥

त्यक्त्वाऽऽयुधानि सर्वाणि सध्वजांश्च रथोत्तमान् ।
प्रयान्ति समरे भीताः पावकेन पराजिताः ॥२३॥

उस पावकसे पराजित एवं भयभीत हो समस्त दैत्य-दानव समरभूमिमें अपने सारे आयुधों और ध्वजसहित उत्तम रथोंको त्यागकर भागने लगे ॥ २३ ॥

न च पश्यन्ति ते वह्निं प्रदीप्तं ध्वजिनीमुखे ।
दिशः खड्गांश्च मेघांश्च दीप्तान् पश्यन्ति दानवाः ॥२४॥

वे दानव सेनाके मुहानेपर प्रज्वलित हुई अग्निकी ओर नहीं देख पाते थे। उन्होंने सम्पूर्ण दिशाओं, खड्गों और मेघोंको भी जलता ही देखा ॥ २४ ॥

ध्रुवः स्वयम्भुवा सुप्तो युगान्तस्तोययोनिना ।
इत्येवं दानवाः सर्वे मेनिरे त्रस्तचेतसः ॥ २५ ॥

वे त्रस्तचित्त समस्त दानव ऐसा मानने लगे कि निश्चय ही जलमें शयन करनेवाले स्वयम्भू नारायणदेव अथवा जलके कारणभूत अग्निदेवने प्रलय आरम्भ कर दिया है॥२५॥

मयश्च शम्बरश्चैव महामायाधरौ तदा ।
पार्जन्यवारुणी माये सृजतां वारिविक्षरे ॥ २६ ॥

मय और शम्बरासुर—ये दो दानव उन दिनों बड़े भारी मायावी थे। इन दोनोंने वहाँ पार्जन्य और वारुणास्त्ररूपिणी मायाओंकी सृष्टि की, जो जलकी वर्षा करनेवाली थीं॥२६॥

ताभ्यां वह्निः स मायाभ्यां सिच्यमानः समन्ततः ।
तोयौघैः पर्वतनिभैर्मृद्वर्चिरभवद् रणे ॥२७॥

उन दोनों मायाओंने जब पर्वत-सदृश जल-प्रवाहोंसे अग्निदेवको सब ओरसे सींचना आरम्भ किया, तब उस रणभूमिमें उनकी ज्वाला कुछ मन्द हो गयी ॥ २७ ॥

शम्यमाने तु समरे पावके दैत्यनाशिनि ।
बृहत्कीर्तिर्बृहत्तेजा वह्निमाह बृहस्पतिः ॥ २८ ॥

भविष्यपर्व ] द्विषष्टितमोऽध्यायः [ १५७

समराङ्गणमें दैत्यनाशन अग्निदेवके शान्त होनेपर महायशस्वी एवं महातेजस्वी बृहस्पतिने उन्हें सम्बोधित करके कहा ॥ २८ ॥

गुरुरुवाच

हिरण्यरतः सुमुख ज्वलनाह्वय सर्वभुक्।
सप्तजिह्वानन क्षाम लेलिहान महाबल ॥ २९ ॥

बृहस्पति बोले—अग्निदेव ! सुवर्ण आपका वीर्य है, मुख सुन्दर है । आप ज्वलन नामसे विख्यात हैं, सर्व-भोक्ता हैं। आपके मुखमें सात जिह्वाएँ हैं। आप सबको क्षीण करनेवाले हैं। लपलपाती जिह्वाओंसे सबको चाट जाने-वाले महाबली पावक ! आपकी जय हो ॥ २९ ॥

आत्मा वायुस्तव विभो शरीरं सर्ववीरुधः।
योनिरापश्च ते प्रोक्ता योनिस्त्वमसि चाम्भसः॥ ३० ॥

विभो ! वायु आपकी आत्मा है । सब प्रकारके वृक्ष-वनस्पति आपके शरीर हैं। जलको आपकी योनि बताया गया है और आप भी जलकी योनि हैं ॥ ३० ॥

ऊर्ध्वं चाधश्च गच्छन्ति संचरन्ति च पार्श्वतः।
अर्चिषस्ते महाभाग सर्वतः प्रभवन्ति च ॥ ३१॥

महाभाग ! आपकी ज्वालाएँ ऊपर और नीचेको जाती हैं, पार्श्वभाग (अगल-बगल) में भी संचरण करती हैं तथा सब ओरसे उनका प्रादुर्भाव होता है ॥ ३१ ॥

त्वमेवाग्ने सर्वमसि त्वयि सर्वमिदं जगत्।
त्वं धारयसि भूतानि भुवनं त्वं बिभर्षि च ॥ ३२ ॥

अग्ने ! आप ही सब कुछ हैं । यह सम्पूर्ण जगत् आप-में ही प्रतिष्ठित है। आप समस्त भूतों और सम्पूर्ण भुवनोंका धारण-पोषण करते हैं ॥ ३२ ॥

त्वमग्ने हव्यवाडेकस्त्वमेव परं हविः।
यजन्ति च सदा सन्तस्त्वामेव परमाध्वरे ॥ ३३ ॥

अग्ने ! एकमात्र आप ही देवताओंके पास हविष्य पहुँचानेवाले हैं। आप ही उत्तम हविष्य हैं। साधु पुरुष श्रेष्ठ यज्ञमें सदा आपका ही यजन् करते हैं ॥ ३३ ॥

त्वमन्नं प्राणिनां भुङ्क्षे जगत्त्रातासि त्वं प्रभो।
त्वयि प्रवृत्तो विजयस्त्वयि लोकाः प्रतिष्ठिताः ॥ ३४ ॥

प्रभो ! आप समस्त प्राणियोंका अन्न खाते हैं और सारे जगत्की रक्षा करते हैं। आपमें ही विजयकी प्रवृत्ति होती है और आपमें ही सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित हैं ॥ ३४ ॥

सर्वान्ल्लोकांस्त्रीनिमान् हव्यवाह
प्राप्ते काले त्वं पचस्येव दीप्तः।
त्वमेवैकस्तपसे जातवेदो
नान्यस्त्वत्तो विद्यते गोषु देव ॥ ३५ ॥

हव्यवाहन ! आप प्रलयका समय आनेपर प्रज्वलित हो इस सम्पूर्ण त्रिलोकीको जला पचा डालते हैं । अग्निदेव ! एकमात्र आप ही सूर्यरूपसे तपते हैं । आपके सिवा दूसरा कोई उन किरणोंमें ताप देनेवाला नहीं है ॥ ३५ ॥

वृषाकपिः सिन्धुपतिस्त्वमग्ने
महामखेष्वग्रहरस्त्वमेव ।
विश्वस्य भूम्नस्त्वमसि प्रसूति-
स्त्वं च प्रतिष्ठा भगवन् प्रजानाम् ॥ ३६ ॥

अग्ने ! आप ही सूर्यरूपसे जलको बरसाते और सोखते हैं । आप ही सिन्धुपति हैं तथा आप ही बड़े-बड़े यज्ञोंमें अग्रभागके अधिकारी हैं । भगवन् ! इस विराट् विश्वके प्रसव-स्थान भी आप ही हैं तथा आप ही समस्त प्रजाओंके आधार हैं ॥ ३६ ॥

सृजस्यपो रश्मिभिर्जातवेद-
स्तथौषधीरोषधीनां रसांश्च ।
विश्वं त्वमादाय युगान्तकाले
स्रष्टा भवस्यानल सर्गकाले ॥ ३७ ॥

अग्निदेव ! आप अपनी किरणोंसे जलकी सृष्टि करते हैं । आप ही ओषधियों तथा उनके रसोंके उत्पादक हैं । अनल ! आप युगान्तकालमें सम्पूर्ण विश्वको लेकर अपने आपमेंविलीन कर लेते हैं तथा सृष्टिकालमें पुनः संसारके स्रष्टा होते हैं ॥ ३७ ॥

त्वमग्ने सर्वभूतानां योनिर्वेदेषु गीयसे।
त्वया देवहितार्थाय निहता दानवा रणे ॥ ३८ ॥

अग्निदेव ! सम्पूर्ण वेदोंमें आप ही समस्त प्राणियोंकी योनि बताये गये हैं । देव ! आपने ही देवताओंके हितके लिये रणभूमिमें दानवोंका वध किया है ॥ ३८ ॥

स्वयोनिस्ते महातेजस्तोयं मखशतार्चित।
तां स्वयोनिं समासाद्य किं विषीदसि पावक ॥ ३९ ॥

सैकड़ों यज्ञोंद्वारा पूजित महातेजस्वी पावक ! जल तो आपकी अपनी ही योनि है । उस अपनी ही योनिको पाकर आप विषाद क्यों करते हैं ? ॥ ३९ ॥

त्रायस्व समरे देवान् दैत्येभ्यः सुरसत्तम।
पिङ्गाक्ष लोहितग्रीव कृष्णवर्त्मन् हुताशन ॥ ४० ॥

सुरश्रेष्ठ ! कृष्णवर्त्मन् ! पिङ्गलनेत्र ! लोहितग्रीव ! हुताशन ! आप समराङ्गणमें देवताओंकी दैत्योंसे रक्षा करें ॥ ४० ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनेऽग्निस्रवे द्विषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें अग्निकी स्तुतिविषयक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६२ ॥

५४८श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

त्रिपष्टितमोऽध्यायः

राजा बलिके प्रति प्रह्लादका वचन तथा बलिकी देवसेनापर आक्रमण

वैशम्पायन उवाच

बृहस्पतेस्तु वचनं श्रुत्वा सत्यं समीरितम्।
भूयः प्रजज्वाल रणे हविषेव महामखे ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! बृहस्पतिकी कही हुई यह सच्ची बात सुनकर अग्निदेव उस रणक्षेत्रमें पुनः प्रज्वलित हो उठे, मानो किसी महायज्ञमें घृतकी आहुति पाकर वे फिरसे धधक उठे हों ॥ १ ॥

हतास्तु माया दैत्यानां प्रदीप्तेनाग्निना रणे।
हतमाया हतबला बलिं ते समुपस्थिताः ॥ २ ॥

समरभूमिमें प्रदीप्त अग्निके द्वारा दैत्योंकी सारी मायाएँ नष्ट कर दी गयीं। माया तथा बलके नष्ट हो जानेपर वे बलिकी सेवामें उपस्थित हुए ॥ २ ॥

पराजितेषु दैत्येषु वह्निनाद्भुतकर्मणा।
प्रह्लादस्तूत्तरं वाक्यमाह दैत्यपतिं बलिम् ॥ ३ ॥

अद्भुत कर्म करनेवाले अग्निके द्वारा समस्त दैत्योंके परास्त कर दिये जानेपर प्रह्लादने दैत्यराज बलिसे यह उत्तम बात कही— ॥ ३ ॥

भवानग्निश्च वायुश्च भास्करः सलिलं शशी।
नक्षत्राणि दिशो व्योम भूश्च दानवसत्तम ॥ ४ ॥
भविष्यं चैव भूतं च भवद्यासुरसत्तम।
दत्तं चैतद् भागवता वरदेन स्वयंभुवा ॥ ५ ॥
इन्द्रत्वं चामरत्वं च युद्धे चाप्यपराजयः।
ईशित्वं च वशित्वं च बलं चैवामितं शुभम् ॥ ६ ॥
सर्वभूतेश्वरत्वं च दैत्यराज सदा तव।
महायोगीश्वरत्वं च शूरत्वं च महामृधे ॥ ७ ॥
अणिमा लघिमा चैव ये चान्ये सात्त्विका गुणाः।
तत्पराजित्य दैत्येन्द्र देवान् सर्वांश्च सानुगान् ॥ ८ ॥
यथोक्तं ब्रह्मणा राजंस्तत्तथा न तदन्यथा।

‘दानवशिरोमणे ! अग्नि, वायु, सूर्य, जल, चन्द्रमा, नक्षत्र, दिशाएँ, आकाश तथा पृथ्वी—सब कुछ तुम्हीं हो ॥ ४ ॥

'असुरप्रवर ! भूत, वर्तमान और भविष्य भी तुम्हीं हो। दैत्यराज ! वरदायक भगवान् स्वयम्भूने तुम्हें यह वर दिया है कि तुम इन्द्रत्व और अमरत्व प्राप्त करोगे, युद्धमें तुम्हारी पराजय नहीं होगी। ईशित्व, वशित्व, अपरिमित शुभ बल तथा सम्पूर्ण भूतोंका अधीश्वरत्व तुम्हें सदा प्राप्त होगा। तुम महायोगीश्वर होओगे और महासमरमें शौर्य प्राप्त करोगे। अणिमा, लघिमा तथा अन्य जो सात्विक गुण हैं, वे भी तुम्हें सुलभ होंगे, अतः दैत्यराज ! तुम देवोंसहित समस्त देवताओंको पराजित करके महान् ऐश्वर्य प्राप्त करो; राजन् ! ब्रह्माजीने जैसा कहा है; वह उसी रूपमें सत्य होगा। उसे कोई मिथ्या नहीं कर सकता ॥ ५–८॥

तस्यतद् वचनं श्रुत्वा प्रह्लादस्य महात्मनः।
बलिः परमसंहृष्टः प्रायाच्छक्ररथं प्रति ॥ ९ ॥

महात्मा प्रह्लादका वह वचन सुनकर राजा बलिको बड़ा हर्ष हुआ। वे उत्साहित होकर इन्द्रके रथकी ओर चले ॥ ९ ॥

ततः प्रयान्तं विबुधेन्द्रसंनिधौ
महासुरेन्द्रं बलिमुत्तमश्रियम्।
तमञ्जसा जग्मुरभिप्रदक्षिणं
द्विजाश्च पुण्याः पशवश्च सत्तमाः ॥ १० ॥

इन्द्रके समीप जाते हुए उत्तम शोभासे सम्पन्न महान् असुरेन्द्र बलिको उस समय पवित्र पक्षी और श्रेष्ठ पशु अनायास ही दाहिने करके गये ॥ १० ॥

महजटाभारधरास्तपस्विन-
स्तदा तमायुर्विधिमन्त्रमङ्गलैः।
अभिष्टुवन्तः कवयः स्वलंकृतं
बलिं प्रयान्तं रणमूर्धनि स्थिताः ॥ ११ ॥

उस समय युद्धके मुहानेपर स्थित हुए महान् जटाभारको धारण करनेवाले विद्वान् तपस्वी युद्धोपयोगी वेषभूषासे विभूषित होकर रणकी यात्रा करनेवाले राजा बलिकी विधि-पूर्वक मङ्गलमय मन्त्रोंद्वारा स्तुति करने लगे ॥ ११ ॥

प्रतप्तजाम्बूनदचित्रभूषणै-
र्दिव्यैश्च रत्नैर्विविधैरलंकृतः।
विराजमानः परमेण वर्चसा
रणे विभात्यग्निशिखेव दानवः ॥ १२ ॥

तपाये हुए सुवर्णके विचित्र आभूषणों तथा नाना प्रकारके दिव्य रत्नोंसे अलंकृत हो उत्तम तेजसे प्रकाशमान दानवराज बलि रणभूमिमें अग्निशिखाके समान उद्भासित हो रहे थे ॥ १२ ॥

स वै तदा शत्रुबलादितं बलं
बलिर्ददर्शोत्तमसत्त्ववीर्यवान् ।
जलागमे श्रीमदिवाभ्रमण्डलं
विशीर्यमाणं नभसीव वायुना ॥ १३ ॥

उस समय उत्तम सत्त्व और बल-पराक्रमसे सम्पन्न राजा बलिने देखा कि शत्रुओंकी सेनाने मेरी सेनाको भली-भाँति पीड़ित कर दिया है। जैसे वर्षा-ऋतुमें शोभासम्पन्न मेघ-मण्डल आकाशमें वायुके द्वारा छिन्न-भिन्न कर दिया जाता है, उसी प्रकार दैत्यसेना तितर-बितर हो गयी है ॥ १३ ॥

ततो ददर्शार्थ बलानि सर्वतो
रणे प्रगुप्तानि हुताशनेन वै।

भविष्यपर्व ] चतुःषष्टितमोऽध्यायः ९४९


समुच्छ्रितान्युग्रतराणि तत्र वै
समुद्रवेगानिव पर्वसंधिषु ॥ १४ ॥

तदनन्तर उन्होंने देखा कि शत्रुओंकी सेनाएँ रणभूमिमें अग्निके द्वारा सब ओरसे सुरक्षित हैं। वे निरन्तर उत्कर्षके पथपर बढ़ती हुई उन्नत होती चली जा रही हैं। जैसे पर्वसंधि (पूर्णिमा) की वेलामें समुद्रोंके वेग बढ़ जाते हैं, उसी प्रकार शत्रुसेनाकी प्रगति उत्तरोत्तर बढ़ रही है ॥ १४ ॥

सतूलशक्त्यृष्टिगदासिस सायकान्
क्षिपन् रिपूणां समरे महात्मनाम् ।
ननाद सिंहर्षभमत्तनागव-
ज्जलागमे तोयदवच्च वीर्यवान् ॥ १५ ॥

तब वे पराक्रमी राजा बलि समरभूमिमें महामनस्वी शत्रुओंपर शूल, शक्ति, ऋष्टि, गदा, खड्ग और सायकोंकी वर्षा करते हुए सिंह, साँड, मतवाले हाथी और वर्षाकालके मेघकी भाँति जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ १५ ॥

दिव्यास्त्रधूमः सुभुजोग्रवायु-
र्महाबलः पौरुषविक्रमेन्धनः ।
प्रजा दिधक्षन्निव कालवह्निः
सुघोररूपो विबभौ रणे बलिः ॥ १६ ॥

उस रणभूमिमें महाबलवान् राजा बलि समस्त प्रजाओंको दग्ध कर डालनेकी इच्छावाले प्रलयंकर अग्निके समान अत्यन्त घोर रूपमें प्रकाशित होने लगे। दिव्यास्त्र ही उन अग्निस্বরূপ बलिके धूम थे। उत्तम भुजा ही उन्हें उत्तेजित करनेवाली भयंकर वायु थी और पुरुषार्थ एवं पराक्रम ही उस अग्निको उद्दीप्त करनेवाले ईंधन थे ॥ १६ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे त्रिषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारविषयक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६३ ॥


चतुःषष्टितमोऽध्यायः

बलि और इन्द्रका युद्ध तथा इन्द्रका रणभूमिसे पलायन

वैशम्पायन उवाच

बलिना तु सुराः सर्वे वर्जयित्वा सुराधिपम् ।
रणे शरशतैर्भिन्नाः ससैन्या वै पराजिताः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! राजा बलिने देवराज इन्द्रको छोड़कर शेष सभी देवताओंको सेनासहित पराजित कर दिया। वे रणभूमिमें उनके सैकड़ों बाणोंसे क्षत-विक्षत हो गये थे ॥ १ ॥

विमुखा याति दैत्येन्द्रैर्वध्यमाना महाचमूः ।
जितास्तु बलिना देवाः शक्रमाहुर्महाबलम् ॥ २ ॥

दैत्येन्द्रोंकी मार खाती हुई देवताओंकी विशाल सेना रणभूमिसे विमुख होकर भाग चली। बलिसे पराजित हुए देवता महाबली इन्द्रके पास गये और इस प्रकार बोले ॥ २ ॥

देवा ऊचुः

भवानिन्द्रश्च धाता च लोकानां प्रभुरव्ययः ।
त्वमप्रतिमकर्मा च तथैवानुपमद्युतिः ॥ ३ ॥

देवताओंने कहा— देवराज ! आप ही इन्द्र (महान् ऐश्वर्यशाली) हैं, आप ही सम्पूर्ण लोकोंके धारण-पोषण करनेवाले अविनाशी प्रभु हैं। आपके वीरोचित कर्मोंकी कहीं उपमा नहीं है। आप अनुपम तेजसे सम्पन्न हैं ॥ ३ ॥

विद्रुतानीह सैन्यानि सहास्माभिः सुरेश्वर ।
रथचक्रध्वजाक्षाणि विभिन्नानि महासुरैः ॥ ४ ॥

सुरेश्वर ! बड़े-बड़े असुरोंने हमारे साथ ही समस्त देव-सैनिकोंको यहाँ मार भगाया है और हमारे रथोंके पहिये, ध्वज तथा धुरे तोड़ डाले हैं ॥ ४ ॥

रथहस्त्यश्वयोधाश्च पदाताश्च सहस्रशः ।
भिन्नच्छिन्नाश्च शतशो गदामुशलपट्टिशैः ॥ ५ ॥

सैकड़ों रथी, हाथीसवार, घुड़सवार तथा सहस्रों पैदल सैनिक गदा, मुसल और पट्टिशोंकी मारसे छिन्न-भिन्न होकर रणभूमिमें पड़े हैं ॥ ५ ॥

महाभैरवरूपं हि दैत्येन्द्रेण कृतं रणे ।
किमुपेक्षसि दैत्येन्द्रैर्हन्यमानां महाचमूम् ॥ ६ ॥
त्रायस्व त्रिदशश्रेष्ठ शरण्यः शरणागतान् ।

दैत्यराज बलिने रणभूमिमें महाभयंकर रूप धारण किया है। दैत्येन्द्रोंद्वारा मारी जाती हुई विशाल देवसेनाकी आप उपेक्षा क्यों कर रहे हैं? देवश्रेष्ठ ! आप शरणागतवत्सल हैं; अतः शरणमें आये हुए हम देवताओंकी रक्षा कीजिये ॥ ६॥

श्रुत्वा तु वचनं तेषां देवानाममराधिपः ॥ ७ ॥
संवर्त्ताग्निसमक्रुद्धः सर्वान् दहति दानवान् ।

उन देवताओंका यह वचन सुनकर अमरेश्वर इन्द्र संवर्तक अग्निके समान कुपित हो समस्त दानवोंको दग्ध करने लगे ॥ ७३॥

दिवाकरकराकारं किरीटं धारयन् प्रभुः ॥ ८ ॥
वैदूर्यवर्णसंकाशो नानारत्नचिताङ्गदः ।
मयूररोमा रक्ताक्षः शतबाहुः सहस्रदृक् ॥ ९ ॥

९५० श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


वे प्रभावशाली देवराज सूर्यदेवकी किरणोंके समान कान्तिमान् किरीट धारण किये हुए थे। उनका वर्ण वैदूर्य-मणिके समान था। उनके बाजू-बंदोंमें नाना प्रकारके रत्न जड़े गये थे। उनकी रोमावलि मोरोंके समान और आँखें लाल थीं। वे सौ बाहों तथा सहस्र नेत्रोंसे सुशोभित थे॥८-९॥

हरिरेको हरिश्मश्रुर्नानाकेतुर्महाबलः ।
वज्रप्रहरणः श्रीमान् योगी शतशिरोधरः ॥ १० ॥

वे इन्द्र अद्वितीय वीर थे। उनकी मूँछें हरे रंगकी थीं। उनके रथपर नाना प्रकारकी ध्वजा-पताकाएँ फहरा रही थीं। वे महान् बलशाली थे। वज्र ही उनका आयुध था। वे सौ सिर धारण करनेवाले तेजस्वी योगी थे ॥ १० ॥

सधनुर्बद्धसन्नाहः शतादित्यसमप्रभः ।
देवगन्धर्वयक्षौघैरनुयातः सहस्रशः ॥११॥

कवच बाँधकर हाथमें धनुष लिये देवराज इन्द्र सौ सूर्योंके समान दिव्य प्रभासे प्रकाशित हो रहे थे। सहस्रों देवता, गन्धर्व और यक्षोंके समुदाय उनके पीछे-पीछे चलते थे ॥ ११ ॥

सामगैश्च जयैश्चापि स्तूयमानो महर्षिभिः।
शतपर्व महारौद्रं स्फोटनं सर्वतोमुखम् ॥ १२ ॥
प्रगृह्य रुचिरं वज्रं दीप्तं रौद्राट्टहासनम् ।
दैत्यानयोधयत् सर्वान् महेन्द्रः पाकशासनः ॥ १३ ॥
अधृष्यः सर्वभूतानामादित्यः दयितः सुतः।

सामगान करनेवाले महर्षि जय-जयकार करते हुए उनकी स्तुति करते थे। वे पाकशासन महेन्द्र तोड़-फोड़ करनेवाले, महाभयंकर, सब ओर मुखवाले तथा रौद्र अट्टहास (गड़गड़ाहट) करनेवाले, सौ पर्वोंसे युक्त, दीप्तिमान् एवं मनोहर वज्र हाथमें लेकर समस्त दैत्योंके साथ युद्ध करने लगे। अदितिके प्रिय पुत्र वे देवराज इन्द्र समस्त प्राणियोंके लिये अजेय थे ॥ १२-१३॥

ततः प्रवृत्तः संग्रामो बलिवासवयोस्र्तदा ॥ १४ ॥
उभाभ्यां देवदैत्याभ्यामचिरान्महदद्भुतः ।
अतिवीर्यबलोदग्रस्तुमुलो लोमहर्षणः ॥ १५॥

तदनन्तर शीघ्र ही राजा बलि और इन्द्रमें महान् अद्भुत संग्राम होने लगा। उनमेंसे एक देवता था और दूसरा दैत्य। उन दोनोंका वह संग्राम अत्यन्त बल-पराक्रमसे बढ़ा-चढ़ा, भयंकर और रोमाञ्चकारी था ॥ १४-१५ ॥

प्रह्लादेन स्तुतिशतैः कर्मभिर्जयसम्मतैः ।
प्रबोधितो दैत्यपतिरग्निरिद्ध इवाबभौ ॥ १६ ॥

प्रह्लादने सैकड़ों स्तुतियों और विजयके लिये अनुमोदित कर्मोंका वर्णन करके दैत्यराज बलिके शौर्य और उत्साहको जगाया, जिससे वे प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित होने लगे ॥ १६ ॥

सुरासुरेन्द्रयोर्दृष्ट्वा संग्रामं लोमहर्षणम् ।
देवानां दानवानां च भूयो युद्धमभूत् तदा ॥ १७ ॥

देवेन्द्र और असुरेन्द्रके उस रोमाञ्चकारी संग्रामको देखकर उस समय दूसरे-दूसरे देवताओं और दानवोंमें भी फिर युद्ध होने लगा ॥ १७ ॥

ततोऽविध्यन्महेन्द्रस्तं बलिमस्त्रैर्महाबलम् ।
तान्यस्त्राणि महाबाहुश्चिच्छेद शतधा रणे ॥ १८ ॥

महेन्द्रने महाबलवान् बलिको अपने अस्त्रोंद्वारा घायल कर दिया। तब महाबाहु बलिने रणभूमिमें इन्द्रके चलाये हुए उन सभी अस्त्रोंके सौ-सौ टुकड़े कर डाले ॥ १८ ॥

ततः क्रुद्धः पुनस्तत्र निजघ्ने दानवं महत् ।
आग्नेयमथ शत्रुघ्नं चिक्षेपेन्द्रो महाबलः ॥ १९ ॥

तब महाबली इन्द्रने कुपित होकर पुनः वहाँ महान् दानवदलका संहार आरम्भ किया। उन्होंने शत्रुनाशक आग्नेयास्त्रका प्रयोग किया ॥ १९ ॥

तद्दृष्ट्वा खे समागच्छत् प्रलयानलसंनिभम् ।
पातयामास तच्चैन्द्रं वारुणास्त्रेण दानवः ॥ २० ॥

प्रलयाग्निके समान तेजस्वी उस आग्नेयास्त्रको आकाशमें आता देख दानव बलिने वारुणास्त्रके द्वारा इन्द्रके छोड़े हुए उस अस्त्रको काट गिराया ॥ २० ॥

संक्रुद्धो मघवा वज्रमगृह्णात् पर्वतोपमम् ।
हन्तुकामो रणश्लाघी बलिं दैत्याधिपं रणे ॥ २१ ॥

तब क्रोधमें भरे हुए रणश्लाघी इन्द्रने रणभूमिमें दैत्यराज बलिका वध करनेके लिये पर्वताकार वज्र हाथमें लिया ॥ २१ ॥

ततः शुश्राव देवेन्द्रः कौशिको हरिवाहनः ।
अशरीरां शुभां वाणीं तस्मिन् महति वैशसे ॥ २२ ॥

इतनेहीमें हरे रंगके वाहनवाले कौशिक देवेन्द्रने उस महासंग्रामके भीतर यह शुभ आकाशवाणी सुनी ॥ २२ ॥

निवर्तस्व महाबाहो सुराणां नन्दिवर्धन ।
पुरंदर सुरश्रेष्ठ न जेष्यसि रणे बलिम् ॥ २३ ॥

'महाबाहो ! युद्धसे निवृत्त हो जाओ ! देवताओंका आनन्द बढ़ानेवाले सुरश्रेष्ठ पुरन्दर ! तुम बलिको रणभूमिमें नहीं जीत सकोगे ॥ २३ ॥

तपसात्युत्तमो दैत्यो वरदानेन चाधिकः ।
स्वयंभूपरितोषाच्च सत्यधर्माच्च वासव ॥ २४ ॥

'वासव ! दितिनन्दन बलि तपस्यासे तो अत्यन्त उत्तम है ही, वरदानके द्वारा भी तुमसे अधिक शक्तिशाली हो गया है; ब्रह्माजीके संतोषसे तथा सत्यधर्मके पालनसे भी इसकी शक्ति बढ़ गयी है ॥ २४ ॥

दानवराज बलिपर लक्ष्मीकी कृपा (पृष्ठ-संख्या १५०)

भविष्यपर्व ] पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ९५१


नैष शक्यस्त्वया जेतुं त्रिदशैर्वा सुरेश्वर ।
यो हास्य जेता भृगुवांस्तं शृणुष्व समाहितः ॥ २५ ॥

'सुरेश्वर ! तुम अथवा दूसरे देवता भी इसे नहीं जीत सकते। जो भगवान् इसपर विजय पानेवाले हैं, उन्हें बताता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ २५ ॥

ब्रह्मणः स हि सर्वस्वं देवानां चैव सा गतिः ।
परं रहस्यं धर्मस्य परस्य च परा गतिः ॥ २६ ॥

'वे ब्रह्माजीके सर्वस्व हैं, देवताओंकी भी गति हैं, धर्मके परम रहस्य हैं तथा उत्कृष्ट पुरुषकी भी परम गति हैं ॥ २६ ॥

परात्परतरः श्रीमान् परावरगतिः प्रभुः ।
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ २७ ॥

'वे भगवान् परसे भी परतर (उत्तमसे भी परमोत्तम) हैं, लक्ष्मीसे सम्पन्न हैं तथा वे ही कारण और कार्य अथवा भूत और भविष्यकी भी गति हैं। वे सबके अन्तर्यामी आत्मा हैं। उनके सहस्रों सिर, सहस्रों नेत्र और सहस्रों पैर हैं ॥ २७ ॥

शङ्खचक्रगदापाणिः पीतवासाः सुरारिहा ।
जेताजेयो जयः श्रीमान् सोऽस्य जेता भविष्यति ॥ २८ ॥

'उनके हाथमे शङ्ख, चक्र और गदा आदि आयुध शोभा पाते हैं। वे पीताम्बरधारी तथा देवद्रोहियोंका दलन करनेवाले हैं। वे श्रीमान् भगवान् सबपर विजय पाते हैं, किंतु उन्हें कोई नहीं जीत सकता। वे विजयस्वरूप हैं। वे ही इस बलिपर विजय प्राप्त करेंगे' ॥ २८ ॥

श्रुत्वा दिव्यां तु मधुरां वाणीं तामशरीरिणीम् ।
अपयातो रणाच्छक्रः सार्धं सर्वैः सुरोत्तमैः ॥ २९ ॥

वह दिव्य मधुर आकाशवाणी सुनकर समस्त श्रेष्ठ देवताओंके साथ इन्द्र रणभूमिसे हट गये ॥ २९ ॥

अपयाते तु देवेन्द्रे कौशिके हरिवाहने ।
सिंहनादो महानासीद् दानवानां महामृधे ॥ ३० ॥

हरिवाहन देवराज इन्द्रके पलायन कर जानेपर उस महासमरमे दानवोंका महान् सिंहनाद होने लगा ॥ ३० ॥

ततः किलकिलाशब्दः क्ष्वेडितास्फोटितस्वनः ।
शङ्खानां निनदश्चात्र योधानां वल्गितस्वनः ॥ ३१ ॥

तदनन्तर किलकारियोंकी आवाज आने लगी, गर्जने और ताल ठोंकनेका शब्द सुनायी देने लगा, शङ्खोंकी ध्वनि होने लगी और योद्धाओंके उछलने-कूदनेकी आवाज भी वहाँ सब ओर होने लगी ॥ ३१ ॥

वादित्राणां च निर्घोषस्तुमुलश्चाभवत्तदा ।
जयशब्दरवाश्चैव देवानां तु पराजये ॥ ३२ ॥

उस समय देवताओंकी पराजय होनेपर दैत्योंके दलमें नाना प्रकारके वाद्योंका तुमुल घोष होने लगा और जयजय कारके शब्द सुनायी देने लगे ॥ ३२ ॥

ससैन्यो दैत्यराजस्तु स्तूयमानः सुहृद्गणैः ।
बलीन्द्रो विबभौ दैत्यो हिरण्यकशिपुर्यथा ॥ ३३ ॥

सुहृदोंके समुदाय सेनासहित दैत्यराज बलिकी स्तुति करने लगे। उस समय इन्द्रपदपर प्रतिष्ठित हुए राज बलि दैत्यप्रवर हिरण्यकशिपुके समान शोभा पाने लगे ॥ ३३ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामने देवासुरसंग्रामे शक्रपलाने चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें देवासुरसंग्राममें इन्द्रका पलायनविषयक चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६४ ॥


पञ्चषष्टितमोऽध्यायः

विजयी बलिके पास राजलक्ष्मी आदिका शुभागमन

वैशम्पायन उवाच

निष्प्रयत्नेषु देवेषु त्रैलोक्ये दैत्यपालिते ।
जये बलेर्बलवतो मयशम्बरयोस्तथा ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! तदनन्तर देवता विजयके लिये प्रयत्न छोड़ बैठे और त्रिलोकीके राज्यका दैत्यराज बलिके द्वारा पालन होने लगा। बलवान् बलि, मयासुर और शम्बरासुरकी विजय हुई ॥ १ ॥

सुधासु दिक्षु सर्वासु प्रवृत्ते धर्मकर्मणि ।
अपावृत्ते धर्मपथे अयनस्थे दिवाकरे ॥ २ ॥

सम्पूर्ण दिशाएँ अमृतमयी हो गयीं, धर्म-कर्मका पालन होने लगा। धर्मका मार्ग खुल गया और सूर्यदेव अपने अयनमे स्थित हो गये ॥ २ ॥

प्रह्लादशम्बरमयैरनुह्लादेन चैव हि ।
दिक्षु सर्वासु गुप्तासु गगने दैत्यपालिते ॥ ३ ॥

दैत्येषु मखशोभाश्च स्वर्गार्थे दर्शयत्सु च ।
प्रकृतिस्थे तदा लोके वर्तमाने च सत्पथे ॥ ४ ॥

अभावे सर्वपापानां भावे चैव तथा स्थिते ।
भावे तपसि सिद्धानां सर्वत्राश्रमरक्षिषु ॥ ५ ॥

९५२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे

चतुष्पादे स्थिते धर्मे अधर्मे पादविग्रहे।
प्रजापालनयुक्तेषु भ्राजमानेषु राजसु ॥ ६ ॥
स्वधर्मसम्प्रयुक्तेषु सर्वाश्रमनिवासिषु ।
अभिषिक्तोऽसुरैः सर्वैर्दैत्यराजो बलिस्तदा ॥ ७ ॥

प्रह्लाद, शम्बरासुर, मयासुर और अनुह्लादके द्वारा सम्पूर्ण दिशाएँ सुरक्षित हो गयीं। आकाशका दैत्योंद्वारा पालन होने लगा। दैत्यलोग स्वर्गकी प्राप्तिके लिये यज्ञशोभाका दर्शन कराने लगे। उस समय सारा जनसमुदाय प्रकृतिस्थ होकर सन्मार्गपर चलने लगा। सब प्रकारके पापोंका अभाव हो गया। पुण्यकर्मकी व्यापक सत्ता दिखायी देने लगी। सिद्ध पुरुषोंकी तपस्यामें स्थिति हुई। सर्वत्र आश्रमोंकी रक्षा होने लगी। धर्म अपने चारों चरणोंसे युक्त होकर रहने लगा। अधर्मका चतुर्थांशमात्र ही शेष रह गया। तेजस्वी राजा प्रजापालनमें तत्पर रहने लगे और सभी आश्रमोंके निवासी अपने-अपने धर्ममें स्थित हो गये। ऐसे समयमें समस्त असुरोंने दैत्यराज बलिको इन्द्रके पदपर अभिषेक किया ॥ ३-७ ॥

हृष्टेष्वसुरसंघेषु नदत्सु मुदितेषु च ।
अथाभ्युपगता लक्ष्मीर्बलिं पद्मासने स्थिता ॥ ८ ॥
पद्मोद्यतकरा देवी वरदा सुरमोहिनी ।

उस समय असुरोंके समुदाय हर्षमें भर गये और आनन्दमग्न होकर जोर-जोरसे गर्जना करने लगे। इसी समय कमलके आसनपर विराजमान राजलक्ष्मी राजा बलिके पास आयीं। देवताओंको मोहनेवाली उन वरदायिनी देवीने अपने हाथमें एक कमलका फूल ले रखा था ॥ ८ ॥

श्रीरुवाच
बले बलवतां श्रेष्ठ महाराज महाद्युते ॥ ९ ॥
प्रीतास्मि तव भद्रं ते देवतानां पराजये ।

लक्ष्मी बोली—बलवानोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी महाराज बलि ! तुम्हारा भला हो। तुमने जो देवताओंको पराजित किया है, इससे मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हुई हूँ ॥ ९ ॥

यस्त्वया युधि विक्रम्य देवराजः पराजितः ॥ १० ॥
दृष्ट्वा ते परमं सत्त्वं ततोऽहं स्वयमागता ।

तुमने युद्धमें पराक्रम करके जो देवराज इन्द्रपर विजय पायी है, तुम्हारे उस उत्तम सत्त्व (धैर्य और बल) को देखकर मैं स्वयं तुम्हारे पास चली आयी हूँ ॥ १० ॥

नाश्चर्यं दानवश्रेष्ठ हिरण्यकशिपोः कुले ॥ ११ ॥
प्रसूतस्यासुरेन्द्रस्य तव कर्मेदमीदृशम्।

दानवशिरोमणे ! तुम असुरराज हिरण्यकशिपुके कुलमें उत्पन्न हुए हो; अतः तुम्हारा ऐसा पराक्रम करना आश्चर्यकी बात नहीं है ॥ ११ ॥

विशेषितस्त्वया राजन् दैत्येन्द्रः प्रपितामहः ॥ १२ ॥
येन भुक्तं हि निखिलं त्रैलोक्यमिदमव्ययम् ।

राजन् ! तुमने अपने प्रपितामह उस दैत्यराज हिरण्यकशिपुका महत्त्व बढ़ा दिया, जिसने प्रवाहरूपसे सदा बने रहनेवाले इस समस्त त्रिभुवनके राज्यका उपभोग किया है ॥ १२ ॥

विशेषतस्तव विभो सर्वे धर्मपथे स्थिताः ॥ १३ ॥
तेन त्रैलोक्यमुदयेन भोक्ष्यस्यमितविक्रम ।

प्रभो ! सबसे विशेष बात यह है कि तुम्हारे राज्यमें सब लोग धर्मके मार्गपर स्थित हैं। अमितपराक्रमी दैत्यराज ! उस त्रिलोकीकी श्रेष्ठ वस्तु धर्मके साथ रहकर तुम राज्यका उपभोग करोगे ॥ १३ ॥

एवमुक्त्वा हि सा देवी लक्ष्मीर्दैत्यपतिं बलिम् ॥ १४ ॥
प्रविष्टा वरदा सौम्या सर्वभूतमनोरमा ।

ऐसा कहकर सम्पूर्ण प्राणियोंके मनको प्रिय लगनेवाली सौम्यररूपा वरदायिनी लक्ष्मीदेवी दैत्यराज बलिके भीतर प्रविष्ट हो गयीं ॥ १४ ॥

शिष्टाश्च देव्यः प्रवरा ह्रीः कीर्तिर्द्युतिरेव च ॥ १५ ॥
प्रभा धृतिः क्षमा भूतिर्नीतिर्विद्या दया स्मृतिः ।
कृतिर्लज्जा तथा मेधा लक्ष्मीरीहा गतिस्तथा ॥ १६ ॥
श्रुतिः प्रीतिर्गिला कीर्तिः शान्तिः पुष्टिः क्रियास्तथा ।
सर्वाश्चाप्सरसो दिव्या नृत्यगीतविशारदाः ॥ १७ ॥
पतिं प्राप्ताः सुदैतेयं त्रैलोक्ये सचराचरे ।
प्राप्तमैश्वर्यममितं बलिना ब्रह्मवादिना ॥ १८ ॥

शेष जो श्रेष्ठ देवियाँ थीं, उन कीर्ति, द्युति, प्रभा, धृति, क्षमा, भूति, नीति, विद्या, दया, स्मृति, कृति, लज्जा, मेधा, लक्ष्मी, ईहा, गति, श्रुति, प्रीति, इला (श्रौतक्रिया), कीर्ति, शान्ति, पुष्टि तथा क्रिया आदिने एवं नृत्यगीतविशारद सम्पूर्ण दिव्य अप्सराओंने उत्तम दैत्यकुमार राजा बलिको पति (पालक) रूपमें प्राप्त किया। ब्रह्मवादी बलिने चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकीमें असीम ऐश्वर्य प्राप्त कर लिया ॥ १५—१८ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतार-विषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६५ ॥

भविष्यपर्व ]षट्षष्टितमोऽध्यायः९५३

षट्षष्टितमोऽध्यायः

अदिति और कश्यपजीके साथ देवताओंका ब्रह्मलोकमें जाना

जनमेजय उवाच
पराजिताः सुरा दैत्यैः किमकुर्वत वै मुने।
कथं च त्रिदिवं लब्धं भूयो देवैर्द्विजोत्तम ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा— मुने! द्विजश्रेष्ठ! दैत्योंसे पराजित होकर देवताओंने क्या किया? फिर उन्हें स्वर्गका राज्य कैसे प्राप्त हुआ? ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा वाणीं तु तां दिव्यां सह देवैः सुराधिपः।
प्राग्दिशं प्रस्थितः श्रीमानदित्यालयमुत्तमम् ॥ २ ॥

वैशम्पायनजीने कहा— जनमेजय! देवताओंसहित श्रीमान् देवराज इन्द्र उस दिव्य आकाशवाणीको सुनकर पूर्व दिशामें देवी अदितिके उत्तम भवनकी ओर चल दिये ॥ २ ॥

प्राप्यादित्यालयं शक्रः कथयामास तां गिरम्।
अदित्यां सा यथा युद्धे तेन वाणी पुरा श्रुता ॥ ३ ॥

अदितिके भवनमें पहुँचकर इन्द्रने युद्धस्थलमें पहले जो आकाशवाणी सुनी थी, उसे वहाँ माता अदितिके समीप कह सुनाया ॥ ३ ॥

अदितिरुवाच
यद्येवं पुत्र युष्माभिर्न शक्यो हन्तुमाहवे।
बलिर्वैरोचनसुतः सर्वैश्चैव मरुद्गणैः ॥ ४ ॥
सहस्रशिरसा हन्तुं केवलं शक्यतेऽसुरः।
तेनैकेन सहस्राक्ष न ह्यन्येन शतक्रतो ॥ ५ ॥
तद् वः पृच्छध्व पितरं कश्यपं सत्यवादिनम्।
पराजयार्थं दैत्यस्य वलेस्तस्य महात्मनः ॥ ६ ॥

अदिति बोलीं— बेटा! सहस्रलोचन! शतक्रतो! यदि ऐसी बात है, यदि तुमलोग और समस्त मरुद्गण भी रण-क्षेत्रमें विरोचनकुमार बलिको वध नहीं कर सकते, यदि वह असुर केवल उन एकमात्र सहस्र मस्तकवाले भगवान्‌के हाथसे ही मारा जा सकता है, दूसरे किसीके हाथसे नहीं तो तुम अपने सत्यवादी पिता कश्यपजीसे पूछो कि दिति-नन्दन महात्मा बलिकी पराजयके लिये क्या उपाय हो सकता है? ॥ ४-६ ॥

ततोऽदित्या सह सुराः सम्प्राप्ताः कश्यपान्तिकम्।
अपश्यन् कश्यपं तत्र मुनिं दिव्यतपोनिधिम् ॥ ७ ॥

तब सब देवता माता अदितिके साथ अपने पिता कश्यपजीके समीप गये। वहाँ उन्होंने दिव्य तपोनिधि मुनिवर कश्यपजीका दर्शन किया ॥ ७ ॥

आद्यं देवं गुरुं दिव्यं क्लिन्नं त्रिपवणार्वुभिः।
तेजसा भास्कराकारं गौरमग्निशिखाप्रभम् ॥ ८ ॥

वे आदिदेवता और दिव्य गुरु हैं। तीनों समय स्नान करनेके कारण उनका शरीर जलसे भीगा रहता है। वे सूर्यके समान तेजस्वी हैं। उनका गौरवर्ण अग्निशिखाके समान प्रकाशित होता है ॥ ८ ॥

न्यस्तदण्डं तपोयुक्तं बद्धकृष्णाजिनोत्तरम्।
वल्कलाजिनसंवीतं प्रदीप्तं ब्रह्मवर्चसा ॥ ९ ॥

उन्होंने दण्डका परित्याग कर दिया है। वे तपस्यामें संलग्न रहते हैं। उनके ऊपरके अङ्गोंमें उत्तरीयके रूपमें काला मृगचर्म बँधा होता है। वे वल्कल और मृगचर्मसे ही अपने शरीरको ढकते हैं। ब्रह्मतेजसे सदा ही उदीप्त रहते हैं ॥ ९ ॥

हुताशमिव दीप्तन्तमाज्यमन्त्रपुरस्कृतम्।
स्वाध्यायिनरतं शान्तं वपुष्मन्तमिवानलम् ॥ १० ॥

मन्त्रोच्चारणपूर्वक घीकी आहुति देनेसे प्रज्वलित हुए अग्निदेवके समान वे सदा देदीप्यमान होते रहते हैं। सदा स्वाध्यायमें तत्पर रहनेवाले और शान्त हैं, शरीरधारी अग्निके समान जान पड़ते हैं ॥ १० ॥

तं ब्रह्मवादिनां श्रेष्ठं सुरासुरगुरुं प्रभुम्।
प्रतपन्तमिवादित्यं मारीचं दीप्ततेजसम् ॥ ११ ॥

वे ब्रह्मवादियोंमें श्रेष्ठ, देवताओं और असुरोंके पिता तथा प्रभावशाली हैं। तपते हुए सूर्यके समान उनका तेज सदा ही उदीप्त रहता है। उन मरीचिनन्दन कश्यपको देवताओने देखा ॥ ११ ॥

यः स्रष्टा सर्वभूतानां प्रजानां पतिरुत्तमः।
आत्मभावविशेषेण तृतीयो यः प्रजापतिः ॥ १२ ॥

जो समस्त प्राणियोंके स्रष्टा उत्तम प्रजापति ब्रह्मा हैं, उनके आत्मभावकी विशेषरूपसे अभिव्यक्ति होनेके कारण कश्यपजी (ब्रह्मा और मरीचिकी अपेक्षा) तीसरे प्रजापति हैं ॥ १२ ॥

ततः प्रणम्य ते वीराः सहादित्या सुरर्षभाः।
ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे ब्रह्माणमिव मानसाः ॥ १३ ॥

अदितिसहित उन सभी वीर एवं श्रेष्ठ देवताओंने कश्यपजीको प्रणाम करके उनसे हाथ जोड़कर उसी प्रकार कहना आरम्भ किया, जैसे ब्रह्माजीके मानसपुत्र उनसे अपनी बात निवेदन करते हैं ॥ १३ ॥

यच्छ्रुतं युधि शक्रेण सरस्वत्या समीरितम्।
अजेयस्त्रिदशैः सर्वैर्वरदानवसत्तमः ॥ १४ ॥

युद्धस्थलमें इन्द्रने आकाशवाणीद्वारा कही गयी जो यह बात सुनी थी कि दानवशिरोमणि बलि समस्त देवताओंके लिये अजेय हैं, उसे कह सुनाया ॥ १४ ॥

श्रुत्वा तु वचनं तेषां पुत्राणां कश्यपस्तदा।
चकार गमने बुद्धिं ब्रह्मलोकाय लोककृत् ॥ १५ ॥

९५४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे

उस समय अपने उन पुत्रोंकी यह बात सुनकर लोकस्रष्टा कश्यपजीने ब्रह्मलोकमें जानेका विचार किया ॥ १५ ॥

कश्यप उवाच

गच्छाम ब्रह्मसदनं ब्रह्मघोषनिनादितम्।
यथाश्रुतं च तत्रैव ब्रह्मणो वदतानघाः॥ १६॥

कश्यपजी बोले—निष्पाप देवताओ ! हमलोग वेद-मन्त्रोंके घोषसे प्रतिध्वनित होनेवाले ब्रह्मलोकको चलें । वहीं वह बात, जैसे तुमने सुनी हैं वैसी ही ब्रह्माजीके समक्ष कहो ॥

वैशम्पायन उवाच

ततोऽदित्या सह सुरा यान्तं कश्यपमन्वयुः।
प्रस्थितं ब्रह्मसदनं देवर्षिगणसेवितम् ॥ १७॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तब अदिति-सहित समस्त देवता देवर्षियोंद्वारा सेवित ब्रह्मलोककी ओर प्रस्थित हुए कश्यपजीके साथ-साथ गये ॥ १७ ॥

ते मुहूर्तेन सम्प्राप्ता ब्रह्मलोकं दिवौकसः।
दिव्यैः कामगमैर्यानैर्महार्हैः सुमनोहरैः ॥ १८ ॥

वे सब देवता इच्छानुसार चलनेवाले परम मनोहर बहुमूल्य दिव्य विमानोंद्वारा दो ही घड़ीमें ब्रह्मलोकमें जा पहुँचे ॥ १८ ॥

दिदृक्षवस्ते ब्रह्माणं तपसो राशिवमव्ययम्।
अभ्यगच्छन्त विस्तीर्णां ब्रह्मणः परमां सभाम्॥ १९ ॥

वे तपस्याकी अक्षय राशि ब्रह्माजीको देखनेके लिये उनकी अत्यन्त विस्तृत उत्तम सभामें गये ॥ १९ ॥

षट्पदोद्गीतनिनादां सामगीतविमिश्रिताम्।
श्रेयस्करीममित्रघ्नीं दृष्ट्वा संजहृषुर्मुदा ॥ २०॥

वहाँ भ्रमरोंका गुञ्जारव गूँज रहा था। उसमें सामगान-की ध्वनि भी मिश्रित थी । वह सभा सबके लिये कल्याण-कारिणी और शत्रुओंका नाश करनेवाली थी । उसे देखकर उन सब लोगोंको बड़ा हर्ष हुआ ॥ २० ॥

ब्राह्मणैश्च महाभागैर्वेदवेदाङ्गपारगैः।
ऋचो बह्वृचमुख्यैश्च शिक्षाविद्भिरस्तथा द्विजैः॥ २१॥

वेद-वेदाङ्गोंके पारंगत विद्वान् महाभाग ब्राह्मण, ऋग्वेद-वेत्ताओंमें श्रेष्ठ तथा शिक्षाके ज्ञाता द्विज ऋचाओंका पाठ करते थे ॥ २१ ॥

शब्दनिर्वचनार्थं च प्रेर्यमाणपदाक्षराः।
शुश्रुवुस्तेऽमरव्याघ्रा विततेषु च कर्मसु ॥ २२ ॥

उन अमरश्रेष्ठ देवताओंने आयोजित हुए यज्ञकर्मोंमें शब्दकी व्युत्पत्तिके लिये ब्राह्मणोंद्वारा जिनके एक-एक पद और अक्षरोंका उच्चारण हो रहा था, उन ऋचाओंको सुना ॥

यज्ञवेदाङ्गविदुषां पदक्रमविदां तथा।
घोषेण परमर्षीणां सा बभूव निनादिता ॥ २३ ॥

यज्ञ, वेद और वेदाङ्गोंके विद्वान् तथा पदपाठ और क्रमपाठके ज्ञाता महर्षियोंके वैदिक घोषसे वह ब्रह्माजीकी सभा प्रतिध्वनित हो रही थी ॥ २३ ॥

यज्ञसंस्तवविद्भिश्च शिक्षाविद्भिरस्तथा द्विजैः।
शब्दनिर्वचनार्थज्ञैः सर्वविद्याविशारदैः॥ २४॥
मीमांसाहितवाक्यज्ञैः सर्ववादविशारदैः।
हृष्टपुष्टस्वरैस्तत्र द्विजेन्द्रैर्लघुवादिभिः।
नादितं ब्रह्मसदनं प्रवरं देवसद्मवत् ॥ २५॥

जो यज्ञोंमें की जानेवाली स्तुतियोंके ज्ञाता, शिक्षाके विद्वान्, शब्दकी व्युत्पत्ति और अर्थके जानकार, सम्पूर्ण विद्याओंमें प्रवीण, मीमांसाके अनुकूल वेदवाक्योंके तात्पर्यको जाननेवाले, सर्ववादविशारद, हृष्ट-पुष्ट स्वरसे युक्त तथा मधुरभाषी थे, उन्हीं द्विजेन्द्रोंद्वारा किये गये वेदघोषसे प्रति-ध्वनित वह श्रेष्ठ ब्रह्मसदन देवसभाके समान सुशोभित होता था ॥ २४-२५ ॥

ते तत्र समुदुप्राप्य शृण्वन्तो वै ध्वनिं सुराः।
पूतान्यात्मशरीराणि मेनिरे तु न संशयः॥ २६ ॥

वहाँ पहुँचकर उस ध्वनिको सुनते हुए वे देवता निःसंदेह अपने शरीरोंको पवित्र मानने लगे ॥ २६ ॥

तूष्णींभूता एकचित्ता ब्रह्मण्योगतमानसाः।
विस्मयोत्फुल्लनयना निरीक्षन्तः परस्परम् ॥ २७॥
नमस्कुर्वन्ति च पुनर्गरुहं लोकगुरुं प्रभुम्।
मनसैव सुरश्रेष्ठाः पुरस्कृत्य तु कश्यपम् ॥ २८ ॥

वे श्रेष्ठ देवता मौन और एकचित्त हो ब्रह्माजीमें मन लगाये आश्चर्यचकित नेत्रोंसे एक-दूसरेको देखते हुए कश्यपजी-को आगे करके मन-ही-मन लोकगुरु भगवान् ब्रह्माको बारं-बार प्रणाम करने लगे ॥ २७-२८ ॥

पुनः सम्पूज्य परमं वेदोच्चारणनिःस्वनम्।
गम्भीरोदारमधुरं सुस्वरं हंसगद्गदम् ॥ २९॥
ऐक्यनानात्वसंयोगसमवायविशारदैः ।
लोकायतिकमुख्यैश्च शुश्रुवुः स्वनमीरितम् ॥ ३० ॥

गम्भीर, उदार, मधुर, उत्तम स्वरसे युक्त और हंसके समान गद्गद वाणीमें उच्चारित वेदपाठकी उस उत्तम ध्वनि-की बार-बार प्रशंसा करके एकत्ववाद ( जीव और ईश्वरकी एकताका प्रतिपादन ), नानात्ववाद ( जीव, ईश्वर और प्रकृति—इन तीन अनादि तत्त्वोंका प्रतिपादन ), संयोगवाद ( प्रकृति-पुरुषके संयोगसे सृष्टिका प्रतिपादन ) तथा समवाय-वादमें प्रवीण पुरुषों एवं लोकायतिकशास्त्रके ज्ञाता मुख्य-मुख्य विद्वानोंद्वारा उच्चारित शब्दको भी उन देवताओं-ने सुना ॥ २९-३० ॥

तत्र तत्र च विप्रेन्द्रान् नियतान् संशितव्रतान्।
जपहोमपरान् मुख्यान् ददृशुः कश्यपात्मजाः॥ ३१ ॥

कश्यपके उन पुत्रोंने वहाँ भिन्न-भिन्न स्थानोंमें बहुत-से

भविष्यपर्व ] षट्षष्टितमोऽध्यायः [ ९५५


ब्राह्मणशिरोमणियोंको, जो कठोर व्रतका पालन करनेवाले थे, नियमपूर्वक जप और होममें तत्पर देखा ॥ ३१ ॥

तस्यां सभायामास्ते स्म ब्रह्मा लोकपितामहः ।
सुरासुरगुरुः श्रीमान् विधिवद् देवमायया ॥ ३२ ॥

उस सभामें देवताओं और असुरोंके गुरु श्रीमान् लोकपितामह ब्रह्मा देवमायाके साथ विधिपूर्वक निवास करते थे ॥

उपासते च तत्रैनं प्रजानां पतयः प्रभुम् ।
दक्षः प्रचेताः पुलहो मरीचिश्च द्विजोत्तमः ॥ ३३ ॥
भृगुरत्रिवसिष्ठश्च गौतमो नारदस्तथा ।
मनुर्द्यौरन्तरिक्षं च वायुस्तेजो जलं मही ॥ ३४ ॥
शब्दस्पर्शौ च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च ।
प्रकृतिश्च विकाराश्च यच्चान्यत् कारणं महत् ॥ ३५ ॥
साङ्गोपाङ्गाश्चतुर्वेदाः सरहस्यपदक्रमाः ।
क्रियाश्च क्रतवश्चैव संकल्पः प्राण एव च ॥ ३६ ॥
एते चान्ये च बहवः स्वयम्भुवमुपस्थिताः ।
अर्थो धर्मश्च कामश्च द्वेषो दर्पश्च नित्यदा ॥ ३७ ॥

वहाँ इन भगवान् ब्रह्माकी समस्त प्रजापतिगण उपासना करते थे। दक्ष, प्रचेता (वरुण), पुलह, द्विजश्रेष्ठ मरीचि, भृगु, अत्रि, वसिष्ठ, गौतम, नारद, मनु, द्यौ, अन्तरिक्ष, वायु, तेज, जल, पृथ्वी, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, प्रकृति और उसके विकार, अन्यान्य महान् कारण, अङ्ग और उपाङ्गोंसहित चारों वेद, रहस्य, पद, क्रम, क्रिया, क्रतु, संकल्प तथा प्राण—ये और दूसरे भी बहुत-से भाव पदार्थ वहाँ ब्रह्माजीकी सेवामें (शरीर धारण करके) उपस्थित थे । अर्थ, धर्म, काम, द्वेष और दर्प आदि भाव भी वहाँ नित्य निवास करते थे ॥ ३३—३७ ॥

शक्रो वृहस्पतिश्चैव संवर्तो बुध एव च ।
शनैश्चरोऽथ राहुश्च ग्रहाः सर्वे ह्यशेषतः ॥ ३८ ॥

इन्द्र, वृहस्पति, संवर्त, बुध, शनैश्चर तथा राहु आदि सभी ग्रह वहाँ विद्यमान थे ॥ ३८ ॥

मरुतो विश्वकर्मा च नक्षत्राणि च भारत ।
दिवाकरश्च सोमश्च ग्रहाणं समुपासते ॥ ३९ ॥

भारत ! मरुद्गण, विश्वकर्मा, नक्षत्र, सूर्य और चन्द्रमा भी वहाँ ब्रह्माजीकी उपासना करते थे ॥ ३८ ॥

सावित्री दुर्गतारणी वाणी सप्तविधा तथा ।
सर्वाणि श्रुतिशास्त्राणि गाथाश्च नियमास्तथा ॥ ४० ॥
भाष्याणि सर्वशास्त्राणि देहवन्ति विशाम्पते ।

प्रजानाथ ! सावित्री, दुर्गम संकटसे तारनेवाली दुर्गा, (सात स्वरोंके भेदसे) सात प्रकारकी वाणी, समस्त श्रुति-शास्त्र (वैदिक साहित्य), गाथा, नियम, भाष्य तथा सम्पूर्ण शास्त्र—ये देह धारण करके ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित थे ॥

क्षणा लवा मुहूर्ताश्च दिवा रात्रिश्च भारत ॥ ४१ ॥
अर्धमासाश्च मासाश्च ऋतवः षट् तथैव च ।
संवत्सराश्चतुर्युगं मासा रात्रिश्चतुर्विधा ॥ ४२ ॥
कालचक्रं च यद् दिव्यमनित्यं ध्रुवमव्ययम् ।
एते चान्ये च बहवः स्वयम्भुवमुपस्थिताः ॥ ४३ ॥

भारत ! क्षण, लव, मुहूर्त, दिन, रात, पक्ष, मास, छः ऋतुएँ, संवत्सर, चारों युग, दिव्य मास, चार प्रकारकी रात्रि, दिव्य, अनित्य, ध्रुव एवं अव्यय कालचक्र—ये तथा अन्य बहुत-से पदार्थ (शरीर धारण करके) स्वयम्भू ब्रह्माकी सेवामें उपस्थित थे ॥ ४१-४३ ॥

ते प्रविष्टाः सभां दिव्यां ब्रह्मणः सर्वकामदाम् ।
कश्यपस्त्रिदशैः सार्धं पुत्रैर्धर्मविशारदैः ॥ ४४ ॥

वे सब आगन्तुक देवता ब्रह्माजीकी दिव्य सभामें, जो सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली थी, प्रविष्ट हुए । अपने धर्मविशारद देवजातीय पुत्रोंके साथ कश्यपजीने उस सभामें प्रवेश किया ॥ ४४ ॥

सर्वतेजोमयीं दिव्यां ब्रह्मर्षिगणसेविताम् ।
ब्राह्म्या श्रिया दीप्यमानमचिन्त्यं विगतक्लमम् ॥ ४५ ॥
ब्रह्माणं वीक्ष्य ते सर्वे आसीनं परमासने ।
जग्मुर्मूर्ध्ना शुभौ पादौ ब्रह्मणस्ते दिवौकसः ॥ ४६ ॥

सम्पूर्ण तेजसे सम्पन्न वह दिव्य सभा ब्रह्मर्षिगणोंसे सेवित थी । उसके भीतर एक उत्तम आसनपर अचिन्त्य, क्लेशहीन तथा ब्राह्मी शोभासे देदीप्यमान ब्रह्माजी विराजमान थे । उन्हें देखकर सभी देवताओंने उन ब्रह्माजीके शुभ चरणोंमें मस्तक रखकर उन्हें प्रणाम किया ॥ ४५-४६ ॥

शिरोभिः स्पृश्य चरणौ तस्य ते परमेष्ठिनः ।
विमुक्ताः सर्वपापेभ्यः शान्ता विगतकल्मषाः ॥ ४७ ॥

उन परमेष्ठी ब्रह्माजीके चरणोंका अपने मस्तकोंसे स्पर्श करके वे सब देवता समस्त पापोंसे मुक्त, शान्त और कल्मषरहित हो गये ॥ ४७ ॥

दृष्ट्वा तुतान् सुरान् सर्वान् कश्यपेन सहागतान् ।
आह ब्रह्मा महातेजा देवानां प्रभुरीश्वरः ॥ ४८ ॥

कश्यपजीके साथ आये हुए उन समस्त देवताओंको देखकर महातेजस्वी देवेश्वर भगवान् ब्रह्मा उनसे इस प्रकार बोले ॥ ४८ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे ब्रह्मलोकगमने षट्षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें देवताओंका ब्रह्मलोकमें गमनविषयक छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६६ ॥

९५६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

सप्तषष्टितमोऽध्यायः

ब्रह्माजीकी आज्ञासे कश्यप और अदितिसहित देवताओंका क्षीरसागरके उत्तर तटपर जाकर तपस्यामें संलग्न होना

ब्रह्मोवाच
यदर्थमिह सम्प्राप्ता भवन्तः सर्व एव हि।
विजानाम्यहमव्यग्र एतत् सर्वं महाबलाः ॥ १ ॥
**ब्रह्माजीने कहा—**महाबली देवताओ ! तुम सब लोग जिस उद्देश्यसे यहाँ आये हो, यह सब मैं व्यग्रतारहित होकर जानता हूँ ॥ १ ॥

भविष्यति च वः सोऽर्थः काङ्क्षितो यः सुरोत्तमाः।
बलेर्दानवमुख्यस्य यो विजेता भविष्यति ॥ २ ॥
सुरश्रेष्ठगण ! तुमलोग जिसकी इच्छा रखते हो, तुम्हारा वह मनोरथ अवश्य पूर्ण होगा। दानवराज बलिपर विजय पानेवाले जो परम पुरुष हैं, वे शीघ्र ही प्रकट होंगे ॥ २ ॥

न खल्वासुरसंघानामेको जेता स विश्वकृत्।
त्रैलोक्यस्यापि जेताऽसौ देवानापि चोत्तमः ॥ ३ ॥
वे विश्वस्रष्टा परमात्मा केवल असुरसमुदायोंको ही नहीं जीतेंगे, त्रिलोकीके राज्यको भी जीत लेंगे। वे देवताओंमें भी सबसे उत्तम हैं ॥ ३ ॥

धाता चैव हि लोकानां विश्वयोनिः सनातनः।
पूर्वं देवं सदा प्राहुर्हेमगर्भनिदर्शनम् ॥ ४ ॥
वे ही लोकोंके धाता (धारण-पोषण करनेवाले), सम्पूर्ण विश्वकी योनि एवं सनातन पुरुष हैं। विद्वान् पुरुष उन्हींको सदा आदि देवता कहते हैं। मैं हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) उन्हींका निदर्शन (प्रतिबिम्ब अथवा पुत्र) हूँ ॥ ४ ॥

आत्मा देवेन विभुना कृतोऽजेयो महात्मनः।
बलेरसुरमुख्यस्य विश्वस्य जगतस्तथा ॥ ५ ॥
प्रभवः स हि सर्वेषामस्माकमपि पूर्वजः।
अचिन्त्यः स हि विश्वात्मा योगयुक्तः परंतपः ॥ ६ ॥
उन सर्वव्यापी परमात्मदेवने ही असुरशिरोमणि महात्मा बलिके स्वरूपको अजेय बनाया है। वे ही सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्तिके कारण तथा हम सब देवताओंके भी पूर्वज हैं। शत्रुओंको संताप देनेवाले वे योगयुक्त विश्वात्मा अचिन्त्य (मन और बुद्धिके अविषय) हैं ॥ ५-६ ॥

तं देवापि महात्मानं न विदुः कोऽप्यसाविति।
वेद्यात्मानं च विश्वं च स देवः पुरुषोत्तमः ॥ ७ ॥
देवता भी उन परमात्माके विषयमें यह नहीं जानते कि वे कौन हैं ? किंतु वे पुरुषोत्तमदेव अपनेको तथा सम्पूर्ण विश्वको भी जानते हैं ॥ ७ ॥

तस्यैव तु प्रसादेन प्रवक्ष्येऽहं परां गतिम्।
यत्र योगं समास्थाय तपश्चरति दुष्करम् ॥ ८ ॥
उन्हींकी कृपा-प्रसादसे मैं उनकी परा गति (उत्कृष्ट आश्रय) का पता बता रहा हूँ, जहाँ योगका आश्रय लेकर वे दुष्कर तपस्या करते हैं ॥ ८ ॥

क्षीरोदस्योत्तरे कूले उदीच्यां दिशि देवताः।
अमृतं नाम परमं स्थानमाहुर्मनीषिणः ॥ ९ ॥
देवताओ ! मनीषी पुरुष कहते हैं कि उत्तर दिशामें क्षीरसागरके उत्तर तटपर 'अमृत' नामक उत्कृष्ट स्थान (परम पद) है ॥ ९ ॥

भवन्तस्तत्र वै गत्वा तपसा संशितव्रताः।
अमृतं स्थानमासाद्य तपश्चरंत दुष्करम् ॥ १० ॥
तुमलोग वहीं जाकर तपस्यापूर्वक कठोर व्रतका पालन करो। उस 'अमृत' स्थानमें पहुँचकर दुष्कर तपस्यामें लग जाओ ॥ १० ॥

तत्र श्रोष्यथ विस्पष्टां स्निग्धगम्भीरनिःस्वनाम्।
उष्णेगे तोयपूर्णस्य तोयदस्य समस्वनाम् ॥ ११ ॥
युक्ताक्षरपदस्निग्धां रम्यामभयदां शिवाम्।
वाणीं परमसंस्कारां वरदां ब्रह्मवादिनीम् ॥ १२ ॥
दिव्यां सरस्वतीं सत्यां सर्वकल्मषनाशिनीम्।
सर्वदेवाधिदेवस्य भाषितां भावितात्मनः ॥ १३ ॥
तस्य व्रतसमाप्तौ तु यावद् व्रतविसर्जनम्।
अमोघस्य तु देवस्य विश्वेदेवा महात्मनः ॥ १४ ॥
स्वागतं वः सुरश्रेष्ठा मत्संकाशे व्यवस्थिताः।
कस्य किं वा वरं देवा ददामि वरदः स्थितः ॥ १५ ॥
तं कश्यपोऽदितिश्चैव वरं गृह्णीत वै ततः।
प्रणम्य शिरसा पादौ तस्मै योगात्मने तदा ॥ १६ ॥
भवानेव च नः पुत्रो भवत्विति न संशयः।
सर्वदेवगण ! वहाँ व्रतकी समाप्ति होनेपर उस व्रतके विसर्जनसे पूर्व तुम्हें वर्षाकालके सजल जलधरकी भाँति स्निग्ध एवं गम्भीर स्वरमें उन अमोघ परमात्माकी सुस्पष्ट वाणी सुनायी देगी, जो उपयुक्त अक्षरों और पदोंसे युक्त, स्नेहपूर्ण, रमणीय, अभयदायिनी, मङ्गलकारिणी, उत्तम संस्कारसे सम्पन्न, वरदायक तथा ब्रह्मवादिनी होगी। उन शुद्ध अन्तःकरणवाले सर्वदेवाधिदेव भगवान्की कही हुई वह दिव्य सत्य वाणी सम्पूर्ण कल्मषोंका नाश करनेवाली होगी। वे कहेंगे—'मेरे पास खड़े हुए सुरश्रेष्ठगण ! तुम्हारा स्वागत है ! मैं वर देनेके लिये खड़ा हूँ, बोलो किसको कौन-सा वर दूँ ?'

भविष्यपर्व ]अष्टषष्टितमोऽध्यायः९५७
उस समय कश्यप, अदिति और तुम सब लोग उनसे वर ग्रहण करना। कश्यप और अदिति उन योगात्मा श्रीहरिके चरणोंमें मस्तक झुकाकर प्रणाम करनेके पश्चात् निस्संदेह यही बात कहे कि 'आप ही मेरे पुत्र होकर प्रकट हों' ॥११—१६३॥<br><br>उक्तश्च परया भक्त्या तथास्त्विति स वक्ष्यति ॥ १७ ॥<br>देवा ब्रुवन्तु तं सर्वे भ्राता नस्त्वं भवेति ह।<br>तथास्त्विति च संश्रीमान् वक्ष्यते सर्वलोककृत् ॥ १८ ॥<br>परम भक्तिभावसे ऐसी बात कहनेपर वे भगवान् 'तथास्तु-ऐसा ही होगा' यह कहेंगे, सब देवता भी उनसे यही कहें कि आप हमारे भाई हो जायँ। तब वे सम्पूर्ण लोकोंके स्रष्टा श्रीमान् भगवान् 'तथास्तु' कहकर तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार कर लेंगे ॥ १७-१८ ॥<br><br>तस्मादेवं गृहीत्वा तु वरं त्रिदशसत्तमाः।<br>कृतकृत्याः पुनः सर्वे गच्छध्वं स्वं स्वमालयम् ॥ १९ ॥<br>श्रेष्ठ देवताओ ! इस प्रकार उनसे वर लेकर कृतकृत्य हो पुनः तुम सब लोग अपने-अपने स्थानको चले जाना ॥ १९ ॥<br><br>तथास्त्विति सुराः सर्वे कश्यपोऽदितिरेव च।<br>वन्दित्वा ब्रह्मचरणौ गताः सौम्यां दिशं प्रति ॥ २० ॥<br>तब सब देवता, कश्यप और अदितिने 'ऐसा ही होगा' यह कहकर ब्रह्माजीके चरणोंमें प्रणाम किया और सब-के-सब उत्तर दिशाकी ओर चल लिये ॥ २० ॥<br><br>तेऽचिरेणैव सम्प्राप्ताः क्षीरोदस्योत्तरं तटम्।<br>यथोद्दिष्टं भगवता ब्रह्मणा ब्रह्मवादिना ॥ २१ ॥<br>ब्रह्मवादी भगवान् ब्रह्माने जैसा बताया था, उसके अनुसार वे शीघ्र ही क्षीरसागरके उत्तर तटपर चले गये ॥तेऽतीत्य सागरान् सर्वान् पर्वतांश्च बहून् क्षणात्।<br>नद्यश्च विविधा दिव्याः पृथिव्यां सुरसत्तमाः ॥ २२ ॥<br>पश्यन्ति च सुघोरां वै सर्वसत्त्वविवर्जिताम्।<br>अभास्कराममर्यादां तमसा संवृतां दिशम् ॥ २३ ॥<br>वे श्रेष्ठतम देवता क्षणभरमे समस्त सागरों, बहुसंख्यक पर्वतों तथा नाना प्रकारकी दिव्य नदियोंको लाँघकर जब भूतलपर स्थित हुए, तब उन्हें अत्यन्त भयंकर, समस्त प्राणियों-से रहित, सूर्यके प्रकाशसे शून्य, सीमाहीन एवं अन्धकारसे आच्छन्न दिशा दृष्टिगोचर हुई ॥ २२-२३ ॥<br><br>अमृतं स्थानमासाद्य कश्यपेन सुराः सह।<br>दीक्षिताः कामदं दिव्यं व्रतं वर्षसहस्रकम् ॥ २४ ॥<br>प्रसादार्थं सुरेशाय तस्मै योगाय धीमते।<br>नारायणाय देवाय सहस्राक्षाय धीमते ॥ २५ ॥<br>कश्यपके साथ अमृतस्थानमें पहुँचकर समस्त देवताओंग्ने उन योगस्वरूप बुद्धिमान् देवेश्वर सहस्रलोचनधारी नारायण-देवकी प्रसन्नताके उद्देश्यसे एक सहस्र वर्षोंके लिये दिव्य कामद-व्रतकी दीक्षा ली ॥ २४-२५ ॥<br><br>ब्रह्मचर्येण मौनेन स्थानवीरासनेन च।<br>दमेन च सुराः सर्वे तपो दुश्चरमास्थिताः ॥ २६ ॥<br>वे सब देवता ब्रह्मचर्य-पालन, मौनधारण, वीरासनग्रहण तथा मन और इन्द्रियोंके संयमद्वारा दुष्कर तपस्यामें संलग्न हो गये ॥ २६ ॥<br><br>कश्यपस्तत्र भगवान् प्रसादार्थं महात्मनः।<br>उदीरयति वेदोक्तं यमाहुः परमं स्तवम् ॥ २७ ॥<br>वहाँ उन परमात्माकी प्रसन्नताके लिये भगवान् कश्यप एक वेदोक्त स्तोत्रका पाठ करने लगे, जिसे 'परमस्तव' कहते हैं ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे सप्तषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारविषयक सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६७ ॥


अष्टषष्टितमोऽध्यायः

कश्यपद्वारा परमपुरुष परमात्माका स्तवन

कश्यप उवाच

नमोऽस्तु देवदेवेश एकशृङ्ग वराह वृषाकपि वृषसिन्धो वृषाकपे सुरवृषभ सुरनिर्मित अनि-र्मित भद्रकपिल विष्वक्सेन ध्रुव धर्म धर्मराज वैकुण्ठ त्रेतावर्त अनादिमध्यनिधन धनंजय शुचिश्रवः अग्निहृज वृष्णिज अज अजयामृते-शय सनातन विधातस्त्रिकाम त्रिधाम त्रिककृत् ककुद्मिन् दुन्दुभे महानाभ लोकनाभ पद्मनाभ विरिञ्चे वरिष्ठ बहुरूप विरूप विश्वरूपाक्षया-क्षर सत्याक्षर हंसाक्षर हव्यभुक् खण्डपरशोशुक मुञ्जकेश हंस महाहंस महदक्षर हृषीकेश सूक्ष्म परसूक्ष्म तुराषाड् विश्वमूर्ते सुराग्रज नील निस्तमो विरजस्तमोरजःसत्त्वधाम सर्व-लोकप्रतिष्ठ शिपिविष्ट सुतपस्तपोऽग्र अग्र अग्रज धर्मनाभ गभस्तिनाभ धर्मनेमे सत्य-धाम सत्याक्षर गभस्तिनेमे विपाप्मन् चन्द्ररथ त्वमेव समुद्रावासाः अजैकपात् सहस्रशीर्ष सहस्रसम्मित महाशीर्ष सहस्रदृक् सहस्रपात् अधोमुख महामुख महापुरुष पुरुषोत्तम सहस्र-बाहो सहस्रमूर्ते सहस्रास्य सहस्राक्ष सहस्र-
९५८श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

...भुज सहस्रभव सहस्रशस्त्वामाहुर्वेदाः ॥ १ ॥

सहस्रलोचन, सहस्रभुज तथा सहस्रों रूपोंमें प्रकट होनेवाले हैं, वेद आपका सहस्रों प्रकारसे वर्णन करते हैं ॥ १ ॥

कश्यपने कहा— देवदेवेश्वर ! आपको नमस्कार है। आप एक सींग धारण करनेवाले मत्स्य एवं वराहरूप हैं। धर्ममयी किरणोंसे प्रकाशित होते हैं। धर्मके सागर हैं। जलका वर्षण और शोषण करनेवाले सूर्य हैं। देवताओंमें श्रेष्ठ हैं। देवताओंके स्रष्टा हैं। आपका किसी अन्यसे निर्माण नहीं हुआ है—आप नित्यसिद्ध हैं। कल्याणमय कपिलस्वरूप हैं। युद्धके लिये की हुई तैयारी मात्रसे ही आप दैत्यसेनाको तितर-बितर कर डालते हैं। आप ध्रुव, धर्म, धर्मराज एवं वैकुण्ठधामके अधिपति हैं। गार्हपत्यादि त्रिविध अग्निके आवर्तक, आदि, मध्य और अन्तसे रहित, धनंजय (अग्नि), पवित्र कीर्तिवाले, अग्निह (कार्तिकेयस्वरूप), वृष्णिज (श्रीकृष्ण), अजन्मा, अजय (अपराजित), अमृतेशय (जलमें शयन करनेवाले) और सनातन पुरुष हैं। आप ही विधाता, त्रिकाम (तीनों लोकोंकी कामनाके विषय अथवा तीनों वेदोंकी श्रुतियोंके लिये कमनीय), त्रिधाम (त्रिलोकी-के आश्रय), त्रिककुद् (धर्म, ज्ञान और वैराग्यरूप तीन कंधोंवाले), ककुद्मी (मोटे कंधेवाले), दुन्दुभे (विजय-घोष करनेवाले वाद्यरूप), महानाभ (बड़ी नाभिवाले), लोकनाभ (अपने नाभिकमलसे सम्पूर्ण लोकको प्रकट करने-वाले), पद्मनाभ (अपनी नाभिसे कमलको प्रकट करनेवाले), विरिञ्चि (ब्रह्मस्वरूप), वरिष्ठ (सर्वश्रेष्ठ), बहुरूपधारी, विरूप (विविध रूप धारण करनेवाले), विश्वरूप, अक्षय, अक्षर (अविनाशी), सत्याक्षर (सत्य एवं अविनाशी अथवा सत्य अक्षरवाले वेदरूप), हंसाक्षर (अजपा मन्त्ररूप), हव्यभोक्ता (अग्नि), खण्डपरशु (शिव), शुक्र (बल-वीर्यरूप), मुञ्जकेश (मूँजके समान केशवाले), हंस और महाहंस हैं। महान् अक्षर प्रणव, इन्द्रियोंके प्रेरक, सूक्ष्म, परमसूक्ष्म, इन्द्र, विश्वरूप, देवताओंके अग्रज, नीलवर्ण, तमोगुण और रजोगुणसे रहित, तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुणके आश्रय, सम्पूर्ण लोकोंमें प्रतिष्ठित, शिपिविष्ट (सूर्य-किरणोंमें स्थित रहनेवाले), उत्तम तपस्यावाले, श्रेष्ठ तपोरूप, अग्र (सबके आदि), अग्रज (सबसे प्रथम प्रकट), धर्मनाभ (धर्मस्वरूप नाभिवाले), गभस्तिनाभ (किरणमयी नाभिवाले), धर्मनेमि (धर्मचक्रके प्रवर्तक), सत्यधाम (वैकुण्ठस्वरूप), सत्याक्षर (वेदरूप), गभस्तिनेमि (रश्मिमण्डलसे प्रकाशित), पापरहित तथा चन्द्र (समष्टि मन) रूपी रथपर आरूढ परमेश्वर ! आप ही समुद्रवासा (समुद्ररूपी वस्त्र धारण करनेवाले) हैं। आप ही अजैकपात् (ग्यारह रुद्रोंमेंसे एक अथवा पूर्वभाद्रपदानक्षत्र), सहस्रों मस्तकवाले, सहस्रसंख्यक, महान् मस्तक धारण करनेवाले, सहस्रनेत्र, सहस्रचरण, अधोमुख, महामुख, महापुरुष, पुरुषोत्तम, सहस्रबाहु, सहस्रमूर्ति, सहस्रमुख,


विश्वेदेव विश्वसम्भव सर्वेषामेव देवानां
सौभग आदौ गतिः विश्वं त्वामाप्यायनः
विश्वं त्वामाहुः पुष्पहासः परमवरदस्त्वमेव
वौषट् ओंकार वषट्कार त्वामेकमाहुरग्र्यं मखभागप्राशिनम् ॥ २ ॥

आप ही विश्वेदेवस्वरूप, विश्वको उत्पन्न करनेवाले, सम्पूर्ण देवताओंके सौभाग्यस्वरूप एवं धर्मरूप हैं। आप ही सम्पूर्ण विश्वको पुष्ट एवं तृप्त करनेवाले हैं। विद्वान् पुरुष आपको ही विश्वरूप बताते हैं। आपका हास पुष्पोंके विकास-की भाँति सुशोभित होता है। आप ही सर्वोत्तम वरदायक देवता हैं। आप ही वौषट्, ओङ्कार और वषट्कार हैं। एक-मात्र आपको ही सर्वश्रेष्ठ यज्ञभागका भोक्ता बताया गया है ॥

शतधार सहस्रधार भूर्दं भुवर्दे स्वर्दे भूर्भुवः-
स्वर्दे त्वमेव भूतं भुवनं त्वं स्वधा त्वमेव ब्रह्मसख
ब्रह्ममय ब्रह्मादिस्त्वमेव ॥ ३ ॥

आप ही शतधार और सहस्रधार (सैकड़ों, हजारों धाराओंमें अमृतकी वर्षा करनेवाले) सोम हैं। आप ही भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोकको देनेवाले हैं। आप उक्त तीनों लोकोंका एक साथ ही दान करनेके कारण भूर्भुवःस्वर्दे (त्रिलोकप्रद) कहे गये हैं। आप ही भूत एवं भुवन हैं। आप ही स्वधा हैं। आप ही ब्रह्मसख (ब्रह्माजीके सखा) और ब्रह्ममय हैं तथा ब्रह्माजीके आदि कारण भी आप ही हैं ॥

द्यौरसि पृथिव्यसि पूषासि मातरिश्वासि घर्मोऽसि
मघवासि होता पोता नेता हन्ता मन्ता होम्यहोता
परात्परस्त्वं होम्यस्त्वमेव ॥ ४ ॥

आप ही द्युलोक हैं, पृथ्वी हैं, पूषा नामक आदित्य हैं, मातरिश्वा (वायु) हैं, धर्म हैं, इन्द्र हैं, होता (हवनकर्ता), पोता (एक ऋत्विज्), नेता (नायक अथवा अगुवा), हन्ता (दुष्टोंका वध करनेवाले), मन्ता (सम्मान देनेवाले), हवनीय पदार्थका होम करनेवाले, परात्पर परमात्मा तथा हवनीय पदार्थरूप हैं ॥ ४ ॥

आपोऽसि विश्ववाग् धात्रा परमेण धास्रः त्वमेव
दिग्ध्व्यः स्रुक् स्रुग्भाण्डस्त्वं गण इष्टोऽसि इज्योऽसि
ईड्योऽसि त्वष्टा त्वमसि समिद्धस्त्वमेव गतिर्गति-
मतामसि मोक्षोऽसि योगोऽसि गुह्योऽसि सिद्धोऽसि
धन्योऽसि धातासि परमोऽसि यशोऽसि सोमोऽसि
यूपोऽसि दक्षिणासि दीक्षासि विश्वमसि ॥ ५ ॥

आप ही जल हैं। सम्पूर्ण विश्वकी वाणी हैं। विधाताने उत्तम यज्ञके निमित्त अग्निकी तृप्तिके लिये दिशाओंसे जिस

भविष्यपर्व ]एकोनसप्ततितमोऽध्यायः९५९

स्रुक् का संग्रह किया, वह आपका ही स्वरूप है। स्रुग्भाण्ड (स्रुक् आदि यज्ञीयसामग्री) भी आप ही हैं। आप ही गण (ऋत्विजोंका समुदाय) हैं। आपका ही यज्ञोंद्वारा यजन किया गया है। आप ही इज्य (यज्ञोंद्वारा पूजनीय) हैं। ईड्य (स्तवनीय!) हैं। आप ही त्वष्टा (विश्वकर्मा) हैं। आप ही प्रज्वलित अग्नि हैं। आप ही जङ्गम प्राणियोंकी गति हैं तथा आप ही मोक्ष हैं, योग हैं, गुह्य हैं, सिद्ध हैं, धन्य हैं, धाता हैं, परम (उत्कृष्ट) हैं, यज्ञ हैं, सोम हैं, यूप हैं, दक्षिणा हैं, दीक्षा हैं और सब कुछ हैं ॥ ५ ॥

स्थविष्ठ स्थविर विश्व तुराषाड् हिरण्यगर्भ हिरण्यनाभ हिरण्यनारायण नारायणान्तर नृणामयन आदित्यवर्ण आदित्यतेजः महापुरुष सुरोत्तम आदिदेव पद्मनाभ पद्मशय पद्माक्ष पद्मगर्भ हिरण्याग्रकेश शुक्ल विश्वदेव विश्वतोमुख विश्वाक्ष विश्वसम्भव विश्वभुक्त्वमेव ॥ ६ ॥

आप अत्यन्त स्थूल और वृद्ध हैं, जाग्रत्-अवस्थाके अभिमानी विश्वसंज्ञक पुरुष हैं, इन्द्र हैं, हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) हैं। आपकी नाभि में हिरण्य है—इसी लिये आप हिरण्यनारायण कहलाते हैं और आप अन्तर्यामी नारायण हैं, नरों (मनुष्यों) के अयन (आश्रय) हैं। आपका वर्ण आदित्यके समान कान्तिमान् है। आप सूर्यके समान तेजस्वी हैं, आप ही महापुरुष, सुरश्रेष्ठ, आदिदेव, पद्मनाभ (नाभिसे कमल उत्पन्न करनेवाले), कमलपर शयन करनेवाले और कमललोचन हैं। पद्मको गर्भसे प्रकट करनेके कारण पद्मगर्भ कहलाते हैं। आपके सुन्दर केश सुनहरे हैं। आपकी अङ्गकान्ति भास्वरशुक्ल है। आप सम्पूर्ण देवस्वरूप हैं। आपके सब ओर मुख और सब ओर नेत्र हैं। आप ही इस विश्वके उत्पादक तथा जगत्के भोक्ता (रक्षक और संहारक) हैं ॥ ६ ॥

भूरिविक्रमं चक्रक्रम त्रिभुवनं सुविक्रम खविक्रम खर्विक्रम बभ्रुः सुविभुः प्रभाकरः शम्भुः स्वयम्भूश्च भूतादिर्भूतात्मन् महाभूत विश्वभुक् त्वमेव विश्वगोप्तासि विश्वम्भर पवित्रमसि हविर्विशारद हविःकर्मा अमृतेन्धन सुरासुरगुरो महादेव नरदेव ऊर्ध्वकर्मन् पूतात्मन् अमृतेश दिवःस्पृग् विश्वस्य पते घृताच्यसि अनन्तकर्मन् द्रुहिणवंश स्ववंश विश्वपास्त्वं त्वमेव विश्वं बिभर्षि वरार्थिनो नस्त्रायस्वेति ॥ ७ ॥

आपका पराक्रम बहुत है। आप चक्रका संचालन करनेवाले हैं। तीनों लोक आपके ही स्वरूप हैं। आपका विक्रम उत्तम है। विक्रम आपका स्वरूप है। आप स्वर्लोकको लाँघ जानेवाले हैं। आप बभ्रु (अग्नि एवं विष्णुरूप), सुविभु (व्यापक), प्रभाकर (सूर्यरूप), शम्भु (कल्याणमय शिव), स्वयम्भू (ब्रह्मा), भूतादि (महत्तत्त्व अथवा सम्पूर्ण भूतोंके आदि कारण), भूतात्मा (समस्त प्राणियोंके आत्मा), महाभूत (परमात्मा अथवा पञ्च महाभूतस्वरूप), विश्वभोक्ता और विश्वपालक हैं। विश्वम्भर ! आप पवित्र हैं। सात हविर्यज्ञ-संस्थाओंके विशेषज्ञ हैं। हविष्यके होममें तत्पर रहनेवाले हैं। अमृत (घी) रूपी ईंधनसे प्रज्वलित होनेवाले अग्नि हैं। सुरासुरगुरो ! महादेव ! नरदेव ! आपके कर्म ऊर्ध्वगति प्रदान करनेवाले हैं। पूतात्मन् ! आप अमृतपदके स्वामी हैं। द्युलोकका स्पर्श करनेवाले हैं। विश्वपते ! आप घृताची (घीकी आहुति डालनेवाली स्रुवा) हैं। आपके कर्म अनन्त हैं। ब्रह्मा आपके वंशज हैं। आप स्ववंश (स्वयम्भू) हैं। आप ही विश्वके पालक हैं तथा आप ही विश्वका धारण-पोषण करते हैं। हम वरकी अभिलाषा रखने वाले सेवकोंकी आप रक्षा करें ॥ ७ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे महापुरुषस्तवे अष्टषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६८ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें महापुरुषकी स्तुतिविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६८ ॥


एकोनसप्ततितमोऽध्यायः

कश्यप, अदिति और देवताओंको भगवान् विष्णुका वरदान देना और अदितिके गर्भसे प्रकट होना

वैशम्पायन उवाच
नारायणस्तु भगवान्छ्रुत्वैतत् परमं स्तवम् ।
ब्रह्मज्ञेन द्विजेन्द्रेण कश्यपेन समीरितम् ॥ १ ॥
स्निग्धगम्भीरनिर्घोषजीमूतस्वननिःस्वनम् ।
मनसा प्रीतियुक्तेन विबुधानां महात्मनाम् ॥ २ ॥
उवाच वचनं सम्यग् हृष्टपुष्टपदाक्षरम् ।
आकाशाच्छुश्रुवे शब्दो दर्शनं नोपलभ्यते ।
श्रीमान् प्रीतमना देवः प्रोवाच प्रभुरीश्वरः ॥ ३ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! ब्रह्मवेत्ता विप्रवर कश्यपद्वारा किये गये इस परमस्तवको सुनकर भगवान् नारायणके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई; वे उन महात्मा देवताओंसे मेघगर्जनाके समान स्निग्ध-गम्भीर घोष करते हुए हृष्ट-पुष्ट पद और अक्षरवाली उत्तम वाणीमें बोले; उस समय आकाशसे केवल उनका शब्दमात्र सुनायी देता